अंग
1055
राग मारू
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਜੁਗ ਚਾਰੇ ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਪਛਾਤਾ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਮਰੈ ਨ ਜਨਮੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਬਦਿ ਸਮਾਹਾ ਹੇ ॥੧੦॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮਿ ਸਬਦਿ ਸਾਲਾਹੇ ॥
ਅਗਮ ਅਗੋਚਰ ਵੇਪਰਵਾਹੇ ॥
ਏਕ ਨਾਮਿ ਜੁਗ ਚਾਰਿ ਉਧਾਰੇ ਸਬਦੇ ਨਾਮ ਵਿਸਾਹਾ ਹੇ ॥੧੧॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਾਂਤਿ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਪਾਏ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਿਰਦੈ ਨਾਮੁ ਵਸਾਏ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੋਵੈ ਸੋ ਨਾਮੁ ਬੂਝੈ ਕਾਟੇ ਦੁਰਮਤਿ ਫਾਹਾ ਹੇ ॥੧੨॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਉਪਜੈ ਸਾਚਿ ਸਮਾਵੈ ॥
ਨਾ ਮਰਿ ਜੰਮੈ ਨ ਜੂਨੀ ਪਾਵੈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਦਾ ਰਹਹਿ ਰੰਗਿ ਰਾਤੇ ਅਨਦਿਨੁ ਲੈਦੇ ਲਾਹਾ ਹੇ ॥੧੩॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਭਗਤ ਸੋਹਹਿ ਦਰਬਾਰੇ ॥
ਸਚੀ ਬਾਣੀ ਸਬਦਿ ਸਵਾਰੇ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ਸਹਜ ਸੇਤੀ ਘਰਿ ਜਾਹਾ ਹੇ ॥੧੪॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਸਬਦੁ ਸੁਣਾਏ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਭਗਤਿ ਕਰਹੁ ਲਿਵ ਲਾਏ ॥
ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵਹਿ ਸਦ ਹੀ ਨਿਰਮਲ ਨਿਰਮਲ ਗੁਣ ਪਾਤਿਸਾਹਾ ਹੇ ॥੧੫॥
ਗੁਣ ਕਾ ਦਾਤਾ ਸਚਾ ਸੋਈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਵਿਰਲਾ ਬੂਝੈ ਕੋਈ ॥
ਨਾਨਕ ਜਨੁ ਨਾਮੁ ਸਲਾਹੇ ਬਿਗਸੈ ਸੋ ਨਾਮੁ ਬੇਪਰਵਾਹਾ ਹੇ ॥੧੬॥੨॥੧੧॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਮਰੈ ਨ ਜਨਮੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਬਦਿ ਸਮਾਹਾ ਹੇ ॥੧੦॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮਿ ਸਬਦਿ ਸਾਲਾਹੇ ॥
ਅਗਮ ਅਗੋਚਰ ਵੇਪਰਵਾਹੇ ॥
ਏਕ ਨਾਮਿ ਜੁਗ ਚਾਰਿ ਉਧਾਰੇ ਸਬਦੇ ਨਾਮ ਵਿਸਾਹਾ ਹੇ ॥੧੧॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਾਂਤਿ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਪਾਏ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਿਰਦੈ ਨਾਮੁ ਵਸਾਏ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੋਵੈ ਸੋ ਨਾਮੁ ਬੂਝੈ ਕਾਟੇ ਦੁਰਮਤਿ ਫਾਹਾ ਹੇ ॥੧੨॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਉਪਜੈ ਸਾਚਿ ਸਮਾਵੈ ॥
