अंग
1049
राग मारू
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਮਾਇਆ ਮੋਹਿ ਸੁਧਿ ਨ ਕਾਈ ॥
ਮਨਮੁਖ ਅੰਧੇ ਕਿਛੂ ਨ ਸੂਝੈ ਗੁਰਮਤਿ ਨਾਮੁ ਪ੍ਰਗਾਸੀ ਹੇ ॥੧੪॥
ਮਨਮੁਖ ਹਉਮੈ ਮਾਇਆ ਸੂਤੇ ॥
ਅਪਣਾ ਘਰੁ ਨ ਸਮਾਲਹਿ ਅੰਤਿ ਵਿਗੂਤੇ ॥
ਪਰ ਨਿੰਦਾ ਕਰਹਿ ਬਹੁ ਚਿੰਤਾ ਜਾਲੈ ਦੁਖੇ ਦੁਖਿ ਨਿਵਾਸੀ ਹੇ ॥੧੫॥
ਆਪੇ ਕਰਤੈ ਕਾਰ ਕਰਾਈ ॥
ਆਪੇ ਗੁਰਮੁਖਿ ਦੇਇ ਬੁਝਾਈ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਮਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਨਾਮੇ ਨਾਮਿ ਨਿਵਾਸੀ ਹੇ ॥੧੬॥੫॥
ਮਨਮੁਖ ਅੰਧੇ ਕਿਛੂ ਨ ਸੂਝੈ ਗੁਰਮਤਿ ਨਾਮੁ ਪ੍ਰਗਾਸੀ ਹੇ ॥੧੪॥
ਮਨਮੁਖ ਹਉਮੈ ਮਾਇਆ ਸੂਤੇ ॥
ਅਪਣਾ ਘਰੁ ਨ ਸਮਾਲਹਿ ਅੰਤਿ ਵਿਗੂਤੇ ॥
ਪਰ ਨਿੰਦਾ ਕਰਹਿ ਬਹੁ ਚਿੰਤਾ ਜਾਲੈ ਦੁਖੇ ਦੁਖਿ ਨਿਵਾਸੀ ਹੇ ॥੧੫॥
ਆਪੇ ਕਰਤੈ ਕਾਰ ਕਰਾਈ ॥
ਆਪੇ ਗੁਰਮੁਖਿ ਦੇਇ ਬੁਝਾਈ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਮਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਨਾਮੇ ਨਾਮਿ ਨਿਵਾਸੀ ਹੇ ॥੧੬॥੫॥
माइआ मोहि सुधि न काई ॥
मनमुख अंधे किछू न सूझै गुरमति नामु प्रगासी हे ॥१४॥
मनमुख हउमै माइआ सूते ॥
अपणा घरु न समालहि अंति विगूते ॥
पर निंदा करहि बहु चिंता जालै दुखे दुखि निवासी हे ॥१५॥
आपे करतै कार कराई ॥
आपे गुरमुखि देइ बुझाई ॥
नानक नामि रते मनु निरमलु नामे नामि निवासी हे ॥१६॥५॥
मनमुख अंधे किछू न सूझै गुरमति नामु प्रगासी हे ॥१४॥
मनमुख हउमै माइआ सूते ॥
अपणा घरु न समालहि अंति विगूते ॥
पर निंदा करहि बहु चिंता जालै दुखे दुखि निवासी हे ॥१५॥
आपे करतै कार कराई ॥
आपे गुरमुखि देइ बुझाई ॥
नानक नामि रते मनु निरमलु नामे नामि निवासी हे ॥१६॥५॥
हिन्दी अर्थ: माया के मोह के कारण मनुष्य को रक्ती भर भी (इस गलती की) समझ नहीं होती। हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाले अंधे मनुष्य को (आत्मिक जीवन के बारे में) कुछ नहीं सूझता। जो मनुष्य गुरू की मति लेता है उसके अंदर परमात्मा का नाम चमक पड़ता है। 14। हे भाई ! मन के मुरीद मनुष्य अहंकार में माया (के मोह) में (सही जीवन से) गाफिल हुए रहते हैं। (विकारों से) हो रहे हमलों से वे अपना हृदय-घर नहीं बचाते। आखिर दुखी रहते है। (हे भाई ! मन के मुरीद मनुष्य) दूसरों की निंदा करते हैं (अपने अंदर की) चिंता उनको बहुत जलाती रहती है। वे सदा ही दुखों में पड़े रहते हैं। 