अंग 1015

अंग
1015
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਕਿਤੀ ਚਖਉ ਸਾਡੜੇ ਕਿਤੀ ਵੇਸ ਕਰੇਉ ॥
ਪਿਰ ਬਿਨੁ ਜੋਬਨੁ ਬਾਦਿ ਗਇਅਮੁ ਵਾਢੀ ਝੂਰੇਦੀ ਝੂਰੇਉ ॥੫॥
ਸਚੇ ਸੰਦਾ ਸਦੜਾ ਸੁਣੀਐ ਗੁਰ ਵੀਚਾਰਿ ॥
ਸਚੇ ਸਚਾ ਬੈਹਣਾ ਨਦਰੀ ਨਦਰਿ ਪਿਆਰਿ ॥੬॥
ਗਿਆਨੀ ਅੰਜਨੁ ਸਚ ਕਾ ਡੇਖੈ ਡੇਖਣਹਾਰੁ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਬੂਝੈ ਜਾਣੀਐ ਹਉਮੈ ਗਰਬੁ ਨਿਵਾਰਿ ॥੭॥
ਤਉ ਭਾਵਨਿ ਤਉ ਜੇਹੀਆ ਮੂ ਜੇਹੀਆ ਕਿਤੀਆਹ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਹੁ ਨ ਵੀਛੁੜੈ ਤਿਨ ਸਚੈ ਰਤੜੀਆਹ ॥੮॥੧॥੯॥
किती चखउ साडड़े किती वेस करेउ ॥
पिर बिनु जोबनु बादि गइअमु वाढी झूरेदी झूरेउ ॥५॥
सचे संदा सदड़ा सुणीऐ गुर वीचारि ॥
सचे सचा बैहणा नदरी नदरि पिआरि ॥६॥
गिआनी अंजनु सच का डेखै डेखणहारु ॥
गुरमुखि बूझै जाणीऐ हउमै गरबु निवारि ॥७॥
तउ भावनि तउ जेहीआ मू जेहीआ कितीआह ॥
नानक नाहु न वीछुड़ै तिन सचै रतड़ीआह ॥८॥१॥९॥

हिन्दी अर्थ: अगर मैं अनेकों ही स्वादिष्ट खाने खाती रहूँ। अनेकों ही सुंदर पहरावे पहनती रहूँ। फिर भी पति-प्रभू से विछुड़ के मेरी जवानी व्यर्थ ही जा रही है। जब तक मैं छुटॅड़ हूँ। मैं (सारी उम्र) झुर-झुर के ही दिन काटूँगी। 5। अगर सदा-स्थिर प्रभू का प्यार-संदेशा सतिगुरू की बाणी की विचार के माध्यम से सुनें। तो उस सदा-स्थिर प्रभू-पति का सदा के लिए साथ मिल जाता है। उस मेहर की नजर वाला प्रभू मेहर की नजर से ताकता है। और उसके प्यार में लीन हो जाया जाता है। 6। परमात्मा से जान-पहचान डालने वाला सदा-स्थिर प्रभू के नाम का सुरमा प्रयोग करता है। और वह (उस) प्रभू का दीदार कर लेता है जो सब जीवों की संभाल करने के समर्थ है। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर (इस भेद को) समझ लेता है वह हउमै-अहंकार दूर करके (उसकी हजूरी में) आदर पाता है। 7। हे पति-प्रभू ! जो जीव-सि्त्रयाँ तुझे अच्छी लगती हैं। वह तेरे जैसी हो जाती हैं। (पर तेरी मेहर की निगाह से वंचित हुई) मेरे जैसी भी अनेकों ही हैं। हे नानक ! जो जीव-सि्त्रयाँ सदा-स्थिर प्रभू के प्यार में रंगी रहती हैं। उनके (हृदय) से पति-प्रभू कभी नहीं विछुड़ता। 8। 1। 9।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਨਾ ਭੈਣਾ ਭਰਜਾਈਆ ਨਾ ਸੇ ਸਸੁੜੀਆਹ ॥
ਸਚਾ ਸਾਕੁ ਨ ਤੁਟਈ ਗੁਰੁ ਮੇਲੇ ਸਹੀਆਹ ॥੧॥
ਬਲਿਹਾਰੀ ਗੁਰ ਆਪਣੇ ਸਦ ਬਲਿਹਾਰੈ ਜਾਉ ॥
ਗੁਰ ਬਿਨੁ ਏਤਾ ਭਵਿ ਥਕੀ ਗੁਰਿ ਪਿਰੁ ਮੇਲਿਮੁ ਦਿਤਮੁ ਮਿਲਾਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਫੁਫੀ ਨਾਨੀ ਮਾਸੀਆ ਦੇਰ ਜੇਠਾਨੜੀਆਹ ॥
ਆਵਨਿ ਵੰਞਨਿ ਨਾ ਰਹਨਿ ਪੂਰ ਭਰੇ ਪਹੀਆਹ ॥੨॥
ਮਾਮੇ ਤੈ ਮਾਮਾਣੀਆ ਭਾਇਰ ਬਾਪ ਨ ਮਾਉ ॥
ਸਾਥ ਲਡੇ ਤਿਨ ਨਾਠੀਆ ਭੀੜ ਘਣੀ ਦਰੀਆਉ ॥੩॥
ਸਾਚਉ ਰੰਗਿ ਰੰਗਾਵਲੋ ਸਖੀ ਹਮਾਰੋ ਕੰਤੁ ॥
