अंग
1063
राग मारू
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸਤਿਗੁਰਿ ਸੇਵਿਐ ਸਹਜ ਅਨੰਦਾ ॥
ਹਿਰਦੈ ਆਇ ਵੁਠਾ ਗੋਵਿੰਦਾ ॥
ਸਹਜੇ ਭਗਤਿ ਕਰੇ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ਆਪੇ ਭਗਤਿ ਕਰਾਇਦਾ ॥੪॥
ਸਤਿਗੁਰ ਤੇ ਵਿਛੁੜੇ ਤਿਨੀ ਦੁਖੁ ਪਾਇਆ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਮਾਰੀਅਹਿ ਦੁਖੁ ਸਬਾਇਆ ॥
ਮਥੇ ਕਾਲੇ ਮਹਲੁ ਨ ਪਾਵਹਿ ਦੁਖ ਹੀ ਵਿਚਿ ਦੁਖੁ ਪਾਇਦਾ ॥੫॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਹਿ ਸੇ ਵਡਭਾਗੀ ॥
ਸਹਜ ਭਾਇ ਸਚੀ ਲਿਵ ਲਾਗੀ ॥
ਸਚੋ ਸਚੁ ਕਮਾਵਹਿ ਸਦ ਹੀ ਸਚੈ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਇਦਾ ॥੬॥
ਜਿਸ ਨੋ ਸਚਾ ਦੇਇ ਸੁ ਪਾਏ ॥
ਅੰਤਰਿ ਸਾਚੁ ਭਰਮੁ ਚੁਕਾਏ ॥
ਸਚੁ ਸਚੈ ਕਾ ਆਪੇ ਦਾਤਾ ਜਿਸੁ ਦੇਵੈ ਸੋ ਸਚੁ ਪਾਇਦਾ ॥੭॥
ਆਪੇ ਕਰਤਾ ਸਭਨਾ ਕਾ ਸੋਈ ॥
ਜਿਸ ਨੋ ਆਪਿ ਬੁਝਾਏ ਬੂਝੈ ਕੋਈ ॥
ਆਪੇ ਬਖਸੇ ਦੇ ਵਡਿਆਈ ਆਪੇ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਇਦਾ ॥੮॥
ਹਉਮੈ ਕਰਦਿਆ ਜਨਮੁ ਗਵਾਇਆ ॥
ਆਗੈ ਮੋਹੁ ਨ ਚੂਕੈ ਮਾਇਆ ॥
ਅਗੈ ਜਮਕਾਲੁ ਲੇਖਾ ਲੇਵੈ ਜਿਉ ਤਿਲ ਘਾਣੀ ਪੀੜਾਇਦਾ ॥੯॥
ਪੂਰੈ ਭਾਗਿ ਗੁਰ ਸੇਵਾ ਹੋਈ ॥
ਨਦਰਿ ਕਰੇ ਤਾ ਸੇਵੇ ਕੋਈ ॥
ਜਮਕਾਲੁ ਤਿਸੁ ਨੇੜਿ ਨ ਆਵੈ ਮਹਲਿ ਸਚੈ ਸੁਖੁ ਪਾਇਦਾ ॥੧੦॥
ਤਿਨ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਜੋ ਤੁਧੁ ਭਾਏ ॥
ਪੂਰੈ ਭਾਗਿ ਗੁਰ ਸੇਵਾ ਲਾਏ ॥
ਤੇਰੈ ਹਥਿ ਹੈ ਸਭ ਵਡਿਆਈ ਜਿਸੁ ਦੇਵਹਿ ਸੋ ਪਾਇਦਾ ॥੧੧॥
ਅੰਦਰਿ ਪਰਗਾਸੁ ਗੁਰੂ ਤੇ ਪਾਏ ॥
ਨਾਮੁ ਪਦਾਰਥੁ ਮੰਨਿ ਵਸਾਏ ॥
ਗਿਆਨ ਰਤਨੁ ਸਦਾ ਘਟਿ ਚਾਨਣੁ ਅਗਿਆਨ ਅੰਧੇਰੁ ਗਵਾਇਦਾ ॥੧੨॥
ਅਗਿਆਨੀ ਅੰਧੇ ਦੂਜੈ ਲਾਗੇ ॥
ਬਿਨੁ ਪਾਣੀ ਡੁਬਿ ਮੂਏ ਅਭਾਗੇ ॥
ਚਲਦਿਆ ਘਰੁ ਦਰੁ ਨਦਰਿ ਨ ਆਵੈ ਜਮ ਦਰਿ ਬਾਧਾ ਦੁਖੁ ਪਾਇਦਾ ॥੧੩॥
ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਸੇਵੇ ਮੁਕਤਿ ਨ ਹੋਈ ॥
ਗਿਆਨੀ ਧਿਆਨੀ ਪੂਛਹੁ ਕੋਈ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵੇ ਤਿਸੁ ਮਿਲੈ ਵਡਿਆਈ ਦਰਿ ਸਚੈ ਸੋਭਾ ਪਾਇਦਾ ॥੧੪॥
ਸਤਿਗੁਰ ਨੋ ਸੇਵੇ ਤਿਸੁ ਆਪਿ ਮਿਲਾਏ ॥
ਮਮਤਾ ਕਾਟਿ ਸਚਿ ਲਿਵ ਲਾਏ ॥
ਸਦਾ ਸਚੁ ਵਣਜਹਿ ਵਾਪਾਰੀ ਨਾਮੋ ਲਾਹਾ ਪਾਇਦਾ ॥੧੫॥
ਆਪੇ ਕਰੇ ਕਰਾਏ ਕਰਤਾ ॥
ਸਬਦਿ ਮਰੈ ਸੋਈ ਜਨੁ ਮੁਕਤਾ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਵਸੈ ਮਨ ਅੰਤਰਿ ਨਾਮੋ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਦਾ ॥੧੬॥੫॥੧੯॥