ਨਾ ਮਰਿ ਜੰਮੈ ਨ ਜੂਨੀ ਪਾਵੈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਦਾ ਰਹਹਿ ਰੰਗਿ ਰਾਤੇ ਅਨਦਿਨੁ ਲੈਦੇ ਲਾਹਾ ਹੇ ॥੧੩॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਭਗਤ ਸੋਹਹਿ ਦਰਬਾਰੇ ॥
ਸਚੀ ਬਾਣੀ ਸਬਦਿ ਸਵਾਰੇ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ਸਹਜ ਸੇਤੀ ਘਰਿ ਜਾਹਾ ਹੇ ॥੧੪॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਸਬਦੁ ਸੁਣਾਏ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਭਗਤਿ ਕਰਹੁ ਲਿਵ ਲਾਏ ॥
ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵਹਿ ਸਦ ਹੀ ਨਿਰਮਲ ਨਿਰਮਲ ਗੁਣ ਪਾਤਿਸਾਹਾ ਹੇ ॥੧੫॥
ਗੁਣ ਕਾ ਦਾਤਾ ਸਚਾ ਸੋਈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਵਿਰਲਾ ਬੂਝੈ ਕੋਈ ॥
ਨਾਨਕ ਜਨੁ ਨਾਮੁ ਸਲਾਹੇ ਬਿਗਸੈ ਸੋ ਨਾਮੁ ਬੇਪਰਵਾਹਾ ਹੇ ॥੧੬॥੨॥੧੧॥
जुग चारे गुर सबदि पछाता ॥
गुरमुखि मरै न जनमै गुरमुखि गुरमुखि सबदि समाहा हे ॥१०॥
गुरमुखि नामि सबदि सालाहे ॥
अगम अगोचर वेपरवाहे ॥
एक नामि जुग चारि उधारे सबदे नाम विसाहा हे ॥११॥
गुरमुखि सांति सदा सुखु पाए ॥
गुरमुखि हिरदै नामु वसाए ॥
गुरमुखि होवै सो नामु बूझै काटे दुरमति फाहा हे ॥१२॥
गुरमुखि उपजै साचि समावै ॥
ना मरि जंमै न जूनी पावै ॥
गुरमुखि सदा रहहि रंगि राते अनदिनु लैदे लाहा हे ॥१३॥
गुरमुखि भगत सोहहि दरबारे ॥
सची बाणी सबदि सवारे ॥
अनदिनु गुण गावै दिनु राती सहज सेती घरि जाहा हे ॥१४॥
सतिगुरु पूरा सबदु सुणाए ॥
अनदिनु भगति करहु लिव लाए ॥
हरि गुण गावहि सद ही निरमल निरमल गुण पातिसाहा हे ॥१५॥
गुण का दाता सचा सोई ॥
गुरमुखि विरला बूझै कोई ॥
नानक जनु नामु सलाहे बिगसै सो नामु बेपरवाहा हे ॥१६॥२॥११॥
गुरमुखि मरै न जनमै गुरमुखि गुरमुखि सबदि समाहा हे ॥१०॥
गुरमुखि नामि सबदि सालाहे ॥
अगम अगोचर वेपरवाहे ॥
एक नामि जुग चारि उधारे सबदे नाम विसाहा हे ॥११॥
गुरमुखि सांति सदा सुखु पाए ॥
गुरमुखि हिरदै नामु वसाए ॥
गुरमुखि होवै सो नामु बूझै काटे दुरमति फाहा हे ॥१२॥
गुरमुखि उपजै साचि समावै ॥
ना मरि जंमै न जूनी पावै ॥
गुरमुखि सदा रहहि रंगि राते अनदिनु लैदे लाहा हे ॥१३॥
गुरमुखि भगत सोहहि दरबारे ॥
सची बाणी सबदि सवारे ॥
अनदिनु गुण गावै दिनु राती सहज सेती घरि जाहा हे ॥१४॥
सतिगुरु पूरा सबदु सुणाए ॥
अनदिनु भगति करहु लिव लाए ॥
हरि गुण गावहि सद ही निरमल निरमल गुण पातिसाहा हे ॥१५॥
गुण का दाता सचा सोई ॥
गुरमुखि विरला बूझै कोई ॥
नानक जनु नामु सलाहे बिगसै सो नामु बेपरवाहा हे ॥१६॥२॥११॥
