अंग
1028
राग मारू
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸਤਿਗੁਰੁ ਦਾਤਾ ਮੁਕਤਿ ਕਰਾਏ ॥
ਸਭਿ ਰੋਗ ਗਵਾਏ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਰਸੁ ਪਾਏ ॥
ਜਮੁ ਜਾਗਾਤਿ ਨਾਹੀ ਕਰੁ ਲਾਗੈ ਜਿਸੁ ਅਗਨਿ ਬੁਝੀ ਠਰੁ ਸੀਨਾ ਹੇ ॥੫॥
ਕਾਇਆ ਹੰਸ ਪ੍ਰੀਤਿ ਬਹੁ ਧਾਰੀ ॥
ਓਹੁ ਜੋਗੀ ਪੁਰਖੁ ਓਹ ਸੁੰਦਰਿ ਨਾਰੀ ॥
ਅਹਿਨਿਸਿ ਭੋਗੈ ਚੋਜ ਬਿਨੋਦੀ ਉਠਿ ਚਲਤੈ ਮਤਾ ਨ ਕੀਨਾ ਹੇ ॥੬॥
ਸ੍ਰਿਸਟਿ ਉਪਾਇ ਰਹੇ ਪ੍ਰਭ ਛਾਜੈ ॥
ਪਉਣ ਪਾਣੀ ਬੈਸੰਤਰੁ ਗਾਜੈ ॥
ਮਨੂਆ ਡੋਲੈ ਦੂਤ ਸੰਗਤਿ ਮਿਲਿ ਸੋ ਪਾਏ ਜੋ ਕਿਛੁ ਕੀਨਾ ਹੇ ॥੭॥
ਨਾਮੁ ਵਿਸਾਰਿ ਦੋਖ ਦੁਖ ਸਹੀਐ ॥
ਹੁਕਮੁ ਭਇਆ ਚਲਣਾ ਕਿਉ ਰਹੀਐ ॥
ਨਰਕ ਕੂਪ ਮਹਿ ਗੋਤੇ ਖਾਵੈ ਜਿਉ ਜਲ ਤੇ ਬਾਹਰਿ ਮੀਨਾ ਹੇ ॥੮॥
ਚਉਰਾਸੀਹ ਨਰਕ ਸਾਕਤੁ ਭੋਗਾਈਐ ॥
ਜੈਸਾ ਕੀਚੈ ਤੈਸੋ ਪਾਈਐ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਬਾਝਹੁ ਮੁਕਤਿ ਨ ਹੋਈ ਕਿਰਤਿ ਬਾਧਾ ਗ੍ਰਸਿ ਦੀਨਾ ਹੇ ॥੯॥
ਖੰਡੇ ਧਾਰ ਗਲੀ ਅਤਿ ਭੀੜੀ ॥
ਲੇਖਾ ਲੀਜੈ ਤਿਲ ਜਿਉ ਪੀੜੀ ॥
ਮਾਤ ਪਿਤਾ ਕਲਤ੍ਰ ਸੁਤ ਬੇਲੀ ਨਾਹੀ ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਰਸ ਮੁਕਤਿ ਨ ਕੀਨਾ ਹੇ ॥੧੦॥
ਮੀਤ ਸਖੇ ਕੇਤੇ ਜਗ ਮਾਹੀ ॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਪਰਮੇਸਰ ਕੋਈ ਨਾਹੀ ॥
ਗੁਰ ਕੀ ਸੇਵਾ ਮੁਕਤਿ ਪਰਾਇਣਿ ਅਨਦਿਨੁ ਕੀਰਤਨੁ ਕੀਨਾ ਹੇ ॥੧੧॥
ਕੂੜੁ ਛੋਡਿ ਸਾਚੇ ਕਉ ਧਾਵਹੁ ॥
ਜੋ ਇਛਹੁ ਸੋਈ ਫਲੁ ਪਾਵਹੁ ॥
ਸਾਚ ਵਖਰ ਕੇ ਵਾਪਾਰੀ ਵਿਰਲੇ ਲੈ ਲਾਹਾ ਸਉਦਾ ਕੀਨਾ ਹੇ ॥੧੨॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਵਖਰੁ ਲੈ ਚਲਹੁ ॥
ਦਰਸਨੁ ਪਾਵਹੁ ਸਹਜਿ ਮਹਲਹੁ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਖੋਜਿ ਲਹਹਿ ਜਨ ਪੂਰੇ ਇਉ ਸਮਦਰਸੀ ਚੀਨਾ ਹੇ ॥੧੩॥
ਪ੍ਰਭ ਬੇਅੰਤ ਗੁਰਮਤਿ ਕੋ ਪਾਵਹਿ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਮਨ ਕਉ ਸਮਝਾਵਹਿ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਕੀ ਬਾਣੀ ਸਤਿ ਸਤਿ ਕਰਿ ਮਾਨਹੁ ਇਉ ਆਤਮ ਰਾਮੈ ਲੀਨਾ ਹੇ ॥੧੪॥
ਨਾਰਦ ਸਾਰਦ ਸੇਵਕ ਤੇਰੇ ॥
ਤ੍ਰਿਭਵਣਿ ਸੇਵਕ ਵਡਹੁ ਵਡੇਰੇ ॥
ਸਭ ਤੇਰੀ ਕੁਦਰਤਿ ਤੂ ਸਿਰਿ ਸਿਰਿ ਦਾਤਾ ਸਭੁ ਤੇਰੋ ਕਾਰਣੁ ਕੀਨਾ ਹੇ ॥੧੫॥
ਇਕਿ ਦਰਿ ਸੇਵਹਿ ਦਰਦੁ ਵਞਾਏ ॥
ਓਇ ਦਰਗਹ ਪੈਧੇ ਸਤਿਗੁਰੂ ਛਡਾਏ ॥
ਹਉਮੈ ਬੰਧਨ ਸਤਿਗੁਰਿ ਤੋੜੇ ਚਿਤੁ ਚੰਚਲੁ ਚਲਣਿ ਨ ਦੀਨਾ ਹੇ ॥੧੬॥
ਸਤਿਗੁਰ ਮਿਲਹੁ ਚੀਨਹੁ ਬਿਧਿ ਸਾਈ ॥
ਜਿਤੁ ਪ੍ਰਭੁ ਪਾਵਹੁ ਗਣਤ ਨ ਕਾਈ ॥
