अंग
1074
राग मारू
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਆਪੇ ਸਚੁ ਧਾਰਿਓ ਸਭੁ ਸਾਚਾ ਸਚੇ ਸਚਿ ਵਰਤੀਜਾ ਹੇ ॥੪॥
ਸਚੁ ਤਪਾਵਸੁ ਸਚੇ ਕੇਰਾ ॥
ਸਾਚਾ ਥਾਨੁ ਸਦਾ ਪ੍ਰਭ ਤੇਰਾ ॥
ਸਚੀ ਕੁਦਰਤਿ ਸਚੀ ਬਾਣੀ ਸਚੁ ਸਾਹਿਬ ਸੁਖੁ ਕੀਜਾ ਹੇ ॥੫॥
ਏਕੋ ਆਪਿ ਤੂਹੈ ਵਡ ਰਾਜਾ ॥
ਹੁਕਮਿ ਸਚੇ ਕੈ ਪੂਰੇ ਕਾਜਾ ॥
ਅੰਤਰਿ ਬਾਹਰਿ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਜਾਣੈ ਆਪੇ ਹੀ ਆਪਿ ਪਤੀਜਾ ਹੇ ॥੬॥
ਤੂ ਵਡ ਰਸੀਆ ਤੂ ਵਡ ਭੋਗੀ ॥
ਤੂ ਨਿਰਬਾਣੁ ਤੂਹੈ ਹੀ ਜੋਗੀ ॥
ਸਰਬ ਸੂਖ ਸਹਜ ਘਰਿ ਤੇਰੈ ਅਮਿਉ ਤੇਰੀ ਦ੍ਰਿਸਟੀਜਾ ਹੇ ॥੭॥
ਤੇਰੀ ਦਾਤਿ ਤੁਝੈ ਤੇ ਹੋਵੈ ॥
ਦੇਹਿ ਦਾਨੁ ਸਭਸੈ ਜੰਤ ਲੋਐ ॥
ਤੋਟਿ ਨ ਆਵੈ ਪੂਰ ਭੰਡਾਰੈ ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਰਹੇ ਆਘੀਜਾ ਹੇ ॥੮॥
ਜਾਚਹਿ ਸਿਧ ਸਾਧਿਕ ਬਨਵਾਸੀ ॥
ਜਾਚਹਿ ਜਤੀ ਸਤੀ ਸੁਖਵਾਸੀ ॥
ਇਕੁ ਦਾਤਾਰੁ ਸਗਲ ਹੈ ਜਾਚਿਕ ਦੇਹਿ ਦਾਨੁ ਸ੍ਰਿਸਟੀਜਾ ਹੇ ॥੯॥
ਕਰਹਿ ਭਗਤਿ ਅਰੁ ਰੰਗ ਅਪਾਰਾ ॥
ਖਿਨ ਮਹਿ ਥਾਪਿ ਉਥਾਪਨਹਾਰਾ ॥
ਭਾਰੋ ਤੋਲੁ ਬੇਅੰਤ ਸੁਆਮੀ ਹੁਕਮੁ ਮੰਨਿ ਭਗਤੀਜਾ ਹੇ ॥੧੦॥
ਜਿਸੁ ਦੇਹਿ ਦਰਸੁ ਸੋਈ ਤੁਧੁ ਜਾਣੈ ॥
ਓਹੁ ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਸਦਾ ਰੰਗ ਮਾਣੈ ॥
ਚਤੁਰੁ ਸਰੂਪੁ ਸਿਆਣਾ ਸੋਈ ਜੋ ਮਨਿ ਤੇਰੈ ਭਾਵੀਜਾ ਹੇ ॥੧੧॥
ਜਿਸੁ ਚੀਤਿ ਆਵਹਿ ਸੋ ਵੇਪਰਵਾਹਾ ॥
ਜਿਸੁ ਚੀਤਿ ਆਵਹਿ ਸੋ ਸਾਚਾ ਸਾਹਾ ॥
ਜਿਸੁ ਚੀਤਿ ਆਵਹਿ ਤਿਸੁ ਭਉ ਕੇਹਾ ਅਵਰੁ ਕਹਾ ਕਿਛੁ ਕੀਜਾ ਹੇ ॥੧੨॥
ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਬੂਝੀ ਅੰਤਰੁ ਠੰਢਾ ॥
ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਲੈ ਤੂਟਾ ਗੰਢਾ ॥
ਸੁਰਤਿ ਸਬਦੁ ਰਿਦ ਅੰਤਰਿ ਜਾਗੀ ਅਮਿਉ ਝੋਲਿ ਝੋਲਿ ਪੀਜਾ ਹੇ ॥੧੩॥
ਮਰੈ ਨਾਹੀ ਸਦ ਸਦ ਹੀ ਜੀਵੈ ॥
ਅਮਰੁ ਭਇਆ ਅਬਿਨਾਸੀ ਥੀਵੈ ॥
ਨਾ ਕੋ ਆਵੈ ਨਾ ਕੋ ਜਾਵੈ ਗੁਰਿ ਦੂਰਿ ਕੀਆ ਭਰਮੀਜਾ ਹੇ ॥੧੪॥
ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਕੀ ਪੂਰੀ ਬਾਣੀ ॥
ਪੂਰੈ ਲਾਗਾ ਪੂਰੇ ਮਾਹਿ ਸਮਾਣੀ ॥
ਚੜੈ ਸਵਾਇਆ ਨਿਤ ਨਿਤ ਰੰਗਾ ਘਟੈ ਨਾਹੀ ਤੋਲੀਜਾ ਹੇ ॥੧੫॥
ਬਾਰਹਾ ਕੰਚਨੁ ਸੁਧੁ ਕਰਾਇਆ ॥
ਨਦਰਿ ਸਰਾਫ ਵੰਨੀ ਸਚੜਾਇਆ ॥
ਪਰਖਿ ਖਜਾਨੈ ਪਾਇਆ ਸਰਾਫੀ ਫਿਰਿ ਨਾਹੀ ਤਾਈਜਾ ਹੇ ॥੧੬॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮੁ ਤੁਮਾਰਾ ਸੁਆਮੀ ॥
ਨਾਨਕ ਦਾਸ ਸਦਾ ਕੁਰਬਾਨੀ ॥
ਸੰਤਸੰਗਿ ਮਹਾ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਦੇਖਿ ਦਰਸਨੁ ਇਹੁ ਮਨੁ ਭੀਜਾ ਹੇ ॥੧੭॥੧॥੩॥
ਸਚੁ ਤਪਾਵਸੁ ਸਚੇ ਕੇਰਾ ॥
