अंग 1019

अंग
1019
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਜੀਵਨਾ ਸਫਲ ਜੀਵਨ ਸੁਨਿ ਹਰਿ ਜਪਿ ਜਪਿ ਸਦ ਜੀਵਨਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਪੀਵਨਾ ਜਿਤੁ ਮਨੁ ਆਘਾਵੈ ਨਾਮੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਰਸੁ ਪੀਵਨਾ ॥੧॥
ਖਾਵਨਾ ਜਿਤੁ ਭੂਖ ਨ ਲਾਗੈ ਸੰਤੋਖਿ ਸਦਾ ਤ੍ਰਿਪਤੀਵਨਾ ॥੨॥
ਪੈਨਣਾ ਰਖੁ ਪਤਿ ਪਰਮੇਸੁਰ ਫਿਰਿ ਨਾਗੇ ਨਹੀ ਥੀਵਨਾ ॥੩॥
ਭੋਗਨਾ ਮਨ ਮਧੇ ਹਰਿ ਰਸੁ ਸੰਤਸੰਗਤਿ ਮਹਿ ਲੀਵਨਾ ॥੪॥
ਬਿਨੁ ਤਾਗੇ ਬਿਨੁ ਸੂਈ ਆਨੀ ਮਨੁ ਹਰਿ ਭਗਤੀ ਸੰਗਿ ਸੀਵਨਾ ॥੫॥
ਮਾਤਿਆ ਹਰਿ ਰਸ ਮਹਿ ਰਾਤੇ ਤਿਸੁ ਬਹੁੜਿ ਨ ਕਬਹੂ ਅਉਖੀਵਨਾ ॥੬॥
ਮਿਲਿਓ ਤਿਸੁ ਸਰਬ ਨਿਧਾਨਾ ਪ੍ਰਭਿ ਕ੍ਰਿਪਾਲਿ ਜਿਸੁ ਦੀਵਨਾ ॥੭॥
ਸੁਖੁ ਨਾਨਕ ਸੰਤਨ ਕੀ ਸੇਵਾ ਚਰਣ ਸੰਤ ਧੋਇ ਪੀਵਨਾ ॥੮॥੩॥੬॥
मारू महला ५ ॥
जीवना सफल जीवन सुनि हरि जपि जपि सद जीवना ॥१॥ रहाउ ॥
पीवना जितु मनु आघावै नामु अंम्रित रसु पीवना ॥१॥
खावना जितु भूख न लागै संतोखि सदा त्रिपतीवना ॥२॥
पैनणा रखु पति परमेसुर फिरि नागे नही थीवना ॥३॥
भोगना मन मधे हरि रसु संतसंगति महि लीवना ॥४॥
बिनु तागे बिनु सूई आनी मनु हरि भगती संगि सीवना ॥५॥
मातिआ हरि रस महि राते तिसु बहुड़ि न कबहू अउखीवना ॥६॥
मिलिओ तिसु सरब निधाना प्रभि क्रिपालि जिसु दीवना ॥७॥
सुखु नानक संतन की सेवा चरण संत धोइ पीवना ॥८॥३॥६॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला ५॥ हे भाई ! जीने में उस मनुष्य का जीना कामयाब है जो हरी-नाम सुन के सदा हरी-नाम जप के जीता है। 1। रहाउ। हे भाई ! आत्मिक जीवन देने वाला हरी-नाम रस पीना चाहिए। ये पीना ऐसा है कि इसके द्वारा मन (माया की तृष्णा की ओर से) तृप्त रहता है। 1। हे भाई ! नाम-भोजन को ही प्राणों की खुराक बनाना चाहिए क्योंकि इसकी बरकति से माया वाली भूख नहीं लगती। संतोष में सदा अघाए रहते हैं। 2। हे जिंदे ! पति-परमेश्वर का नाम-कपड़ा ही सिर पर रख। फिर कभी नंगे सिर नहीं हो सकते। 3। हे भाई ! मन में हरी-नाम रस को ही लेना चाहिए। संतों केी संगति में रह के नाम-रस ही पीना चाहिए। 4। हे भाई ! (किसी सूई की आवश्यक्ता नहीं पड़ती। किसी धागे की जरूरत नहीं पड़ती; ज्यों-ज्यों नाम जपते रहें) बिना सूई धागा लगाए ही मन परमात्मा की भगती में सीया जाता है। 5। हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा के नाम-रस में रंगे जाते हैं वह असल नशे में मस्त हैं; ये नशा फिर कभी कम नहीं होता। 6। पर। हे भाई ! कृपालु प्रभू ने स्वयं जिस जीव को ये नाम की दाति दी उसको ही सारे खजानों का मालिक (प्रभू) मिल गया। 7। हे नानक ! असल आत्मिक आनंद संत-जनों की सेवा करने में ही है। संतों के चरण धो के पीने में है (भाव। गरीबी-भाव से संतो की सेवा में ही सुख है)। 8। 3। 6।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੫ ਘਰੁ ੮ ਅੰਜੁਲੀਆ
