अंग
1005
राग मारू
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਹਮ ਤੁਮ ਸੰਗਿ ਝੂਠੇ ਸਭਿ ਬੋਲਾ ॥
ਪਾਇ ਠਗਉਰੀ ਆਪਿ ਭੁਲਾਇਓ ॥
ਨਾਨਕ ਕਿਰਤੁ ਨ ਜਾਇ ਮਿਟਾਇਓ ॥੨॥
ਪਸੁ ਪੰਖੀ ਭੂਤ ਅਰੁ ਪ੍ਰੇਤਾ ॥
ਬਹੁ ਬਿਧਿ ਜੋਨੀ ਫਿਰਤ ਅਨੇਤਾ ॥
ਜਹ ਜਾਨੋ ਤਹ ਰਹਨੁ ਨ ਪਾਵੈ ॥
ਥਾਨ ਬਿਹੂਨ ਉਠਿ ਉਠਿ ਫਿਰਿ ਧਾਵੈ ॥
ਮਨਿ ਤਨਿ ਬਾਸਨਾ ਬਹੁਤੁ ਬਿਸਥਾਰਾ ॥
ਅਹੰਮੇਵ ਮੂਠੋ ਬੇਚਾਰਾ ॥
ਅਨਿਕ ਦੋਖ ਅਰੁ ਬਹੁਤੁ ਸਜਾਈ ॥
ਤਾ ਕੀ ਕੀਮਤਿ ਕਹਣੁ ਨ ਜਾਈ ॥
ਪ੍ਰਭ ਬਿਸਰਤ ਨਰਕ ਮਹਿ ਪਾਇਆ ॥
ਤਹ ਮਾਤ ਨ ਬੰਧੁ ਨ ਮੀਤ ਨ ਜਾਇਆ ॥
ਜਿਸ ਕਉ ਹੋਤ ਕ੍ਰਿਪਾਲ ਸੁਆਮੀ ॥
ਸੋ ਜਨੁ ਨਾਨਕ ਪਾਰਗਰਾਮੀ ॥੩॥
ਭ੍ਰਮਤ ਭ੍ਰਮਤ ਪ੍ਰਭ ਸਰਨੀ ਆਇਆ ॥
ਦੀਨਾ ਨਾਥ ਜਗਤ ਪਿਤ ਮਾਇਆ ॥
ਪ੍ਰਭ ਦਇਆਲ ਦੁਖ ਦਰਦ ਬਿਦਾਰਣ ॥
ਜਿਸੁ ਭਾਵੈ ਤਿਸ ਹੀ ਨਿਸਤਾਰਣ ॥
ਅੰਧ ਕੂਪ ਤੇ ਕਾਢਨਹਾਰਾ ॥
ਪ੍ਰੇਮ ਭਗਤਿ ਹੋਵਤ ਨਿਸਤਾਰਾ ॥
ਸਾਧ ਰੂਪ ਅਪਨਾ ਤਨੁ ਧਾਰਿਆ ॥
ਮਹਾ ਅਗਨਿ ਤੇ ਆਪਿ ਉਬਾਰਿਆ ॥
ਜਪ ਤਪ ਸੰਜਮ ਇਸ ਤੇ ਕਿਛੁ ਨਾਹੀ ॥
ਆਦਿ ਅੰਤਿ ਪ੍ਰਭ ਅਗਮ ਅਗਾਹੀ ॥
ਨਾਮੁ ਦੇਹਿ ਮਾਗੈ ਦਾਸੁ ਤੇਰਾ ॥
ਹਰਿ ਜੀਵਨ ਪਦੁ ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭੁ ਮੇਰਾ ॥੪॥੩॥੧੯॥
ਪਾਇ ਠਗਉਰੀ ਆਪਿ ਭੁਲਾਇਓ ॥
ਨਾਨਕ ਕਿਰਤੁ ਨ ਜਾਇ ਮਿਟਾਇਓ ॥੨॥
ਪਸੁ ਪੰਖੀ ਭੂਤ ਅਰੁ ਪ੍ਰੇਤਾ ॥
ਬਹੁ ਬਿਧਿ ਜੋਨੀ ਫਿਰਤ ਅਨੇਤਾ ॥
ਜਹ ਜਾਨੋ ਤਹ ਰਹਨੁ ਨ ਪਾਵੈ ॥
ਥਾਨ ਬਿਹੂਨ ਉਠਿ ਉਠਿ ਫਿਰਿ ਧਾਵੈ ॥
ਮਨਿ ਤਨਿ ਬਾਸਨਾ ਬਹੁਤੁ ਬਿਸਥਾਰਾ ॥
ਅਹੰਮੇਵ ਮੂਠੋ ਬੇਚਾਰਾ ॥
ਅਨਿਕ ਦੋਖ ਅਰੁ ਬਹੁਤੁ ਸਜਾਈ ॥
ਤਾ ਕੀ ਕੀਮਤਿ ਕਹਣੁ ਨ ਜਾਈ ॥
ਪ੍ਰਭ ਬਿਸਰਤ ਨਰਕ ਮਹਿ ਪਾਇਆ ॥
ਤਹ ਮਾਤ ਨ ਬੰਧੁ ਨ ਮੀਤ ਨ ਜਾਇਆ ॥
ਜਿਸ ਕਉ ਹੋਤ ਕ੍ਰਿਪਾਲ ਸੁਆਮੀ ॥
ਸੋ ਜਨੁ ਨਾਨਕ ਪਾਰਗਰਾਮੀ ॥੩॥
ਭ੍ਰਮਤ ਭ੍ਰਮਤ ਪ੍ਰਭ ਸਰਨੀ ਆਇਆ ॥
ਦੀਨਾ ਨਾਥ ਜਗਤ ਪਿਤ ਮਾਇਆ ॥
ਪ੍ਰਭ ਦਇਆਲ ਦੁਖ ਦਰਦ ਬਿਦਾਰਣ ॥
ਜਿਸੁ ਭਾਵੈ ਤਿਸ ਹੀ ਨਿਸਤਾਰਣ ॥
ਅੰਧ ਕੂਪ ਤੇ ਕਾਢਨਹਾਰਾ ॥
ਪ੍ਰੇਮ ਭਗਤਿ ਹੋਵਤ ਨਿਸਤਾਰਾ ॥
ਸਾਧ ਰੂਪ ਅਪਨਾ ਤਨੁ ਧਾਰਿਆ ॥
ਮਹਾ ਅਗਨਿ ਤੇ ਆਪਿ ਉਬਾਰਿਆ ॥
ਜਪ ਤਪ ਸੰਜਮ ਇਸ ਤੇ ਕਿਛੁ ਨਾਹੀ ॥
ਆਦਿ ਅੰਤਿ ਪ੍ਰਭ ਅਗਮ ਅਗਾਹੀ ॥
ਨਾਮੁ ਦੇਹਿ ਮਾਗੈ ਦਾਸੁ ਤੇਰਾ ॥