15। (पर। हे भाई ! मनमुखों के भी क्या वश। ) करतार ने खुद ही उनसे (ये निंदा की) कार सदा करवाई है। करतार खुद ही गुरू के सन्मुख करके मनुष्य को (सही आत्मिक जीवन की) समझ देता है। हे नानक ! जो मनुष्य परमात्मा के नाम में रंगे रहते हैं। उनका मन पवित्र हो जाता है। वे सदा परमात्मा के नाम में लीन रहते हैं। 16। 5।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਏਕੋ ਸੇਵੀ ਸਦਾ ਥਿਰੁ ਸਾਚਾ ॥
ਦੂਜੈ ਲਾਗਾ ਸਭੁ ਜਗੁ ਕਾਚਾ ॥
ਗੁਰਮਤੀ ਸਦਾ ਸਚੁ ਸਾਲਾਹੀ ਸਾਚੇ ਹੀ ਸਾਚਿ ਪਤੀਜੈ ਹੇ ॥੧॥
ਤੇਰੇ ਗੁਣ ਬਹੁਤੇ ਮੈ ਏਕੁ ਨ ਜਾਤਾ ॥
ਆਪੇ ਲਾਇ ਲਏ ਜਗਜੀਵਨੁ ਦਾਤਾ ॥
ਆਪੇ ਬਖਸੇ ਦੇ ਵਡਿਆਈ ਗੁਰਮਤਿ ਇਹੁ ਮਨੁ ਭੀਜੈ ਹੇ ॥੨॥
ਮਾਇਆ ਲਹਰਿ ਸਬਦਿ ਨਿਵਾਰੀ ॥
ਇਹੁ ਮਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਹਉਮੈ ਮਾਰੀ ॥
ਸਹਜੇ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ਰੰਗਿ ਰਾਤਾ ਰਸਨਾ ਰਾਮੁ ਰਵੀਜੈ ਹੇ ॥੩॥
ਮੇਰੀ ਮੇਰੀ ਕਰਤ ਵਿਹਾਣੀ ॥
ਮਨਮੁਖਿ ਨ ਬੂਝੈ ਫਿਰੈ ਇਆਣੀ ॥
ਜਮਕਾਲੁ ਘੜੀ ਮੁਹਤੁ ਨਿਹਾਲੇ ਅਨਦਿਨੁ ਆਰਜਾ ਛੀਜੈ ਹੇ ॥੪॥
ਅੰਤਰਿ ਲੋਭੁ ਕਰੈ ਨਹੀ ਬੂਝੈ ॥
ਸਿਰ ਊਪਰਿ ਜਮਕਾਲੁ ਨ ਸੂਝੈ ॥
ਐਥੈ ਕਮਾਣਾ ਸੁ ਅਗੈ ਆਇਆ ਅੰਤਕਾਲਿ ਕਿਆ ਕੀਜੈ ਹੇ ॥੫॥
ਜੋ ਸਚਿ ਲਾਗੇ ਤਿਨ ਸਾਚੀ ਸੋਇ ॥
ਦੂਜੈ ਲਾਗੇ ਮਨਮੁਖਿ ਰੋਇ ॥
ਦੁਹਾ ਸਿਰਿਆ ਕਾ ਖਸਮੁ ਹੈ ਆਪੇ ਆਪੇ ਗੁਣ ਮਹਿ ਭੀਜੈ ਹੇ ॥੬॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਸਦਾ ਜਨੁ ਸੋਹੈ ॥
ਨਾਮ ਰਸਾਇਣਿ ਇਹੁ ਮਨੁ ਮੋਹੈ ॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹ ਮੈਲੁ ਪਤੰਗੁ ਨ ਲਾਗੈ ਗੁਰਮਤੀ ਹਰਿ ਨਾਮਿ ਭੀਜੈ ਹੇ ॥੭॥
ਸਭਨਾ ਵਿਚਿ ਵਰਤੈ ਇਕੁ ਸੋਈ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਪਰਗਟੁ ਹੋਈ ॥
ਹਉਮੈ ਮਾਰਿ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਨਾਇ ਸਾਚੈ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀਜੈ ਹੇ ॥੮॥
ਕਿਲਬਿਖ ਦੂਖ ਨਿਵਾਰਣਹਾਰਾ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸੇਵਿਆ ਸਬਦਿ ਵੀਚਾਰਾ ॥
ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਆਪੇ ਆਪਿ ਵਰਤੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਤਨੁ ਮਨੁ ਭੀਜੈ ਹੇ ॥੯॥
ਮਾਇਆ ਅਗਨਿ ਜਲੈ ਸੰਸਾਰੇ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਿਵਾਰੈ ਸਬਦਿ ਵੀਚਾਰੇ ॥
ਅੰਤਰਿ ਸਾਂਤਿ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਗੁਰਮਤੀ ਨਾਮੁ ਲੀਜੈ ਹੇ ॥੧੦॥