ਸਚਿ ਵਿਛੋੜਾ ਨਾ ਥੀਐ ਸੋ ਸਹੁ ਰੰਗਿ ਰਵੰਤੁ ॥੪॥
ਸਭੇ ਰੁਤੀ ਚੰਗੀਆ ਜਿਤੁ ਸਚੇ ਸਿਉ ਨੇਹੁ ॥
ਸਾ ਧਨ ਕੰਤੁ ਪਛਾਣਿਆ ਸੁਖਿ ਸੁਤੀ ਨਿਸਿ ਡੇਹੁ ॥੫॥
ਪਤਣਿ ਕੂਕੇ ਪਾਤਣੀ ਵੰਞਹੁ ਧ੍ਰੁਕਿ ਵਿਲਾੜਿ ॥
ਪਾਰਿ ਪਵੰਦੜੇ ਡਿਠੁ ਮੈ ਸਤਿਗੁਰ ਬੋਹਿਥਿ ਚਾੜਿ ॥੬॥
ਹਿਕਨੀ ਲਦਿਆ ਹਿਕਿ ਲਦਿ ਗਏ ਹਿਕਿ ਭਾਰੇ ਭਰ ਨਾਲਿ ॥
ਜਿਨੀ ਸਚੁ ਵਣੰਜਿਆ ਸੇ ਸਚੇ ਪ੍ਰਭ ਨਾਲਿ ॥੭॥
ਨਾ ਹਮ ਚੰਗੇ ਆਖੀਅਹ ਬੁਰਾ ਨ ਦਿਸੈ ਕੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਹਉਮੈ ਮਾਰੀਐ ਸਚੇ ਜੇਹੜਾ ਸੋਇ ॥੮॥੨॥੧੦॥
मारू महला १ ॥
ना भैणा भरजाईआ ना से ससुड़ीआह ॥
सचा साकु न तुटई गुरु मेले सहीआह ॥१॥
बलिहारी गुर आपणे सद बलिहारै जाउ ॥
गुर बिनु एता भवि थकी गुरि पिरु मेलिमु दितमु मिलाइ ॥१॥ रहाउ ॥
फुफी नानी मासीआ देर जेठानड़ीआह ॥
आवनि वंञनि ना रहनि पूर भरे पहीआह ॥२॥
मामे तै मामाणीआ भाइर बाप न माउ ॥
साथ लडे तिन नाठीआ भीड़ घणी दरीआउ ॥३॥
साचउ रंगि रंगावलो सखी हमारो कंतु ॥
सचि विछोड़ा ना थीऐ सो सहु रंगि रवंतु ॥४॥
सभे रुती चंगीआ जितु सचे सिउ नेहु ॥
सा धन कंतु पछाणिआ सुखि सुती निसि डेहु ॥५॥
पतणि कूके पातणी वंञहु ध्रुकि विलाड़ि ॥
पारि पवंदड़े डिठु मै सतिगुर बोहिथि चाड़ि ॥६॥
हिकनी लदिआ हिकि लदि गए हिकि भारे भर नालि ॥
जिनी सचु वणंजिआ से सचे प्रभ नालि ॥७॥
ना हम चंगे आखीअह बुरा न दिसै कोइ ॥
नानक हउमै मारीऐ सचे जेहड़ा सोइ ॥८॥२॥१०॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला १॥ ना बहिनें। ना भौजाईयाँ। ना सासें – किसी का भी वैसा साक नहीं जो (सत्संगी) सहेलियों का है। गुरू (सत्संगी-) सहेलियों के साथ मिलाता है (सत्संगियों वाला) सदा स्थिर रहने वाला साक कभी नहीं टूटता। 1। मैं अपने गुरू से बलिहार हूँ। सदा सदके जाती हूँ। गुरू (के मिलाप) के बिना मैं भटक-भटक के बहुत थक गई थी। (अब) गुरू ने मुझे पति मिलाया है। मुझे (पति) मिला दिया है। 1। रहाउ। फूफियाँ। नानियां। मासियां। देवरानियां। जेठानियाँ – यह (संसार में) आती है और चली जाती हैं। सदा (हमारे साथ) नहीं रहती। इन (साकों अंगो-) राहियों के पूरों के पूर भरे हुए समूह चले जाते हैं। 2। मामे। मामियाँ। भाई। पिता। और माँ – (किसी के साथ भी सच्चा साक) नहीं बन सकता। (ये भी मेहमान की तरह हैं) इन पराहुणों के काफिले के काफिले लादे हुए चले जा रहे हैं। संसार-दरिया के पक्त न पर इनकी भीड़ लगी पड़ी है। 3। हे सहेलियो ! हमारा पति-प्रभू ही सदा-स्थिर रहने वाला है और वह प्रेम-रंग में रंगा रहता है। उस सदा-स्थिर के नाम में जुड़ने से उससे विछोड़ा नहीं होता। (चरणों में जुड़ी जीव-स्त्री को) वह पति प्यार से गले लगाए रखता है। 