ਹਿਰਦੈ ਆਇ ਵੁਠਾ ਗੋਵਿੰਦਾ ॥
ਸਹਜੇ ਭਗਤਿ ਕਰੇ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ਆਪੇ ਭਗਤਿ ਕਰਾਇਦਾ ॥੪॥
ਸਤਿਗੁਰ ਤੇ ਵਿਛੁੜੇ ਤਿਨੀ ਦੁਖੁ ਪਾਇਆ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਮਾਰੀਅਹਿ ਦੁਖੁ ਸਬਾਇਆ ॥
ਮਥੇ ਕਾਲੇ ਮਹਲੁ ਨ ਪਾਵਹਿ ਦੁਖ ਹੀ ਵਿਚਿ ਦੁਖੁ ਪਾਇਦਾ ॥੫॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਹਿ ਸੇ ਵਡਭਾਗੀ ॥
ਸਹਜ ਭਾਇ ਸਚੀ ਲਿਵ ਲਾਗੀ ॥
ਸਚੋ ਸਚੁ ਕਮਾਵਹਿ ਸਦ ਹੀ ਸਚੈ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਇਦਾ ॥੬॥
ਜਿਸ ਨੋ ਸਚਾ ਦੇਇ ਸੁ ਪਾਏ ॥
ਅੰਤਰਿ ਸਾਚੁ ਭਰਮੁ ਚੁਕਾਏ ॥
ਸਚੁ ਸਚੈ ਕਾ ਆਪੇ ਦਾਤਾ ਜਿਸੁ ਦੇਵੈ ਸੋ ਸਚੁ ਪਾਇਦਾ ॥੭॥
ਆਪੇ ਕਰਤਾ ਸਭਨਾ ਕਾ ਸੋਈ ॥
ਜਿਸ ਨੋ ਆਪਿ ਬੁਝਾਏ ਬੂਝੈ ਕੋਈ ॥
ਆਪੇ ਬਖਸੇ ਦੇ ਵਡਿਆਈ ਆਪੇ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਇਦਾ ॥੮॥
ਹਉਮੈ ਕਰਦਿਆ ਜਨਮੁ ਗਵਾਇਆ ॥
ਆਗੈ ਮੋਹੁ ਨ ਚੂਕੈ ਮਾਇਆ ॥
ਅਗੈ ਜਮਕਾਲੁ ਲੇਖਾ ਲੇਵੈ ਜਿਉ ਤਿਲ ਘਾਣੀ ਪੀੜਾਇਦਾ ॥੯॥
ਪੂਰੈ ਭਾਗਿ ਗੁਰ ਸੇਵਾ ਹੋਈ ॥
ਨਦਰਿ ਕਰੇ ਤਾ ਸੇਵੇ ਕੋਈ ॥
ਜਮਕਾਲੁ ਤਿਸੁ ਨੇੜਿ ਨ ਆਵੈ ਮਹਲਿ ਸਚੈ ਸੁਖੁ ਪਾਇਦਾ ॥੧੦॥
ਤਿਨ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਜੋ ਤੁਧੁ ਭਾਏ ॥
ਪੂਰੈ ਭਾਗਿ ਗੁਰ ਸੇਵਾ ਲਾਏ ॥
ਤੇਰੈ ਹਥਿ ਹੈ ਸਭ ਵਡਿਆਈ ਜਿਸੁ ਦੇਵਹਿ ਸੋ ਪਾਇਦਾ ॥੧੧॥
ਅੰਦਰਿ ਪਰਗਾਸੁ ਗੁਰੂ ਤੇ ਪਾਏ ॥
ਨਾਮੁ ਪਦਾਰਥੁ ਮੰਨਿ ਵਸਾਏ ॥
ਗਿਆਨ ਰਤਨੁ ਸਦਾ ਘਟਿ ਚਾਨਣੁ ਅਗਿਆਨ ਅੰਧੇਰੁ ਗਵਾਇਦਾ ॥੧੨॥
ਅਗਿਆਨੀ ਅੰਧੇ ਦੂਜੈ ਲਾਗੇ ॥
ਬਿਨੁ ਪਾਣੀ ਡੁਬਿ ਮੂਏ ਅਭਾਗੇ ॥
ਚਲਦਿਆ ਘਰੁ ਦਰੁ ਨਦਰਿ ਨ ਆਵੈ ਜਮ ਦਰਿ ਬਾਧਾ ਦੁਖੁ ਪਾਇਦਾ ॥੧੩॥
ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਸੇਵੇ ਮੁਕਤਿ ਨ ਹੋਈ ॥
ਗਿਆਨੀ ਧਿਆਨੀ ਪੂਛਹੁ ਕੋਈ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵੇ ਤਿਸੁ ਮਿਲੈ ਵਡਿਆਈ ਦਰਿ ਸਚੈ ਸੋਭਾ ਪਾਇਦਾ ॥੧੪॥
ਸਤਿਗੁਰ ਨੋ ਸੇਵੇ ਤਿਸੁ ਆਪਿ ਮਿਲਾਏ ॥
ਮਮਤਾ ਕਾਟਿ ਸਚਿ ਲਿਵ ਲਾਏ ॥
ਸਦਾ ਸਚੁ ਵਣਜਹਿ ਵਾਪਾਰੀ ਨਾਮੋ ਲਾਹਾ ਪਾਇਦਾ ॥੧੫॥
ਆਪੇ ਕਰੇ ਕਰਾਏ ਕਰਤਾ ॥
ਸਬਦਿ ਮਰੈ ਸੋਈ ਜਨੁ ਮੁਕਤਾ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਵਸੈ ਮਨ ਅੰਤਰਿ ਨਾਮੋ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਦਾ ॥੧੬॥੫॥੧੯॥
सतिगुरि सेविऐ सहज अनंदा ॥
हिरदै आइ वुठा गोविंदा ॥
