अंग 1065

अंग
1065
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਹਰਿ ਚੇਤਹਿ ਤਿਨ ਬਲਿਹਾਰੈ ਜਾਉ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਤਿਨ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਉ ॥
ਤਿਨ ਕੀ ਧੂਰਿ ਲਾਈ ਮੁਖਿ ਮਸਤਕਿ ਸਤਸੰਗਤਿ ਬਹਿ ਗੁਣ ਗਾਇਦਾ ॥੨॥
ਹਰਿ ਕੇ ਗੁਣ ਗਾਵਾ ਜੇ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭ ਭਾਵਾ ॥
ਅੰਤਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਸਬਦਿ ਸੁਹਾਵਾ ॥
ਗੁਰਬਾਣੀ ਚਹੁ ਕੁੰਡੀ ਸੁਣੀਐ ਸਾਚੈ ਨਾਮਿ ਸਮਾਇਦਾ ॥੩॥
ਸੋ ਜਨੁ ਸਾਚਾ ਜਿ ਅੰਤਰੁ ਭਾਲੇ ॥ ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਹਰਿ ਨਦਰਿ ਨਿਹਾਲੇ ॥
ਗਿਆਨ ਅੰਜਨੁ ਪਾਏ ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਨਦਰੀ ਨਦਰਿ ਮਿਲਾਇਦਾ ॥੪॥
ਵਡੈ ਭਾਗਿ ਇਹੁ ਸਰੀਰੁ ਪਾਇਆ ॥
ਮਾਣਸ ਜਨਮਿ ਸਬਦਿ ਚਿਤੁ ਲਾਇਆ ॥
ਬਿਨੁ ਸਬਦੈ ਸਭੁ ਅੰਧ ਅੰਧੇਰਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਕਿਸਹਿ ਬੁਝਾਇਦਾ ॥੫॥
ਇਕਿ ਕਿਤੁ ਆਏ ਜਨਮੁ ਗਵਾਏ ॥
ਮਨਮੁਖ ਲਾਗੇ ਦੂਜੈ ਭਾਏ ॥
ਏਹ ਵੇਲਾ ਫਿਰਿ ਹਾਥਿ ਨ ਆਵੈ ਪਗਿ ਖਿਸਿਐ ਪਛੁਤਾਇਦਾ ॥੬॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਪਵਿਤ੍ਰੁ ਸਰੀਰਾ ॥
ਤਿਸੁ ਵਿਚਿ ਵਸੈ ਸਚੁ ਗੁਣੀ ਗਹੀਰਾ ॥
ਸਚੋ ਸਚੁ ਵੇਖੈ ਸਭ ਥਾਈ ਸਚੁ ਸੁਣਿ ਮੰਨਿ ਵਸਾਇਦਾ ॥੭॥
ਹਉਮੈ ਗਣਤ ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਨਿਵਾਰੇ ॥
ਹਰਿ ਜੀਉ ਹਿਰਦੈ ਰਖਹੁ ਉਰ ਧਾਰੇ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਸਦਾ ਸਾਲਾਹੇ ਮਿਲਿ ਸਾਚੇ ਸੁਖੁ ਪਾਇਦਾ ॥੮॥
ਸੋ ਚੇਤੇ ਜਿਸੁ ਆਪਿ ਚੇਤਾਏ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਵਸੈ ਮਨਿ ਆਏ ॥
ਆਪੇ ਵੇਖੈ ਆਪੇ ਬੂਝੈ ਆਪੈ ਆਪੁ ਸਮਾਇਦਾ ॥੯॥
ਜਿਨਿ ਮਨ ਵਿਚਿ ਵਥੁ ਪਾਈ ਸੋਈ ਜਾਣੈ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦੇ ਆਪੁ ਪਛਾਣੈ ॥
ਆਪੁ ਪਛਾਣੈ ਸੋਈ ਜਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਬਾਣੀ ਸਬਦੁ ਸੁਣਾਇਦਾ ॥੧੦॥
ਏਹ ਕਾਇਆ ਪਵਿਤੁ ਹੈ ਸਰੀਰੁ ॥
ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਚੇਤੈ ਗੁਣੀ ਗਹੀਰੁ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ਰੰਗਿ ਰਾਤਾ ਗੁਣ ਕਹਿ ਗੁਣੀ ਸਮਾਇਦਾ ॥੧੧॥
ਏਹੁ ਸਰੀਰੁ ਸਭ ਮੂਲੁ ਹੈ ਮਾਇਆ ॥
ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਇਆ ॥
ਹਰਿ ਨ ਚੇਤੈ ਸਦਾ ਦੁਖੁ ਪਾਏ ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਚੇਤੇ ਦੁਖੁ ਪਾਇਦਾ ॥੧੨॥
ਜਿ ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵੇ ਸੋ ਪਰਵਾਣੁ ॥
ਕਾਇਆ ਹੰਸੁ ਨਿਰਮਲੁ ਦਰਿ ਸਚੈ ਜਾਣੁ ॥
ਹਰਿ ਸੇਵੇ ਹਰਿ ਮੰਨਿ ਵਸਾਏ ਸੋਹੈ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਇਦਾ ॥੧੩॥
ਬਿਨੁ ਭਾਗਾ ਗੁਰੁ ਸੇਵਿਆ ਨ ਜਾਇ ॥
ਮਨਮੁਖ ਭੂਲੇ ਮੁਏ ਬਿਲਲਾਇ ॥
ਜਿਨ ਕਉ ਨਦਰਿ ਹੋਵੈ ਗੁਰ ਕੇਰੀ ਹਰਿ ਜੀਉ ਆਪਿ ਮਿਲਾਇਦਾ ॥੧੪॥
ਕਾਇਆ ਕੋਟੁ ਪਕੇ ਹਟਨਾਲੇ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਲੇਵੈ ਵਸਤੁ ਸਮਾਲੇ ॥
ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ਊਤਮ ਪਦਵੀ ਪਾਇਦਾ ॥੧੫॥
ਆਪੇ ਸਚਾ ਹੈ ਸੁਖਦਾਤਾ ॥
ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਪਛਾਤਾ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਸਲਾਹੇ ਸਾਚਾ ਪੂਰੈ ਭਾਗਿ ਕੋ ਪਾਇਦਾ ॥੧੬॥੭॥੨੧॥
हरि चेतहि तिन बलिहारै जाउ ॥
गुर कै सबदि तिन मेलि मिलाउ ॥
तिन की धूरि लाई मुखि मसतकि सतसंगति बहि गुण गाइदा ॥२॥
हरि के गुण गावा जे हरि प्रभ भावा ॥
अंतरि हरि नामु सबदि सुहावा ॥
गुरबाणी चहु कुंडी सुणीऐ साचै नामि समाइदा ॥३॥
सो जनु साचा जि अंतरु भाले ॥ गुर कै सबदि हरि नदरि निहाले ॥
गिआन अंजनु पाए गुर सबदी नदरी नदरि मिलाइदा ॥४॥
वडै भागि इहु सरीरु पाइआ ॥
माणस जनमि सबदि चितु लाइआ ॥
बिनु सबदै सभु अंध अंधेरा गुरमुखि किसहि बुझाइदा ॥५॥
इकि कितु आए जनमु गवाए ॥
मनमुख लागे दूजै भाए ॥
एह वेला फिरि हाथि न आवै पगि खिसिऐ पछुताइदा ॥६॥
गुर कै सबदि पवित्रु सरीरा ॥
तिसु विचि वसै सचु गुणी गहीरा ॥
सचो सचु वेखै सभ थाई सचु सुणि मंनि वसाइदा ॥७॥
हउमै गणत गुर सबदि निवारे ॥
हरि जीउ हिरदै रखहु उर धारे ॥
गुर कै सबदि सदा सालाहे मिलि साचे सुखु पाइदा ॥८॥
सो चेते जिसु आपि चेताए ॥
गुर कै सबदि वसै मनि आए ॥
आपे वेखै आपे बूझै आपै आपु समाइदा ॥९॥
जिनि मन विचि वथु पाई सोई जाणै ॥
गुर कै सबदे आपु पछाणै ॥
आपु पछाणै सोई जनु निरमलु बाणी सबदु सुणाइदा ॥१०॥
एह काइआ पवितु है सरीरु ॥
गुर सबदी चेतै गुणी गहीरु ॥
अनदिनु गुण गावै रंगि राता गुण कहि गुणी समाइदा ॥११॥
एहु सरीरु सभ मूलु है माइआ ॥
दूजै भाइ भरमि भुलाइआ ॥
हरि न चेतै सदा दुखु पाए बिनु हरि चेते दुखु पाइदा ॥१२॥
जि सतिगुरु सेवे सो परवाणु ॥
काइआ हंसु निरमलु दरि सचै जाणु ॥
हरि सेवे हरि मंनि वसाए सोहै हरि गुण गाइदा ॥१३॥
बिनु भागा गुरु सेविआ न जाइ ॥
मनमुख भूले मुए बिललाइ ॥
जिन कउ नदरि होवै गुर केरी हरि जीउ आपि मिलाइदा ॥१४॥
काइआ कोटु पके हटनाले ॥
गुरमुखि लेवै वसतु समाले ॥
हरि का नामु धिआइ दिनु राती ऊतम पदवी पाइदा ॥१५॥
आपे सचा है सुखदाता ॥
पूरे गुर कै सबदि पछाता ॥
नानक नामु सलाहे साचा पूरै भागि को पाइदा ॥१६॥७॥२१॥

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा का सिमरन करते हैं। मैं उनसे कुर्बान जाता हूँ। गुरू के शबद की बरकति से मैं उनकी संगति में मिलता हूँ। हे भाई ! जो मनुष्य साध-संगति में बैठ के परमात्मा के गुण गाते हैं। मैं उन (के चरणों) की धूल अपने मुँह पर अपने माथे पर लगाता हूँ। 2। हे भाई ! मैं परमात्मा के गुण तब ही गा सकता हूँ यदि मैं उसे अच्छा लगूँ (अगर मेरे पर उसकी मेहर हो)। हे भाई ! यदि मेरे दिल में परमात्मा का नाम बस जाए। तो गुरू के शबद की बरकति से मेरा जीवन सुंदर बन जाता है। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की बाणी में जुड़ता है। वह सारे संसार में प्रकट हो जाता है। नाम में लीन रहने से मनुष्य सदा कायम रहने वाले परमात्मा में समाया रहता है। 3। हे भाई ! जो मनुष्य अपने हृदय को खोजता रहता है। वह मनुष्य (विकारों से) अडोल जीवन वाला बन जाता है। गुरू के शबद में जुड़ने से परमात्मा मेहर की निगाह से देखता है। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के शबद से आत्मिक जीवन की सूझ का सुरमा प्रयोग करता है। मेहर का मालिक परमात्मा उसको अपनी मेहर से (अपने चरणों में) मिला लेता है। 4। हे भाई ! ये मनुष्य-शरीर बड़ी किस्मत से मिलता है। (पर उसी को ही मिला जानो। जिस ने) मनुष्य जनम में (आ के) गुरू के शबद में अपना मन जोड़ा। किसी विरले को ही गुरू के द्वारा परमात्मा ये समझ बख्शता है कि गुरू के शबद के बिना (जीवन-यात्रा में मनुष्य के लिए) हर जगह घोर अंधकार है। 5। हे भाई ! कई मनुष्य मानस-जन्म गवा के जगत में व्यर्थ ही आए (समझो) क्योंकि अपने मन के पीछे चलने वाले वह लोग माया के प्यार में ही लगे रहे। हे भाई ! मानस-जनम वाला यह समय फिर नहीं मिलता (इसको विकारों में गवा के) मौत आने पर मनुष्य पछताता है। 6। हे भाई ! गुरू के शबद में जुड़ के (जिस मनुष्य का) शरीर (विकारों से) पवित्र रहता है। उस मनुष्य के इस शरीर में वह परमात्मा आ बसता है जो सदा कायम रहने वाला है जो सारे गुणों का मालिक है और जो बड़े जिगरे वाला है वह मनुष्य (फिर) हर जगह सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा को ही देखता है। सदा स्थिर हरी-नाम को सुन के अपने मन में बसाए रखता है। 7। हे भाई ! अहंकार की गिनतियाँ (मनुष्य) गुरू के शबद द्वारा ही दूर कर सकता है। (इसलिए। हे भाई ! गुरू के शबद से) परमात्मा को अपने हृदय में बसाए रखो। जो मनुष्य गुरू के शबद से सदा परमात्मा की सिफतसालाह करता रहता है। वह सदा स्थिर प्रभू में जुड़ के आत्मिक आनंद पाता है। 8। हे भाई ! परमात्मा का नाम वह मनुष्य (ही) सिमरता है जिसको परमात्मा स्वयं सिमरन के लिए प्रेरित करता है। गुरू के शबद के द्वारा परमात्मा उसके मन में बसता है। (हरेक में व्यापक परमात्मा) स्वयं ही (उस मनुष्य के हरेक काम को) देखता है। स्वयं ही (उसके दिल की) समझता है। और (खुद ही उस मनुष्य में बसता हुआ) अपने आप को अपने आप में लीन करता है। 9। हे भाई ! (परमात्मा की कृपा से) जिस (मनुष्य) ने परमात्मा का नाम-पदार्थ (अपने) मन में पा लिया। वह ही (उसकी कद्र) समझता है। गुरू के शबद से (वह मनुष्य) अपने जीवन को पड़तालता रहता है। (जो मनुष्य) अपने जीवन को पड़तालता है वही मनुष्य जीवन वाला हो जाता है। (वह फिर औरों को भी) सिफत-सालाह की बाणी गुरू का शबद सुनाता है। 10। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के शबद में जुड़ के गुणों के मालिक गहरे जिगरे वाले परमात्मा को सिमरता है। उसका यह शरीर (विकारों से बच के) पवित्र हो जाता है। वह मनुष्य परमात्मा के प्रेम-रंग में रंग के हर वक्त परमात्मा के गुण गाता है। परमात्मा के गुण उचार के वह गुणों के मालिक प्रभू में लीन हो जाता है। 11। पर। हे भाई ! जो मनुष्य (परमात्मा को छोड़ के) और ही प्यार में फसता है। भटकना में पड़ कर कुमार्ग पर पड़ा रहता है। उसका ये शरीर सिर्फ माया के मोह का कारण बन जाता है। हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा का नाम नहीं सिमरता। वह सदा दुख पाता है। (ये बात पक्की है कि) प्रभू का नाम सिमरे बिना मनुष्य दुख पाता है। 12। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है। वह (लोक-परलोक में) आदर-योग्य हो जाता है। उसका शरीर (विकारों से) पवित्र रहता है। उसकी आत्मा पवित्र रहती है। सदा स्थिर परमात्मा के दर पर वह जाना-पहचाना हो जाता है (आदर प्राप्त करता है)। वह मनुष्य परमात्मा की सेवा-भक्ति करता है। परमात्मा को मन में बसाए रखता है। परमात्मा के गुण गाता सुंदर जीवन वाला बन जाता है। 13। पर। हे भाई ! किस्मत के बिना गुरू की शरण नहीं पड़ा जा सकता। अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य कुमार्ग पर पड़े रहते हैं। बड़े दुखी हो-हो के आत्मिक मौत सहेड़ी रखते हैं। हे भाई ! जिन मनुष्यों पर गुरू की मेहर की निगाह होती है। उनको परमात्मा अपने (चरणों) में जोड़ लेता है। 14। (विकारों के मुकाबले पर उसका) शरीर (एक ऐसा) किला (बन जाता) है (जिसके) बाजार (ज्ञान-इन्द्रियाँ विकारों के मुकाबले में) अडोल (हो जाती) हैं। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के सन्मुख हो के (अपने अंदर) नाम-पदार्थ संभाल लेता है वह मनुष्य दिन-रात परमात्मा का नाम सिमर के उच्च आत्मिक दर्जा हासिल कर लेता है। 15। हे नानक ! (कह-हे भाई !) सदा कायम रहने वाला परमात्मा स्वयं ही (सारे) सुख देने वाला है। पूरे गुरू के शबद में जुड़ के उसके साथ सांझ डाली जा सकती है। पूरी किस्मत से मनुष्य ये दाति प्राप्त करता है कि सदा-स्थिर हरी-नाम की सिफत सालाह करता रहता है। 16। 7। 21।

संदर्भ: यह अंग 1065 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।

Pragati Maidan के पीछे यमुना के किनारे शाम का सूरज।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 44 पंक्तियों का है, 1 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1065” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 1066 →, पीछे का: ← अंग 1064

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।