हिन्दी अर्थ: हे भाई ! चारों युगों में ही गुरू के शबद के द्वारा ही प्रभू के साथ सांझ बनती है। गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य जनम-मरण के चक्करों में नहीं पड़ता वह गुरू के शबद में लीन रहता है। 10। हे भाई ! गुरमुख मनुष्य परमात्मा के नाम में जुड़ता है। गुरू के शबद द्वारा अगम अगोचर बेपरवाह प्रभू की सिफत-सालाह करता है। (हे भाई ! गुरमुख जानता है कि) परमात्मा के नाम ने ही चारों युगों के जीवों का पार-उतारा किया है। और गुरू के शबद से नाम का व्यापार किया जा सकता है। 11। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य सदा आत्मिक ठंड और आत्मिक आनंद पाता है। वह अपने दिल में परमात्मा का नाम बसाए रखता है। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है वह हरी के नाम से सांझ पा लेता है। 12। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है। वह उस सदा-स्थिर परमात्मा (की याद) में लीन रहता है जिससे वह पैदा हुआ है। (इसलिए) वह बार-‘बार पैदा होता-मरता नहीं। वह जूनियों में नहीं पड़ता। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाले बंदे सदा परमात्मा के प्रेम-रंग में रंगे रहते हैं। वे हर समय यह लाभ कमाते रहते हैं। 13। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाले भक्त परमात्मा की हजूरी में आदर पाते हैं। सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह की बाणी से गुरू के शबद की बरकति से उनके जीवन सुधर जाते हैं। हे भाई ! जो मनुष्य हर वक्त दिन रात परमात्मा के गुण गाता है। वह आत्मिक अडोलता से प्रभू-चरणों में टिका रहता है (उसका मन बाहर नहीं भटकता)। 14। हे भाई ! पूरा गुरू शबद सुनाता है (और कहता है कि) हर समय सुरति जोड़ के परमात्मा की भक्ति करते रहो। जो मनुष्य परमात्मा के गुण गाते हैं। प्रभू-पातशाह के पवित्र गुण गाते हैं। वे पवित्र जीवन वाले हो जाते हैं। 15। पर। हे भाई ! (अपने) गुणों (के गायन) की दाति देने वाला वह सदा-स्थिर परमात्मा स्वयं ही है। गुरू के सन्मुख रहने वाला कोई विरला मनुष्य (इस बात को) समझता है। हे नानक ! परमात्मा का जो सेवक परमात्मा के नाम की वडिआई करता है। बेपरवाह प्रभू का नाम जपता है। वह सदा खिला हुआ रहता है। 16। 2। 11।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਹਰਿ ਜੀਉ ਸੇਵਿਹੁ ਅਗਮ ਅਪਾਰਾ ॥
ਤਿਸ ਦਾ ਅੰਤੁ ਨ ਪਾਈਐ ਪਾਰਾਵਾਰਾ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦਿ ਰਵਿਆ ਘਟ ਅੰਤਰਿ ਤਿਤੁ ਘਟਿ ਮਤਿ ਅਗਾਹਾ ਹੇ ॥੧॥