ਹਉਮੈ ਮਾਰਿ ਕਰਹੁ ਗੁਰ ਸੇਵਾ ਜਨ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਰੰਗਿ ਭੀਨਾ ਹੇ ॥੧੭॥੨॥੮॥
ਸਭਿ ਰੋਗ ਗਵਾਏ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਰਸੁ ਪਾਏ ॥
ਜਮੁ ਜਾਗਾਤਿ ਨਾਹੀ ਕਰੁ ਲਾਗੈ ਜਿਸੁ ਅਗਨਿ ਬੁਝੀ ਠਰੁ ਸੀਨਾ ਹੇ ॥੫॥
ਕਾਇਆ ਹੰਸ ਪ੍ਰੀਤਿ ਬਹੁ ਧਾਰੀ ॥
ਓਹੁ ਜੋਗੀ ਪੁਰਖੁ ਓਹ ਸੁੰਦਰਿ ਨਾਰੀ ॥
ਅਹਿਨਿਸਿ ਭੋਗੈ ਚੋਜ ਬਿਨੋਦੀ ਉਠਿ ਚਲਤੈ ਮਤਾ ਨ ਕੀਨਾ ਹੇ ॥੬॥
ਸ੍ਰਿਸਟਿ ਉਪਾਇ ਰਹੇ ਪ੍ਰਭ ਛਾਜੈ ॥
ਪਉਣ ਪਾਣੀ ਬੈਸੰਤਰੁ ਗਾਜੈ ॥
ਮਨੂਆ ਡੋਲੈ ਦੂਤ ਸੰਗਤਿ ਮਿਲਿ ਸੋ ਪਾਏ ਜੋ ਕਿਛੁ ਕੀਨਾ ਹੇ ॥੭॥
ਨਾਮੁ ਵਿਸਾਰਿ ਦੋਖ ਦੁਖ ਸਹੀਐ ॥
ਹੁਕਮੁ ਭਇਆ ਚਲਣਾ ਕਿਉ ਰਹੀਐ ॥
ਨਰਕ ਕੂਪ ਮਹਿ ਗੋਤੇ ਖਾਵੈ ਜਿਉ ਜਲ ਤੇ ਬਾਹਰਿ ਮੀਨਾ ਹੇ ॥੮॥
ਚਉਰਾਸੀਹ ਨਰਕ ਸਾਕਤੁ ਭੋਗਾਈਐ ॥
ਜੈਸਾ ਕੀਚੈ ਤੈਸੋ ਪਾਈਐ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਬਾਝਹੁ ਮੁਕਤਿ ਨ ਹੋਈ ਕਿਰਤਿ ਬਾਧਾ ਗ੍ਰਸਿ ਦੀਨਾ ਹੇ ॥੯॥
ਖੰਡੇ ਧਾਰ ਗਲੀ ਅਤਿ ਭੀੜੀ ॥
ਲੇਖਾ ਲੀਜੈ ਤਿਲ ਜਿਉ ਪੀੜੀ ॥
ਮਾਤ ਪਿਤਾ ਕਲਤ੍ਰ ਸੁਤ ਬੇਲੀ ਨਾਹੀ ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਰਸ ਮੁਕਤਿ ਨ ਕੀਨਾ ਹੇ ॥੧੦॥
ਮੀਤ ਸਖੇ ਕੇਤੇ ਜਗ ਮਾਹੀ ॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਪਰਮੇਸਰ ਕੋਈ ਨਾਹੀ ॥
ਗੁਰ ਕੀ ਸੇਵਾ ਮੁਕਤਿ ਪਰਾਇਣਿ ਅਨਦਿਨੁ ਕੀਰਤਨੁ ਕੀਨਾ ਹੇ ॥੧੧॥
ਕੂੜੁ ਛੋਡਿ ਸਾਚੇ ਕਉ ਧਾਵਹੁ ॥
ਜੋ ਇਛਹੁ ਸੋਈ ਫਲੁ ਪਾਵਹੁ ॥
ਸਾਚ ਵਖਰ ਕੇ ਵਾਪਾਰੀ ਵਿਰਲੇ ਲੈ ਲਾਹਾ ਸਉਦਾ ਕੀਨਾ ਹੇ ॥੧੨॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਵਖਰੁ ਲੈ ਚਲਹੁ ॥
ਦਰਸਨੁ ਪਾਵਹੁ ਸਹਜਿ ਮਹਲਹੁ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਖੋਜਿ ਲਹਹਿ ਜਨ ਪੂਰੇ ਇਉ ਸਮਦਰਸੀ ਚੀਨਾ ਹੇ ॥੧੩॥
ਪ੍ਰਭ ਬੇਅੰਤ ਗੁਰਮਤਿ ਕੋ ਪਾਵਹਿ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਮਨ ਕਉ ਸਮਝਾਵਹਿ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਕੀ ਬਾਣੀ ਸਤਿ ਸਤਿ ਕਰਿ ਮਾਨਹੁ ਇਉ ਆਤਮ ਰਾਮੈ ਲੀਨਾ ਹੇ ॥੧੪॥
ਨਾਰਦ ਸਾਰਦ ਸੇਵਕ ਤੇਰੇ ॥
ਤ੍ਰਿਭਵਣਿ ਸੇਵਕ ਵਡਹੁ ਵਡੇਰੇ ॥
ਸਭ ਤੇਰੀ ਕੁਦਰਤਿ ਤੂ ਸਿਰਿ ਸਿਰਿ ਦਾਤਾ ਸਭੁ ਤੇਰੋ ਕਾਰਣੁ ਕੀਨਾ ਹੇ ॥੧੫॥
ਇਕਿ ਦਰਿ ਸੇਵਹਿ ਦਰਦੁ ਵਞਾਏ ॥
ਓਇ ਦਰਗਹ ਪੈਧੇ ਸਤਿਗੁਰੂ ਛਡਾਏ ॥
ਹਉਮੈ ਬੰਧਨ ਸਤਿਗੁਰਿ ਤੋੜੇ ਚਿਤੁ ਚੰਚਲੁ ਚਲਣਿ ਨ ਦੀਨਾ ਹੇ ॥੧੬॥
ਸਤਿਗੁਰ ਮਿਲਹੁ ਚੀਨਹੁ ਬਿਧਿ ਸਾਈ ॥
ਜਿਤੁ ਪ੍ਰਭੁ ਪਾਵਹੁ ਗਣਤ ਨ ਕਾਈ ॥
ਹਉਮੈ ਮਾਰਿ ਕਰਹੁ ਗੁਰ ਸੇਵਾ ਜਨ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਰੰਗਿ ਭੀਨਾ ਹੇ ॥੧੭॥੨॥੮॥
