अंग 1004

अंग
1004
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਬਾਝੁ ਗੁਰੂ ਗੁਬਾਰਾ ॥
ਮਿਲਿ ਸਤਿਗੁਰ ਨਿਸਤਾਰਾ ॥੨॥
ਹਉ ਹਉ ਕਰਮ ਕਮਾਣੇ ॥
ਤੇ ਤੇ ਬੰਧ ਗਲਾਣੇ ॥
ਮੇਰੀ ਮੇਰੀ ਧਾਰੀ ॥
ਓਹਾ ਪੈਰਿ ਲੋਹਾਰੀ ॥
ਸੋ ਗੁਰ ਮਿਲਿ ਏਕੁ ਪਛਾਣੈ ॥
ਜਿਸੁ ਹੋਵੈ ਭਾਗੁ ਮਥਾਣੈ ॥੩॥
ਸੋ ਮਿਲਿਆ ਜਿ ਹਰਿ ਮਨਿ ਭਾਇਆ ॥
ਸੋ ਭੂਲਾ ਜਿ ਪ੍ਰਭੂ ਭੁਲਾਇਆ ॥
ਨਹ ਆਪਹੁ ਮੂਰਖੁ ਗਿਆਨੀ ॥
ਜਿ ਕਰਾਵੈ ਸੁ ਨਾਮੁ ਵਖਾਨੀ ॥
ਤੇਰਾ ਅੰਤੁ ਨ ਪਾਰਾਵਾਰਾ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਸਦ ਬਲਿਹਾਰਾ ॥੪॥੧॥੧੭॥
बाझु गुरू गुबारा ॥
मिलि सतिगुर निसतारा ॥२॥
हउ हउ करम कमाणे ॥
ते ते बंध गलाणे ॥
मेरी मेरी धारी ॥
ओहा पैरि लोहारी ॥
सो गुर मिलि एकु पछाणै ॥
जिसु होवै भागु मथाणै ॥३॥
सो मिलिआ जि हरि मनि भाइआ ॥
सो भूला जि प्रभू भुलाइआ ॥
नह आपहु मूरखु गिआनी ॥
जि करावै सु नामु वखानी ॥
तेरा अंतु न पारावारा ॥
जन नानक सद बलिहारा ॥४॥१॥१७॥

हिन्दी अर्थ: गुरू के बिना (आत्मिक जीवन का) अंधेरा (ही अंधेरा) है। गुरू को मिल के (ही इस अंधेरे में से) पार लांघा जाता है। 2। हे भाई ! अहंकार के आसरे जीव (अनेकों) कर्म करते हैं। वह सारे कर्म (जीवों के) गले में फंदे बन जाते हैं। जीव अपने हृदय में ममता बसाए रखता है। वह ममता ही जीव के पैरों में लोहे की बेड़ी बन जाती है। वह गुरू को मिल के एक परमात्मा के साथ गहरी सांझ डाल लेता है। हे भाई ! जिस मनुष्य के माथे के भाग्य जाग उठते हैं। 3। हे भाई ! वही मनुष्य प्रभू-चरणों में जुड़ता है जो प्रभू के मन को प्यारा लगता है; वही मनुष्य गलत राह पर पड़ता है जिसे प्रभू स्वयं कुमार्ग पर डालता है। अपने आप ना कोई मूर्ख है ना ही कोई समझदार। परमात्मा जो कुछ जीवों से करवाता है उसके अनुसार ही उसका नाम (मूर्ख अथवा ज्ञानी) पड़ जाता है। तेरे गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता। तेरी हस्ती के इस पार-उस पार के छोर को तलाशा नहीं जा सकता। हे दास नानक ! (कह- हे प्रभू !) मैं तुझसे सदा सदके जाता हूँ। 4। 1। 17।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਮੋਹਨੀ ਮੋਹਿ ਲੀਏ ਤ੍ਰੈ ਗੁਨੀਆ ॥
ਲੋਭਿ ਵਿਆਪੀ ਝੂਠੀ ਦੁਨੀਆ ॥
ਮੇਰੀ ਮੇਰੀ ਕਰਿ ਕੈ ਸੰਚੀ ਅੰਤ ਕੀ ਬਾਰ ਸਗਲ ਲੇ ਛਲੀਆ ॥੧॥
ਨਿਰਭਉ ਨਿਰੰਕਾਰੁ ਦਇਅਲੀਆ ॥
ਜੀਅ ਜੰਤ ਸਗਲੇ ਪ੍ਰਤਿਪਲੀਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਏਕੈ ਸ੍ਰਮੁ ਕਰਿ ਗਾਡੀ ਗਡਹੈ ॥