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਜਿਸੁ ਗ੍ਰਿਹਿ ਬਹੁਤੁ ਤਿਸੈ ਗ੍ਰਿਹਿ ਚਿੰਤਾ ॥
ਜਿਸੁ ਗ੍ਰਿਹਿ ਥੋਰੀ ਸੁ ਫਿਰੈ ਭ੍ਰਮੰਤਾ ॥
ਦੁਹੂ ਬਿਵਸਥਾ ਤੇ ਜੋ ਮੁਕਤਾ ਸੋਈ ਸੁਹੇਲਾ ਭਾਲੀਐ ॥੧॥
ਗ੍ਰਿਹ ਰਾਜ ਮਹਿ ਨਰਕੁ ਉਦਾਸ ਕਰੋਧਾ ॥
ਬਹੁ ਬਿਧਿ ਬੇਦ ਪਾਠ ਸਭਿ ਸੋਧਾ ॥
ਦੇਹੀ ਮਹਿ ਜੋ ਰਹੈ ਅਲਿਪਤਾ ਤਿਸੁ ਜਨ ਕੀ ਪੂਰਨ ਘਾਲੀਐ ॥੨॥
ਜਾਗਤ ਸੂਤਾ ਭਰਮਿ ਵਿਗੂਤਾ ॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਮੁਕਤਿ ਨ ਹੋਈਐ ਮੀਤਾ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਤੁਟਹਿ ਹਉ ਬੰਧਨ ਏਕੋ ਏਕੁ ਨਿਹਾਲੀਐ ॥੩॥
ਕਰਮ ਕਰੈ ਤ ਬੰਧਾ ਨਹ ਕਰੈ ਤ ਨਿੰਦਾ ॥
ਮੋਹ ਮਗਨ ਮਨੁ ਵਿਆਪਿਆ ਚਿੰਦਾ ॥
ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਸੁਖੁ ਦੁਖੁ ਸਮ ਜਾਣੈ ਘਟਿ ਘਟਿ ਰਾਮੁ ਹਿਆਲੀਐ ॥੪॥
ਸੰਸਾਰੈ ਮਹਿ ਸਹਸਾ ਬਿਆਪੈ ॥
ਅਕਥ ਕਥਾ ਅਗੋਚਰ ਨਹੀ ਜਾਪੈ ॥
ਜਿਸਹਿ ਬੁਝਾਏ ਸੋਈ ਬੂਝੈ ਓਹੁ ਬਾਲਕ ਵਾਗੀ ਪਾਲੀਐ ॥੫॥
ਛੋਡਿ ਬਹੈ ਤਉ ਛੂਟੈ ਨਾਹੀ ॥
ਜਉ ਸੰਚੈ ਤਉ ਭਉ ਮਨ ਮਾਹੀ ॥
ਇਸ ਹੀ ਮਹਿ ਜਿਸ ਕੀ ਪਤਿ ਰਾਖੈ ਤਿਸੁ ਸਾਧੂ ਚਉਰੁ ਢਾਲੀਐ ॥੬॥
ਜੋ ਸੂਰਾ ਤਿਸ ਹੀ ਹੋਇ ਮਰਣਾ ॥
ਜੋ ਭਾਗੈ ਤਿਸੁ ਜੋਨੀ ਫਿਰਣਾ ॥
ਜੋ ਵਰਤਾਏ ਸੋਈ ਭਲ ਮਾਨੈ ਬੁਝਿ ਹੁਕਮੈ ਦੁਰਮਤਿ ਜਾਲੀਐ ॥੭॥
ਜਿਤੁ ਜਿਤੁ ਲਾਵਹਿ ਤਿਤੁ ਤਿਤੁ ਲਗਨਾ ॥
ਕਰਿ ਕਰਿ ਵੇਖੈ ਅਪਣੇ ਜਚਨਾ ॥
ਨਾਨਕ ਕੇ ਪੂਰਨ ਸੁਖਦਾਤੇ ਤੂ ਦੇਹਿ ਤ ਨਾਮੁ ਸਮਾਲੀਐ ॥੮॥੧॥੭॥
मारू महला ५ घरु ८ अंजुलीआ
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जिसु ग्रिहि बहुतु तिसै ग्रिहि चिंता ॥
जिसु ग्रिहि थोरी सु फिरै भ्रमंता ॥
दुहू बिवसथा ते जो मुकता सोई सुहेला भालीऐ ॥१॥
ग्रिह राज महि नरकु उदास करोधा ॥
बहु बिधि बेद पाठ सभि सोधा ॥
देही महि जो रहै अलिपता तिसु जन की पूरन घालीऐ ॥२॥
जागत सूता भरमि विगूता ॥
बिनु गुर मुकति न होईऐ मीता ॥
साधसंगि तुटहि हउ बंधन एको एकु निहालीऐ ॥३॥
करम करै त बंधा नह करै त निंदा ॥
मोह मगन मनु विआपिआ चिंदा ॥
गुर प्रसादि सुखु दुखु सम जाणै घटि घटि रामु हिआलीऐ ॥४॥
संसारै महि सहसा बिआपै ॥
अकथ कथा अगोचर नही जापै ॥
जिसहि बुझाए सोई बूझै ओहु बालक वागी पालीऐ ॥५॥
छोडि बहै तउ छूटै नाही ॥
जउ संचै तउ भउ मन माही ॥
इस ही महि जिस की पति राखै तिसु साधू चउरु ढालीऐ ॥६॥
जो सूरा तिस ही होइ मरणा ॥
जो भागै तिसु जोनी फिरणा ॥