सहजे भगति करे दिनु राती आपे भगति कराइदा ॥४॥
सतिगुर ते विछुड़े तिनी दुखु पाइआ ॥
अनदिनु मारीअहि दुखु सबाइआ ॥
मथे काले महलु न पावहि दुख ही विचि दुखु पाइदा ॥५॥
सतिगुरु सेवहि से वडभागी ॥
सहज भाइ सची लिव लागी ॥
सचो सचु कमावहि सद ही सचै मेलि मिलाइदा ॥६॥
जिस नो सचा देइ सु पाए ॥
अंतरि साचु भरमु चुकाए ॥
सचु सचै का आपे दाता जिसु देवै सो सचु पाइदा ॥७॥
आपे करता सभना का सोई ॥
जिस नो आपि बुझाए बूझै कोई ॥
आपे बखसे दे वडिआई आपे मेलि मिलाइदा ॥८॥
हउमै करदिआ जनमु गवाइआ ॥
आगै मोहु न चूकै माइआ ॥
अगै जमकालु लेखा लेवै जिउ तिल घाणी पीड़ाइदा ॥९॥
पूरै भागि गुर सेवा होई ॥
नदरि करे ता सेवे कोई ॥
जमकालु तिसु नेड़ि न आवै महलि सचै सुखु पाइदा ॥१०॥
तिन सुखु पाइआ जो तुधु भाए ॥
पूरै भागि गुर सेवा लाए ॥
तेरै हथि है सभ वडिआई जिसु देवहि सो पाइदा ॥११॥
अंदरि परगासु गुरू ते पाए ॥
नामु पदारथु मंनि वसाए ॥
गिआन रतनु सदा घटि चानणु अगिआन अंधेरु गवाइदा ॥१२॥
अगिआनी अंधे दूजै लागे ॥
बिनु पाणी डुबि मूए अभागे ॥
चलदिआ घरु दरु नदरि न आवै जम दरि बाधा दुखु पाइदा ॥१३॥
बिनु सतिगुर सेवे मुकति न होई ॥
गिआनी धिआनी पूछहु कोई ॥
सतिगुरु सेवे तिसु मिलै वडिआई दरि सचै सोभा पाइदा ॥१४॥
सतिगुर नो सेवे तिसु आपि मिलाए ॥
ममता काटि सचि लिव लाए ॥
सदा सचु वणजहि वापारी नामो लाहा पाइदा ॥१५॥
आपे करे कराए करता ॥
सबदि मरै सोई जनु मुकता ॥
नानक नामु वसै मन अंतरि नामो नामु धिआइदा ॥१६॥५॥१९॥
हिरदै आइ वुठा गोविंदा ॥
सहजे भगति करे दिनु राती आपे भगति कराइदा ॥४॥
सतिगुर ते विछुड़े तिनी दुखु पाइआ ॥
अनदिनु मारीअहि दुखु सबाइआ ॥
मथे काले महलु न पावहि दुख ही विचि दुखु पाइदा ॥५॥
सतिगुरु सेवहि से वडभागी ॥
सहज भाइ सची लिव लागी ॥
सचो सचु कमावहि सद ही सचै मेलि मिलाइदा ॥६॥
जिस नो सचा देइ सु पाए ॥
अंतरि साचु भरमु चुकाए ॥
सचु सचै का आपे दाता जिसु देवै सो सचु पाइदा ॥७॥
आपे करता सभना का सोई ॥
जिस नो आपि बुझाए बूझै कोई ॥
आपे बखसे दे वडिआई आपे मेलि मिलाइदा ॥८॥
हउमै करदिआ जनमु गवाइआ ॥
आगै मोहु न चूकै माइआ ॥