ਏਕਹਿ ਸੁਪਨੈ ਦਾਮੁ ਨ ਛਡਹੈ ॥
ਰਾਜੁ ਕਮਾਇ ਕਰੀ ਜਿਨਿ ਥੈਲੀ ਤਾ ਕੈ ਸੰਗਿ ਨ ਚੰਚਲਿ ਚਲੀਆ ॥੨॥
ਏਕਹਿ ਪ੍ਰਾਣ ਪਿੰਡ ਤੇ ਪਿਆਰੀ ॥
ਏਕ ਸੰਚੀ ਤਜਿ ਬਾਪ ਮਹਤਾਰੀ ॥
ਸੁਤ ਮੀਤ ਭ੍ਰਾਤ ਤੇ ਗੁਹਜੀ ਤਾ ਕੈ ਨਿਕਟਿ ਨ ਹੋਈ ਖਲੀਆ ॥੩॥
ਹੋਇ ਅਉਧੂਤ ਬੈਠੇ ਲਾਇ ਤਾਰੀ ॥
ਜੋਗੀ ਜਤੀ ਪੰਡਿਤ ਬੀਚਾਰੀ ॥
ਗ੍ਰਿਹਿ ਮੜੀ ਮਸਾਣੀ ਬਨ ਮਹਿ ਬਸਤੇ ਊਠਿ ਤਿਨਾ ਕੈ ਲਾਗੀ ਪਲੀਆ ॥੪॥
ਕਾਟੇ ਬੰਧਨ ਠਾਕੁਰਿ ਜਾ ਕੇ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਬਸਿਓ ਜੀਅ ਤਾ ਕੈ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਭਏ ਜਨ ਮੁਕਤੇ ਗਤਿ ਪਾਈ ਨਾਨਕ ਨਦਰਿ ਨਿਹਲੀਆ ॥੫॥੨॥੧੮॥
मारू महला ५ ॥
मोहनी मोहि लीए त्रै गुनीआ ॥
लोभि विआपी झूठी दुनीआ ॥
मेरी मेरी करि कै संची अंत की बार सगल ले छलीआ ॥१॥
निरभउ निरंकारु दइअलीआ ॥
जीअ जंत सगले प्रतिपलीआ ॥१॥ रहाउ ॥
एकै स्रमु करि गाडी गडहै ॥
एकहि सुपनै दामु न छडहै ॥
राजु कमाइ करी जिनि थैली ता कै संगि न चंचलि चलीआ ॥२॥
एकहि प्राण पिंड ते पिआरी ॥
एक संची तजि बाप महतारी ॥
सुत मीत भ्रात ते गुहजी ता कै निकटि न होई खलीआ ॥३॥
होइ अउधूत बैठे लाइ तारी ॥
जोगी जती पंडित बीचारी ॥
ग्रिहि मड़ी मसाणी बन महि बसते ऊठि तिना कै लागी पलीआ ॥४॥
काटे बंधन ठाकुरि जा के ॥
हरि हरि नामु बसिओ जीअ ता कै ॥
साधसंगि भए जन मुकते गति पाई नानक नदरि निहलीआ ॥५॥२॥१८॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला ५॥ (हे भाई ! उस परमात्मा की पैदा की हुई) मोहनी माया ने सारे त्रै-गुणी जीवों को अपने वश में किया हुआ है। सारी दुनिया नाशवंत दुनिया के लोभ में फंसी हुई है। सारे जीव (इस माया की) ममता में फस के (इसको) एकत्र करते हैं। पर आखिरी वक्त ये सबको धोखा दे जाती है। 1। हे भाई ! जो परमात्मा डर-रहित है। जिसका कोई खास स्वरूप बताया नहीं जा सकता। जो दया का घर है। वह सारे जीवों की पालना करता है। 1। रहाउ। हे भाई ! कोई तो ऐसा है जो बड़ी मेहनत से कमा के धरती में दबा के रखता है; कोई ऐसा है जो सपने में (भी। भाव। कभी भी इसको) हाथों से नहीं छोड़ता। जिस मनुष्य ने हकूमत करके खजाना जोड़ लिया; ये कभी एक जगह ना टिकने वाली माया उसके साथ भी नहीं जाती। 2। हे भाई ! कोई ऐसा मनुष्य है जिसको ये माया प्राणों से शरीर से भी ज्यादा प्यारी लगती है। कोई ऐसा है जो माता-पिता का साथ छोड़ के एकत्र करता है; पुत्रों-मित्रों-भाईयों से छुपा के रखता है। पर ये उसके पास भी नहीं रुकती। 