अंग 1057

अंग
1057
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਵਖਾਣੈ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਨਾਮਿ ਰਤਾ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਚੁਕਾਹਾ ਹੇ ॥੮॥
ਗੁਰ ਸੇਵਾ ਤੇ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਪਾਏ ॥
ਹਉਮੈ ਮੇਰਾ ਆਪੁ ਗਵਾਏ ॥
ਆਪੇ ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰੇ ਸੁਖਦਾਤਾ ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦੇ ਸੋਹਾ ਹੇ ॥੯॥
ਗੁਰ ਕਾ ਸਬਦੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਹੈ ਬਾਣੀ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਵਖਾਣੀ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਸਚਾ ਵਸੈ ਘਟ ਅੰਤਰਿ ਸੋ ਘਟੁ ਨਿਰਮਲੁ ਤਾਹਾ ਹੇ ॥੧੦॥
ਸੇਵਕ ਸੇਵਹਿ ਸਬਦਿ ਸਲਾਹਹਿ ॥
ਸਦਾ ਰੰਗਿ ਰਾਤੇ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵਹਿ ॥
ਆਪੇ ਬਖਸੇ ਸਬਦਿ ਮਿਲਾਏ ਪਰਮਲ ਵਾਸੁ ਮਨਿ ਤਾਹਾ ਹੇ ॥੧੧॥
ਸਬਦੇ ਅਕਥੁ ਕਥੇ ਸਾਲਾਹੇ ॥
ਮੇਰੇ ਪ੍ਰਭ ਸਾਚੇ ਵੇਪਰਵਾਹੇ ॥
ਆਪੇ ਗੁਣਦਾਤਾ ਸਬਦਿ ਮਿਲਾਏ ਸਬਦੈ ਕਾ ਰਸੁ ਤਾਹਾ ਹੇ ॥੧੨॥
ਮਨਮੁਖੁ ਭੂਲਾ ਠਉਰ ਨ ਪਾਏ ॥
ਜੋ ਧੁਰਿ ਲਿਖਿਆ ਸੁ ਕਰਮ ਕਮਾਏ ॥
ਬਿਖਿਆ ਰਾਤੇ ਬਿਖਿਆ ਖੋਜੈ ਮਰਿ ਜਨਮੈ ਦੁਖੁ ਤਾਹਾ ਹੇ ॥੧੩॥
ਆਪੇ ਆਪਿ ਆਪਿ ਸਾਲਾਹੇ ॥
ਤੇਰੇ ਗੁਣ ਪ੍ਰਭ ਤੁਝ ਹੀ ਮਾਹੇ ॥
ਤੂ ਆਪਿ ਸਚਾ ਤੇਰੀ ਬਾਣੀ ਸਚੀ ਆਪੇ ਅਲਖੁ ਅਥਾਹਾ ਹੇ ॥੧੪॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਦਾਤੇ ਕੋਇ ਨ ਪਾਏ ॥
ਲਖ ਕੋਟੀ ਜੇ ਕਰਮ ਕਮਾਏ ॥
ਗੁਰ ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਘਟ ਅੰਤਰਿ ਵਸਿਆ ਸਬਦੇ ਸਚੁ ਸਾਲਾਹਾ ਹੇ ॥੧੫॥
ਸੇ ਜਨ ਮਿਲੇ ਧੁਰਿ ਆਪਿ ਮਿਲਾਏ ॥
ਸਾਚੀ ਬਾਣੀ ਸਬਦਿ ਸੁਹਾਏ ॥
ਨਾਨਕ ਜਨੁ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ਨਿਤ ਸਾਚੇ ਗੁਣ ਗਾਵਹ ਗੁਣੀ ਸਮਾਹਾ ਹੇ ॥੧੬॥੪॥੧੩॥
गुर कै सबदि हरि नामु वखाणै ॥
अनदिनु नामि रता दिनु राती माइआ मोहु चुकाहा हे ॥८॥
गुर सेवा ते सभु किछु पाए ॥
हउमै मेरा आपु गवाए ॥
आपे क्रिपा करे सुखदाता गुर कै सबदे सोहा हे ॥९॥
गुर का सबदु अंम्रित है बाणी ॥
अनदिनु हरि का नामु वखाणी ॥
हरि हरि सचा वसै घट अंतरि सो घटु निरमलु ताहा हे ॥१०॥
सेवक सेवहि सबदि सलाहहि ॥
सदा रंगि राते हरि गुण गावहि ॥
आपे बखसे सबदि मिलाए परमल वासु मनि ताहा हे ॥११॥
सबदे अकथु कथे सालाहे ॥
मेरे प्रभ साचे वेपरवाहे ॥
आपे गुणदाता सबदि मिलाए सबदै का रसु ताहा हे ॥१२॥
मनमुखु भूला ठउर न पाए ॥
जो धुरि लिखिआ सु करम कमाए ॥
बिखिआ राते बिखिआ खोजै मरि जनमै दुखु ताहा हे ॥१३॥
आपे आपि आपि सालाहे ॥
तेरे गुण प्रभ तुझ ही माहे ॥
तू आपि सचा तेरी बाणी सची आपे अलखु अथाहा हे ॥१४॥
बिनु गुर दाते कोइ न पाए ॥
लख कोटी जे करम कमाए ॥
गुर किरपा ते घट अंतरि वसिआ सबदे सचु सालाहा हे ॥१५॥
