अंग 1014

अंग
1014
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਲਾਗੀ ਭੂਖ ਮਾਇਆ ਮਗੁ ਜੋਹੈ ਮੁਕਤਿ ਪਦਾਰਥੁ ਮੋਹਿ ਖਰੇ ॥੩॥
ਕਰਣ ਪਲਾਵ ਕਰੇ ਨਹੀ ਪਾਵੈ ਇਤ ਉਤ ਢੂਢਤ ਥਾਕਿ ਪਰੇ ॥
ਕਾਮਿ ਕ੍ਰੋਧਿ ਅਹੰਕਾਰਿ ਵਿਆਪੇ ਕੂੜ ਕੁਟੰਬ ਸਿਉ ਪ੍ਰੀਤਿ ਕਰੇ ॥੪॥
ਖਾਵੈ ਭੋਗੈ ਸੁਣਿ ਸੁਣਿ ਦੇਖੈ ਪਹਿਰਿ ਦਿਖਾਵੈ ਕਾਲ ਘਰੇ ॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਸਬਦ ਨ ਆਪੁ ਪਛਾਣੈ ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਨਾਮ ਨ ਕਾਲੁ ਟਰੇ ॥੫॥
ਜੇਤਾ ਮੋਹੁ ਹਉਮੈ ਕਰਿ ਭੂਲੇ ਮੇਰੀ ਮੇਰੀ ਕਰਤੇ ਛੀਨਿ ਖਰੇ ॥
ਤਨੁ ਧਨੁ ਬਿਨਸੈ ਸਹਸੈ ਸਹਸਾ ਫਿਰਿ ਪਛੁਤਾਵੈ ਮੁਖਿ ਧੂਰਿ ਪਰੇ ॥੬॥
ਬਿਰਧਿ ਭਇਆ ਜੋਬਨੁ ਤਨੁ ਖਿਸਿਆ ਕਫੁ ਕੰਠੁ ਬਿਰੂਧੋ ਨੈਨਹੁ ਨੀਰੁ ਢਰੇ ॥
ਚਰਣ ਰਹੇ ਕਰ ਕੰਪਣ ਲਾਗੇ ਸਾਕਤ ਰਾਮੁ ਨ ਰਿਦੈ ਹਰੇ ॥੭॥
ਸੁਰਤਿ ਗਈ ਕਾਲੀ ਹੂ ਧਉਲੇ ਕਿਸੈ ਨ ਭਾਵੈ ਰਖਿਓ ਘਰੇ ॥
ਬਿਸਰਤ ਨਾਮ ਐਸੇ ਦੋਖ ਲਾਗਹਿ ਜਮੁ ਮਾਰਿ ਸਮਾਰੇ ਨਰਕਿ ਖਰੇ ॥੮॥
ਪੂਰਬ ਜਨਮ ਕੋ ਲੇਖੁ ਨ ਮਿਟਈ ਜਨਮਿ ਮਰੈ ਕਾ ਕਉ ਦੋਸੁ ਧਰੇ ॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਬਾਦਿ ਜੀਵਣੁ ਹੋਰੁ ਮਰਣਾ ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਸਬਦੈ ਜਨਮੁ ਜਰੇ ॥੯॥
ਖੁਸੀ ਖੁਆਰ ਭਏ ਰਸ ਭੋਗਣ ਫੋਕਟ ਕਰਮ ਵਿਕਾਰ ਕਰੇ ॥
ਨਾਮੁ ਬਿਸਾਰਿ ਲੋਭਿ ਮੂਲੁ ਖੋਇਓ ਸਿਰਿ ਧਰਮ ਰਾਇ ਕਾ ਡੰਡੁ ਪਰੇ ॥੧੦॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਰਾਮ ਨਾਮ ਗੁਣ ਗਾਵਹਿ ਜਾ ਕਉ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਨਦਰਿ ਕਰੇ ॥
ਤੇ ਨਿਰਮਲ ਪੁਰਖ ਅਪਰੰਪਰ ਪੂਰੇ ਤੇ ਜਗ ਮਹਿ ਗੁਰ ਗੋਵਿੰਦ ਹਰੇ ॥੧੧॥
ਹਰਿ ਸਿਮਰਹੁ ਗੁਰ ਬਚਨ ਸਮਾਰਹੁ ਸੰਗਤਿ ਹਰਿ ਜਨ ਭਾਉ ਕਰੇ ॥
ਹਰਿ ਜਨ ਗੁਰੁ ਪਰਧਾਨੁ ਦੁਆਰੈ ਨਾਨਕ ਤਿਨ ਜਨ ਕੀ ਰੇਣੁ ਹਰੇ ॥੧੨॥੮॥
लागी भूख माइआ मगु जोहै मुकति पदारथु मोहि खरे ॥३॥
करण पलाव करे नही पावै इत उत ढूढत थाकि परे ॥
कामि क्रोधि अहंकारि विआपे कूड़ कुटंब सिउ प्रीति करे ॥४॥
खावै भोगै सुणि सुणि देखै पहिरि दिखावै काल घरे ॥
बिनु गुर सबद न आपु पछाणै बिनु हरि नाम न कालु टरे ॥५॥
जेता मोहु हउमै करि भूले मेरी मेरी करते छीनि खरे ॥
तनु धनु बिनसै सहसै सहसा फिरि पछुतावै मुखि धूरि परे ॥६॥
बिरधि भइआ जोबनु तनु खिसिआ कफु कंठु बिरूधो नैनहु नीरु ढरे ॥
चरण रहे कर कंपण लागे साकत रामु न रिदै हरे ॥७॥
सुरति गई काली हू धउले किसै न भावै रखिओ घरे ॥
बिसरत नाम ऐसे दोख लागहि जमु मारि समारे नरकि खरे ॥८॥
पूरब जनम को लेखु न मिटई जनमि मरै का कउ दोसु धरे ॥
बिनु गुर बादि जीवणु होरु मरणा बिनु गुर सबदै जनमु जरे ॥९॥
खुसी खुआर भए रस भोगण फोकट करम विकार करे ॥
नामु बिसारि लोभि मूलु खोइओ सिरि धरम राइ का डंडु परे ॥१०॥
गुरमुखि राम नाम गुण गावहि जा कउ हरि प्रभु नदरि करे ॥
ते निरमल पुरख अपरंपर पूरे ते जग महि गुर गोविंद हरे ॥११॥
हरि सिमरहु गुर बचन समारहु संगति हरि जन भाउ करे ॥
हरि जन गुरु परधानु दुआरै नानक तिन जन की रेणु हरे ॥१२॥८॥

