मः 5 ॥ सुख समूहा भोग भूमि सबाई को धणी ॥ नानक हभो रोगु मिरतक नाम विहूणिआ ॥2॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ अगर किसी मनुष्य को सारे सुख भोगने को मिले हों। और वह सारी धरती का मालिक हो। (पर) हे नानक ! अगर वह प्रभू के नाम से वंचित है उसकी आत्मा मुर्दा है। सारे सुख उसके लिए रोग के (समान) हैं। 2।
मः 5 ॥ हिकस कूं तू आहि पछाणू भी हिकु करि ॥ नानक आसड़ी निबाहि मानुख परथाई लजीवदो ॥3॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: महला 2॥ हे नानक ! सिर्फ एक परमात्मा को मिलने की चाहत रख। एक परमात्मा को ही अपना मित्र बना। वही आपकी आशा पूरी करने वाला है। किसी मनुष्य का आसरा लेना लज्जा का कारण बनता है। 3।
पउड़ी ॥ निहचलु एकु नराइणो हरि अगम अगाधा ॥ निहचलु नामु निधानु है जिसु सिमरत हरि लाधा ॥ निहचलु कीरतनु गुण गोबिंद गुरमुखि गावाधा ॥ सचु धरमु तपु निहचलो दिनु रैनि अराधा ॥ दइआ धरमु तपु निहचलो जिसु करमि लिखाधा ॥ निहचलु मसतकि लेखु लिखिआ सो टलै न टलाधा ॥ निहचल संगति साध जन बचन निहचलु गुर साधा ॥ जिन कउ पूरबि लिखिआ तिन सदा सदा आराधा ॥19॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ सिर्फ अपहुँच और अथाह हरी-परमात्मा ही सदा-स्थिर रहने वाला है। उस हरी का नाम-खजाना भी ना खत्म होने वाला है। नाम सिमरने से परमात्मा मिल जाता है। गुरू की शरण पड़ के गाए हुए परमात्मा के गुणों का कीर्तन भी (ऐसा खजाना है जो) सदा कायम रहता है। दिन-रात प्रभू का सिमरन करना चाहिए। यही है सदा-स्थिर धर्म और यही है सदा कायम रहने वाला तप। पर यह अटल तप। दया और धर्म उसी को मिलता है जिसके भाग्यों में प्रभू की मेहर से लिखा गया है। माथे पर लिखा हुआ ये लेख ऐसा है कि किसी के टाले नहीं टल सकता। साध जनों की संगत (भी मनुष्य के जीवन के लिए एक) अटल (रास्ता) है। गुरू-साधु के वचन भी (मनुष्य की अगुवाई के लिए) अटॅल (बोल) हैं। पूर्बले जन्म में किए कर्मों के लेख जिनके माथे पर उघड़े हैं। उन्होंने सदा ही (गुरू की शरण पड़ कर) परमात्मा का सिमरन किया है। 19।
सलोक डखणे मः 5 ॥ जो डुबंदो आपि सो तराए किन॑ खे ॥ तारेदड़ो भी तारि नानक पिर सिउ रतिआ ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: श्लोक डखणे महला 5॥ जो मनुष्य स्वयं ही (संसार-समुंद्र के विकारों की लहरों में) डूब रहा हैं। वह और किसी को (कैसे) तैरा सकता है। हे नानक ! जो मनुष्य पति-परमात्मा (के प्यार) में रंगे हुए हैं वह (इन मुश्किलों में से) स्वयं भी पार हो जाते हैं और औरों का भी उद्धार कर लेते हैं। 1।
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ जिस जगह (भाव। साध-संगति में) कोई (गुरमुख लोग) मेरे पति-प्रभू का नाम सुनते उचारते हों। मैं भी वहीं (चल के) जाऊँ। (क्योंकि) हे नानक ! (साध-संगति में) पिर का दीदार कर के (अपना आप) हरा हैं जाता है (आत्मिक जीवन मिल जाता है)। 2।
मः 5 ॥ मेरी मेरी किआ करहि पुत्र कलत्र सनेह ॥ नानक नाम विहूणीआ निमुणीआदी देह ॥3॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ मोह में फस के आप क्यों ये कहे जा रहा है कि ये मेरी स्त्री है यह मेरा पुत्र है। हे नानक ! (मोह में फस के) प्रभू के नाम से वंचित रहके ये शरीर जिसकी कोई बुनियाद नहीं (बिसात नहीं) (व्यर्थ चला जाएगा)।