से जन मिले धुरि आपि मिलाए ॥
साची बाणी सबदि सुहाए ॥
नानक जनु गुण गावै नित साचे गुण गावह गुणी समाहा हे ॥१६॥४॥१३॥

हिन्दी अर्थ: गुरू के शबद में जुड़ के वह मनुष्य परमात्मा का नाम उचारता है। वह दिन-रात हर वक्त परमात्मा के नाम में मस्त रहता है। (और। इस तरह अपने अंदर से) माया का मोह दूर कर लेता है। 8। हे भाई ! गुरू की शरण पड़ने वाले मनुष्य हरेक चीज हासिल कर लेते हैं। वह मनुष्य अहंकार-ममता स्वै भाव दूर कर लेता है। हे भाई ! जिस मनुष्य पर सुखों का दाता प्रभू कृपा करता है। वह मनुष्य गुरू के शबद की बरकति से अपना आत्मिक जीवन सुंदर बना लेता है। 9। हे भाई ! गुरू का शबद आत्मिक जीवन देने वाली बाणी है। (इसमें जुड़ के) हर वक्त परमात्मा का नाम सिमरा कर। हे भाई ! जिस मनुष्य के हृदय में सदा कायम रहने वाला परमात्मा आ बसता है। उस मनुष्य का वह हृदय पवित्र हो जाता है। 10। हे भाई ! (प्रभू के) सेवक (गुरू के) शबद से (प्रभू की) सेवा-भगती करते हैं। सिफत सालाह करते हैं। प्रभू के प्रेम-रंग में मस्त हो के सदा प्रभू के गुण गाते रहते हैं। हे भाई ! जिस मनुष्य को प्रभू स्वयं ही मेहर करके (गुरू के) शबद में जोड़ता है। उस मनुष्य के मन में (मानो) चंदन की सुगंधी पैदा हो जाती है। 11। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के शबद से अकथ प्रभू के गुण बयान करता रहता है। सदा-स्थिर बेपरवाह प्रभू की सिफत-सालाह करता रहता है। गुणों की दाति करने वाला प्रभू स्वयं ही उसको गुरू के शबद में जोड़ के रखता है। उसको शबद का आनंद आने लग जाता है। 12। हे भाई ! मन का मुरीद मनुष्य जीवन के सही रास्ते से टूट जाता है (भटकता फिरता है। उसको कोई) ठिकाना नहीं मिलता। (पर उसके भी क्या वश। उसके पिछले किए कर्मों के अनुसार) जो कुछ धुर से उसके माथे पर लिखा गया है वह कर्म वह अब कर रहा है। माया (के रंग में) मस्त होने के कारण वह (अब भी) माया की तलाश ही करता फिरता है। कभी मरता है कभी पैदा होता है (कभी हर्ष और कभी शोक)। ये दुख उसे लगे रहते हैं। 13। हे भाई ! (अगर कोई भाग्यशाली सिफत-सालाह कर रहा है। तो उसमें बैठा भी प्रभू) स्वयं ही स्वयं सिफत-सालाह कर रहा है। हे प्रभू ! तेरे गुण तेरे में ही हैं (तेरे जैसा और कोई नहीं); हे प्रभू ! तू स्वयं अॅटल है। तेरी सिफत सालाह की बाणी अॅटल है। तू स्वयं ही अॅलख और अपार है। 14। सिफत-सालाह की दाति देने वाले गुरू के बिना वह नाम की दाति हासिल नहीं कर सकता। हे भाई ! अगर (कोई मनमुख नाम के बिना और-और धार्मिक निहित किए) कर्म करता फिरे। हे भाई ! गुरू की कृपा से जिस मनुष्य के हृदय में हरी-नाम आ बसता है। वह मनुष्य गुरू के शबद से सदा-स्थिर प्रभू की सिफत-सालाह करता रहता है। 