अगै जमकालु लेखा लेवै जिउ तिल घाणी पीड़ाइदा ॥९॥
पूरै भागि गुर सेवा होई ॥
नदरि करे ता सेवे कोई ॥
जमकालु तिसु नेड़ि न आवै महलि सचै सुखु पाइदा ॥१०॥
तिन सुखु पाइआ जो तुधु भाए ॥
पूरै भागि गुर सेवा लाए ॥
तेरै हथि है सभ वडिआई जिसु देवहि सो पाइदा ॥११॥
अंदरि परगासु गुरू ते पाए ॥
नामु पदारथु मंनि वसाए ॥
गिआन रतनु सदा घटि चानणु अगिआन अंधेरु गवाइदा ॥१२॥
अगिआनी अंधे दूजै लागे ॥
बिनु पाणी डुबि मूए अभागे ॥
चलदिआ घरु दरु नदरि न आवै जम दरि बाधा दुखु पाइदा ॥१३॥
बिनु सतिगुर सेवे मुकति न होई ॥
गिआनी धिआनी पूछहु कोई ॥
सतिगुरु सेवे तिसु मिलै वडिआई दरि सचै सोभा पाइदा ॥१४॥
सतिगुर नो सेवे तिसु आपि मिलाए ॥
ममता काटि सचि लिव लाए ॥
सदा सचु वणजहि वापारी नामो लाहा पाइदा ॥१५॥
आपे करे कराए करता ॥
सबदि मरै सोई जनु मुकता ॥
नानक नामु वसै मन अंतरि नामो नामु धिआइदा ॥१६॥५॥१९॥
हिन्दी अर्थ: हे भाई ! यदि गुरू की शरण पड़ जाएं तो आत्मिक अडोलता का आनंद मिल जाता है। (गुरू के सन्मुख होने वाले मनुष्य के) हृदय में गोविंद-प्रभू आ बसता है। वह मनुष्य दिन-रात आत्मिक अडोलता में टिक के परमात्मा की भगती करता है। हे भाई ! परमात्मा स्वयं ही (अपनी) भगती करवाता है। 4। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू (के चरणों) से विछुड़े हुए हैं। उन्होंने (अपने लिए) दुख ही सहेड़ा हुआ है। वे हर वक्त दुख की चोटें खाते हैं। उनको हरेक किस्म का दुख होता रहता है। (विकारों की कालिख से उनके) मुँह काले हुए रहते हैं (उनके मन मलीन रहते हैं) उनको प्रभू चरणों में ठिकाना नहीं मिलता। हे भाई ! (गुरू चरणों से विछुड़ा हुआ मनुष्य सदा दुख में ही ग्रसा रहता है) दुख में ही ग्रसा रहता है। सदा दुख ही सहता रहता है। 5। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ते हैं। वे बड़े भाग्यशाली हो जाते हैं। किसी खास यतन के बिना ही सदा-स्थिर प्रभू के नाम में उनकी लगन लगी रहती है। वह मनुष्य सदा ही सदा-स्थिर हरी नाम सिमरन की कमाई करते हैं। (गुरू उन्हें अपने साथ) मिला के सदा-स्थिर हरी-नाम में मिला देता है। 