ਹਰਿ ਜੀਵਨ ਪਦੁ ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭੁ ਮੇਰਾ ॥੪॥੩॥੧੯॥
हम तुम संगि झूठे सभि बोला ॥
पाइ ठगउरी आपि भुलाइओ ॥
नानक किरतु न जाइ मिटाइओ ॥२॥
पसु पंखी भूत अरु प्रेता ॥
बहु बिधि जोनी फिरत अनेता ॥
जह जानो तह रहनु न पावै ॥
थान बिहून उठि उठि फिरि धावै ॥
मनि तनि बासना बहुतु बिसथारा ॥
अहंमेव मूठो बेचारा ॥
अनिक दोख अरु बहुतु सजाई ॥
ता की कीमति कहणु न जाई ॥
प्रभ बिसरत नरक महि पाइआ ॥
तह मात न बंधु न मीत न जाइआ ॥
जिस कउ होत क्रिपाल सुआमी ॥
सो जनु नानक पारगरामी ॥३॥
भ्रमत भ्रमत प्रभ सरनी आइआ ॥
दीना नाथ जगत पित माइआ ॥
प्रभ दइआल दुख दरद बिदारण ॥
जिसु भावै तिस ही निसतारण ॥
अंध कूप ते काढनहारा ॥
प्रेम भगति होवत निसतारा ॥
साध रूप अपना तनु धारिआ ॥
महा अगनि ते आपि उबारिआ ॥
जप तप संजम इस ते किछु नाही ॥
आदि अंति प्रभ अगम अगाही ॥
नामु देहि मागै दासु तेरा ॥
हरि जीवन पदु नानक प्रभु मेरा ॥४॥३॥१९॥
पाइ ठगउरी आपि भुलाइओ ॥
नानक किरतु न जाइ मिटाइओ ॥२॥
पसु पंखी भूत अरु प्रेता ॥
बहु बिधि जोनी फिरत अनेता ॥
जह जानो तह रहनु न पावै ॥
थान बिहून उठि उठि फिरि धावै ॥
मनि तनि बासना बहुतु बिसथारा ॥
अहंमेव मूठो बेचारा ॥
अनिक दोख अरु बहुतु सजाई ॥
ता की कीमति कहणु न जाई ॥
प्रभ बिसरत नरक महि पाइआ ॥
तह मात न बंधु न मीत न जाइआ ॥
जिस कउ होत क्रिपाल सुआमी ॥
सो जनु नानक पारगरामी ॥३॥
भ्रमत भ्रमत प्रभ सरनी आइआ ॥
दीना नाथ जगत पित माइआ ॥
प्रभ दइआल दुख दरद बिदारण ॥
जिसु भावै तिस ही निसतारण ॥
अंध कूप ते काढनहारा ॥
प्रेम भगति होवत निसतारा ॥
साध रूप अपना तनु धारिआ ॥
महा अगनि ते आपि उबारिआ ॥
जप तप संजम इस ते किछु नाही ॥
आदि अंति प्रभ अगम अगाही ॥
नामु देहि मागै दासु तेरा ॥
हरि जीवन पदु नानक प्रभु मेरा ॥४॥३॥१९॥