हिन्दी अर्थ: सदा इसको माया की भूख ही चिपकी रहती है। सदा माया की राह ही ताकता रहता है। माया के मोह में (फंस के चारों पदार्थों में से) मुक्ति पदार्थ गवा लेता है। 3। (सारी उम्र जीव माया की खातिर ही) विरलाप करता रहता है (मन की तसल्ली योग्य माया) प्राप्त नहीं होती। हर तरफ माया की तलाश करता-करता थक जाता है। काम में। क्रोध में। अहंकार में दबा हुआ जीव सदा नाशवंत पदार्थों के साथ ही प्रीति करता है। सदा अपने परिवार के साथ ही मोह जोड़ के रखता है। 4। (दुनिया के अच्छे-अच्छे पदार्थ) खाता है (विषौ) भोगता है। (शोभा-निंदा आदि के वचन) बार-बार सुनता है। (दुनिया के रंग-तमाशे) देखता है। (सुंदर-सुंदर कपड़े आदि) पहन के (लोगों को) दिखाता है- (बस ! इन्हीं व्यस्तताओं में मस्त हो के) आत्मिक मौत के घर में टिका रहता है (आत्मिक मौत सहेड़ के रखता है)। गुरू के शबद से टूटा हुआ अपने आत्मिक जीवन को पहचान नहीं सकता। परमात्मा के नाम से टूटा हुआ होने के कारण आत्मिक मौत (इसके सिर से) नहीं टलती। 5। जितना ही मोह और अहंकार के कारण जीव सही जीवन-राह से भूलता जाता है। जितना ज्यादा ‘मेरी मेरी’ (माया) करता है। उतना ही ज्यादा अहंकार और ममता इसके आत्मिक जीवन को छीन के लेते जाते हैं। आखिर में ये शरीर और ये धन। (जिनकी खातिर हर वक्त सहम में रहता था। ) नाश हो जाते हैं। तब जीव पछताता है। (पर उस वक्त पछताने से कुछ नहीं बनता) इसके मुँह पर धिक्कारें ही पड़ती हैं। 6। मनुष्य बूढ़ा हो जाता है। जवानी खिसक जाती है शरीर कमजोर हो जाता है। गला बलगम से रुका रहता है। आँखों से पानी बहता रहता है। पैर (चलने से) रह जाते हैं। हाथ काँपने लग जाते हैं। (फिर भी) माया-ग्रसित जीव के हृदय में हरी परमात्मा (का नाम) नहीं (बसता)। 7। (वृद्ध हो जाने पर) अकल ठिकाने नहीं रहती। केश काले और सफेद हो जाते हैं। घर में रखा हुआ किसी को अच्छा नहीं लगता (फिर भी परमात्मा के नाम को भुलाए रखता है) परमात्मा का नाम बिसार के रखने के कारण ऐसी बुराईयाँ इससे चिपकी रहती हैं जिनके कारण जमराज इसको मार के नर्क में ले जाता है। 