अंग 1010

अंग
1010
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਧੰਧੈ ਧਾਵਤ ਜਗੁ ਬਾਧਿਆ ਨਾ ਬੂਝੈ ਵੀਚਾਰੁ ॥
ਜੰਮਣ ਮਰਣੁ ਵਿਸਾਰਿਆ ਮਨਮੁਖ ਮੁਗਧੁ ਗਵਾਰੁ ॥
ਗੁਰਿ ਰਾਖੇ ਸੇ ਉਬਰੇ ਸਚਾ ਸਬਦੁ ਵੀਚਾਰਿ ॥੭॥
ਸੂਹਟੁ ਪਿੰਜਰਿ ਪ੍ਰੇਮ ਕੈ ਬੋਲੈ ਬੋਲਣਹਾਰੁ ॥
ਸਚੁ ਚੁਗੈ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀਐ ਉਡੈ ਤ ਏਕਾ ਵਾਰ ॥
ਗੁਰਿ ਮਿਲਿਐ ਖਸਮੁ ਪਛਾਣੀਐ ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਮੋਖ ਦੁਆਰੁ ॥੮॥੨॥
धंधै धावत जगु बाधिआ ना बूझै वीचारु ॥
जंमण मरणु विसारिआ मनमुख मुगधु गवारु ॥
गुरि राखे से उबरे सचा सबदु वीचारि ॥७॥
सूहटु पिंजरि प्रेम कै बोलै बोलणहारु ॥
सचु चुगै अंम्रितु पीऐ उडै त एका वार ॥
गुरि मिलिऐ खसमु पछाणीऐ कहु नानक मोख दुआरु ॥८॥२॥

हिन्दी अर्थ: दुनिया के कार्य-व्यवहार में दौड़-भाग करता हुआ मनुष्य माया के मोह में बँध जाता है। वह (इसमें से निकलने की कोई) सोच सोच ही नहीं सकता। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य ऐसा मूर्ख और बुद्धू बन जाता है कि वह जनम-मरण का चक्कर भुला ही बैठता है। जिनकी रक्षा गुरू ने की। वे सच्चे शबद को अपने सोच-मण्डल में बसा के (मोह की जंजीरों में से) बच निकले। 7। (तोता अपने मालिक के पिंजरे में पड़ कर वही बोली बोलता है जो मालिक सिखाता है। मालिक वह बोली सुन के तोते पर खुश होता है) जो जीव-तोता प्रभू के प्रेम के पिंजरे में पड़ कर वह बोल बोलता है जो इसके अंदर बोलणहार प्रभू को पसंद है। तो वह जीव-तोता सदा-स्थिर नाम की चोग चुगता है नाम-अमृत पीता है। (शरीर पिंजरे को सदा के लिए) एक बार ही त्याग जाता है (बार-बार जनम मरण में नहीं पड़ता)। हे नानक ! कह- अगर गुरू मिल जाए तो पति-परमात्मा के साथ गहरी सांझ पड़ जाती है। और माया के मोह से खलासी का दरवाजा मिल जाता है। 8। 2।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਸਬਦਿ ਮਰੈ ਤਾ ਮਾਰਿ ਮਰੁ ਭਾਗੋ ਕਿਸੁ ਪਹਿ ਜਾਉ ॥
ਜਿਸ ਕੈ ਡਰਿ ਭੈ ਭਾਗੀਐ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਤਾ ਕੋ ਨਾਉ ॥
ਮਾਰਹਿ ਰਾਖਹਿ ਏਕੁ ਤੂ ਬੀਜਉ ਨਾਹੀ ਥਾਉ ॥੧॥
ਬਾਬਾ ਮੈ ਕੁਚੀਲੁ ਕਾਚਉ ਮਤਿਹੀਨ ॥
ਨਾਮ ਬਿਨਾ ਕੋ ਕਛੁ ਨਹੀ ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਪੂਰੀ ਮਤਿ ਕੀਨ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਅਵਗਣਿ ਸੁਭਰ ਗੁਣ ਨਹੀ ਬਿਨੁ ਗੁਣ ਕਿਉ ਘਰਿ ਜਾਉ ॥