हिन्दी अर्थ: संसारी साथियों के साथ (साथ निबाहने वाले) सारे बोल झूठे ही हो जाते हैं। पर। हे नानक ! (जीवों के भी क्या वश। ) परमात्मा स्वयं ही (माया के मोह की) ठॅग-बूटी खिला के जीव को गलत रास्ते पर डाल देता है। (जन्म-जन्मांतरों के) किए हुए कर्मों के संस्कारों के समूह को मिटाया नहीं जा सकता। 2। हे भाई ! (माया के मोह में) अंधा हुआ जीव पशू-पंछी भूत-प्रेत आदि अनेकों जूनियों में भटकता फिरता है; जिस असल ठिकाने पर जाना है वहाँ टिक नहीं सकता। बेआसरा हो के बार-बार उठ के (और-और जूनियों में) भटकता है। हे भाई ! (माया के मोह के कारण) मनुष्य के मन में तन में अनेकों वासनाओं का पसारा पसरा रहता है। अहंकार इस बेचारे के आत्मिक जीवन को लूट लेता है। इसके अंदर ऐब पैदा हो जाते हैं। और उनकी सजा भी बहुत मिलती है (उससे बचने की दुनियावी पदार्थों की कोई) कीमत नहीं बताई जा सकती (किसी भी कीमत से इस सजा से खलासी नहीं हो सकती)। हे भाई ! परमात्मा का नाम भूलने के कारण जीव नर्क में फेंका जाता है। वहाँ ना माँ। ना कोई संबंधी। ना कोई मित्र। ना स्त्री – (कोई भी सहायता नहीं कर सकता)। जिस पर मालिक-प्रभू मेहरवान होता है। हे नानक ! (कह- हे भाई !) वह मनुष्य (संसार-समुंद्र से) पार लांघने योग्य हो जाता है 3। जीव भटक-भटक के (आखिर उसकी) शरण आता है। हे भाई ! प्रभू दीना नाथ है। जगत का माता-पिता है। दया का घर है। (जीवों के) दुख-दर्द दूर करने वाला है। हे भाई ! जो जीव उस प्रभू को अच्छा लगने लगता है उसको वह (संसार-समुंद्र से) पार लंघा देता है। हे भाई ! (संसार-रूप) अंधे कूएँ में से (प्रभू जीव को) निकालने के समर्थ है। प्रभू की प्यार-भरी भक्ति से जीव का पार-उतारा हो जाता है। हे भाई ! परमात्मा ने गुरू-रूप अपना शरीर (स्वयं ही सदा) धारण किया है। और जीवों को माया की बड़ी आग से स्वयं ही सदा बचाया है। वरना इस जीव से जप तप (नाम की कमाई) और संजम (शुद्ध आचरण) की मेहनत कुछ भी नहीं हो सकती। हे प्रभू ! जगत के आरम्भ से अंत तक तू ही तू कायम रहने वाला है। तू अपहॅुच है। तू अथाह है। तेरा दास तेरे दर से तेरा नाम माँगता है। हे नानक ! (कह- हे भाई !) मेरा हरी-प्रभू आत्मिक जीवन का दर्जा (देने वाला) है। 4। 3। 19।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਕਤ ਕਉ ਡਹਕਾਵਹੁ ਲੋਗਾ ਮੋਹਨ ਦੀਨ ਕਿਰਪਾਈ ॥੧॥
ਐਸੀ ਜਾਨਿ ਪਾਈ ॥
ਸਰਣਿ ਸੂਰੋ ਗੁਰ ਦਾਤਾ ਰਾਖੈ ਆਪਿ ਵਡਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਭਗਤਾ ਕਾ ਆਗਿਆਕਾਰੀ ਸਦਾ ਸਦਾ ਸੁਖਦਾਈ ॥੨॥
ਅਪਨੇ ਕਉ ਕਿਰਪਾ ਕਰੀਅਹੁ ਇਕੁ ਨਾਮੁ ਧਿਆਈ ॥੩॥
ਨਾਨਕੁ ਦੀਨੁ ਨਾਮੁ ਮਾਗੈ ਦੁਤੀਆ ਭਰਮੁ ਚੁਕਾਈ ॥੪॥੪॥੨੦॥
ਕਤ ਕਉ ਡਹਕਾਵਹੁ ਲੋਗਾ ਮੋਹਨ ਦੀਨ ਕਿਰਪਾਈ ॥੧॥
ਐਸੀ ਜਾਨਿ ਪਾਈ ॥
ਸਰਣਿ ਸੂਰੋ ਗੁਰ ਦਾਤਾ ਰਾਖੈ ਆਪਿ ਵਡਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਭਗਤਾ ਕਾ ਆਗਿਆਕਾਰੀ ਸਦਾ ਸਦਾ ਸੁਖਦਾਈ ॥੨॥
ਅਪਨੇ ਕਉ ਕਿਰਪਾ ਕਰੀਅਹੁ ਇਕੁ ਨਾਮੁ ਧਿਆਈ ॥੩॥
ਨਾਨਕੁ ਦੀਨੁ ਨਾਮੁ ਮਾਗੈ ਦੁਤੀਆ ਭਰਮੁ ਚੁਕਾਈ ॥੪॥੪॥੨੦॥
मारू महला ५ ॥
कत कउ डहकावहु लोगा मोहन दीन किरपाई ॥१॥
ऐसी जानि पाई ॥
सरणि सूरो गुर दाता राखै आपि वडाई ॥१॥ रहाउ ॥
भगता का आगिआकारी सदा सदा सुखदाई ॥२॥
अपने कउ किरपा करीअहु इकु नामु धिआई ॥३॥
नानकु दीनु नामु मागै दुतीआ भरमु चुकाई ॥४॥४॥२०॥
कत कउ डहकावहु लोगा मोहन दीन किरपाई ॥१॥
ऐसी जानि पाई ॥
सरणि सूरो गुर दाता राखै आपि वडाई ॥१॥ रहाउ ॥
भगता का आगिआकारी सदा सदा सुखदाई ॥२॥
अपने कउ किरपा करीअहु इकु नामु धिआई ॥३॥
नानकु दीनु नामु मागै दुतीआ भरमु चुकाई ॥४॥४॥२०॥