ਇੰਦ੍ਰ ਇੰਦ੍ਰਾਸਣਿ ਬੈਠੇ ਜਮ ਕਾ ਭਉ ਪਾਵਹਿ ॥
ਜਮੁ ਨ ਛੋਡੈ ਬਹੁ ਕਰਮ ਕਮਾਵਹਿ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਭੇਟੈ ਤਾ ਮੁਕਤਿ ਪਾਈਐ ਹਰਿ ਹਰਿ ਰਸਨਾ ਪੀਜੈ ਹੇ ॥੧੧॥
ਮਨਮੁਖਿ ਅੰਤਰਿ ਭਗਤਿ ਨ ਹੋਈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਭਗਤਿ ਸਾਂਤਿ ਸੁਖੁ ਹੋਈ ॥
ਪਵਿਤ੍ਰ ਪਾਵਨ ਸਦਾ ਹੈ ਬਾਣੀ ਗੁਰਮਤਿ ਅੰਤਰੁ ਭੀਜੈ ਹੇ ॥੧੨॥
ਬ੍ਰਹਮਾ ਬਿਸਨੁ ਮਹੇਸੁ ਵੀਚਾਰੀ ॥
ਤ੍ਰੈ ਗੁਣ ਬਧਕ ਮੁਕਤਿ ਨਿਰਾਰੀ ॥
ਏਕੋ ਸੇਵੀ ਸਦਾ ਥਿਰੁ ਸਾਚਾ ॥
ਦੂਜੈ ਲਾਗਾ ਸਭੁ ਜਗੁ ਕਾਚਾ ॥
ਗੁਰਮਤੀ ਸਦਾ ਸਚੁ ਸਾਲਾਹੀ ਸਾਚੇ ਹੀ ਸਾਚਿ ਪਤੀਜੈ ਹੇ ॥੧॥
ਤੇਰੇ ਗੁਣ ਬਹੁਤੇ ਮੈ ਏਕੁ ਨ ਜਾਤਾ ॥
ਆਪੇ ਲਾਇ ਲਏ ਜਗਜੀਵਨੁ ਦਾਤਾ ॥
ਆਪੇ ਬਖਸੇ ਦੇ ਵਡਿਆਈ ਗੁਰਮਤਿ ਇਹੁ ਮਨੁ ਭੀਜੈ ਹੇ ॥੨॥
ਮਾਇਆ ਲਹਰਿ ਸਬਦਿ ਨਿਵਾਰੀ ॥
ਇਹੁ ਮਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਹਉਮੈ ਮਾਰੀ ॥
ਸਹਜੇ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ਰੰਗਿ ਰਾਤਾ ਰਸਨਾ ਰਾਮੁ ਰਵੀਜੈ ਹੇ ॥੩॥
ਮੇਰੀ ਮੇਰੀ ਕਰਤ ਵਿਹਾਣੀ ॥
ਮਨਮੁਖਿ ਨ ਬੂਝੈ ਫਿਰੈ ਇਆਣੀ ॥
ਜਮਕਾਲੁ ਘੜੀ ਮੁਹਤੁ ਨਿਹਾਲੇ ਅਨਦਿਨੁ ਆਰਜਾ ਛੀਜੈ ਹੇ ॥੪॥
ਅੰਤਰਿ ਲੋਭੁ ਕਰੈ ਨਹੀ ਬੂਝੈ ॥
ਸਿਰ ਊਪਰਿ ਜਮਕਾਲੁ ਨ ਸੂਝੈ ॥
ਐਥੈ ਕਮਾਣਾ ਸੁ ਅਗੈ ਆਇਆ ਅੰਤਕਾਲਿ ਕਿਆ ਕੀਜੈ ਹੇ ॥੫॥
ਜੋ ਸਚਿ ਲਾਗੇ ਤਿਨ ਸਾਚੀ ਸੋਇ ॥
ਦੂਜੈ ਲਾਗੇ ਮਨਮੁਖਿ ਰੋਇ ॥
ਦੁਹਾ ਸਿਰਿਆ ਕਾ ਖਸਮੁ ਹੈ ਆਪੇ ਆਪੇ ਗੁਣ ਮਹਿ ਭੀਜੈ ਹੇ ॥੬॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਸਦਾ ਜਨੁ ਸੋਹੈ ॥
ਨਾਮ ਰਸਾਇਣਿ ਇਹੁ ਮਨੁ ਮੋਹੈ ॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹ ਮੈਲੁ ਪਤੰਗੁ ਨ ਲਾਗੈ ਗੁਰਮਤੀ ਹਰਿ ਨਾਮਿ ਭੀਜੈ ਹੇ ॥੭॥
ਸਭਨਾ ਵਿਚਿ ਵਰਤੈ ਇਕੁ ਸੋਈ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਪਰਗਟੁ ਹੋਈ ॥
ਹਉਮੈ ਮਾਰਿ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਨਾਇ ਸਾਚੈ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀਜੈ ਹੇ ॥੮॥
ਕਿਲਬਿਖ ਦੂਖ ਨਿਵਾਰਣਹਾਰਾ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸੇਵਿਆ ਸਬਦਿ ਵੀਚਾਰਾ ॥
ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਆਪੇ ਆਪਿ ਵਰਤੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਤਨੁ ਮਨੁ ਭੀਜੈ ਹੇ ॥੯॥
ਮਾਇਆ ਅਗਨਿ ਜਲੈ ਸੰਸਾਰੇ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਿਵਾਰੈ ਸਬਦਿ ਵੀਚਾਰੇ ॥
ਅੰਤਰਿ ਸਾਂਤਿ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਗੁਰਮਤੀ ਨਾਮੁ ਲੀਜੈ ਹੇ ॥੧੦॥