6। पर। हे भाई ! वह मनुष्य (ही सदा-स्थिर हरी नाम की दाति) प्राप्त करता है जिस को सदा कायम रहने वाला परमात्मा देता है। उस मनुष्य के हृदय में सदा-स्थिर हरी नाम टिका रहता है। (नाम की बरकति से वह मनुष्य अपने अंदर से) भटकना दूर कर लेता है। हे भाई ! सदा-स्थिर प्रभू अपने सदा-स्थिर नाम की दाति देने वाला स्वयं ही है। जिस को देता है। वह मनुष्य सदा-स्थिर हरी नाम हासिल कर लेता है। 7। हे भाई ! वह करतार स्वयं ही सब जीवों का (मालिक) है। ये बात कोई वह मनुष्य ही समझता है जिसको परमात्मा स्वयं समझाता है। हे भाई ! करतार स्वयं ही बख्शिश करता है। स्वयं ही वडिआई देता है। स्वयं ही (गुरू के साथ) मिला के (अपने चरणों में) मिलाता है। 8। हे भाई ! जो मनुष्य ‘मैं बड़ा हूँ’। मैं बड़ा बन जाऊँ’ – इन सोचों में अपनी जिंदगी व्यर्थ गवा देता है। उसके जीवन सफर में (उसके अंदर से) माया का मोह (कभी) नहीं समाप्त होता। (जब) परलोक में धर्म-राज (उनसे मानस जीवन में किये हुए कामों का) हिसाब माँगता है (तब वह ऐसे) पीड़ा जाता है जैसे (कोल्हू में डाली हुई) घाणी के तिल पीड़े जाते हैं। 9। हे भाई ! गुरू की बताई (नाम-सिमरन की) कार बड़ी किस्मत से (ही किसी से) हो सकती है। जब परमात्मा मेहर की निगाह करता है तब ही कोई मनुष्य कर सकता है। आत्मिक मौत उस मनुष्य के नजदीक नहीं आती। वह मनुष्य सदा-स्थिर परमात्मा के चरणों में जुड़ के आत्मिक आनंद पाता है। 10। हे प्रभू ! जो मनुष्य तुझे अच्छे लगे उन्होंने ही आत्मिक आनंद पाया। उनकी बड़ी किस्मत कि तूने उनको गुरू की बताई हुई कार में लगाए रखा। सारी (लोक-परलोक की) इज्जत तेरे हाथ में है। जिसको तू (यह इज्जत) देता है वह प्राप्त करता है। 11। (हे प्रभू ! जिस पर तू मेहर की निगाह करता है। वह मनुष्य अपने) हृदय में गुरू से आत्मिक जीवन की सूझ प्राप्त करता है। वह (तेरा) श्रेष्ठ नाम अपने मन में बसाता है। उसके हृदय में आत्मिक जीवन की सूझ का श्रेष्ठ प्रकाश हो जाता है (जिसकी बरकति से वह अपने अंदर से) जीवन के प्रति बे-समझी का अंधेरा दूर कर लेता है। 