हिन्दी अर्थ: मारू महला ५॥ हे लोगो ! तुम क्यों अपने मन को डोलाते हो। सुंदर प्रभू गरीबों पर दया करने वाला है। 1। हे भाई ! मैंने तो ऐसा समझ लिया है कि परमात्मा सबसे बड़ा दाता है। शरण पड़ों की मदद करने वाला सूरमा है। (अपने सेवक की) आप लाज रखता है। 1। रहाउ। हे लोगो ! परमात्मा अपने भक्तों की आरजू मानने वाला है। और (उनको) सदा सुख देने वाला है। 2। (हे प्रभू ! मैं नानक तेरे दर का सेवक हूँ) अपने (इस) सेवक पर मेहर करनी। मैं (तेरा सेवक) तेरा नाम ही सिमरता रहॅूँ। 3। हे प्रभू ! किसी और दूसरे (को तेरे जैसा समझने) का भुलेखा दूर कर के गरीब नानक (तेरे दर से) तेरा नाम माँगता है। 4। 4। 20।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਮੇਰਾ ਠਾਕੁਰੁ ਅਤਿ ਭਾਰਾ ॥
ਮੋਹਿ ਸੇਵਕੁ ਬੇਚਾਰਾ ॥੧॥
ਮੋਹਨੁ ਲਾਲੁ ਮੇਰਾ ਪ੍ਰੀਤਮ ਮਨ ਪ੍ਰਾਨਾ ॥
ਮੋ ਕਉ ਦੇਹੁ ਦਾਨਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਗਲੇ ਮੈ ਦੇਖੇ ਜੋਈ ॥
ਬੀਜਉ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਈ ॥੨॥
ਜੀਅਨ ਪ੍ਰਤਿਪਾਲਿ ਸਮਾਹੈ ॥
ਹੈ ਹੋਸੀ ਆਹੇ ॥੩॥
ਦਇਆ ਮੋਹਿ ਕੀਜੈ ਦੇਵਾ ॥
ਨਾਨਕ ਲਾਗੋ ਸੇਵਾ ॥੪॥੫॥੨੧॥
ਮੇਰਾ ਠਾਕੁਰੁ ਅਤਿ ਭਾਰਾ ॥
ਮੋਹਿ ਸੇਵਕੁ ਬੇਚਾਰਾ ॥੧॥
ਮੋਹਨੁ ਲਾਲੁ ਮੇਰਾ ਪ੍ਰੀਤਮ ਮਨ ਪ੍ਰਾਨਾ ॥
ਮੋ ਕਉ ਦੇਹੁ ਦਾਨਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਗਲੇ ਮੈ ਦੇਖੇ ਜੋਈ ॥
ਬੀਜਉ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਈ ॥੨॥
ਜੀਅਨ ਪ੍ਰਤਿਪਾਲਿ ਸਮਾਹੈ ॥
ਹੈ ਹੋਸੀ ਆਹੇ ॥੩॥
ਦਇਆ ਮੋਹਿ ਕੀਜੈ ਦੇਵਾ ॥
ਨਾਨਕ ਲਾਗੋ ਸੇਵਾ ॥੪॥੫॥੨੧॥
मारू महला ५ ॥
मेरा ठाकुरु अति भारा ॥
मोहि सेवकु बेचारा ॥१॥
मोहनु लालु मेरा प्रीतम मन प्राना ॥
मो कउ देहु दाना ॥१॥ रहाउ ॥
सगले मै देखे जोई ॥
बीजउ अवरु न कोई ॥२॥
जीअन प्रतिपालि समाहै ॥
है होसी आहे ॥३॥
दइआ मोहि कीजै देवा ॥
नानक लागो सेवा ॥४॥५॥२१॥
मेरा ठाकुरु अति भारा ॥
मोहि सेवकु बेचारा ॥१॥
मोहनु लालु मेरा प्रीतम मन प्राना ॥
मो कउ देहु दाना ॥१॥ रहाउ ॥
सगले मै देखे जोई ॥
बीजउ अवरु न कोई ॥२॥
जीअन प्रतिपालि समाहै ॥
है होसी आहे ॥३॥
दइआ मोहि कीजै देवा ॥
नानक लागो सेवा ॥४॥५॥२१॥