4। उसको वह सारी ही ऋतुएं अच्छी लगती हैं जिस-जिस ऋतु में सदा-स्थिर प्रभू-पति के साथ उसका प्यार बनता है। जो जीव-स्त्री पति-प्रभू (के साक) को पहचान लेती है वह जीव-स्त्री दिन-रात पूर्ण आनंद में शांत-चिक्त रहती है। 5। (संसार-दरिया के) पक्तन पर (खड़ा) गुरू मल्लाह (जीव-राहियों को) पुकार के कह रहा है कि (प्रभू-नाम के जहाज में चढ़ो और) दौड़ के छलांग मार के पार लांघ जाओ। सतिगुरू के जहाज में चढ़ के (संसार-दरिया से) पार पहुँचे हुए (अनेकों ही प्राणी) मैंने (स्वयं) देखे हैं। 6। (सतिगुरू का आहवाहन सुन के) अनेकों जीवों ने (संसार-दरिया से पार लांघने के लिए प्रभू-नाम का सौदा गुरू के जहाज में) लाद लिया है। अनेकों ही लाद के पार पहुँच गए हैं। पर अनेकों ही (ऐसे भी दुर्भाग्यशाली हैं जिन्होंने गुरू की पुकार की परवाह ही नहीं की। और वे विकारों के भार के साथ) भारे हो के संसार-समुंद्र में (डूब गए हैं)। जिन्होंने (गुरू का उपदेश सुन के) सदा-स्थिर रहने वाला नाम-सौदा खरीदा है वह (सदा-स्थिर प्रभू के) चरणों में लीन हो गए हैं। 7। (ऐसे भाग्यशाली लोग ये निश्चय रखते हैं कि) हम (सबसे) अच्छे नहीं कहे जा सकते। और हमसे बुरा कोई मनुष्य (जगत में) दिखता नहीं। हे नानक ! (प्रभू चरणों में एक-मेक होने के लिए) अहंकार को दूर करनाप चाहिए (जिस मनुष्य ने गुरू की शरण पड़ कर अहंकार को दूर कर लिया) वह सदा-स्थिर प्रभू जैसा ही बन गया। 8। 2। 10।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਨਾ ਜਾਣਾ ਮੂਰਖੁ ਹੈ ਕੋਈ ਨਾ ਜਾਣਾ ਸਿਆਣਾ ॥
ਸਦਾ ਸਾਹਿਬ ਕੈ ਰੰਗੇ ਰਾਤਾ ਅਨਦਿਨੁ ਨਾਮੁ ਵਖਾਣਾ ॥੧॥
ਬਾਬਾ ਮੂਰਖੁ ਹਾ ਨਾਵੈ ਬਲਿ ਜਾਉ ॥
ਤੂ ਕਰਤਾ ਤੂ ਦਾਨਾ ਬੀਨਾ ਤੇਰੈ ਨਾਮਿ ਤਰਾਉ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮੂਰਖੁ ਸਿਆਣਾ ਏਕੁ ਹੈ ਏਕ ਜੋਤਿ ਦੁਇ ਨਾਉ ॥
ਮੂਰਖਾ ਸਿਰਿ ਮੂਰਖੁ ਹੈ ਜਿ ਮੰਨੇ ਨਾਹੀ ਨਾਉ ॥੨॥
ਗੁਰ ਦੁਆਰੈ ਨਾਉ ਪਾਈਐ ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਪਲੈ ਨ ਪਾਇ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਕੈ ਭਾਣੈ ਮਨਿ ਵਸੈ ਤਾ ਅਹਿਨਿਸਿ ਰਹੈ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥੩॥
ਰਾਜੰ ਰੰਗੰ ਰੂਪੰ ਮਾਲੰ ਜੋਬਨੁ ਤੇ ਜੂਆਰੀ ॥
ਹੁਕਮੀ ਬਾਧੇ ਪਾਸੈ ਖੇਲਹਿ ਚਉਪੜਿ ਏਕਾ ਸਾਰੀ ॥੪॥
ਜਗਿ ਚਤੁਰੁ ਸਿਆਣਾ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਣਾ ਨਾਉ ਪੰਡਿਤ ਪੜਹਿ ਗਾਵਾਰੀ ॥
ਨਾਉ ਵਿਸਾਰਹਿ ਬੇਦੁ ਸਮਾਲਹਿ ਬਿਖੁ ਭੂਲੇ ਲੇਖਾਰੀ ॥੫॥
मारू महला १ ॥
ना जाणा मूरखु है कोई ना जाणा सिआणा ॥
सदा साहिब कै रंगे राता अनदिनु नामु वखाणा ॥१॥
बाबा मूरखु हा नावै बलि जाउ ॥
तू करता तू दाना बीना तेरै नामि तराउ ॥१॥ रहाउ ॥
मूरखु सिआणा एकु है एक जोति दुइ नाउ ॥
मूरखा सिरि मूरखु है जि मंने नाही नाउ ॥२॥
गुर दुआरै नाउ पाईऐ बिनु सतिगुर पलै न पाइ ॥
सतिगुर कै भाणै मनि वसै ता अहिनिसि रहै लिव लाइ ॥३॥
