अंग
1067
राग मारू
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਆਪੇ ਸਚਾ ਸਬਦਿ ਮਿਲਾਏ ॥
ਸਬਦੇ ਵਿਚਹੁ ਭਰਮੁ ਚੁਕਾਏ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਮਿਲੈ ਵਡਿਆਈ ਨਾਮੇ ਹੀ ਸੁਖੁ ਪਾਇਦਾ ॥੧੬॥੮॥੨੨॥
ਸਬਦੇ ਵਿਚਹੁ ਭਰਮੁ ਚੁਕਾਏ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਮਿਲੈ ਵਡਿਆਈ ਨਾਮੇ ਹੀ ਸੁਖੁ ਪਾਇਦਾ ॥੧੬॥੮॥੨੨॥
आपे सचा सबदि मिलाए ॥
सबदे विचहु भरमु चुकाए ॥
नानक नामि मिलै वडिआई नामे ही सुखु पाइदा ॥१६॥८॥२२॥
सबदे विचहु भरमु चुकाए ॥
नानक नामि मिलै वडिआई नामे ही सुखु पाइदा ॥१६॥८॥२२॥
हिन्दी अर्थ: हे भाई ! सदा-स्थिर प्रभू स्वयं ही (मनुष्य को गुरू के) शबद में जोड़ता है। शबद से ही (उसके) अंदर से भटकना दूर करता है। हे नानक ! हरी-नाम में जुड़े हुओं को लोक-परलोक में इज्जत मिलती है। नाम से ही (मनुष्य) आत्मिक आनंद पाता है। 16। 8। 22।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਅਗਮ ਅਗੋਚਰ ਵੇਪਰਵਾਹੇ ॥
ਆਪੇ ਮਿਹਰਵਾਨ ਅਗਮ ਅਥਾਹੇ ॥
ਅਪੜਿ ਕੋਇ ਨ ਸਕੈ ਤਿਸ ਨੋ ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਮੇਲਾਇਆ ॥੧॥
ਤੁਧੁਨੋ ਸੇਵਹਿ ਜੋ ਤੁਧੁ ਭਾਵਹਿ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦੇ ਸਚਿ ਸਮਾਵਹਿ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਗੁਣ ਰਵਹਿ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ਰਸਨਾ ਹਰਿ ਰਸੁ ਭਾਇਆ ॥੨॥
ਸਬਦਿ ਮਰਹਿ ਸੇ ਮਰਣੁ ਸਵਾਰਹਿ ॥
ਹਰਿ ਕੇ ਗੁਣ ਹਿਰਦੈ ਉਰ ਧਾਰਹਿ ॥
ਜਨਮੁ ਸਫਲੁ ਹਰਿ ਚਰਣੀ ਲਾਗੇ ਦੂਜਾ ਭਾਉ ਚੁਕਾਇਆ ॥੩॥
ਹਰਿ ਜੀਉ ਮੇਲੇ ਆਪਿ ਮਿਲਾਏ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦੇ ਆਪੁ ਗਵਾਏ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਸਦਾ ਹਰਿ ਭਗਤੀ ਰਾਤੇ ਇਸੁ ਜਗ ਮਹਿ ਲਾਹਾ ਪਾਇਆ ॥੪॥
ਤੇਰੇ ਗੁਣ ਕਹਾ ਮੈ ਕਹਣੁ ਨ ਜਾਈ ॥
ਅੰਤੁ ਨ ਪਾਰਾ ਕੀਮਤਿ ਨਹੀ ਪਾਈ ॥
ਆਪੇ ਦਇਆ ਕਰੇ ਸੁਖਦਾਤਾ ਗੁਣ ਮਹਿ ਗੁਣੀ ਸਮਾਇਆ ॥੫॥
ਇਸੁ ਜਗ ਮਹਿ ਮੋਹੁ ਹੈ ਪਾਸਾਰਾ ॥
ਮਨਮੁਖੁ ਅਗਿਆਨੀ ਅੰਧੁ ਅੰਧਾਰਾ ॥
ਧੰਧੈ ਧਾਵਤੁ ਜਨਮੁ ਗਵਾਇਆ ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਦੁਖੁ ਪਾਇਆ ॥੬॥
ਕਰਮੁ ਹੋਵੈ ਤਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪਾਏ ॥
ਹਉਮੈ ਮੈਲੁ ਸਬਦਿ ਜਲਾਏ ॥
ਮਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਗਿਆਨੁ ਰਤਨੁ ਚਾਨਣੁ ਅਗਿਆਨੁ ਅੰਧੇਰੁ ਗਵਾਇਆ ॥੭॥
ਤੇਰੇ ਨਾਮ ਅਨੇਕ ਕੀਮਤਿ ਨਹੀ ਪਾਈ ॥
ਸਚੁ ਨਾਮੁ ਹਰਿ ਹਿਰਦੈ ਵਸਾਈ ॥
ਕੀਮਤਿ ਕਉਣੁ ਕਰੇ ਪ੍ਰਭ ਤੇਰੀ ਤੂ ਆਪੇ ਸਹਜਿ ਸਮਾਇਆ ॥੮॥
ਨਾਮੁ ਅਮੋਲਕੁ ਅਗਮ ਅਪਾਰਾ ॥
ਨਾ ਕੋ ਹੋਆ ਤੋਲਣਹਾਰਾ ॥
ਆਪੇ ਤੋਲੇ ਤੋਲਿ ਤੋਲਾਏ ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਮੇਲਿ ਤੋਲਾਇਆ ॥੯॥
ਸੇਵਕ ਸੇਵਹਿ ਕਰਹਿ ਅਰਦਾਸਿ ॥
ਤੂ ਆਪੇ ਮੇਲਿ ਬਹਾਲਹਿ ਪਾਸਿ ॥
ਸਭਨਾ ਜੀਆ ਕਾ ਸੁਖਦਾਤਾ ਪੂਰੈ ਕਰਮਿ ਧਿਆਇਆ ॥੧੦॥
ਜਤੁ ਸਤੁ ਸੰਜਮੁ ਜਿ ਸਚੁ ਕਮਾਵੈ ॥
ਇਹੁ ਮਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਜਿ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ॥
ਇਸੁ ਬਿਖੁ ਮਹਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪਰਾਪਤਿ ਹੋਵੈ ਹਰਿ ਜੀਉ ਮੇਰੇ ਭਾਇਆ ॥੧੧॥
ਜਿਸ ਨੋ ਬੁਝਾਏ ਸੋਈ ਬੂਝੈ ॥
ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ਅੰਦਰੁ ਸੂਝੈ ॥
ਹਉਮੈ ਮੇਰਾ ਠਾਕਿ ਰਹਾਏ ਸਹਜੇ ਹੀ ਸਚੁ ਪਾਇਆ ॥੧੨॥
ਬਿਨੁ ਕਰਮਾ ਹੋਰ ਫਿਰੈ ਘਨੇਰੀ ॥
ਮਰਿ ਮਰਿ ਜੰਮੈ ਚੁਕੈ ਨ ਫੇਰੀ ॥
ਬਿਖੁ ਕਾ ਰਾਤਾ ਬਿਖੁ ਕਮਾਵੈ ਸੁਖੁ ਨ ਕਬਹੂ ਪਾਇਆ ॥੧੩॥
ਬਹੁਤੇ ਭੇਖ ਕਰੇ ਭੇਖਧਾਰੀ ॥
ਬਿਨੁ ਸਬਦੈ ਹਉਮੈ ਕਿਨੈ ਨ ਮਾਰੀ ॥
ਜੀਵਤੁ ਮਰੈ ਤਾ ਮੁਕਤਿ ਪਾਏ ਸਚੈ ਨਾਇ ਸਮਾਇਆ ॥੧੪॥
ਅਗਿਆਨੁ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਇਸੁ ਤਨਹਿ ਜਲਾਏ ॥
ਅਗਮ ਅਗੋਚਰ ਵੇਪਰਵਾਹੇ ॥
ਆਪੇ ਮਿਹਰਵਾਨ ਅਗਮ ਅਥਾਹੇ ॥
ਅਪੜਿ ਕੋਇ ਨ ਸਕੈ ਤਿਸ ਨੋ ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਮੇਲਾਇਆ ॥੧॥
ਤੁਧੁਨੋ ਸੇਵਹਿ ਜੋ ਤੁਧੁ ਭਾਵਹਿ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦੇ ਸਚਿ ਸਮਾਵਹਿ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਗੁਣ ਰਵਹਿ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ਰਸਨਾ ਹਰਿ ਰਸੁ ਭਾਇਆ ॥੨॥
ਸਬਦਿ ਮਰਹਿ ਸੇ ਮਰਣੁ ਸਵਾਰਹਿ ॥
ਹਰਿ ਕੇ ਗੁਣ ਹਿਰਦੈ ਉਰ ਧਾਰਹਿ ॥
ਜਨਮੁ ਸਫਲੁ ਹਰਿ ਚਰਣੀ ਲਾਗੇ ਦੂਜਾ ਭਾਉ ਚੁਕਾਇਆ ॥੩॥
ਹਰਿ ਜੀਉ ਮੇਲੇ ਆਪਿ ਮਿਲਾਏ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦੇ ਆਪੁ ਗਵਾਏ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਸਦਾ ਹਰਿ ਭਗਤੀ ਰਾਤੇ ਇਸੁ ਜਗ ਮਹਿ ਲਾਹਾ ਪਾਇਆ ॥੪॥
ਤੇਰੇ ਗੁਣ ਕਹਾ ਮੈ ਕਹਣੁ ਨ ਜਾਈ ॥
ਅੰਤੁ ਨ ਪਾਰਾ ਕੀਮਤਿ ਨਹੀ ਪਾਈ ॥
ਆਪੇ ਦਇਆ ਕਰੇ ਸੁਖਦਾਤਾ ਗੁਣ ਮਹਿ ਗੁਣੀ ਸਮਾਇਆ ॥੫॥