ਸਭ ਮਹਿ ਵਰਤੈ ਏਕੋ ਸੋਈ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਪਰਗਟੁ ਹੋਈ ॥
ਸਭਨਾ ਪ੍ਰਤਿਪਾਲ ਕਰੇ ਜਗਜੀਵਨੁ ਦੇਦਾ ਰਿਜਕੁ ਸੰਬਾਹਾ ਹੇ ॥੨॥
ਪੂਰੈ ਸਤਿਗੁਰਿ ਬੂਝਿ ਬੁਝਾਇਆ ॥
ਹੁਕਮੇ ਹੀ ਸਭੁ ਜਗਤੁ ਉਪਾਇਆ ॥
ਹੁਕਮੁ ਮੰਨੇ ਸੋਈ ਸੁਖੁ ਪਾਏ ਹੁਕਮੁ ਸਿਰਿ ਸਾਹਾ ਪਾਤਿਸਾਹਾ ਹੇ ॥੩॥
ਸਚਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਸਬਦੁ ਅਪਾਰਾ ॥
ਤਿਸ ਦੈ ਸਬਦਿ ਨਿਸਤਰੈ ਸੰਸਾਰਾ ॥
ਆਪੇ ਕਰਤਾ ਕਰਿ ਕਰਿ ਵੇਖੈ ਦੇਦਾ ਸਾਸ ਗਿਰਾਹਾ ਹੇ ॥੪॥
ਕੋਟਿ ਮਧੇ ਕਿਸਹਿ ਬੁਝਾਏ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਰਤੇ ਰੰਗੁ ਲਾਏ ॥
ਹਰਿ ਸਾਲਾਹਹਿ ਸਦਾ ਸੁਖਦਾਤਾ ਹਰਿ ਬਖਸੇ ਭਗਤਿ ਸਲਾਹਾ ਹੇ ॥੫॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਹਿ ਸੇ ਜਨ ਸਾਚੇ ॥
ਜੋ ਮਰਿ ਜੰਮਹਿ ਕਾਚਨਿ ਕਾਚੇ ॥
ਅਗਮ ਅਗੋਚਰੁ ਵੇਪਰਵਾਹਾ ਭਗਤਿ ਵਛਲੁ ਅਥਾਹਾ ਹੇ ॥੬॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਸਾਚੁ ਦ੍ਰਿੜਾਏ ॥
ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਸਦਾ ਗੁਣ ਗਾਏ ॥
ਗੁਣਦਾਤਾ ਵਰਤੈ ਸਭ ਅੰਤਰਿ ਸਿਰਿ ਸਿਰਿ ਲਿਖਦਾ ਸਾਹਾ ਹੇ ॥੭॥
ਸਦਾ ਹਦੂਰਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਾਪੈ ॥
ਸਬਦੇ ਸੇਵੈ ਸੋ ਜਨੁ ਧ੍ਰਾਪੈ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਸੇਵਹਿ ਸਚੀ ਬਾਣੀ ਸਬਦਿ ਸਚੈ ਓਮਾਹਾ ਹੇ ॥੮॥
ਅਗਿਆਨੀ ਅੰਧਾ ਬਹੁ ਕਰਮ ਦ੍ਰਿੜਾਏ ॥
ਮਨਹਠਿ ਕਰਮ ਫਿਰਿ ਜੋਨੀ ਪਾਏ ॥
ਹਰਿ ਜੀਉ ਸੇਵਿਹੁ ਅਗਮ ਅਪਾਰਾ ॥
ਤਿਸ ਦਾ ਅੰਤੁ ਨ ਪਾਈਐ ਪਾਰਾਵਾਰਾ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦਿ ਰਵਿਆ ਘਟ ਅੰਤਰਿ ਤਿਤੁ ਘਟਿ ਮਤਿ ਅਗਾਹਾ ਹੇ ॥੧॥
ਸਭ ਮਹਿ ਵਰਤੈ ਏਕੋ ਸੋਈ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਪਰਗਟੁ ਹੋਈ ॥
ਸਭਨਾ ਪ੍ਰਤਿਪਾਲ ਕਰੇ ਜਗਜੀਵਨੁ ਦੇਦਾ ਰਿਜਕੁ ਸੰਬਾਹਾ ਹੇ ॥੨॥
ਪੂਰੈ ਸਤਿਗੁਰਿ ਬੂਝਿ ਬੁਝਾਇਆ ॥
ਹੁਕਮੇ ਹੀ ਸਭੁ ਜਗਤੁ ਉਪਾਇਆ ॥
ਹੁਕਮੁ ਮੰਨੇ ਸੋਈ ਸੁਖੁ ਪਾਏ ਹੁਕਮੁ ਸਿਰਿ ਸਾਹਾ ਪਾਤਿਸਾਹਾ ਹੇ ॥੩॥
ਸਚਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਸਬਦੁ ਅਪਾਰਾ ॥
ਤਿਸ ਦੈ ਸਬਦਿ ਨਿਸਤਰੈ ਸੰਸਾਰਾ ॥
ਆਪੇ ਕਰਤਾ ਕਰਿ ਕਰਿ ਵੇਖੈ ਦੇਦਾ ਸਾਸ ਗਿਰਾਹਾ ਹੇ ॥੪॥
ਕੋਟਿ ਮਧੇ ਕਿਸਹਿ ਬੁਝਾਏ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਰਤੇ ਰੰਗੁ ਲਾਏ ॥
ਹਰਿ ਸਾਲਾਹਹਿ ਸਦਾ ਸੁਖਦਾਤਾ ਹਰਿ ਬਖਸੇ ਭਗਤਿ ਸਲਾਹਾ ਹੇ ॥੫॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਹਿ ਸੇ ਜਨ ਸਾਚੇ ॥
ਜੋ ਮਰਿ ਜੰਮਹਿ ਕਾਚਨਿ ਕਾਚੇ ॥
ਅਗਮ ਅਗੋਚਰੁ ਵੇਪਰਵਾਹਾ ਭਗਤਿ ਵਛਲੁ ਅਥਾਹਾ ਹੇ ॥੬॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਸਾਚੁ ਦ੍ਰਿੜਾਏ ॥
ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਸਦਾ ਗੁਣ ਗਾਏ ॥
ਗੁਣਦਾਤਾ ਵਰਤੈ ਸਭ ਅੰਤਰਿ ਸਿਰਿ ਸਿਰਿ ਲਿਖਦਾ ਸਾਹਾ ਹੇ ॥੭॥