सतिगुरु दाता मुकति कराए ॥
सभि रोग गवाए अंम्रित रसु पाए ॥
जमु जागाति नाही करु लागै जिसु अगनि बुझी ठरु सीना हे ॥५॥
काइआ हंस प्रीति बहु धारी ॥
ओहु जोगी पुरखु ओह सुंदरि नारी ॥
अहिनिसि भोगै चोज बिनोदी उठि चलतै मता न कीना हे ॥६॥
स्रिसटि उपाइ रहे प्रभ छाजै ॥
पउण पाणी बैसंतरु गाजै ॥
मनूआ डोलै दूत संगति मिलि सो पाए जो किछु कीना हे ॥७॥
नामु विसारि दोख दुख सहीऐ ॥
हुकमु भइआ चलणा किउ रहीऐ ॥
नरक कूप महि गोते खावै जिउ जल ते बाहरि मीना हे ॥८॥
चउरासीह नरक साकतु भोगाईऐ ॥
जैसा कीचै तैसो पाईऐ ॥
सतिगुर बाझहु मुकति न होई किरति बाधा ग्रसि दीना हे ॥९॥
खंडे धार गली अति भीड़ी ॥
लेखा लीजै तिल जिउ पीड़ी ॥
मात पिता कलत्र सुत बेली नाही बिनु हरि रस मुकति न कीना हे ॥१०॥
मीत सखे केते जग माही ॥
बिनु गुर परमेसर कोई नाही ॥
गुर की सेवा मुकति पराइणि अनदिनु कीरतनु कीना हे ॥११॥
कूड़ु छोडि साचे कउ धावहु ॥
जो इछहु सोई फलु पावहु ॥
साच वखर के वापारी विरले लै लाहा सउदा कीना हे ॥१२॥
हरि हरि नामु वखरु लै चलहु ॥
दरसनु पावहु सहजि महलहु ॥
गुरमुखि खोजि लहहि जन पूरे इउ समदरसी चीना हे ॥१३॥
प्रभ बेअंत गुरमति को पावहि ॥
गुर कै सबदि मन कउ समझावहि ॥
सतिगुर की बाणी सति सति करि मानहु इउ आतम रामै लीना हे ॥१४॥
नारद सारद सेवक तेरे ॥
त्रिभवणि सेवक वडहु वडेरे ॥
सभ तेरी कुदरति तू सिरि सिरि दाता सभु तेरो कारणु कीना हे ॥१५॥
इकि दरि सेवहि दरदु वञाए ॥
ओइ दरगह पैधे सतिगुरू छडाए ॥
हउमै बंधन सतिगुरि तोड़े चितु चंचलु चलणि न दीना हे ॥१६॥
सतिगुर मिलहु चीनहु बिधि साई ॥
जितु प्रभु पावहु गणत न काई ॥
हउमै मारि करहु गुर सेवा जन नानक हरि रंगि भीना हे ॥१७॥२॥८॥
सभि रोग गवाए अंम्रित रसु पाए ॥
जमु जागाति नाही करु लागै जिसु अगनि बुझी ठरु सीना हे ॥५॥
काइआ हंस प्रीति बहु धारी ॥
ओहु जोगी पुरखु ओह सुंदरि नारी ॥
अहिनिसि भोगै चोज बिनोदी उठि चलतै मता न कीना हे ॥६॥
स्रिसटि उपाइ रहे प्रभ छाजै ॥
पउण पाणी बैसंतरु गाजै ॥
मनूआ डोलै दूत संगति मिलि सो पाए जो किछु कीना हे ॥७॥
नामु विसारि दोख दुख सहीऐ ॥