ਸਾਚਾ ਥਾਨੁ ਸਦਾ ਪ੍ਰਭ ਤੇਰਾ ॥
ਸਚੀ ਕੁਦਰਤਿ ਸਚੀ ਬਾਣੀ ਸਚੁ ਸਾਹਿਬ ਸੁਖੁ ਕੀਜਾ ਹੇ ॥੫॥
ਏਕੋ ਆਪਿ ਤੂਹੈ ਵਡ ਰਾਜਾ ॥
ਹੁਕਮਿ ਸਚੇ ਕੈ ਪੂਰੇ ਕਾਜਾ ॥
ਅੰਤਰਿ ਬਾਹਰਿ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਜਾਣੈ ਆਪੇ ਹੀ ਆਪਿ ਪਤੀਜਾ ਹੇ ॥੬॥
ਤੂ ਵਡ ਰਸੀਆ ਤੂ ਵਡ ਭੋਗੀ ॥
ਤੂ ਨਿਰਬਾਣੁ ਤੂਹੈ ਹੀ ਜੋਗੀ ॥
ਸਰਬ ਸੂਖ ਸਹਜ ਘਰਿ ਤੇਰੈ ਅਮਿਉ ਤੇਰੀ ਦ੍ਰਿਸਟੀਜਾ ਹੇ ॥੭॥
ਤੇਰੀ ਦਾਤਿ ਤੁਝੈ ਤੇ ਹੋਵੈ ॥
ਦੇਹਿ ਦਾਨੁ ਸਭਸੈ ਜੰਤ ਲੋਐ ॥
ਤੋਟਿ ਨ ਆਵੈ ਪੂਰ ਭੰਡਾਰੈ ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਰਹੇ ਆਘੀਜਾ ਹੇ ॥੮॥
ਜਾਚਹਿ ਸਿਧ ਸਾਧਿਕ ਬਨਵਾਸੀ ॥
ਜਾਚਹਿ ਜਤੀ ਸਤੀ ਸੁਖਵਾਸੀ ॥
ਇਕੁ ਦਾਤਾਰੁ ਸਗਲ ਹੈ ਜਾਚਿਕ ਦੇਹਿ ਦਾਨੁ ਸ੍ਰਿਸਟੀਜਾ ਹੇ ॥੯॥
ਕਰਹਿ ਭਗਤਿ ਅਰੁ ਰੰਗ ਅਪਾਰਾ ॥
ਖਿਨ ਮਹਿ ਥਾਪਿ ਉਥਾਪਨਹਾਰਾ ॥
ਭਾਰੋ ਤੋਲੁ ਬੇਅੰਤ ਸੁਆਮੀ ਹੁਕਮੁ ਮੰਨਿ ਭਗਤੀਜਾ ਹੇ ॥੧੦॥
ਜਿਸੁ ਦੇਹਿ ਦਰਸੁ ਸੋਈ ਤੁਧੁ ਜਾਣੈ ॥
ਓਹੁ ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਸਦਾ ਰੰਗ ਮਾਣੈ ॥
ਚਤੁਰੁ ਸਰੂਪੁ ਸਿਆਣਾ ਸੋਈ ਜੋ ਮਨਿ ਤੇਰੈ ਭਾਵੀਜਾ ਹੇ ॥੧੧॥
ਜਿਸੁ ਚੀਤਿ ਆਵਹਿ ਸੋ ਵੇਪਰਵਾਹਾ ॥
ਜਿਸੁ ਚੀਤਿ ਆਵਹਿ ਸੋ ਸਾਚਾ ਸਾਹਾ ॥
ਜਿਸੁ ਚੀਤਿ ਆਵਹਿ ਤਿਸੁ ਭਉ ਕੇਹਾ ਅਵਰੁ ਕਹਾ ਕਿਛੁ ਕੀਜਾ ਹੇ ॥੧੨॥
ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਬੂਝੀ ਅੰਤਰੁ ਠੰਢਾ ॥
ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਲੈ ਤੂਟਾ ਗੰਢਾ ॥
ਸੁਰਤਿ ਸਬਦੁ ਰਿਦ ਅੰਤਰਿ ਜਾਗੀ ਅਮਿਉ ਝੋਲਿ ਝੋਲਿ ਪੀਜਾ ਹੇ ॥੧੩॥
ਮਰੈ ਨਾਹੀ ਸਦ ਸਦ ਹੀ ਜੀਵੈ ॥
ਅਮਰੁ ਭਇਆ ਅਬਿਨਾਸੀ ਥੀਵੈ ॥
ਨਾ ਕੋ ਆਵੈ ਨਾ ਕੋ ਜਾਵੈ ਗੁਰਿ ਦੂਰਿ ਕੀਆ ਭਰਮੀਜਾ ਹੇ ॥੧੪॥
ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਕੀ ਪੂਰੀ ਬਾਣੀ ॥
ਪੂਰੈ ਲਾਗਾ ਪੂਰੇ ਮਾਹਿ ਸਮਾਣੀ ॥
ਚੜੈ ਸਵਾਇਆ ਨਿਤ ਨਿਤ ਰੰਗਾ ਘਟੈ ਨਾਹੀ ਤੋਲੀਜਾ ਹੇ ॥੧੫॥
ਬਾਰਹਾ ਕੰਚਨੁ ਸੁਧੁ ਕਰਾਇਆ ॥
ਨਦਰਿ ਸਰਾਫ ਵੰਨੀ ਸਚੜਾਇਆ ॥
ਪਰਖਿ ਖਜਾਨੈ ਪਾਇਆ ਸਰਾਫੀ ਫਿਰਿ ਨਾਹੀ ਤਾਈਜਾ ਹੇ ॥੧੬॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮੁ ਤੁਮਾਰਾ ਸੁਆਮੀ ॥
ਨਾਨਕ ਦਾਸ ਸਦਾ ਕੁਰਬਾਨੀ ॥
ਸੰਤਸੰਗਿ ਮਹਾ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਦੇਖਿ ਦਰਸਨੁ ਇਹੁ ਮਨੁ ਭੀਜਾ ਹੇ ॥੧੭॥੧॥੩॥
आपे सचु धारिओ सभु साचा सचे सचि वरतीजा हे ॥४॥
सचु तपावसु सचे केरा ॥
साचा थानु सदा प्रभ तेरा ॥
सची कुदरति सची बाणी सचु साहिब सुखु कीजा हे ॥५॥