जो वरताए सोई भल मानै बुझि हुकमै दुरमति जालीऐ ॥७॥
जितु जितु लावहि तितु तितु लगना ॥
करि करि वेखै अपणे जचना ॥
नानक के पूरन सुखदाते तू देहि त नामु समालीऐ ॥८॥१॥७॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला ५ घरु ८ अंजुलीआ ੴ सतिगुर प्रसादि॥ हे भाई ! जिस मनुष्य के घर में बहुत माया होती है (अपार धन-संपदा होती है)। उस मनुष्य के (हृदय-) घर में (हर वक्त) चिंता रहती है (कि कहीं खोई ना जाए)। जिस मनुष्य के घर में थोड़ी माया है वह मनुष्य (माया की खातिर) भटकता फिरता है। जो मनुष्य इन दोनों हालातों से बचा रहता है। वही मनुष्य सुखी देखा जाता है। 1। हे भाई ! जो मनुष्य गृहस्थ के ऐश्वर्य में व्यस्त है। वह (दरअसल) नर्क (भोग रहा है); जो मनुष्य (गृहस्त के जंजालों का) त्याग कर गया है वह सदा क्रोध का शिकार हुआ रहता है। भले ही उसने कई तरीकों से सारे वेद-शास्त्र पढ़े-विचारे हों। हे भाई ! उस मनुष्य की ही मेहनत सफल होती है जो शरीर की खातिर किरत-कार करते हुए ही (माया से) निर्लिप रहता है। 2। हे भाई ! (जो मनुष्य अहंकार के बँधनों में बँधा हुआ है वह) जागता हुआ और सोया हुआ हर वक्त भटकना में पड़ कर दुखी होता है। हे मित्र ! गुरू की शरण के बिना इन बँधनों से खलासी नहीं होती। जिस मनुष्य के अहंकार के बँधन गुरू की संगति में टिक के टूट जाते हैं। वह हर जगह एक परमात्मा को ही देखता है। 3। हे भाई ! (जो मनुष्य शास्त्रों के अनुसार निहित धार्मिक) कर्म करता रहता है वह इन कर्मों के जाल में जकड़ा रहता है। और। अगर वह किसी वक्त ये कर्म नहीं करता। तो कर्म-काण्डी लोग उसकी निंदा करते हैं। सो। उसका मन मोह में डूबा रहता है चिंता तले दबा रहता है। हे भाई ! गुरू की किरपा से जो मनुष्य सुख और दुख को एक-समान समझता है वह हरेक शरीर में एक प्रभू को ही बसता देखता है। 4। हे भाई ! जगत (के धँधों) में (मनुष्य को कोई ना कोई) सहम दबा के रखता है; उसको अकथ अगोचर परमात्मा की सिफत-सालाह सूझती ही नहीं। (पर जीव के भी क्या वश। ) वही मनुष्य (जीवन का सही रास्ता) समझता है जिसको परमात्मा स्वयं बख्शता है। उस मनुष्य को परमात्मा बच्चे की तरह पालता है। 5। हे भाई ! (जब कोई मनुष्य त्यागी बन के माया को अपनी ओर से) छोड़ बैठता है तब (भी माया) खलासी नहीं करती। जब कोई मनुष्य माया एकत्र करता जाता है जब (संचय करने वाले के) मन में डर बना रहता है (कि कहीं हाथ से चली ना जाए)। इस माया में रहते हुए ही परमात्मा स्वयं जिस मनुष्य की इज्जत रखता है। उस गुरमुख के सिर पर चवर झुलाया जाता है। 