हुकमु भइआ चलणा किउ रहीऐ ॥
नरक कूप महि गोते खावै जिउ जल ते बाहरि मीना हे ॥८॥
चउरासीह नरक साकतु भोगाईऐ ॥
जैसा कीचै तैसो पाईऐ ॥
सतिगुर बाझहु मुकति न होई किरति बाधा ग्रसि दीना हे ॥९॥
खंडे धार गली अति भीड़ी ॥
लेखा लीजै तिल जिउ पीड़ी ॥
मात पिता कलत्र सुत बेली नाही बिनु हरि रस मुकति न कीना हे ॥१०॥
मीत सखे केते जग माही ॥
बिनु गुर परमेसर कोई नाही ॥
गुर की सेवा मुकति पराइणि अनदिनु कीरतनु कीना हे ॥११॥
कूड़ु छोडि साचे कउ धावहु ॥
जो इछहु सोई फलु पावहु ॥
साच वखर के वापारी विरले लै लाहा सउदा कीना हे ॥१२॥
हरि हरि नामु वखरु लै चलहु ॥
दरसनु पावहु सहजि महलहु ॥
गुरमुखि खोजि लहहि जन पूरे इउ समदरसी चीना हे ॥१३॥
प्रभ बेअंत गुरमति को पावहि ॥
गुर कै सबदि मन कउ समझावहि ॥
सतिगुर की बाणी सति सति करि मानहु इउ आतम रामै लीना हे ॥१४॥
नारद सारद सेवक तेरे ॥
त्रिभवणि सेवक वडहु वडेरे ॥
सभ तेरी कुदरति तू सिरि सिरि दाता सभु तेरो कारणु कीना हे ॥१५॥
इकि दरि सेवहि दरदु वञाए ॥
ओइ दरगह पैधे सतिगुरू छडाए ॥
हउमै बंधन सतिगुरि तोड़े चितु चंचलु चलणि न दीना हे ॥१६॥
सतिगुर मिलहु चीनहु बिधि साई ॥
जितु प्रभु पावहु गणत न काई ॥
हउमै मारि करहु गुर सेवा जन नानक हरि रंगि भीना हे ॥१७॥२॥८॥
हिन्दी अर्थ: (परमात्मा की मेहर से मिला हुआ) सतिगुरू आत्मिक जीवन के गुणों की दाति देता है। विकारों से बचाता है। हमारे हृदय में अमृत-नाम का रस डाल के हमारे रोग दूर करता है। (गुरू की कृपा से) जिस मनुष्य की तृष्णा-अग्नि बुझ जाती है जिसकी छाती (नाम की ठंड से) ठंडी-ठार हो जाती है। जम-मसूलिया उसके नजदीक नहीं फटकता। उसको (जम का) कर नहीं देना पड़ता (क्योंकि उसको गुरू की किरपा से सिमरन के बिना और कोई मायावी वस्तु सौदा अपने जीवन-बेड़े में लादा ही नहीं)। 5। यह काया (जैसे) एक सुंदर स्त्री है (पर जगत में आ के) पक्षी जीवात्मा काया-नारि से बहुत प्रीति बना लेता है। यह जीवात्मा (मानो) एक जोगी है (जो जोगी वाली फेरी डाल के जगत से चला जाता है)। रंग-रलियों में मस्त जोगी-जीवात्मा दिन-रात काया को भोगता है (दरगाह से संदेशा बुलावा आने पर) चलने के वक्त (जोगी-जीव काया नारि से) सलाह भी नहीं करता। 