ਇੰਦ੍ਰ ਇੰਦ੍ਰਾਸਣਿ ਬੈਠੇ ਜਮ ਕਾ ਭਉ ਪਾਵਹਿ ॥
ਜਮੁ ਨ ਛੋਡੈ ਬਹੁ ਕਰਮ ਕਮਾਵਹਿ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਭੇਟੈ ਤਾ ਮੁਕਤਿ ਪਾਈਐ ਹਰਿ ਹਰਿ ਰਸਨਾ ਪੀਜੈ ਹੇ ॥੧੧॥
ਮਨਮੁਖਿ ਅੰਤਰਿ ਭਗਤਿ ਨ ਹੋਈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਭਗਤਿ ਸਾਂਤਿ ਸੁਖੁ ਹੋਈ ॥
ਪਵਿਤ੍ਰ ਪਾਵਨ ਸਦਾ ਹੈ ਬਾਣੀ ਗੁਰਮਤਿ ਅੰਤਰੁ ਭੀਜੈ ਹੇ ॥੧੨॥
ਬ੍ਰਹਮਾ ਬਿਸਨੁ ਮਹੇਸੁ ਵੀਚਾਰੀ ॥
ਤ੍ਰੈ ਗੁਣ ਬਧਕ ਮੁਕਤਿ ਨਿਰਾਰੀ ॥
मारू महला ३ ॥
एको सेवी सदा थिरु साचा ॥
दूजै लागा सभु जगु काचा ॥
गुरमती सदा सचु सालाही साचे ही साचि पतीजै हे ॥१॥
तेरे गुण बहुते मै एकु न जाता ॥
आपे लाइ लए जगजीवनु दाता ॥
आपे बखसे दे वडिआई गुरमति इहु मनु भीजै हे ॥२॥
माइआ लहरि सबदि निवारी ॥
इहु मनु निरमलु हउमै मारी ॥
सहजे गुण गावै रंगि राता रसना रामु रवीजै हे ॥३॥
मेरी मेरी करत विहाणी ॥
मनमुखि न बूझै फिरै इआणी ॥
जमकालु घड़ी मुहतु निहाले अनदिनु आरजा छीजै हे ॥४॥
अंतरि लोभु करै नही बूझै ॥
सिर ऊपरि जमकालु न सूझै ॥
ऐथै कमाणा सु अगै आइआ अंतकालि किआ कीजै हे ॥५॥
जो सचि लागे तिन साची सोइ ॥
दूजै लागे मनमुखि रोइ ॥
दुहा सिरिआ का खसमु है आपे आपे गुण महि भीजै हे ॥६॥
गुर कै सबदि सदा जनु सोहै ॥
नाम रसाइणि इहु मनु मोहै ॥
माइआ मोह मैलु पतंगु न लागै गुरमती हरि नामि भीजै हे ॥७॥
सभना विचि वरतै इकु सोई ॥
गुर परसादी परगटु होई ॥
हउमै मारि सदा सुखु पाइआ नाइ साचै अंम्रितु पीजै हे ॥८॥
किलबिख दूख निवारणहारा ॥
गुरमुखि सेविआ सबदि वीचारा ॥
सभु किछु आपे आपि वरतै गुरमुखि तनु मनु भीजै हे ॥९॥
माइआ अगनि जलै संसारे ॥
गुरमुखि निवारै सबदि वीचारे ॥
अंतरि सांति सदा सुखु पाइआ गुरमती नामु लीजै हे ॥१०॥
इंद्र इंद्रासणि बैठे जम का भउ पावहि ॥
जमु न छोडै बहु करम कमावहि ॥
सतिगुरु भेटै ता मुकति पाईऐ हरि हरि रसना पीजै हे ॥११॥
मनमुखि अंतरि भगति न होई ॥
गुरमुखि भगति सांति सुखु होई ॥
पवित्र पावन सदा है बाणी गुरमति अंतरु भीजै हे ॥१२॥
ब्रहमा बिसनु महेसु वीचारी ॥
त्रै गुण बधक मुकति निरारी ॥
एको सेवी सदा थिरु साचा ॥
दूजै लागा सभु जगु काचा ॥
गुरमती सदा सचु सालाही साचे ही साचि पतीजै हे ॥१॥
तेरे गुण बहुते मै एकु न जाता ॥
आपे लाइ लए जगजीवनु दाता ॥
आपे बखसे दे वडिआई गुरमति इहु मनु भीजै हे ॥२॥
माइआ लहरि सबदि निवारी ॥