12। हे भाई ! माया के मोह में अंधे हो चुके और आत्मिक जीवन से बेसमझ मनुष्य (परमात्मा को छोड़ के) और ही धंधों में लगे रहते हैं। वह बद्किस्मत मनुष्य पानी के बिना (विकारों के पानी में) डूब के आत्मिक मौत मर जाते हैं। जिंदगी के सफ़र में पड़ने से अपना असली घर-बार नहीं दिखता। (ऐसा मनुष्य) जमराज के दर पर बँधा हुआ दुख पाता है। 13। हे भाई ! गुरू की शरण पड़े बिना (माया के मोह से) मुक्ति नहीं होती। बेशक कोई मनुष्य उनको पूछ के देखे जो धार्मिक पुस्तकें पढ़ के निरी कथा-वार्ता चर्चा करने वाले हैं। या जो। समाधियाँ लगाए रखते हैं। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है। उसको (लोक-परलोक की) इज्जत मिलती है। वह मनुष्य सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा के दर पर आदर प्राप्त करता है। 14। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की बताई हुई कार करता है। उसको परमात्मा स्वयं ही (अपने चरणों में) मिला लेता है। वह मनुष्य (अपने अंदर से) मायावी पदार्थों के कब्जे़ की लालसा छोड़ के सदा-स्थिर हरी-नाम में सुरति जोड़े रखता है। हे भाई ! जो वणजारे जीव सदा-स्थिर हरी-नाम का वणज सदा करते हैं। उनको हरी-नाम का लाभ मिलता है। 15। पर। हे भाई ! करतार स्वयं ही (सब कुछ) करता है। स्वयं ही (जीवों से) करवाता है। (उसकी मेहर से) जो मनुष्य गुरू के शबद से (अपने अंदर से) स्वै भाव त्यागता है। वही (विकारों से) स्वतंत्र हो जाता है। हे नानक ! उस मनुष्य के मन में परमात्मा का नाम टिका रहता है। वह हर वक्त परमात्मा का नाम ही सिमरता रहता है। 16। 5। 19।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਜੋ ਤੁਧੁ ਕਰਣਾ ਸੋ ਕਰਿ ਪਾਇਆ ॥
ਭਾਣੇ ਵਿਚਿ ਕੋ ਵਿਰਲਾ ਆਇਆ ॥
ਭਾਣਾ ਮੰਨੇ ਸੋ ਸੁਖੁ ਪਾਏ ਭਾਣੇ ਵਿਚਿ ਸੁਖੁ ਪਾਇਦਾ ॥੧॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਤੇਰਾ ਭਾਣਾ ਭਾਵੈ ॥
ਸਹਜੇ ਹੀ ਸੁਖੁ ਸਚੁ ਕਮਾਵੈ ॥
ਭਾਣੇ ਨੋ ਲੋਚੈ ਬਹੁਤੇਰੀ ਆਪਣਾ ਭਾਣਾ ਆਪਿ ਮਨਾਇਦਾ ॥੨॥
ਤੇਰਾ ਭਾਣਾ ਮੰਨੇ ਸੁ ਮਿਲੈ ਤੁਧੁ ਆਏ ॥
ਜੋ ਤੁਧੁ ਕਰਣਾ ਸੋ ਕਰਿ ਪਾਇਆ ॥
ਭਾਣੇ ਵਿਚਿ ਕੋ ਵਿਰਲਾ ਆਇਆ ॥