एको आपि तूहै वड राजा ॥
हुकमि सचे कै पूरे काजा ॥
अंतरि बाहरि सभु किछु जाणै आपे ही आपि पतीजा हे ॥६॥
तू वड रसीआ तू वड भोगी ॥
तू निरबाणु तूहै ही जोगी ॥
सरब सूख सहज घरि तेरै अमिउ तेरी द्रिसटीजा हे ॥७॥
तेरी दाति तुझै ते होवै ॥
देहि दानु सभसै जंत लोऐ ॥
तोटि न आवै पूर भंडारै त्रिपति रहे आघीजा हे ॥८॥
जाचहि सिध साधिक बनवासी ॥
जाचहि जती सती सुखवासी ॥
इकु दातारु सगल है जाचिक देहि दानु स्रिसटीजा हे ॥९॥
करहि भगति अरु रंग अपारा ॥
खिन महि थापि उथापनहारा ॥
भारो तोलु बेअंत सुआमी हुकमु मंनि भगतीजा हे ॥१०॥
जिसु देहि दरसु सोई तुधु जाणै ॥
ओहु गुर कै सबदि सदा रंग माणै ॥
चतुरु सरूपु सिआणा सोई जो मनि तेरै भावीजा हे ॥११॥
जिसु चीति आवहि सो वेपरवाहा ॥
जिसु चीति आवहि सो साचा साहा ॥
जिसु चीति आवहि तिसु भउ केहा अवरु कहा किछु कीजा हे ॥१२॥
त्रिसना बूझी अंतरु ठंढा ॥
गुरि पूरै लै तूटा गंढा ॥
सुरति सबदु रिद अंतरि जागी अमिउ झोलि झोलि पीजा हे ॥१३॥
मरै नाही सद सद ही जीवै ॥
अमरु भइआ अबिनासी थीवै ॥
ना को आवै ना को जावै गुरि दूरि कीआ भरमीजा हे ॥१४॥
पूरे गुर की पूरी बाणी ॥
पूरै लागा पूरे माहि समाणी ॥
चड़ै सवाइआ नित नित रंगा घटै नाही तोलीजा हे ॥१५॥
बारहा कंचनु सुधु कराइआ ॥
नदरि सराफ वंनी सचड़ाइआ ॥
परखि खजानै पाइआ सराफी फिरि नाही ताईजा हे ॥१६॥
अंम्रित नामु तुमारा सुआमी ॥
नानक दास सदा कुरबानी ॥
संतसंगि महा सुखु पाइआ देखि दरसनु इहु मनु भीजा हे ॥१७॥१॥३॥
सचु तपावसु सचे केरा ॥
साचा थानु सदा प्रभ तेरा ॥
सची कुदरति सची बाणी सचु साहिब सुखु कीजा हे ॥५॥
एको आपि तूहै वड राजा ॥
हुकमि सचे कै पूरे काजा ॥
अंतरि बाहरि सभु किछु जाणै आपे ही आपि पतीजा हे ॥६॥
तू वड रसीआ तू वड भोगी ॥
तू निरबाणु तूहै ही जोगी ॥
सरब सूख सहज घरि तेरै अमिउ तेरी द्रिसटीजा हे ॥७॥
तेरी दाति तुझै ते होवै ॥
देहि दानु सभसै जंत लोऐ ॥
तोटि न आवै पूर भंडारै त्रिपति रहे आघीजा हे ॥८॥
जाचहि सिध साधिक बनवासी ॥
जाचहि जती सती सुखवासी ॥
इकु दातारु सगल है जाचिक देहि दानु स्रिसटीजा हे ॥९॥
करहि भगति अरु रंग अपारा ॥
खिन महि थापि उथापनहारा ॥
भारो तोलु बेअंत सुआमी हुकमु मंनि भगतीजा हे ॥१०॥