6। हे भाई ! जो मनुष्य माया के मुकाबले पर सूरमा बनता है उसको ही माया की तरफ से उपरामता मिलती है; पर जो मनुष्य (माया से) मात खा जाता है उसको अनेकों जूनियों में भटकना पड़ता है। (सूरमा मनुष्य) उस भाणे को मीठा करके मानता है जो भाणा परमात्मा बरताता है (उसे मीठा समझता है जिसे परमात्मा करता है); वह मनुष्य रज़ा को समझ के (अपने अंदर से) खोटी मति को जला देता है। 7। हे प्रभू ! तू जिस-जिस काम में जीवों को लगाता है। उसी उसी काम में जीव लगते हैं। हे भाई ! परमात्मा अपनी मर्ज़ी। के काम कर कर के स्वयं ही उनको देखता है। हे नानक को सारे गुण देने वाले प्रभू ! अगर तू (अपने नाम की दाति) दे तो ही तेरा नाम हृदय में बसाया जा सकता है। 8। 1। 7।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਬਿਰਖੈ ਹੇਠਿ ਸਭਿ ਜੰਤ ਇਕਠੇ ॥
ਇਕਿ ਤਤੇ ਇਕਿ ਬੋਲਨਿ ਮਿਠੇ ॥
ਅਸਤੁ ਉਦੋਤੁ ਭਇਆ ਉਠਿ ਚਲੇ ਜਿਉ ਜਿਉ ਅਉਧ ਵਿਹਾਣੀਆ ॥੧॥
ਪਾਪ ਕਰੇਦੜ ਸਰਪਰ ਮੁਠੇ ॥
ਅਜਰਾਈਲਿ ਫੜੇ ਫੜਿ ਕੁਠੇ ॥
मारू महला ५ ॥
बिरखै हेठि सभि जंत इकठे ॥
इकि तते इकि बोलनि मिठे ॥
असतु उदोतु भइआ उठि चले जिउ जिउ अउध विहाणीआ ॥१॥
पाप करेदड़ सरपर मुठे ॥
अजराईलि फड़े फड़ि कुठे ॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला ५॥ (हे भाई ! जैसे सूरज के डूबने के वक्त अनेकों पक्षी किसी वृक्ष पर आ के इकट्ठे होते हैं। इसी तरह) इस आकाश-वृक्ष तले सारे जीव-जंतु आ के एकत्र हुए हैं। कई कड़वे बोल बोलते हैं कई मीठे बोल बोलते हैं। डूबा हुआ सूरज जब आकाश में दोबारा उदय हो उठता है तब (पक्षी वृक्ष से) उठ के उड़ जाते हैं (वैसे ही) ज्यों-ज्यों (जीवों की) उम्र समाप्त हो जाती है (पक्षियों की तरह यहाँ से कूच कर जाते हैं)। 1। हे भाई ! यहाँ पाप करने वाले जीव (अपने आत्मिक जीवन का सरमाया) जरूर लुटा जाते हैं। पाप करने वालों को मौत का फरिश्ता पकड़-पकड़ के कोह (तड़फा-तड़फा) के मारे जा रहा है

संदर्भ: यह अंग 1019 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

Rajiv Chowk metro station की platform पर 9 PM की भीड़।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 42 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1019” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 1020 →, पीछे का: ← अंग 1018

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।