ਇਸੁ ਜਗ ਮਹਿ ਮੋਹੁ ਹੈ ਪਾਸਾਰਾ ॥
ਮਨਮੁਖੁ ਅਗਿਆਨੀ ਅੰਧੁ ਅੰਧਾਰਾ ॥
ਧੰਧੈ ਧਾਵਤੁ ਜਨਮੁ ਗਵਾਇਆ ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਦੁਖੁ ਪਾਇਆ ॥੬॥
ਕਰਮੁ ਹੋਵੈ ਤਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪਾਏ ॥
ਹਉਮੈ ਮੈਲੁ ਸਬਦਿ ਜਲਾਏ ॥
ਮਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਗਿਆਨੁ ਰਤਨੁ ਚਾਨਣੁ ਅਗਿਆਨੁ ਅੰਧੇਰੁ ਗਵਾਇਆ ॥੭॥
ਤੇਰੇ ਨਾਮ ਅਨੇਕ ਕੀਮਤਿ ਨਹੀ ਪਾਈ ॥
ਸਚੁ ਨਾਮੁ ਹਰਿ ਹਿਰਦੈ ਵਸਾਈ ॥
ਕੀਮਤਿ ਕਉਣੁ ਕਰੇ ਪ੍ਰਭ ਤੇਰੀ ਤੂ ਆਪੇ ਸਹਜਿ ਸਮਾਇਆ ॥੮॥
ਨਾਮੁ ਅਮੋਲਕੁ ਅਗਮ ਅਪਾਰਾ ॥
ਨਾ ਕੋ ਹੋਆ ਤੋਲਣਹਾਰਾ ॥
ਆਪੇ ਤੋਲੇ ਤੋਲਿ ਤੋਲਾਏ ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਮੇਲਿ ਤੋਲਾਇਆ ॥੯॥
ਸੇਵਕ ਸੇਵਹਿ ਕਰਹਿ ਅਰਦਾਸਿ ॥
ਤੂ ਆਪੇ ਮੇਲਿ ਬਹਾਲਹਿ ਪਾਸਿ ॥
ਸਭਨਾ ਜੀਆ ਕਾ ਸੁਖਦਾਤਾ ਪੂਰੈ ਕਰਮਿ ਧਿਆਇਆ ॥੧੦॥
ਜਤੁ ਸਤੁ ਸੰਜਮੁ ਜਿ ਸਚੁ ਕਮਾਵੈ ॥
ਇਹੁ ਮਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਜਿ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ॥
ਇਸੁ ਬਿਖੁ ਮਹਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪਰਾਪਤਿ ਹੋਵੈ ਹਰਿ ਜੀਉ ਮੇਰੇ ਭਾਇਆ ॥੧੧॥
ਜਿਸ ਨੋ ਬੁਝਾਏ ਸੋਈ ਬੂਝੈ ॥
ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ਅੰਦਰੁ ਸੂਝੈ ॥
ਹਉਮੈ ਮੇਰਾ ਠਾਕਿ ਰਹਾਏ ਸਹਜੇ ਹੀ ਸਚੁ ਪਾਇਆ ॥੧੨॥
ਬਿਨੁ ਕਰਮਾ ਹੋਰ ਫਿਰੈ ਘਨੇਰੀ ॥
ਮਰਿ ਮਰਿ ਜੰਮੈ ਚੁਕੈ ਨ ਫੇਰੀ ॥
ਬਿਖੁ ਕਾ ਰਾਤਾ ਬਿਖੁ ਕਮਾਵੈ ਸੁਖੁ ਨ ਕਬਹੂ ਪਾਇਆ ॥੧੩॥
ਬਹੁਤੇ ਭੇਖ ਕਰੇ ਭੇਖਧਾਰੀ ॥
ਬਿਨੁ ਸਬਦੈ ਹਉਮੈ ਕਿਨੈ ਨ ਮਾਰੀ ॥
ਜੀਵਤੁ ਮਰੈ ਤਾ ਮੁਕਤਿ ਪਾਏ ਸਚੈ ਨਾਇ ਸਮਾਇਆ ॥੧੪॥
ਅਗਿਆਨੁ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਇਸੁ ਤਨਹਿ ਜਲਾਏ ॥
मारू महला ३ ॥
अगम अगोचर वेपरवाहे ॥
आपे मिहरवान अगम अथाहे ॥
अपड़ि कोइ न सकै तिस नो गुर सबदी मेलाइआ ॥१॥
तुधुनो सेवहि जो तुधु भावहि ॥
गुर कै सबदे सचि समावहि ॥
अनदिनु गुण रवहि दिनु राती रसना हरि रसु भाइआ ॥२॥
सबदि मरहि से मरणु सवारहि ॥
हरि के गुण हिरदै उर धारहि ॥
जनमु सफलु हरि चरणी लागे दूजा भाउ चुकाइआ ॥३॥
हरि जीउ मेले आपि मिलाए ॥
गुर कै सबदे आपु गवाए ॥
अनदिनु सदा हरि भगती राते इसु जग महि लाहा पाइआ ॥४॥
तेरे गुण कहा मै कहणु न जाई ॥
अंतु न पारा कीमति नही पाई ॥
आपे दइआ करे सुखदाता गुण महि गुणी समाइआ ॥५॥