इहु मनु निरमलु हउमै मारी ॥
सहजे गुण गावै रंगि राता रसना रामु रवीजै हे ॥३॥
मेरी मेरी करत विहाणी ॥
मनमुखि न बूझै फिरै इआणी ॥
जमकालु घड़ी मुहतु निहाले अनदिनु आरजा छीजै हे ॥४॥
अंतरि लोभु करै नही बूझै ॥
सिर ऊपरि जमकालु न सूझै ॥
ऐथै कमाणा सु अगै आइआ अंतकालि किआ कीजै हे ॥५॥
जो सचि लागे तिन साची सोइ ॥
दूजै लागे मनमुखि रोइ ॥
दुहा सिरिआ का खसमु है आपे आपे गुण महि भीजै हे ॥६॥
गुर कै सबदि सदा जनु सोहै ॥
नाम रसाइणि इहु मनु मोहै ॥
माइआ मोह मैलु पतंगु न लागै गुरमती हरि नामि भीजै हे ॥७॥
सभना विचि वरतै इकु सोई ॥
गुर परसादी परगटु होई ॥
हउमै मारि सदा सुखु पाइआ नाइ साचै अंम्रितु पीजै हे ॥८॥
किलबिख दूख निवारणहारा ॥
गुरमुखि सेविआ सबदि वीचारा ॥
सभु किछु आपे आपि वरतै गुरमुखि तनु मनु भीजै हे ॥९॥
माइआ अगनि जलै संसारे ॥
गुरमुखि निवारै सबदि वीचारे ॥
अंतरि सांति सदा सुखु पाइआ गुरमती नामु लीजै हे ॥१०॥
इंद्र इंद्रासणि बैठे जम का भउ पावहि ॥
जमु न छोडै बहु करम कमावहि ॥
सतिगुरु भेटै ता मुकति पाईऐ हरि हरि रसना पीजै हे ॥११॥
मनमुखि अंतरि भगति न होई ॥
गुरमुखि भगति सांति सुखु होई ॥
पवित्र पावन सदा है बाणी गुरमति अंतरु भीजै हे ॥१२॥
ब्रहमा बिसनु महेसु वीचारी ॥
त्रै गुण बधक मुकति निरारी ॥
हिन्दी अर्थ: मारू महला ३॥ हे भाई ! मैं सिर्फ उस परमात्मा की ही सेवा-भक्ति करता हूँ। जो एक ही सदा कायम रहने वाला है। जगत (उस प्रभू की भक्ति छोड़ के) माया के मोह में लगा रहता है और कमजोर आत्मिक जीवन वाला हो जाता है। हे भाई ! मैं गुरू की मति की बरकति से सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह करता हूँ। (मेरा मन) सदा स्थिर प्रभू (की याद) में मस्त रहता है। 1। हे प्रभू ! तेरे अनेकों ही गुण (उपकार) हैं। मैं तो तेरे एक उपकार को ही नहीं समझ सका (कद्र नहीं पाई)। हे भाई ! जगत का जीवन दातार प्रभू स्वयं ही (मेहर करके जीव को अपने चरणों में) जोड़ता है। जिस मनुष्य पर खुद ही बख्शिश करता है उसको (नाम की) वडिआई देता है। उसका मन गुरू की शिक्षा में भीग जाता है। 2। हे भाई ! जिस मनुष्य ने गुरू के शबदों के द्वारा (अपने अंदर से) माया की लहर दूर कर ली। अहंकार को मार के उसका यह मन पवित्र हो जाता है। वह मनुष्य आत्मिक अडोलता में टिक के परमात्मा के गुण गाता रहता है। प्रभू के प्रेम-रंग में रंगा रहता है। उसकी जीभ परमात्मा का नाम जपती रहती है। 