8। (पर जीव के भी वश की बात नहीं) पूर्बले जन्मों के किए कर्मों के संस्कारों का लेखा मिटता नहीं (जितना समय वह लेखा मौजूद है। उनके प्रभाव तले कुकर्म कर करके) जनम-मरण के चक्कर में पड़ा रहता है। जीव बेचारा और किस को दोष दे। (दरअसल। बात ये है कि) गुरू की शरण पड़े बिना जिन्दगी व्यर्थ जाती है (विकारों में पड़ कर मनुष्य) और आत्मिक मौत सहेड़ता जाता है। गुरू शबद से टूटने के कारण जिंदगी (विकारों में) जल जाती है। 9। जीव दुनियां की खुशियाँ लेने में। रस भोगने में। और फोके व बुरे कर्म करने में पड़ कर दुखी होता है। परमात्मा का नाम भुला के। लोभ में फस के मूल भी गवा लेता है। आखिर इसके सिर पर धर्मराज का डण्डा पड़ता है। 10। गुरू की शरण पड़ने वाले मनुष्य परमात्मा के नाम के गुण गाते हैं। जिन पर हरी-प्रभू मेहर की निगाह करता है वह जगत में हरी-गोबिंद बेअंत पूरन सर्व-व्यापक प्रभू को सिमर के पवित्र जीवन वाले हो जाते हैं। 11। हे भाई ! संत जनों की संगति में प्रेम जोड़ के परमात्मा का नाम सिमरो। गुरू के बचन (हृदय में) संभाल के रखो। परमात्मा के दर पर गुरू (का बचन) ही आदर पाता है। संत जनों की संगति ही कबूल पड़ती है। हे नानक ! (अरदास कर-) हे हरी ! (मुझे) उन संत जनों की चरण-धूड़ दे। 12। 8।
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਮਾਰੂ ਕਾਫੀ ਮਹਲਾ ੧ ਘਰੁ ੨ ॥
ਆਵਉ ਵੰਞਉ ਡੁੰਮਣੀ ਕਿਤੀ ਮਿਤ੍ਰ ਕਰੇਉ ॥
ਸਾ ਧਨ ਢੋਈ ਨ ਲਹੈ ਵਾਢੀ ਕਿਉ ਧੀਰੇਉ ॥੧॥
ਮੈਡਾ ਮਨੁ ਰਤਾ ਆਪਨੜੇ ਪਿਰ ਨਾਲਿ ॥
ਹਉ ਘੋਲਿ ਘੁਮਾਈ ਖੰਨੀਐ ਕੀਤੀ ਹਿਕ ਭੋਰੀ ਨਦਰਿ ਨਿਹਾਲਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਪੇਈਅੜੈ ਡੋਹਾਗਣੀ ਸਾਹੁਰੜੈ ਕਿਉ ਜਾਉ ॥
ਮੈ ਗਲਿ ਅਉਗਣ ਮੁਠੜੀ ਬਿਨੁ ਪਿਰ ਝੂਰਿ ਮਰਾਉ ॥੨॥
ਪੇਈਅੜੈ ਪਿਰੁ ਸੰਮਲਾ ਸਾਹੁਰੜੈ ਘਰਿ ਵਾਸੁ ॥
ਸੁਖਿ ਸਵੰਧਿ ਸੋਹਾਗਣੀ ਪਿਰੁ ਪਾਇਆ ਗੁਣਤਾਸੁ ॥੩॥
ਲੇਫੁ ਨਿਹਾਲੀ ਪਟ ਕੀ ਕਾਪੜੁ ਅੰਗਿ ਬਣਾਇ ॥
ਪਿਰੁ ਮੁਤੀ ਡੋਹਾਗਣੀ ਤਿਨ ਡੁਖੀ ਰੈਣਿ ਵਿਹਾਇ ॥੪॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मारू काफी महला १ घरु २ ॥
आवउ वंञउ डुंमणी किती मित्र करेउ ॥
सा धन ढोई न लहै वाढी किउ धीरेउ ॥१॥
मैडा मनु रता आपनड़े पिर नालि ॥
हउ घोलि घुमाई खंनीऐ कीती हिक भोरी नदरि निहालि ॥१॥ रहाउ ॥
पेईअड़ै डोहागणी साहुरड़ै किउ जाउ ॥
मै गलि अउगण मुठड़ी बिनु पिर झूरि मराउ ॥२॥
पेईअड़ै पिरु संमला साहुरड़ै घरि वासु ॥
सुखि सवंधि सोहागणी पिरु पाइआ गुणतासु ॥३॥
लेफु निहाली पट की कापड़ु अंगि बणाइ ॥
पिरु मुती डोहागणी तिन डुखी रैणि विहाइ ॥४॥