ਸਦਾ ਹਦੂਰਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਾਪੈ ॥
ਸਬਦੇ ਸੇਵੈ ਸੋ ਜਨੁ ਧ੍ਰਾਪੈ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਸੇਵਹਿ ਸਚੀ ਬਾਣੀ ਸਬਦਿ ਸਚੈ ਓਮਾਹਾ ਹੇ ॥੮॥
ਅਗਿਆਨੀ ਅੰਧਾ ਬਹੁ ਕਰਮ ਦ੍ਰਿੜਾਏ ॥
ਮਨਹਠਿ ਕਰਮ ਫਿਰਿ ਜੋਨੀ ਪਾਏ ॥
मारू महला ३ ॥
हरि जीउ सेविहु अगम अपारा ॥
तिस दा अंतु न पाईऐ पारावारा ॥
गुर परसादि रविआ घट अंतरि तितु घटि मति अगाहा हे ॥१॥
सभ महि वरतै एको सोई ॥
गुर परसादी परगटु होई ॥
सभना प्रतिपाल करे जगजीवनु देदा रिजकु संबाहा हे ॥२॥
पूरै सतिगुरि बूझि बुझाइआ ॥
हुकमे ही सभु जगतु उपाइआ ॥
हुकमु मंने सोई सुखु पाए हुकमु सिरि साहा पातिसाहा हे ॥३॥
सचा सतिगुरु सबदु अपारा ॥
तिस दै सबदि निसतरै संसारा ॥
आपे करता करि करि वेखै देदा सास गिराहा हे ॥४॥
कोटि मधे किसहि बुझाए ॥
गुर कै सबदि रते रंगु लाए ॥
हरि सालाहहि सदा सुखदाता हरि बखसे भगति सलाहा हे ॥५॥
सतिगुरु सेवहि से जन साचे ॥
जो मरि जंमहि काचनि काचे ॥
अगम अगोचरु वेपरवाहा भगति वछलु अथाहा हे ॥६॥
सतिगुरु पूरा साचु द्रिड़ाए ॥
सचै सबदि सदा गुण गाए ॥
गुणदाता वरतै सभ अंतरि सिरि सिरि लिखदा साहा हे ॥७॥
सदा हदूरि गुरमुखि जापै ॥
सबदे सेवै सो जनु ध्रापै ॥
अनदिनु सेवहि सची बाणी सबदि सचै ओमाहा हे ॥८॥
अगिआनी अंधा बहु करम द्रिड़ाए ॥
मनहठि करम फिरि जोनी पाए ॥
हरि जीउ सेविहु अगम अपारा ॥
तिस दा अंतु न पाईऐ पारावारा ॥
गुर परसादि रविआ घट अंतरि तितु घटि मति अगाहा हे ॥१॥
सभ महि वरतै एको सोई ॥
गुर परसादी परगटु होई ॥
सभना प्रतिपाल करे जगजीवनु देदा रिजकु संबाहा हे ॥२॥
पूरै सतिगुरि बूझि बुझाइआ ॥
हुकमे ही सभु जगतु उपाइआ ॥
हुकमु मंने सोई सुखु पाए हुकमु सिरि साहा पातिसाहा हे ॥३॥
सचा सतिगुरु सबदु अपारा ॥
तिस दै सबदि निसतरै संसारा ॥
आपे करता करि करि वेखै देदा सास गिराहा हे ॥४॥
कोटि मधे किसहि बुझाए ॥
गुर कै सबदि रते रंगु लाए ॥
हरि सालाहहि सदा सुखदाता हरि बखसे भगति सलाहा हे ॥५॥
सतिगुरु सेवहि से जन साचे ॥
जो मरि जंमहि काचनि काचे ॥
अगम अगोचरु वेपरवाहा भगति वछलु अथाहा हे ॥६॥
सतिगुरु पूरा साचु द्रिड़ाए ॥
सचै सबदि सदा गुण गाए ॥
गुणदाता वरतै सभ अंतरि सिरि सिरि लिखदा साहा हे ॥७॥
सदा हदूरि गुरमुखि जापै ॥
सबदे सेवै सो जनु ध्रापै ॥
अनदिनु सेवहि सची बाणी सबदि सचै ओमाहा हे ॥८॥
अगिआनी अंधा बहु करम द्रिड़ाए ॥
मनहठि करम फिरि जोनी पाए ॥