6। जगत पैदा करके प्रभू सब जीवों की रक्षा करता है। हवा पानी आग (आदि सब तत्वों से शरीर रच के सबके अंदर) प्रकट रहता है। (पर उस रखवाले प्रभू को भुला के) मूर्ख मन कामादिक वैरियों की संगति में मिल के भटकता है। और अपने किए का फल पाता है। 7। परमात्मा का नाम भुला के दोखों (विकारों) में फस जाया जाता है दुख सहने पड़ते हैं। जब प्रभू का हुकम (बुलावा) आता है। यहाँ से चलना पड़ता है। फिर यहाँ रह ही नहीं सकते। (परमात्मा की याद से टूट के सारी उम्र) नर्कों के कूएँ में गोते खाता रहता है (इस तरह तड़फता है) जैसे पानी से बाहर निकल के मछली (तड़फती है)। 8। माया-ग्रसित जीव (परमात्मा को भुला के) चौरासी लाख जूनियों के चक्कर में दुख भोगता है। (सृजनहार की रजा का नियम ही ऐसा है कि) जैसा कर्म करते हैं वैसा ही फल भोगते हैं। गुरू की शरण पड़े बिना (चौरासी के चक्करों में से) मुक्ति नहीं होती। अपने किए कर्मों का बँधा जीव उस चक्कर में फंसा ही रहता है। 9। (इस विकार भरे जगत में सही इन्सानी जीवन का रास्ता। मानो) एक बड़ी ही तंग गली (में से गुजरता है जहाँ बहुत ही संकोच करके संजोअ के चलना पड़ता) है (वह रास्ता। जैसे) खंडे की धार (जैसा तेज) है (जिसके ऊपर से गुजरते हुए थोड़ा सा भी डोलने से विकारों के समुंद्र में गिर जाते हैं)। किए कर्मों का हिसाब भी पूरा करना पड़ता है (भाव। जब तक मन में विकारों के संस्कार मौजूद हैं। तब तक विकारों से मुक्ति नहीं मिलती) जैसे तिलों को (कोल्हू में) पीड़ने से ही तेल निकलता है (वैसे ही दुख के कोल्हू में पड़ कर विकारों से मुक्ति मिलती है)। इस दुख में माता-पिता-पत्नी-पुत्र कोई भी सहायक नहीं हो सकता। परमात्मा के नाम-रस की प्राप्ति के बिना (विकारों से) मुक्ति नहीं मिलती। 10। जगत में (चाहे) अनेकों ही मित्र साथी (बना लें)। पर गुरू के बिना परमात्मा के बिना (विकारों के समुंद्र में डूबते जीव का) कोई मददगार नहीं बनता। गुरू की बताई हुई सेवा ही (विकारों से) मुक्ति का आसरा बनता है। (जो व्यक्ति) हर वक्त प्रभू की सिफत सालाह करता है (वह विकारों से स्वतंत्र हो जाता है)। 