हिन्दी अर्थ: ੴ सतिगुर प्रसादि॥ मारू काफी महला १ घरु २॥ (हे प्रीतम प्रभू ! तुझसे विछुड़ के) मैं (दुविधा और) दु-चिक्ती में (डावाँडोल) होई हुई (जन्मों के चक्कर में) भटकती फिरती हूँ (दिलासा धरने के लिए) मैं अनेकों मित्र बनाती हूँ। पर जब तक तुझसे विछुड़ी हुई हूँ। मुझे धरवास कैसे आए। (तुझसे विछुड़ी हुई) जीव-स्त्री (किसी और जगह) आसरा पा ही नहीं सकती। 1। ता कि मेरा मन (तुझ) अपने प्यारे पति के साथ रंगा जाए- (हे प्रीतम प्रभू !) मैं तुझसे वारने जाती हूँ। कुर्बान जाती हूँ। रक्ती भर भी समय ही (मेरी ओर) मेहर की नजर से देख। 1। रहाउ। (इस संसार) पेके घर में मैं (सारी उम्र) प्रभू-पति से विछुड़ी रही हूँ। मैं पति-प्रभू के देश में कैसे पहुँच सकती हूँ। (प्रभू से विछोड़े के कारण) अवगुण मेरे गले तक पहुँच गए हैं। (सारी उम्र) मुझे अवगुणों ने ठॅग के रखा है। पति-प्रभू के मिलाप से वंचित रह के मैं अंदर-अंदर से दुखी भी हो रही हूँ। और आत्मिक मौत भी मैंने सहेड़ ली है। 2। यदि मैं (इस संसार) पेके घर में पति-प्रभू को (अपने हृदय में) संभाल के रखूँ तो पति-प्रभू के देश में मुझे उसके चरणों में जगह मिल जाए। वह भाग्यशाली (जीवन-रात) सुख से सो के गुजारती हैं जिन्होंने (पेके घर में) गुणों के खजाना पति-प्रभू को पा लिया है। 3। वे अगर रेशम का लेफ लें। रेशम की तुलाई लें। और कपड़ा भी रेशम का बना के ही शरीर पर प्रयोग करें। तब भी उनकी जीवन-रात दुखों में ही बीतती है जिन दुर्भाग्यपूर्ण (सि्त्रयों) ने पति को भुला दिया और जो छुटॅड़ हो गई। । 4।

संदर्भ: यह अंग 1014 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।

गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।

Janpath की सड़क-side चाय और बीच में एक quiet moment।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 31 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1014” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 1015 →, पीछे का: ← अंग 1013

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।