15। हे भाई ! जिन मनुष्यों को धुर से अपने हुकम से प्रभू अपने चरणों में मिलाता है वही मिलते हैं। सिफत सालाह की बाणी के द्वारा गुरू के शबद से उनके जीवन सुंदर हो जाते हैं। हे नानक ! प्रभू का सेवक सदा-स्थिर प्रभू के गुण गाता है। आओ। हम भी गुण गाएं। (जो मनुष्य गुण गाता है। वह) गुणों के मालिक प्रभू में लीन हो जाता है। 16। 4। 13।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਨਿਹਚਲੁ ਏਕੁ ਸਦਾ ਸਚੁ ਸੋਈ ॥
ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਤੇ ਸੋਝੀ ਹੋਈ ॥
ਹਰਿ ਰਸਿ ਭੀਨੇ ਸਦਾ ਧਿਆਇਨਿ ਗੁਰਮਤਿ ਸੀਲੁ ਸੰਨਾਹਾ ਹੇ ॥੧॥
ਅੰਦਰਿ ਰੰਗੁ ਸਦਾ ਸਚਿਆਰਾ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਹਰਿ ਨਾਮਿ ਪਿਆਰਾ ॥
ਨਉ ਨਿਧਿ ਨਾਮੁ ਵਸਿਆ ਘਟ ਅੰਤਰਿ ਛੋਡਿਆ ਮਾਇਆ ਕਾ ਲਾਹਾ ਹੇ ॥੨॥
ਰਈਅਤਿ ਰਾਜੇ ਦੁਰਮਤਿ ਦੋਈ ॥
ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਸੇਵੇ ਏਕੁ ਨ ਹੋਈ ॥
ਏਕੁ ਧਿਆਇਨਿ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਪਾਇਨਿ ਨਿਹਚਲੁ ਰਾਜੁ ਤਿਨਾਹਾ ਹੇ ॥੩॥
ਆਵਣੁ ਜਾਣਾ ਰਖੈ ਨ ਕੋਈ ॥
ਜੰਮਣੁ ਮਰਣੁ ਤਿਸੈ ਤੇ ਹੋਈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਾਚਾ ਸਦਾ ਧਿਆਵਹੁ ਗਤਿ ਮੁਕਤਿ ਤਿਸੈ ਤੇ ਪਾਹਾ ਹੇ ॥੪॥
ਸਚੁ ਸੰਜਮੁ ਸਤਿਗੁਰੂ ਦੁਆਰੈ ॥
ਹਉਮੈ ਕ੍ਰੋਧੁ ਸਬਦਿ ਨਿਵਾਰੈ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਿ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਪਾਈਐ ਸੀਲੁ ਸੰਤੋਖੁ ਸਭੁ ਤਾਹਾ ਹੇ ॥੫॥
ਹਉਮੈ ਮੋਹੁ ਉਪਜੈ ਸੰਸਾਰਾ ॥
ਸਭੁ ਜਗੁ ਬਿਨਸੈ ਨਾਮੁ ਵਿਸਾਰਾ ॥
ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਸੇਵੇ ਨਾਮੁ ਨ ਪਾਈਐ ਨਾਮੁ ਸਚਾ ਜਗਿ ਲਾਹਾ ਹੇ ॥੬॥
ਸਚਾ ਅਮਰੁ ਸਬਦਿ ਸੁਹਾਇਆ ॥
ਪੰਚ ਸਬਦ ਮਿਲਿ ਵਾਜਾ ਵਾਇਆ ॥
मारू महला ३ ॥
निहचलु एकु सदा सचु सोई ॥
पूरे गुर ते सोझी होई ॥
हरि रसि भीने सदा धिआइनि गुरमति सीलु संनाहा हे ॥१॥
अंदरि रंगु सदा सचिआरा ॥
गुर कै सबदि हरि नामि पिआरा ॥
नउ निधि नामु वसिआ घट अंतरि छोडिआ माइआ का लाहा हे ॥२॥
रईअति राजे दुरमति दोई ॥
बिनु सतिगुर सेवे एकु न होई ॥
एकु धिआइनि सदा सुखु पाइनि निहचलु राजु तिनाहा हे ॥३॥
आवणु जाणा रखै न कोई ॥
जंमणु मरणु तिसै ते होई ॥
गुरमुखि साचा सदा धिआवहु गति मुकति तिसै ते पाहा हे ॥४॥
सचु संजमु सतिगुरू दुआरै ॥
हउमै क्रोधु सबदि निवारै ॥
सतिगुरु सेवि सदा सुखु पाईऐ सीलु संतोखु सभु ताहा हे ॥५॥
हउमै मोहु उपजै संसारा ॥
सभु जगु बिनसै नामु विसारा ॥
बिनु सतिगुर सेवे नामु न पाईऐ नामु सचा जगि लाहा हे ॥६॥
सचा अमरु सबदि सुहाइआ ॥