जिसु देहि दरसु सोई तुधु जाणै ॥
ओहु गुर कै सबदि सदा रंग माणै ॥
चतुरु सरूपु सिआणा सोई जो मनि तेरै भावीजा हे ॥११॥
जिसु चीति आवहि सो वेपरवाहा ॥
जिसु चीति आवहि सो साचा साहा ॥
जिसु चीति आवहि तिसु भउ केहा अवरु कहा किछु कीजा हे ॥१२॥
त्रिसना बूझी अंतरु ठंढा ॥
गुरि पूरै लै तूटा गंढा ॥
सुरति सबदु रिद अंतरि जागी अमिउ झोलि झोलि पीजा हे ॥१३॥
मरै नाही सद सद ही जीवै ॥
अमरु भइआ अबिनासी थीवै ॥
ना को आवै ना को जावै गुरि दूरि कीआ भरमीजा हे ॥१४॥
पूरे गुर की पूरी बाणी ॥
पूरै लागा पूरे माहि समाणी ॥
चड़ै सवाइआ नित नित रंगा घटै नाही तोलीजा हे ॥१५॥
बारहा कंचनु सुधु कराइआ ॥
नदरि सराफ वंनी सचड़ाइआ ॥
परखि खजानै पाइआ सराफी फिरि नाही ताईजा हे ॥१६॥
अंम्रित नामु तुमारा सुआमी ॥
नानक दास सदा कुरबानी ॥
संतसंगि महा सुखु पाइआ देखि दरसनु इहु मनु भीजा हे ॥१७॥१॥३॥
हिन्दी अर्थ: वह खुद ही सदा कायम रहने वाला है। सारे जगत को वह खुद ही सहारा देने वाला है। अपने सदा-स्थिर (नियमों के) द्वारा वह स्वयं ही जगत में वरतारा बरता रहा है। 4। हे भाई ! सदा स्थिर परमात्मा का न्याय भी अॅटल (अभूल) है। हे प्रभू ! तेरा ठिकाना सदा कायम रहने वाला है। हे साहिब ! तेरी रची हुई कदरति और (उसकी) संरचना (बणतर) अॅटल नियमों वाली है। तूने स्वयं ही (इस कुदरति में) अटल सुख पैदा किया हुआ है। 5। हे प्रभू ! सिर्फ तू स्वयं ही सबसे बड़ा राजा है। हे भाई ! सदा स्थिर प्रभू के हुकम अनुसार सब जीवों के काम सफल होते हैं। जो कुछ जीवों के अंदर घटित होता है जो कुछ बाहर सारे जगत में हो रहा है ये सब कुछ वह स्वयं ही जानता है। और संतुष्ट होता है। 6। हे प्रभू ! (सबमें व्यापक हो के) तू सबसे बड़ा रस लेने वाला व भोग भोगने वाला है। (निराकार होते हुए) तू स्वयं ही वासना रहित जोगी है। हे प्रभू ! आत्मिक अडोलता के सारे आनंद तेरे घर में मौजूद हैं। तेरी मेहर की निगाह में अमृत बस रहा है। 7। हे प्रभू ! जितनी दाति तू दे रहा है यह तू ही दे सकता है। तू तो सारे लोकों में सब जीवों को दान दे रहा है। तेरे भरे हुए खजाने में कभी घाटा नहीं पड़ सकता। सारे ही जीव (तेरी दातों की बरकति से) पूरी तौर पर तृप्त रहते हैं। 