3। हे भाई ! कई ऐसे हैं जो त्यागी बन के समाधि लगा के बैठते हैं; कई जोगी हैं। जती हैं ज्ञानी पंण्डित हैं; (पंडित) घर में। (त्यागी) मढ़ी-मसाणों में जंगलों में टिके रहते हैं। पर ये माया उठके उनको भी चिपक जाती है। 4। हे भाई ! मालिक-प्रभू ने जिन मनुष्यों के (माया के मोह के) बँधन काट दिए। उनके हृदय में परमात्मा का नाम सदा के लिए आ टिका। वह मनुष्य गुरू की संगति में रह के (माया के मोह के फंदों से) आजाद हो गए। हे नानक ! परमात्मा ने उन पर मेहर की निगाह की। और उन्होंने सबसे ऊँची आत्मिक अवस्था प्राप्त कर ली। 5। 2। 18।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਸਿਮਰਹੁ ਏਕੁ ਨਿਰੰਜਨ ਸੋਊ ॥
ਜਾ ਤੇ ਬਿਰਥਾ ਜਾਤ ਨ ਕੋਊ ॥
ਮਾਤ ਗਰਭ ਮਹਿ ਜਿਨਿ ਪ੍ਰਤਿਪਾਰਿਆ ॥
ਜੀਉ ਪਿੰਡੁ ਦੇ ਸਾਜਿ ਸਵਾਰਿਆ ॥
ਸੋਈ ਬਿਧਾਤਾ ਖਿਨੁ ਖਿਨੁ ਜਪੀਐ ॥
ਜਿਸੁ ਸਿਮਰਤ ਅਵਗੁਣ ਸਭਿ ਢਕੀਐ ॥
ਚਰਣ ਕਮਲ ਉਰ ਅੰਤਰਿ ਧਾਰਹੁ ॥
ਬਿਖਿਆ ਬਨ ਤੇ ਜੀਉ ਉਧਾਰਹੁ ॥
ਕਰਣ ਪਲਾਹ ਮਿਟਹਿ ਬਿਲਲਾਟਾ ॥
ਜਪਿ ਗੋਵਿਦ ਭਰਮੁ ਭਉ ਫਾਟਾ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਵਿਰਲਾ ਕੋ ਪਾਏ ॥
ਨਾਨਕੁ ਤਾ ਕੈ ਬਲਿ ਬਲਿ ਜਾਏ ॥੧॥
ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਮਨਿ ਤਨਿ ਆਧਾਰਾ ॥
ਜੋ ਸਿਮਰੈ ਤਿਸ ਕਾ ਨਿਸਤਾਰਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮਿਥਿਆ ਵਸਤੁ ਸਤਿ ਕਰਿ ਮਾਨੀ ॥
ਹਿਤੁ ਲਾਇਓ ਸਠ ਮੂੜ ਅਗਿਆਨੀ ॥
ਕਾਮ ਕ੍ਰੋਧ ਲੋਭ ਮਦ ਮਾਤਾ ॥
ਕਉਡੀ ਬਦਲੈ ਜਨਮੁ ਗਵਾਤਾ ॥
ਅਪਨਾ ਛੋਡਿ ਪਰਾਇਐ ਰਾਤਾ ॥
ਮਾਇਆ ਮਦ ਮਨ ਤਨ ਸੰਗਿ ਜਾਤਾ ॥
ਤ੍ਰਿਸਨ ਨ ਬੂਝੈ ਕਰਤ ਕਲੋਲਾ ॥
ਊਣੀ ਆਸ ਮਿਥਿਆ ਸਭਿ ਬੋਲਾ ॥
ਆਵਤ ਇਕੇਲਾ ਜਾਤ ਇਕੇਲਾ ॥
मारू महला ५ ॥
सिमरहु एकु निरंजन सोऊ ॥
जा ते बिरथा जात न कोऊ ॥
मात गरभ महि जिनि प्रतिपारिआ ॥
जीउ पिंडु दे साजि सवारिआ ॥
सोई बिधाता खिनु खिनु जपीऐ ॥
जिसु सिमरत अवगुण सभि ढकीऐ ॥
चरण कमल उर अंतरि धारहु ॥
बिखिआ बन ते जीउ उधारहु ॥
करण पलाह मिटहि बिललाटा ॥
जपि गोविद भरमु भउ फाटा ॥
साधसंगि विरला को पाए ॥
नानकु ता कै बलि बलि जाए ॥१॥
राम नामु मनि तनि आधारा ॥
जो सिमरै तिस का निसतारा ॥१॥ रहाउ ॥
मिथिआ वसतु सति करि मानी ॥
हितु लाइओ सठ मूड़ अगिआनी ॥
काम क्रोध लोभ मद माता ॥
कउडी बदलै जनमु गवाता ॥
अपना छोडि पराइऐ राता ॥
माइआ मद मन तन संगि जाता ॥
त्रिसन न बूझै करत कलोला ॥
ऊणी आस मिथिआ सभि बोला ॥