हिन्दी अर्थ: मारू महला ५॥ हे भाई ! मेरा मालिक प्रभू बहुत सारी ताकतों का मालिक है। मैं (तो उसके दर पे एक) निमाणा सेवक हूँ। 1। हे मेरे मन के प्यारे ! हे मेरे प्राणों के प्यारे ! तू मेरा सुंदर प्यारा प्रभू है। मुझे (अपने नाम का) दान बख्श। 1। रहाउ। हे भाई ! अन्य सारे आसरे खोज के देख लिए हैं। कोई और दूसरा (उस प्रभू के बराबर का) नहीं। 2। हे भाई ! परमात्मा सारे जीवों को पालता है। सबको रोज़ी पहुँचाता है। वह अब भी है। आगे भी कायम रहेगा। पहले भी था। 3। हे नानक ! (कह-) हे देव ! मेरे पर दया कर। मैं तेरी सेवा-भक्ति में लगा रहूँ। 4। 5। 21।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਪਤਿਤ ਉਧਾਰਨ ਤਾਰਨ ਬਲਿ ਬਲਿ ਬਲੇ ਬਲਿ ਜਾਈਐ ॥
ਐਸਾ ਕੋਈ ਭੇਟੈ ਸੰਤੁ ਜਿਤੁ ਹਰਿ ਹਰੇ ਹਰਿ ਧਿਆਈਐ ॥੧॥
ਮੋ ਕਉ ਕੋਇ ਨ ਜਾਨਤ ਕਹੀਅਤ ਦਾਸੁ ਤੁਮਾਰਾ ॥
ਏਹਾ ਓਟ ਆਧਾਰਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਰਬ ਧਾਰਨ ਪ੍ਰਤਿਪਾਰਨ ਇਕ ਬਿਨਉ ਦੀਨਾ ॥
ਤੁਮਰੀ ਬਿਧਿ ਤੁਮ ਹੀ ਜਾਨਹੁ ਤੁਮ ਜਲ ਹਮ ਮੀਨਾ ॥੨॥
ਪੂਰਨ ਬਿਸਥੀਰਨ ਸੁਆਮੀ ਆਹਿ ਆਇਓ ਪਾਛੈ ॥
ਸਗਲੋ ਭੂ ਮੰਡਲ ਖੰਡਲ ਪ੍ਰਭ ਤੁਮ ਹੀ ਆਛੈ ॥੩॥
ਪਤਿਤ ਉਧਾਰਨ ਤਾਰਨ ਬਲਿ ਬਲਿ ਬਲੇ ਬਲਿ ਜਾਈਐ ॥
ਐਸਾ ਕੋਈ ਭੇਟੈ ਸੰਤੁ ਜਿਤੁ ਹਰਿ ਹਰੇ ਹਰਿ ਧਿਆਈਐ ॥੧॥
ਮੋ ਕਉ ਕੋਇ ਨ ਜਾਨਤ ਕਹੀਅਤ ਦਾਸੁ ਤੁਮਾਰਾ ॥
ਏਹਾ ਓਟ ਆਧਾਰਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਰਬ ਧਾਰਨ ਪ੍ਰਤਿਪਾਰਨ ਇਕ ਬਿਨਉ ਦੀਨਾ ॥
ਤੁਮਰੀ ਬਿਧਿ ਤੁਮ ਹੀ ਜਾਨਹੁ ਤੁਮ ਜਲ ਹਮ ਮੀਨਾ ॥੨॥
ਪੂਰਨ ਬਿਸਥੀਰਨ ਸੁਆਮੀ ਆਹਿ ਆਇਓ ਪਾਛੈ ॥
ਸਗਲੋ ਭੂ ਮੰਡਲ ਖੰਡਲ ਪ੍ਰਭ ਤੁਮ ਹੀ ਆਛੈ ॥੩॥
मारू महला ५ ॥
पतित उधारन तारन बलि बलि बले बलि जाईऐ ॥
ऐसा कोई भेटै संतु जितु हरि हरे हरि धिआईऐ ॥१॥
मो कउ कोइ न जानत कहीअत दासु तुमारा ॥
एहा ओट आधारा ॥१॥ रहाउ ॥
सरब धारन प्रतिपारन इक बिनउ दीना ॥
तुमरी बिधि तुम ही जानहु तुम जल हम मीना ॥२॥
पूरन बिसथीरन सुआमी आहि आइओ पाछै ॥