इसु जग महि मोहु है पासारा ॥
मनमुखु अगिआनी अंधु अंधारा ॥
धंधै धावतु जनमु गवाइआ बिनु नावै दुखु पाइआ ॥६॥
करमु होवै ता सतिगुरु पाए ॥
हउमै मैलु सबदि जलाए ॥
मनु निरमलु गिआनु रतनु चानणु अगिआनु अंधेरु गवाइआ ॥७॥
तेरे नाम अनेक कीमति नही पाई ॥
सचु नामु हरि हिरदै वसाई ॥
कीमति कउणु करे प्रभ तेरी तू आपे सहजि समाइआ ॥८॥
नामु अमोलकु अगम अपारा ॥
ना को होआ तोलणहारा ॥
आपे तोले तोलि तोलाए गुर सबदी मेलि तोलाइआ ॥९॥
सेवक सेवहि करहि अरदासि ॥
तू आपे मेलि बहालहि पासि ॥
सभना जीआ का सुखदाता पूरै करमि धिआइआ ॥१०॥
जतु सतु संजमु जि सचु कमावै ॥
इहु मनु निरमलु जि हरि गुण गावै ॥
इसु बिखु महि अंम्रितु परापति होवै हरि जीउ मेरे भाइआ ॥११॥
जिस नो बुझाए सोई बूझै ॥
हरि गुण गावै अंदरु सूझै ॥
हउमै मेरा ठाकि रहाए सहजे ही सचु पाइआ ॥१२॥
बिनु करमा होर फिरै घनेरी ॥
मरि मरि जंमै चुकै न फेरी ॥
बिखु का राता बिखु कमावै सुखु न कबहू पाइआ ॥१३॥
बहुते भेख करे भेखधारी ॥
बिनु सबदै हउमै किनै न मारी ॥
जीवतु मरै ता मुकति पाए सचै नाइ समाइआ ॥१४॥
अगिआनु त्रिसना इसु तनहि जलाए ॥
अगम अगोचर वेपरवाहे ॥
आपे मिहरवान अगम अथाहे ॥
अपड़ि कोइ न सकै तिस नो गुर सबदी मेलाइआ ॥१॥
तुधुनो सेवहि जो तुधु भावहि ॥
गुर कै सबदे सचि समावहि ॥
अनदिनु गुण रवहि दिनु राती रसना हरि रसु भाइआ ॥२॥
सबदि मरहि से मरणु सवारहि ॥
हरि के गुण हिरदै उर धारहि ॥
जनमु सफलु हरि चरणी लागे दूजा भाउ चुकाइआ ॥३॥
हरि जीउ मेले आपि मिलाए ॥
गुर कै सबदे आपु गवाए ॥
अनदिनु सदा हरि भगती राते इसु जग महि लाहा पाइआ ॥४॥
तेरे गुण कहा मै कहणु न जाई ॥
अंतु न पारा कीमति नही पाई ॥
आपे दइआ करे सुखदाता गुण महि गुणी समाइआ ॥५॥
इसु जग महि मोहु है पासारा ॥
मनमुखु अगिआनी अंधु अंधारा ॥
धंधै धावतु जनमु गवाइआ बिनु नावै दुखु पाइआ ॥६॥
करमु होवै ता सतिगुरु पाए ॥
हउमै मैलु सबदि जलाए ॥
मनु निरमलु गिआनु रतनु चानणु अगिआनु अंधेरु गवाइआ ॥७॥
तेरे नाम अनेक कीमति नही पाई ॥
सचु नामु हरि हिरदै वसाई ॥
कीमति कउणु करे प्रभ तेरी तू आपे सहजि समाइआ ॥८॥
नामु अमोलकु अगम अपारा ॥
ना को होआ तोलणहारा ॥