ਸਹਜਿ ਸਬਦਿ ਸੁਖੁ ਊਪਜੈ ਬਿਨੁ ਭਾਗਾ ਧਨੁ ਨਾਹਿ ॥
ਜਿਨ ਕੈ ਨਾਮੁ ਨ ਮਨਿ ਵਸੈ ਸੇ ਬਾਧੇ ਦੂਖ ਸਹਾਹਿ ॥੨॥
ਜਿਨੀ ਨਾਮੁ ਵਿਸਾਰਿਆ ਸੇ ਕਿਤੁ ਆਏ ਸੰਸਾਰਿ ॥
ਆਗੈ ਪਾਛੈ ਸੁਖੁ ਨਹੀ ਗਾਡੇ ਲਾਦੇ ਛਾਰੁ ॥
ਵਿਛੁੜਿਆ ਮੇਲਾ ਨਹੀ ਦੂਖੁ ਘਣੋ ਜਮ ਦੁਆਰਿ ॥੩॥
ਅਗੈ ਕਿਆ ਜਾਣਾ ਨਾਹਿ ਮੈ ਭੂਲੇ ਤੂ ਸਮਝਾਇ ॥
ਭੂਲੇ ਮਾਰਗੁ ਜੋ ਦਸੇ ਤਿਸ ਕੈ ਲਾਗਉ ਪਾਇ ॥
ਗੁਰ ਬਿਨੁ ਦਾਤਾ ਕੋ ਨਹੀ ਕੀਮਤਿ ਕਹਣੁ ਨ ਜਾਇ ॥੪॥
ਸਾਜਨੁ ਦੇਖਾ ਤਾ ਗਲਿ ਮਿਲਾ ਸਾਚੁ ਪਠਾਇਓ ਲੇਖੁ ॥
ਮੁਖਿ ਧਿਮਾਣੈ ਧਨ ਖੜੀ ਗੁਰਮੁਖਿ ਆਖੀ ਦੇਖੁ ॥
ਤੁਧੁ ਭਾਵੈ ਤੂ ਮਨਿ ਵਸਹਿ ਨਦਰੀ ਕਰਮਿ ਵਿਸੇਖੁ ॥੫॥
ਭੂਖ ਪਿਆਸੋ ਜੇ ਭਵੈ ਕਿਆ ਤਿਸੁ ਮਾਗਉ ਦੇਇ ॥
ਬੀਜਉ ਸੂਝੈ ਕੋ ਨਹੀ ਮਨਿ ਤਨਿ ਪੂਰਨੁ ਦੇਇ ॥
ਜਿਨਿ ਕੀਆ ਤਿਨਿ ਦੇਖਿਆ ਆਪਿ ਵਡਾਈ ਦੇਇ ॥੬॥
ਨਗਰੀ ਨਾਇਕੁ ਨਵਤਨੋ ਬਾਲਕੁ ਲੀਲ ਅਨੂਪੁ ॥
ਨਾਰਿ ਨ ਪੁਰਖੁ ਨ ਪੰਖਣੂ ਸਾਚਉ ਚਤੁਰੁ ਸਰੂਪੁ ॥
ਜੋ ਤਿਸੁ ਭਾਵੈ ਸੋ ਥੀਐ ਤੂ ਦੀਪਕੁ ਤੂ ਧੂਪੁ ॥੭॥
ਗੀਤ ਸਾਦ ਚਾਖੇ ਸੁਣੇ ਬਾਦ ਸਾਦ ਤਨਿ ਰੋਗੁ ॥
ਸਚੁ ਭਾਵੈ ਸਾਚਉ ਚਵੈ ਛੂਟੈ ਸੋਗ ਵਿਜੋਗੁ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਨ ਵੀਸਰੈ ਜੋ ਤਿਸੁ ਭਾਵੈ ਸੁ ਹੋਗੁ ॥੮॥੩॥
मारू महला १ ॥
सबदि मरै ता मारि मरु भागो किसु पहि जाउ ॥
जिस कै डरि भै भागीऐ अंम्रितु ता को नाउ ॥
मारहि राखहि एकु तू बीजउ नाही थाउ ॥१॥
बाबा मै कुचीलु काचउ मतिहीन ॥
नाम बिना को कछु नही गुरि पूरै पूरी मति कीन ॥१॥ रहाउ ॥
अवगणि सुभर गुण नही बिनु गुण किउ घरि जाउ ॥
सहजि सबदि सुखु ऊपजै बिनु भागा धनु नाहि ॥
जिन कै नामु न मनि वसै से बाधे दूख सहाहि ॥२॥
जिनी नामु विसारिआ से कितु आए संसारि ॥
आगै पाछै सुखु नही गाडे लादे छारु ॥
विछुड़िआ मेला नही दूखु घणो जम दुआरि ॥३॥
अगै किआ जाणा नाहि मै भूले तू समझाइ ॥
भूले मारगु जो दसे तिस कै लागउ पाइ ॥
गुर बिनु दाता को नही कीमति कहणु न जाइ ॥४॥
साजनु देखा ता गलि मिला साचु पठाइओ लेखु ॥
मुखि धिमाणै धन खड़ी गुरमुखि आखी देखु ॥
तुधु भावै तू मनि वसहि नदरी करमि विसेखु ॥५॥
भूख पिआसो जे भवै किआ तिसु मागउ देइ ॥
बीजउ सूझै को नही मनि तनि पूरनु देइ ॥
जिनि कीआ तिनि देखिआ आपि वडाई देइ ॥६॥
नगरी नाइकु नवतनो बालकु लील अनूपु ॥
नारि न पुरखु न पंखणू साचउ चतुरु सरूपु ॥
जो तिसु भावै सो थीऐ तू दीपकु तू धूपु ॥७॥
गीत साद चाखे सुणे बाद साद तनि रोगु ॥