सगलो भू मंडल खंडल प्रभ तुम ही आछै ॥३॥
पतित उधारन तारन बलि बलि बले बलि जाईऐ ॥
ऐसा कोई भेटै संतु जितु हरि हरे हरि धिआईऐ ॥१॥
मो कउ कोइ न जानत कहीअत दासु तुमारा ॥
एहा ओट आधारा ॥१॥ रहाउ ॥
सरब धारन प्रतिपारन इक बिनउ दीना ॥
तुमरी बिधि तुम ही जानहु तुम जल हम मीना ॥२॥
पूरन बिसथीरन सुआमी आहि आइओ पाछै ॥
सगलो भू मंडल खंडल प्रभ तुम ही आछै ॥३॥
हिन्दी अर्थ: मारू महला ५॥ हे भाई ! विकारियों को बचाने वाले और (संसार-समुंद्र से) पार लंघाने वाले परमात्मा से सदा ही बलिहार जाना चाहिए। (हर वक्त यही प्रार्थना करनी चाहिए कि) कोई ऐसा संत मिल जाए जिससे सदा ही परमात्मा का सिमरन किया जा सके। 1। हे प्रभू ! मुझे (तो) कोई नहीं जानता। पर मैं तेरा दास कहलवाता हूँ। मुझे यही सहारा है। मुझे यही आसरा है (कि तू अपने दास की लाज रखेगा)। 1। रहाउ। हे सारे जीवों को सहारा देने वाले ! हे सबको पालने वाले ! मैं निमाणा एक विनती करता हूँ कि तू पानी हो और मैं तेरी मछली बना रहूँ (पर ये कैसे संभव हो सके- ये) जुगति तू स्वयं ही जानता है। 2। हे सर्व-व्यापक ! हे सारे पसारे के मालिक ! मैं तेरी शरण आ पड़ा हूँ। यह सारा आकार- धरती। धरतियों के चक्कर। धरती के हिस्से- ये सब कुछ तू स्वयं ही स्वयं है (तूने अपने आप से पैदा किए हैं)। 3।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 1005 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
AIIMS के बाहर रात 2 बजे का इंतज़ार, परिवार वाले उम्मीद और थकान के बीच।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 54 पंक्तियों का है, 4 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1005” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 1006 →, पीछे का: ← अंग 1004।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।