आपे तोले तोलि तोलाए गुर सबदी मेलि तोलाइआ ॥९॥
सेवक सेवहि करहि अरदासि ॥
तू आपे मेलि बहालहि पासि ॥
सभना जीआ का सुखदाता पूरै करमि धिआइआ ॥१०॥
जतु सतु संजमु जि सचु कमावै ॥
इहु मनु निरमलु जि हरि गुण गावै ॥
इसु बिखु महि अंम्रितु परापति होवै हरि जीउ मेरे भाइआ ॥११॥
जिस नो बुझाए सोई बूझै ॥
हरि गुण गावै अंदरु सूझै ॥
हउमै मेरा ठाकि रहाए सहजे ही सचु पाइआ ॥१२॥
बिनु करमा होर फिरै घनेरी ॥
मरि मरि जंमै चुकै न फेरी ॥
बिखु का राता बिखु कमावै सुखु न कबहू पाइआ ॥१३॥
बहुते भेख करे भेखधारी ॥
बिनु सबदै हउमै किनै न मारी ॥
जीवतु मरै ता मुकति पाए सचै नाइ समाइआ ॥१४॥
अगिआनु त्रिसना इसु तनहि जलाए ॥
हिन्दी अर्थ: मारू महला ३॥ हे अपहुँच प्रभू ! हे ज्ञान-इन्द्रियों की पहुँच से परे रहने वाले प्रभू ! हे बेमुथाज प्रभू ! हे (अपने जैसे) खुद ही खुद ! हे मेहरवान ! हे अपहुँच ! हे गहरे जिगरे वाले ! जिस मनुष्य को तू गुरू के शबद के माध्यम से अपने साथ मिला लेता है। उसकी कोई बराबरी नहीं कर सकता। 1। हे प्रभू ! तेरी सेवा-भगती वह मनुष्य करते हैं जो तुझे प्यारे लगते हैं। वह मनुष्य गुरू के शबद से (तेरे) सदा-स्थिर नाम में लीन रहते हैं। हर वक्त दिन रात वे तेरे गुण गाते हैं। हे हरी ! उनकी जीभ को तेरे नाम-अमृत का स्वाद अच्छा लगता है। 2। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के शबद से (विकारों से। स्वै भाव से) मर जाते हैं। वह अपनी ये मौत और के लिए सुंदर बना लेते हैं (भाव। लोगों को उनका ये आत्मिक जीवन अच्छा लगता है)। वह मनुष्य अपने हृदय में परमात्मा के गुण टिकाए रखते हैं। परमात्मा के चरणों में लग के वे अपना मानस जन्म कामयाब बना लेते हैं। वे (अपने अंदर से) माया का प्यार समाप्त कर लेते हैं। 3। परमात्मा उनको स्वयं अपने चरणों में मिला लेता है। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के शबद से (अपने अंदर से) स्वै भाव दूर कर लेते हैं। वे हर वक्त परमात्मा की भक्ति में मस्त रहते हैं। इस जगत में वे (भक्ति का) लाभ कमाते हैं। 