3। उसकी सारी उम्र ‘मेरी माया’ ‘मेरी माया’ करते हुए बीत जाती है। (माया की खातिर) भटकती फिरती है। हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाली बेसमझ जीव-स्त्री (सही जीवन-राह को) नहीं समझती। आत्मिक मौत उसकी जिंदगी की हरेक घड़ी हरेक पल को गौर से ताकती रहती है (भाव। ऐसी जीव-स्त्री सदा आत्मिक मौत मरती रहती है) उसकी उम्र एक-एक दिन कर के (व्यर्थ ही) कम होती जाती है। 4। हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाली जीव-स्त्री अपने अंदर लोभ करती रहती है। उसको (सही जीवन-राह) नहीं सूझता। उसके सिर पर मौत खड़ी रहती है। पर उसको इसकी समझ नहीं आती। इस जीवन में जीव-स्त्री जो कुछ कर्म कमाती है (उसका फल) भुगतना पड़ता है (सारी उम्र लोभ-लालच में गवाने से) अंत के समय कुछ नहीं किया जा सकता। 5। हे भाई ! जो मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू के नाम में जुड़ते हैं। उनको सदा कायम रहने वाली शोभा मिलती है। पर माया के मोह में लग के मन का मुरीद जीव दुखी रहता है। (पर जीवों के भी क्या वश। कोई नाम में जुड़ता है। कोई माया के मोह में फसा रहता है-) इन दोनों छोरों का मालिक प्रभू स्वयं ही है। वह खुद ही अपने गुणों में पतीजता है। 6। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के शबद के द्वारा अपना जीवन सुंदर बनाता है। उसका यह मन श्रेष्ठ नाम-रस में मस्त रहता है। उसको माया के मोह की मैल रक्ती भर भी नहीं लगती। गुरू की मति की बरकति से (उसका मन) परमात्मा के नाम में भीगा रहता है। 7। हे भाई ! एक वही परमात्मा सब जीवों में मौजूद है। पर गुरू की कृपा से ही वह (किसी भाग्यशाली के हृदय में) प्रकट होता है। वह मनुष्य (अपने अंदर से) अहंकार को दूर करके सदा आत्मिक आनंद पाता है। हे भाई ! सदा कायम रहने वाले परमात्मा के नाम में जुड़ने से आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल पीया जा सकता है। 