11। (हे भाई !) माया का मोह छोड़ के सदा-स्थिर रहने वाले प्रभू को मिलने का उद्यम करो (माया की ओर से नहीं तरसोगे)। जो कुछ (प्रभू-दर से) माँगोगे वही मिल जाएगा। (पर माया इतनी प्रबल है कि) सदा-कायम रहने वाले नाम-वस्तु के व्यापार वाले (जगत में) कोई एक-आध ही होते हैं। जो मनुष्य ये वाणज्य करता है वह (उच्च आत्मिक अवस्था का) लाभ कमा लेता है। 12। (हे भाई !) परमात्मा के नाम का सौदा (यहाँ से) खरीद के चलो। परमात्मा के दर्शन पाओगे। उसकी दरगाह से (वह दाति मिलेगी जिसकी बरकति से) अडोल आत्मिक अवस्था में टिके रहोगे। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ते हैं। वे लोग (आत्मिक गुणों में) पूर्ण (हो के प्रभू का नाम-सौदा) हासिल कर लेते हैं। और इस तरह प्यार करने वाले परमात्मा को (अपने अंदर बसता ही) पहचान लेते हैं। 13। कोई विरले (भाग्यशाली) लोग गुरू की मति ले कर बेअंत गुणों के मालिक परमात्मा को पा लेते हैं। गुरू के शबद में जुड़ के (अपने) मन को (विकारों की तरफ दौड़ने से हटाने के लिए) समझाते हैं। हे भाई ! सतिगुरू की बाणी में पूर्ण श्रद्धा बनाओ। इस तरह (भाव। गुरू की बाणी में श्रद्धा बनाने से) सर्व-व्यापक परमात्मा में लीन हुआ जाता है (और विकारों की ओर की दौड़ भटकना समाप्त हो जाती है)। 14। हे प्रभू ! नारद (आदि बड़े-बड़े ऋषिगण) और शारदा (जैसी बेअंत देवियाँ) सब तेरे (ही दर के) सेवक हैं। इस त्रिभवनी संसार में बड़े से बड़े कहलवाने वाले भी तेरे दर के सेवक हैं। यह सारी रचना तेरी ही रची हुई है। यह सारा संसार तेरा ही बनाया हुआ है। तू हरेक जीव के सिर पर राज़क है। 15। अनेकों ही जीव (तेरे नाम की बरकति से अपना) दुख-दर्द दूर करके तेरे दर पर तेरी सेवा-भक्ति करते हैं। जिनको सतिगुरू (विकारों के पँजे से) छुड़ा लेता है उनको परमात्मा की दरगाह में आदर-सत्कार मिलता है। जिन (भाग्यशालियों) के अहंकासर के बँधन सतिगुरू ने तोड़ दिए। उनके चँचल मन को गुरू ने (विकारों की तरफ) भटकने नहीं दिया। 