सचु भावै साचउ चवै छूटै सोग विजोगु ॥
नानक नामु न वीसरै जो तिसु भावै सु होगु ॥८॥३॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला १॥ (जब मनुष्य गुरू के) शबद में (जुड़ के) स्वै भाव को मारता है तब वह मौत के डर को मार लेता है। (वैसे मौत से) भाग के मैं किस के पास जा सकता हॅूँ। जिस परमात्मा के डर में रहने से अदब में रहने से (मौत के डर से) बचा जा सकता है (उसका नाम जपना चाहिए)। उसका नाम अटल आत्मिक जीवन देने वाला है। हे प्रभू ! तू स्वयं ही मारता है तू खुद ही रक्षा करता है। तेरे बिना और कोई जगह नहीं (जो मार सके अथवा मौत से बचा सके)। 1। हे प्रभू ! (तेरे नाम के बिना) मैं गंदा हूँ। कमजोर-दिल हूँ। बुद्धि-हीन हूँ। तेरे नाम के बिना कोई भी जीव किसी भी लायक नहीं (मति-हीन है)। (जिस मनुष्य को पूरा गुरू मिल गया) पूरे गुरू ने उसको वह मति दे दी जिससे वह जीवन-यात्रा में बिल्कुल गलती नहीं ना खाए। 1। रहाउ। (प्रभू के नाम से टूट के) मैं अवगुणों से नाको-नाक भर जाता हूँ। मेरे में गुण नहीं पैदा होते। और गुणों के बिना मैं (परमात्मा के) देश में कैसे पहुँच सकता हूँ। जो मनुष्य अडोल आत्मिक अवस्था में टिकता है गुरू के शबद में जुड़ता है उसके अंदर आत्मिक आनंद पैदा होता है। पर यह नाम-धन किस्मत के बिना नहीं मिलता। जिनके मन में परमात्मा का नाम नहीं बसता। वे अवगुणों से बँधे हुए दुख सहते हैं। 2। जिन लोगों ने परमात्मा का नाम भुला दिया वे संसार में किसलिए आए। उन्हें ना परलोक में सुख। ना इस लोक में सुख। वे तो राख से लदी हुई गाड़ियाँ हैं (उनके शरीर विकारों से भरे हुए हैं)। वे परमात्मा से विछुड़े हुए हैं। परमात्मा के साथ उनको मिलाप नसीब नहीं होता। वे जमराज के डर से काफी दुख सहते हैं। 3। हे प्रभू ! मुझे ये समझ नहीं कि तेरे नाम से टूट के मेरे साथ क्या होगा। मुझ भूले हुए को। हे प्रभू ! तू स्वयं बुद्धि दे। मुझ गलत राह पर पड़े हुए को जो कोई रास्ता बताएगा। मैं उसके पैरों पर लगूँगा। (सही रास्ते की) दाति देने वाला गुरू के बिना और कोई नहीं। गुरू की बख्शी हुई इस दाति का मूल्य नहीं डाला जा सकता। 