ਭਾਣਾ ਮੰਨੇ ਸੋ ਸੁਖੁ ਪਾਏ ਭਾਣੇ ਵਿਚਿ ਸੁਖੁ ਪਾਇਦਾ ॥੧॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਤੇਰਾ ਭਾਣਾ ਭਾਵੈ ॥
ਸਹਜੇ ਹੀ ਸੁਖੁ ਸਚੁ ਕਮਾਵੈ ॥
ਭਾਣੇ ਨੋ ਲੋਚੈ ਬਹੁਤੇਰੀ ਆਪਣਾ ਭਾਣਾ ਆਪਿ ਮਨਾਇਦਾ ॥੨॥
ਤੇਰਾ ਭਾਣਾ ਮੰਨੇ ਸੁ ਮਿਲੈ ਤੁਧੁ ਆਏ ॥
मारू महला ३ ॥
जो तुधु करणा सो करि पाइआ ॥
भाणे विचि को विरला आइआ ॥
भाणा मंने सो सुखु पाए भाणे विचि सुखु पाइदा ॥१॥
गुरमुखि तेरा भाणा भावै ॥
सहजे ही सुखु सचु कमावै ॥
भाणे नो लोचै बहुतेरी आपणा भाणा आपि मनाइदा ॥२॥
तेरा भाणा मंने सु मिलै तुधु आए ॥
जो तुधु करणा सो करि पाइआ ॥
भाणे विचि को विरला आइआ ॥
भाणा मंने सो सुखु पाए भाणे विचि सुखु पाइदा ॥१॥
गुरमुखि तेरा भाणा भावै ॥
सहजे ही सुखु सचु कमावै ॥
भाणे नो लोचै बहुतेरी आपणा भाणा आपि मनाइदा ॥२॥
तेरा भाणा मंने सु मिलै तुधु आए ॥
हिन्दी अर्थ: मारू महला ३॥ हे प्रभू ! जो काम तू करना (चाहता) है। वह काम तू अवश्य कर देता है। (ये पता होते हुए भी) कोई विरला मनुष्य तेरी रजा को मीठा करके मानता है। जो मनुष्य तेरी रजा को सिर माथे करके मानता है। वह आत्मिक सुख हासिल करता है। तेरी रजा में रह के आत्मिक आनंद पाता है। 1। हे प्रभू ! गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य को तेरी रजा अच्छी लगती है। वह आत्मिक अडोलता में रह के सुख पाता है। वह सदा-स्थिर हरी-नाम सिमरन की कमाई करता रहता है। हे भाई ! प्रभू के किए को मीठा मानने की तमन्ना बहुत सारी लुकाई करती है। पर अपनी रज़ा वह स्वयं ही (किसी विरले से) मनवाता है। 2। हे प्रभू ! जो मनुष्य तेरी रजा को मानता है। वह तुझे आ मिलता है।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 1063 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।
Hauz Khas Village के lake के पास बैठ कर पानी देखना।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 47 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1063” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 1064 →, पीछे का: ← अंग 1062।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।