पंच सबद मिलि वाजा वाइआ ॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला ३॥ हे भाई ! सदा कायम रहने वाला अटॅल सिर्फ वह परमात्मा ही है। पूरे गुरू से जिन मनुष्यों को ये समझ आ जाती है। वे परमात्मा के नाम-रस में भीगे रहते हैं। सदा परमात्मा का सिमरन करते हैं। गुरू की मति पर चल कर वह मनुष्य अच्छे आचरण का संजोअ (पहने रखते हैं। जिसके कारण कोई विकार उन पर हमला नहीं कर सकते)। 1। हे भाई ! जिस मनुष्य के हृदय में परमात्मा का प्यार है। वह सदा सुर्खरू है। गुरू के शबद की बरकति से वह प्रभू के नाम में प्रेम बनाए रखता है। उसके हृदय में सारे सुखों और पदार्थों का खजाना हरी-नाम बसता है। वह माया को असल कमाई मानना छोड़ देता है। 2। हे भाई ! खोटी मति के कारण हाकिम और प्रजा सब दुबिधा में फंसे रहते हैं। गुरू की शरण पड़े बिना किसी के अंदर एक परमात्मा का प्रकाश नहीं होता। जो मनुष्य सिर्फ परमात्मा को सिमरते हैं। वह आत्मिक आनंद पाते हैं। उनको अटॅल (आत्मिक) राज मिला रहता है। 3। हे भाई ! (परमात्मा के बिना और) कोई जनम-मरण के चक्कर से बच नहीं सकता। ये जनम-मरण (का चक्कर) उस परमात्मा की रज़ा के अनुसार ही होता है। हे भाई ! गुरू की शरण पड़ कर सदा-स्थिर प्रभू का नित्य सिमरन करते रहो। ऊँची आत्मिक अवस्था और विकारों से खलासी उस परमात्मा से ही मिलती है। 4। हे भाई ! विकारों से बचने का पक्का प्रबंध गुरू के दर से (प्राप्त होता है)। (जो मनुष्य गुरू के सन्मुख रहता है वह) गुरू के शबद से (अपने अंदर से) अहंकार दूर कर लेता है। क्रोध दूर कर लेता है। हे भाई ! गुरू की शरण पड़ने से ही सदा आत्मिक आनंद मिलता है। अच्छा आचरण। संतोख -ये सब कुछ गुरू के दर से ही हैं। 5। हे भाई ! संसार में खचित रहने से (मनुष्य के अंदर) अहंकार पैदा हो जाता है। (इनके कारण) परमात्मा का नाम भुला के सारा जगत आत्मिक मौत सहेड़ लेता है। हे भाई ! गुरू की शरण पड़े बिना परमात्मा का नाम नहीं मिलता। हरी-नाम ही जगत में सदा कायम रहने वाली कमाई है। 6। हे भाई ! गुरू के शबद से (जिस मनुष्य को) परमात्मा का अटल हुकम मीठा लगने लग जाता है। (उसके अंदर इस तरह आनंद बना रहता है जैसे) पाँचों किस्मों के साजों ने मिल के सुंदर राग पैदा किया हुआ है।

संदर्भ: यह अंग 1057 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।

Old Delhi के Karim’s में दोपहर का खाना, और बीच में मौन-सा एक pause।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 47 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1057” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 1058 →, पीछे का: ← अंग 1056

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।