4। हे प्रभू ! (मेरा जी करता है कि) मैं तेरे गुण कथन करूँ। पर मुझसे बयान नहीं किए जा सकते। तेरे गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता। उस पार का किनारा नहीं तलाशा जा सकता। मूल्य नहीं पड़ सकता। हे भाई ! सारे सुख देने वाला (प्रभू जब) स्वयं ही दया करता है। तो गुण गाने वाले को अपने गुणों में लीन कर लेता है। 5। हे भाई ! इस जगत में (हर तरफ) मोह पसरा हुआ है। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य (इस मोह के कारण) आत्मिक जीवन से बेसमझ रहता है। (मोह में) बिल्कुल अंधा हुआ रहता है। (मोह के) घंधे में भटकता-भटकता (मानस-) जनम बेकार कर लेता है। परमात्मा के नाम के बिना दुख पाता है। 6। हे भाई ! (जब किसी मनुष्य पर) परमात्मा की मेहर होती है। तब उसको गुरू मिलता है। गुरू के शबद से (वह अपने अंदर से) अहंकार की मैल जलाता है। उसका मन पवित्र हो जाता है। (उसको अपने अंदर से) ज्ञान रतन (मिल जाता है। जो उसके अंदर आत्मिक जीवन का) प्रकाश कर देता है। इस तरह वह (अपने अंदर से) अज्ञान-अंधेरा दूर कर लेता है। 7। हे प्रभू ! (तेरे गुणों के आधार पर) तेरे अनेकों ही नाम हैं। मूल्य नहीं पाया जा सकता (किसी दुनियावी पदार्थ के बदले में तेरा नाम प्राप्त नहीं हो सकता)। (अगर तू मेहर करे तो) मैं तेरा सदा कायम रहने वाला नाम अपने दिल में बसाए रखूँ। हे प्रभू ! कौन तेरा मूल्य डाल सकता है। (जिस पर तू दयावान होता है। उसको) तू खुद ही आत्मिक अडोलता में लीन रखता है। 8। हे भाई ! अपहुँच और बेअंत परमात्मा के नाम का मूल्य नहीं डाला जा सकता (किसी दुनियावी पदार्थ के बदले नहीं मिल सकता)। कोई भी जीव (हरी-नाम का) मूल्य डालने के योग्य नहीं हो सका। वह प्रभू स्वयं ही अपने नाम की कद्र (कीमत) जानता है। खुद कद्र जान के जीवों को कद्र करनी सिखाता है। गुरू के शबद से (अपने साथ) मिला के कद्र सिखाता है। 9। हे प्रभू ! तेरे भक्त तेरी सेवा-भगती करते हैं। (तेरे दर पर) अरादास करते हैं। तू स्वयं ही उनको (अपने नाम में) जोड़ के अपने पास बैठाता है। हे प्रभू ! तू सारे जीवों को सुख देने वाला है। तेरी पूरी मेहर से (ही तेरे सेवक) तेरा नाम सिमरते हैं। 