8। हे प्रभू ! जंगलों के वासी सिद्ध और साधिक (तेरे दर से ही) माँगते हैं। सुखी-रहने वाले जती और सती (भी तेरे दर से) माँगते हैं। तू एक दाता है। और सारी दुनिया (तेरे दर से) माँगने वाली है। तू सारी सृष्टि को दान देता है। 9। हे भाई ! (अनेकों भक्त) बेअंत प्रभू की भक्ति करते हैं और आत्मिक आनंद पाते हैं। परमात्मा पैदा करके एक छिन में नाश करने की समर्था रखता है। वह मालिक बेअंत ताकत वाला है बेअंत है। (जीव) उसका हुकम मान के उसके भगत बनते हैं। 10। हे प्रभू ! जिस मनुष्य को तू दर्शन देता है। वही तेरे साथ सांझ डालता है। गुरू के शबद की बरकति से वह सदा आत्मिक आनंद पाता है। वही मनुष्य (दरअसल) समझदार है सुंदर है बुद्धिवान है। जो तेरे मन को अच्छा लगता है। 11। हे प्रभू ! जिस मनुष्य के चिक्त में तू आ बसता है उसको किसी की मुथाजी नहीं रहती। वह सदा कायम रहने वाले (नाम-) धन का मालिक बन जाता है। उसको किसी तरह का कोई डर नहीं रह जाता। कोई भी उसका कुछ बिगाड़ नहीं सकता। 12। उसकी तृष्णा (की आग) बुझ गई उसका हृदय शांत हो गया। हे भाई ! (प्रभू से) टूटे हुए जिस मनुष्य को पकड़ के पूरे गुरू ने (दोबारा प्रभू के संग) जोड़ दिया। गुरू के शबद को सुरति में (टिकाने की सूझ उस मनुष्य के) हृदय में जाग उठी। वह मनुष्य बड़े स्वाद से आत्मिक जीवन देने वाला नाम-रस पीता है। 13। वह आत्मिक मौत नहीं सहेड़ता। वह सदा ही आत्मिक जीवन जीता है। वह अटल आत्मिक जीवन वाला हो जाता है। उसको मौत का सहम नहीं व्यापता। हे भाई ! गुरू ने जिस मनुष्य की भटकना दूर कर दी। ऐसा मनुष्य जनम-मरण के चक्र से बच जाता है। 14। हे भाई ! जो मनुष्य पूरे गुरू की पूरी बाणी से पूर्ण परमात्मा की याद में जुड़ता है। वह उसमें समाया रहता है। परमात्मा के प्रेम का रंग (उसके दिल में) सदा ही बढ़ता रहता है। पड़ताल करने से वह कभी भी कम नहीं होता। 15। हे भाई ! वह मनुष्य बारह वंनी के (शुद्ध) सोने जैसा खरा हो जाता है। वह सुंदर रंग वाला (सुंदर आत्मिक जीवन वाला) गुरू-सर्राफ की नज़रों में परवान हो जाता है। (जैसे शुद्ध सोने को) सर्राफ परख के खजाने में डाल लेते हैं। और उसको फिर परखने के लिए भट्ठी में डाला नहीं जाता (इस तरह वह मनुष्य परमात्मा की हजूरी में कबूल हो जाता है)। 