आवत इकेला जात इकेला ॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला ५॥ हे भाई ! उसी निर्लिप परमात्मा का सिमरन करते रहो। जिस (के दर) से कोई भी जीव खाली नहीं जाता; माँ के पेट में जिस ने पालना की। प्राण और शरीर दे के पैदा करके सुंदर बना दिया। हे भाई ! उसी सृजनहार को हरेक छिन जपना चाहिए। जिसको सिमरते हुए अपने सारे अवगुणों को ढक सकते हैं। हे भाई ! परमात्मा के सुंदर चरण (अपने) हृदय में बसाए रखो। और इस तरह माया (सागर के लबालब भरे) पानी से (अपने) प्राणों को बचा लो। हे भाई ! (सिमरन की बरकति से) सारी गिड़-गिड़ाहटें और विलाप मिट जाते हैं। गोबिंद (का नाम) जप के भटकना और डर (का पर्दा) फट जाता है। पर। हे भाई ! कोई विरला मनुष्य गुरू की संगति में रह के नाम प्राप्त करता है। नानक उस मनुष्य से सदा बलिहार जाता है। 1। हे भाई ! परमात्मा के नाम को अपने मन में अपने शरीर में (अपनी जिंदगी का) सहारा बनाए रख। जो मनुष्य (नाम) सिमरता है (संसार-समुंद्र से) उस (मनुष्य) का पार-‘उतारा हो जाता है। 1। रहाउ। नाशवंत पदार्थों को सदा-स्थिर रहने वाला समझ रहा है। हे दुष्ट ! हे मूर्ख ! हे बेसमझ ! उनके साथ तूने प्यार डाला है हे मूर्ख ! तू काम क्रोध लोभ (आदि विकारों) के नशे में मस्त है। और। इस तरह कौड़ी के बदले में अपना (कीमती मानस) जनम गवा रहा है। हे मूर्ख ! (सिर्फ परमात्मा ही) अपना (असल साथी है। उसको) छोड़ के पराए (हो जाने वाले धन-पदार्थ) के साथ प्यार कर रहा है। तुझे माया का नशा चढ़ा हुआ है। तू मन के पीछे लग के सिर्फ शरीर की खातिर दौड़-भाग करता है। दुनिया के मौज-मेले करते हुए तेरी तृष्णा नहीं मिटती। (तेरी तृप्ति की) आस (कभी) पूरी नहीं होती। नाशवंत माया की खातिर ही तेरी सारी बातें हैं। हे भाई ! जीव इस संसार में अकेला ही आता है और यहाँ से अकेला ही चल पड़ता है;

संदर्भ: यह अंग 1004 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

Saket के Mall में Sunday-shopping के बीच कोई हल्की-सी पंक्ति याद आ जाए, क्या होगा।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 56 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1004” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 1005 →, पीछे का: ← अंग 1003

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।