4। (गुरू की शरण पड़ कर) मैं सदा-स्थिर प्रभू का सिमरन कर रही हूँ। ये सिमरन-रूपी चिट्ठी मैंने (प्रभू-पति को) भेजी है। जब उस सज्जन-प्रभू का मैं दर्शन करूँगी तब मैं उसके गले से लग जाऊँगी। (प्रभू की याद से टूट के) हे बेहाल हो के खड़ी जीव स्त्री ! तू भी गुरू की शरण पड़। और अपनी आँखों से उसका दर्शन कर ले। (पर। हे प्रभू ! हम जीवों के भी क्या वश। ) अगर तुझे अच्छा लगे तो तू जीवों के मन आ के प्रकट होता है। तेरी मेहर की निगाह से तेरी बख्शिश से तेरे दशर्नों की वडिआई मिलती है। 5। अगर कोई मनुष्य स्वयं ही (माया के मोह में) भूखा-प्यासा भटक रहा हो। मैं उससे क्या (नाम की दाति) माँग सकता हॅूँ। वह मुझे क्या दे सकता है। मुझे तो और कोई (दाता) नहीं सूझता। (हाँ। ) वही परमात्मा दे सकता है जो जीवों के मन में तन में भरपूर है। जिस परमात्मा ने यह जगत रचा है उसने स्वयं ही इसकी संभाल करनी है। वह स्वयं ही अपने (नाम की दाति की) वडिआई देता है। 6। परमात्मा इन शरीरों का मालिक है। (जीवों को प्यार करने में वह हर वक्त) नया है। बालक (की तरह वह निर्वैर) है। वह अनोखे करिश्मे करने में समर्थ है। परमात्मा सदा-स्थिर रहने वाला है। (स्त्री मर्द पंछी आदि सभी में मौजूद है) पर वह कोई खास स्त्री नहीं। कोई खास मर्द नहीं। कोई खास पंछी नहीं। बुद्धि का पुँज है। जगत में वही कुछ हो रहा है जो उसको भाता है। हे प्रभू ! तू सब जीवों को प्रकाश (ज्ञान) देने वाला है। तू सबको सुगन्धि (मीठा स्वभाव) देने वाला है। 7। दुनियाँ के गीत सुन के देखे हैं। स्वाद चख के देखे हैं; ये गीत और स्वाद शरीर के रोग ही पैदा करते हैं। जिस मनुष्य को सदा-स्थिर प्रभू प्यारा लगता है जो मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू का नाम सिमरता है। उसका (प्रभू से) विछोड़ा समाप्त हो जाता है। उसकी चिंता दूर हो जाती है। हे नानक ! जिस मनुष्य को प्रभू का नाम नहीं भूलता। उसको ये यकीन बन जाता है कि जगत में वही कुछ होता है जो प्रभू को पसन्द आता है। 8। 3।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਸਾਚੀ ਕਾਰ ਕਮਾਵਣੀ ਹੋਰਿ ਲਾਲਚ ਬਾਦਿ ॥
ਇਹੁ ਮਨੁ ਸਾਚੈ ਮੋਹਿਆ ਜਿਹਵਾ ਸਚਿ ਸਾਦਿ ॥
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਕੋ ਰਸੁ ਨਹੀ ਹੋਰਿ ਚਲਹਿ ਬਿਖੁ ਲਾਦਿ ॥੧॥