8। हे भाई ! जो परमात्मा (सारे) पाप और दुख दूर करने के समर्थ है। उसकी सेवा-भक्ति गुरू के सन्मुख हो के गुरू के शबद में सुरति जोड़ के ही की जा सकती है। गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य का तन और मन (परमात्मा की भक्ति में) रसा रहता है। (गुरमुख मनुष्य को ही यह निश्चय आता है कि) परमात्मा सब कुछ स्वयं ही कर रहा है; हर जगह स्वयं ही मौजूद है। 9। हे भाई ! माया (की तृष्णा) की आग जगत में भड़क रही है। गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य गुरू के शबद में सुरति जोड़ के (इस तृष्णा अग्नि को अपने अंदर से) दूर कर लेता है। उसके अंदर सदा ठंड बनी रहती है। वह आत्मिक आनंद पाता है। हे भाई ! गुरू की मति पर चलने से ही परमात्मा का नाम सिमरा जा सकता है। 10। हे भाई ! (लोगों के मिथे हुए देवताओं के राजे) इन्द्र जैसे भी अपने तख्त पर बैठे हुए (इस तृष्णा की अग्नि के कारण) आत्मिक मौत का सहम बर्दाश्त कर रहे हैं। (जो लोग नाम नहीं सिमरते। पर अन्य मिथे हुए अनेकों धार्मिक) कर्म करते हैं। आत्मिक मौत (उनको भी) नहीं छोड़ती। जब (मनुष्य को) गुरू मिलता है। तब (इस आत्मिक मौत से) मुक्ति मिलती है। हे भाई ! (गुरू के द्वारा ही) जीभ से हरी-नाम-रस पीया जा सकता है। 11। हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य के हृदय में परमात्मा की भक्ति पैदा नहीं हो सकती। जो मनुष्य गुरू के सन्मुख रहता है। उसके अंदर परमात्मा की याद है। उसके अंदर ठंढ है। उसके अंदर आत्मिक आनंद है। हे भाई ! गुरू की बाणी सदा मनुष्य के मन को पवित्र करने में समर्थ है। गुरू की मति पर चलने से ही हृदय पतीजता है। 12। हे भाई ! बिचार के देख लो – ब्रहमा हो। विष्णू हो। शिव हो (कोई भी हो। जो प्राणी) माया के तीन गुणों में बँधे हुए हैं (आत्मिक मौत से) मुक्ति (उनसे) अलग हो जाती है।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 1049 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।
Vasant-Panchami की सुबह, सरस्वती-pooja, बच्चों का पीला कुर्ता।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 47 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1049” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 1050 →, पीछे का: ← अंग 1048।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।