राजं रंगं रूपं मालं जोबनु ते जूआरी ॥
हुकमी बाधे पासै खेलहि चउपड़ि एका सारी ॥४॥
जगि चतुरु सिआणा भरमि भुलाणा नाउ पंडित पड़हि गावारी ॥
नाउ विसारहि बेदु समालहि बिखु भूले लेखारी ॥५॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला १॥ मैं नहीं समझ सकता कि जो (व्यक्ति परमात्मा का नाम सिमरता है) वह मूर्ख (कैसे) है। और जो मनुष्य नाम नहीं सिमरता वह समझदार कैसे है। (असल समझदारी नाम-सिमरने में है। इस वास्ते) मैं हर वक्त प्रभू का नाम सिमरता हूँ और सदा मालिक प्रभू के प्रेम-रंग में रंगा रहता हूँ। 1। हे प्रभू ! (तेरे नाम से टूट के) मैं मति-हीन रहता हूँ मैं तेरे नाम से सदके जाता हूँ (तेरे नाम की बरकति से ही मुझे समझ आती है कि) तू हमारा सृजनहार है। तू हमारे दिल की जानता है। तू हमारे कामों को हर वक्त देखता है। मैं तेरे नाम में जुड़ के ही पार लांघ सकता हूँ। 1। रहाउ। पर चाहे कोई मूर्ख है चाहे कोई समझदार है (हरेक जीव) एक ही परमात्मा में बसता है। मूर्ख और समझदार दो अलग-अलग नाम हैं जोति दोनों में एक ही है। जो आदमी परमात्मा का नाम सिमरना नहीं कबूलता। वह महा मूर्ख है। 2। परमात्मा का नाम गुरू-दर से मिलता है। गुरू की शरण के बिना प्रभू के नाम की प्राप्ति नहीं हो सकती। अगर गुरू के हुकम में चल के मनुष्य के मन में नाम बस जाए। तब वह दिन-रात नाम में सुरति जोड़े रखता है। 3। जो लोग राज। रंग-तमाशे। रूप। माल-धन और जवानी -सिर्फ इसी में मस्त रहते हैं उनको जुआरिए समझो। पर उनके भी क्या वश। प्रभू के हुकम में बँधे हुए वह (मायावी पदार्थों की) चौपड़ खेल खेलते रहते हैं। एक माया की तृष्णा ही उनकी नर्द है। 4। जो बंदा माया की भटकना में पड़ कर जीवन-राह से विछुड़ता जा रहा है वही जगत में चतुर और सयाना माना जाता है; पढ़ते हैं (माया कमाने वाली) मूर्खों की विद्या। पर अपना नाम कहलवाते हैं ‘पंडित’। (ये पण्डित) परमात्मा का नाम भुला देते हैं; और अपनी ओर से वेद (आदि धर्म-पुस्तकों) को संभाल रहे हैं। ये विद्वान आत्मिक जीवन की मौत लाने वाली माया के जहर में भूले पड़े हैं। 5।

संदर्भ: यह अंग 1015 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।

गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।

Pragati Maidan के पीछे यमुना के किनारे शाम का सूरज।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 40 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1015” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 1016 →, पीछे का: ← अंग 1014

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।