16। हे नानक ! (कह-) हे मेरे मालिक प्रभू ! तेरा नाम आत्मिक जीवन देने वाला है। तेरे दास तुझसे सदा सदके जाते हैं। गुरू की संगति में रह के वह बहुत आत्मिक आनंद पाते हैं। (तेरा) दर्शन करके उनका ये मन (तेरे नाम-रस में) भीगा रहता है। 17। 1। 3।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੫ ਸੋਲਹੇ
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਗੁਰੁ ਗੋਪਾਲੁ ਗੁਰੁ ਗੋਵਿੰਦਾ ॥
ਗੁਰੁ ਦਇਆਲੁ ਸਦਾ ਬਖਸਿੰਦਾ ॥
ਗੁਰੁ ਸਾਸਤ ਸਿਮ੍ਰਿਤਿ ਖਟੁ ਕਰਮਾ ਗੁਰੁ ਪਵਿਤ੍ਰੁ ਅਸਥਾਨਾ ਹੇ ॥੧॥
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਗੁਰੁ ਗੋਪਾਲੁ ਗੁਰੁ ਗੋਵਿੰਦਾ ॥
ਗੁਰੁ ਦਇਆਲੁ ਸਦਾ ਬਖਸਿੰਦਾ ॥
ਗੁਰੁ ਸਾਸਤ ਸਿਮ੍ਰਿਤਿ ਖਟੁ ਕਰਮਾ ਗੁਰੁ ਪਵਿਤ੍ਰੁ ਅਸਥਾਨਾ ਹੇ ॥੧॥
मारू महला ५ सोलहे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गुरु गोपालु गुरु गोविंदा ॥
गुरु दइआलु सदा बखसिंदा ॥
गुरु सासत सिम्रिति खटु करमा गुरु पवित्रु असथाना हे ॥१॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गुरु गोपालु गुरु गोविंदा ॥
गुरु दइआलु सदा बखसिंदा ॥
गुरु सासत सिम्रिति खटु करमा गुरु पवित्रु असथाना हे ॥१॥
हिन्दी अर्थ: मारू महला ५ सोलहे ੴ सतिगुर प्रसादि॥ हे भाई ! (गुरू के सेवक के लिए) गुरू गोपाल (का रूप) है। गुरू गोविंद (का रूप) है। गुरू दया का श्रोत है। गुरू सदा बख्शिश करने वाला है। (सेवक के लिए) गुरू (ही) शास्त्र है। स्मृति है। छह धार्मिक कर्म है; गुरू ही पवित्र तीर्थ है। 1।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 1074 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
दिल्ली-यूनिवर्सिटी के North Campus में exam-season की tension।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 45 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1074” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 1075 →, पीछे का: ← अंग 1073।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।