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ मैं आँखों से गुरू के दर्शन करता हॅूँ। अपना माथा गुरू के चरणों में धरता हूँ। पैरों से मैं गुरू के बताए हुए रास्ते पर चलता हूँ। हाथों से मैं (गुरू की संगति को) पंखा करता हूँ। (इस संयम में रह कर) मैं परमात्मा का स्वरूप अपने हृदय में टिकाता हूँ और दिन-रात (उसका नाम) जपता हूँ। सब ताकतों के मालिक गुरू में श्रद्धा धार के मैंने (माया वाली) सारी (मोह भरी) अपनत्व दूर कर ली है। गुरू ने मुझे प्रभू का नाम-खजाना दिया है। (अब) मेरा दुख-कलेश उतर गया है। हे भाईयो ! (आप भी) अकथ प्रभू के नाम-खजाने को (खुले दिल) से इस्तेमाल करो। और एकत्र करो। सदा गुरू की कहानियां करो। नाम जपो। सेवा करो और अपना आचरण पवित्र बनाओ। (इस तरह जब) मन की अडोलता बन जाती है। तब ईश्वर मिल जाता है। (फिर) मौत का डर भी दूर हो जाता है (आत्मिक मौत नजदीक नहीं फटकती)। 20।
सलोक डखणे मः 5 ॥ लगड़ीआ पिरीअंनि पेखंदीआ ना तिपीआ ॥ हभ मझाहू सो धणी बिआ न डिठो कोइ ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: श्लोक डखणे महला 5॥ (मेरी आँखें) पति प्रभू के साथ लग गई हैं (अब ये आँखें उसको) देख-देख के तृप्त नहीं होती (थकती नहीं)। वह मालिक प्रभू (अब मुझे) सबमें (दिखाई दे रहा है)। (मैंने कहीं भी उसके बिना उस जैसा) कोई दूसरा नहीं देखा। 1।
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ संत-जनों के उपदेश-मयी वचन सुख दिखाने वाला राह हैं; (पर) हे नानक ! ये बचन उनको ही मिलते हैं जिनके माथे पर (पूर्बले भले कर्मों के) भाग्य (उघड़ते हैं)। 2।
मः 5 ॥ डूंगरि जला थला भूमि बना फल कंदरा ॥ पाताला आकास पूरनु हभ घटा ॥ नानक पेखि जीओ इकतु सूति परोतीआ ॥3॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ पहाड़ों में। समुंद्रों में। रेतीली जगहों में। धरती में। जंगलों में। फलों में। गुफाओं में। पाताल आकाश में -सारे ही शरीरों में (परमात्मा) व्यापक है। हे नानक ! जिस प्रभू ने (सारी ही रचना को) एक ही धागे में (भाव। हुकम में। मर्यादा में) पिरो के रखा है उसको देख-देख के मुझे आत्मिक जीवन मिलता है। 3।
पउड़ी ॥ हरि जी माता हरि जी पिता हरि जीउ प्रतिपालक ॥ हरि जी मेरी सार करे हम हरि के बालक ॥ सहजे सहजि खिलाइदा नही करदा आलक ॥ अउगणु को न चितारदा गल सेती लाइक ॥ मुहि मंगां सोई देवदा हरि पिता सुखदाइक ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ परमात्मा मेरा माता पिता है (माता-पिता की तरह मुझे) पालने वाला है। प्रभू मेरी संभाल करता है। हम प्रभू के बच्चे हैं। मुझे मेरा हरी अडोल अवस्था में टिका के जीवन-खेल खिला रहा है। (इस बात से रक्ती भर भी) आलस नहीं करता। मेरे किसी अवगुण को याद नहीं रखता। (सदा) अपने गले से (मुझे) लगाए रखता है। जो कुछ मैं मुँह से माँगता हूँ। मेरा सुखदायी पिता-प्रभू वही-वही दे देता है।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 11 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “महला 5॥ अगर किसी मनुष्य को सारे सुख भोगने को मिले हों।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।