10। हे भाई ! जो मनुष्य सदा-स्थिर हरी-नाम सिमरन की कमाई करता है। जो मनुष्य परमात्मा के गुण गाता रहता है। उसका यह मन पवित्र हो जाता है। आत्मिक मौत लाने वाली इस माया-जहर के बीच में रहते हुए ही उसको आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल मिल जाता है। मेरे प्रभू को यही मर्यादा भाती है। 11। हे भाई ! जिस मनुष्य को परमात्मा खुद आत्मिक जीवन की समझ देता है। वही मनुष्य समझता है। (ज्यों ज्यों) वह परमात्मा के गुण गाता है। उसका हृदय सूझ वाला होता जाता है। वह मनुष्य अहंकार और ममता को (प्रभाव डालने से) रोके रखता हैआत्मिक अडोलता में टिक केवह सदा-स्थिर हरी मिलाप प्राप्त कर लेता है। 12। हे भाई ! परमात्मा की मेहर के बिना (नाम से टूटी हुई) और बहुत सारी दुनिया भटकती फिरती है। वह जनम-मरण के चक्करों में पड़ी रहती है। उसका जनम-मरन का चक्कर खत्म नहीं होता। जो मनुष्य आत्मिक मौत लाने वाली माया-जहर का लट्टू हुआ रहता है। वह यह जहर ही विहाजता फिरता है। वह कभी भी आत्मिक आनंद नहीं पा सकता। 13। हे भाई ! (त्योगियों वाला पहरावा डाले फिरते हुओं को देख के भी ना भूल जाना कि ये इस जहर से बचे हुए हैं। जोग-अभ्यास वाला) धार्मिक पहरावा पहनने वाला मनुष्य बहुत सारे (ऐसे) भेष करता है। पर गुरू के शबद के बिना कोई भी मनुष्य (अपने अंदर से) अहंकार दूर नहीं कर सका। जब मनुष्य दुनिया के कार्य-व्यवहार करता हुआ ही स्वै भाव छोड़ता है। तब वह (अहंकार से) मुक्ति पा लेता है। वह सदा कायम रहने वाले परमात्मा के नाम में जुड़ा रहता है। 14। हे भाई ! आत्मिक जीवन की ओर से बेसमझी (इसको) माया की तृष्णा (कह लो। ये माया की तृष्णा मनुष्य के) इस शरीर को (अंदर-अंदर से) जलाती रहती है।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 1067 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।
India Gate के लॉन में Sunday शाम की family-picnic।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 47 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1067” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 1068 →, पीछे का: ← अंग 1066।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।