16। हे भाई ! तुम गुरू को मिलो। और (गुरू से) वह ढंग-तरीका सीख लो जिसकी सहायता से परमात्मा को मिल सको। और कर्मों का लेखा भी कोई ना रह जाए। अपने अहंकार को मार कर गुरू द्वारा बताई हुई सेवा करो। हे दास नानक ! (जो मनुष्य गुरू द्वारा बताई हुई सेवा करता है) वह परमात्मा के प्रेम-रंग में भीग जाता है। 17। 2। 8।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਅਸੁਰ ਸਘਾਰਣ ਰਾਮੁ ਹਮਾਰਾ ॥
ਘਟਿ ਘਟਿ ਰਮਈਆ ਰਾਮੁ ਪਿਆਰਾ ॥
ਨਾਲੇ ਅਲਖੁ ਨ ਲਖੀਐ ਮੂਲੇ ਗੁਰਮੁਖਿ ਲਿਖੁ ਵੀਚਾਰਾ ਹੇ ॥੧॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਾਧੂ ਸਰਣਿ ਤੁਮਾਰੀ ॥
ਅਸੁਰ ਸਘਾਰਣ ਰਾਮੁ ਹਮਾਰਾ ॥
ਘਟਿ ਘਟਿ ਰਮਈਆ ਰਾਮੁ ਪਿਆਰਾ ॥
ਨਾਲੇ ਅਲਖੁ ਨ ਲਖੀਐ ਮੂਲੇ ਗੁਰਮੁਖਿ ਲਿਖੁ ਵੀਚਾਰਾ ਹੇ ॥੧॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਾਧੂ ਸਰਣਿ ਤੁਮਾਰੀ ॥
मारू महला १ ॥
असुर सघारण रामु हमारा ॥
घटि घटि रमईआ रामु पिआरा ॥
नाले अलखु न लखीऐ मूले गुरमुखि लिखु वीचारा हे ॥१॥
गुरमुखि साधू सरणि तुमारी ॥
असुर सघारण रामु हमारा ॥
घटि घटि रमईआ रामु पिआरा ॥
नाले अलखु न लखीऐ मूले गुरमुखि लिखु वीचारा हे ॥१॥
गुरमुखि साधू सरणि तुमारी ॥
हिन्दी अर्थ: मारू महला १॥ हमारा परमात्मा (हमारे मनों में से कामादिक) दैत्यों का नाश करने में समर्थ है। वह प्यारा सुंदर राम हरेक शरीर में बसता है। हर वक्त हमारे अंदर मौजूद है। फिर भी वह अलख है। उसका स्वरूप बिल्कुल ही बयान नहीं किया जा सकता। (हे भाई !) गुरू की शरण पड़ कर उसके गुणों की विचार (अपने हृदय में) परो लो। 1। हे प्रभू ! जो मनुष्य गुरू के सन्मुख हो के तेरी शरण पड़ते हैं वे अपने मन को साध लेते हैं (विकारों से रोक लेते हैं)।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 1028 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।
गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।
Sangam Vihar में सुबह 4 बजे जब रसोई शुरू होती है।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 44 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1028” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 1029 →, पीछे का: ← अंग 1027।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।