ਐਸਾ ਲਾਲਾ ਮੇਰੇ ਲਾਲ ਕੋ ਸੁਣਿ ਖਸਮ ਹਮਾਰੇ ॥
ਜਿਉ ਫੁਰਮਾਵਹਿ ਤਿਉ ਚਲਾ ਸਚੁ ਲਾਲ ਪਿਆਰੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਲਾਲੇ ਚਾਕਰੀ ਗੋਲੇ ਸਿਰਿ ਮੀਰਾ ॥
ਗੁਰ ਬਚਨੀ ਮਨੁ ਵੇਚਿਆ ਸਬਦਿ ਮਨੁ ਧੀਰਾ ॥
मारू महला १ ॥
साची कार कमावणी होरि लालच बादि ॥
इहु मनु साचै मोहिआ जिहवा सचि सादि ॥
बिनु नावै को रसु नही होरि चलहि बिखु लादि ॥१॥
ऐसा लाला मेरे लाल को सुणि खसम हमारे ॥
जिउ फुरमावहि तिउ चला सचु लाल पिआरे ॥१॥ रहाउ ॥
अनदिनु लाले चाकरी गोले सिरि मीरा ॥
गुर बचनी मनु वेचिआ सबदि मनु धीरा ॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला १॥ (प्रभू-मालिक का गुलाम) सदा-स्थिर प्रभू की भक्ति की कार करता है। (नाम-सिमरन के बिना) बाकी के लालच उसको व्यर्थ (दिखाई देते) हैं। सदा-स्थिर प्रभू ने अपने सेवक का मन प्रेम-वश किया हुआ है (इस वास्ते सेवक की) जीभ सदा-स्थिर नाम-सिमरन के स्वाद में (मगन रहती) है। (सेवक को) प्रभू के नाम के बिना और कोई रस (आकर्षित) नहीं (करता)। (सेवक को निष्चय है कि नाम-रस से वंचित रहने वाले) लोग वह चीज इकट्ठी करके ले जाते हैं जो आत्मिक जीवन के लिए जहर है। 1। हे मेरे पति ! हे मेरे प्यारे लाल ! (मेरी आरज़ू) सुन। मैं अपने लाल का (भाव। तेरा) ऐसा सेवक-ग़ुलाम हूँ कि (तू) जैसे हुकम करता है। मैं वैसे ही (जीवन-राह पर) चलता हूँ। तू ही सदा कायम रहने वाला है। 1। रहाउ। सेवक ने हर रोज (हर वक्त) परमात्मा की भक्ति की सेवा ही संभाली हुई है। सेवक को अपने सिर पर मालिक-प्रभू (खड़ा दिखाई देता) है। सेवक ने अपना मन गुरू के वचनों से बेच दिया है। गुरू के शबद में (टिक के) सेवक का मन धैर्य धरता है।

संदर्भ: यह अंग 1010 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।

गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।

IGI Airport की 3 बजे की flight का इंतज़ार, सब लोग phones पर, मन कहीं और।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 41 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1010” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 1011 →, पीछे का: ← अंग 1009

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।