हिन्दी अर्थ: मारू महला ३॥ हे भाई ! बेअंत और अपहुँच परमात्मा का सिमरन करते रहा करो। उस (के गुणों) का अंत नहीं पाया जा सकता। (उसकी हस्ती) उसके इस पार-उस पार का छोर नहीं पाया जा सकता। हे भाई ! गुरू की कृपा से जिस हृदय में परमात्मा आ बसता है। उस हृदय में बड़ी ऊँची मति प्रकट हो जाती है। 1। हे भाई ! सिर्फ वह परमात्मा ही सब जीवों में व्यापक है। पर गुरू की कृपा से ही वह प्रकट होता है। वह जगत-का-सहारा प्रभू सब जीवों की पालना करता है। सबको रिजक देता है। सबको रिज़क पहुँचाता है। 2। हे भाई ! पूरे गुरू ने (खुद) समझ के (जगत को) समझाया है कि परमात्मा ने अपने हुकम में ही सारा जगत पैदा किया है। जो मनुष्य उसके हुकम को (मीठा करके) मानता है। वही आत्मिक आनंद पाता है। उसका हुकम शाहों-पातशाहों के सिर पर भी चल रहा है (कोई उससे आकी नहीं हो सकता)। 3। हे भाई ! गुरू अभूल है। उसका उपदेश भी बहुत गहरा है। उसके शबद से जगत (संसार-समुंद्र से) पार लांघता है। (गुरू यह बताता है कि) परमात्मा स्वयं ही (जीवों को) पैदा करके (उनकी) संभाल करता है। (सबको) साँसें (प्राण) भी देता है रोज़ी भी देता है। 4। हे भाई ! करोड़ों में से किसी विरले को (परमात्मा सही आत्मिक जीवन की) सूझ बख्शता है। हे भाई ! जो मनुष्य प्यार से गुरू के शबद में मस्त रहते हैं। और सारे सुखों के दाते हरी की सदा सिफत सालाह करते हैं। परमात्मा उनको भगती और सिफत सालाह की (और) दाति बख्शता है। 5। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ते हैं। वे अडोल जीवन वाले हो जाते हैं। पर जो जनम-मरण के चक्करों में पड़े हुए हैं। वे बहुत ही कमजोर आत्मिक जीवन वाले हैं। हे भाई ! अपहुँच अगोचर बेपरवाह और बेअंत परमात्मा भगती से प्यार करता है। 6। हे भाई ! पूरा गुरू जिस मनुष्य के दिल में सदा-स्थिर हरी का नाम पक्का करता है। वह मनुष्य शबद से सदा स्थिर प्रभू के गुण गाता है। उसे इस तरह दिखता है कि गुण-दाता प्रभू सब जीवों में बस रहा है। और हरेक के सिर पर वह समय (साहा) लिखता है (जब जीवात्मा दुल्हन ने परलोक ससुराल चले जाना है)। 7। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य को परमात्मा अंग-संग बसता दिखता है। जो मनुष्य गुरू के शबद से सेवा-भक्ति करता है वह मनुष्य (माया की तृष्णा से) तृप्त रहता है। हे भाई ! जो मनुष्य सिफत सालाह वाली बाणी के द्वारा हर वक्त परमात्मा की सेवा-भगती करते हैं। शबद की बरकति से उनके अंदर आत्मिक आनंद बना रहता है। 8। हे भाई ! (आत्मिक जीवन से) बेसमझ (और माया के मोह में) अंधा (हुआ) मनुष्य (हरी-नाम भुला के तीर्थ-स्नान आदि और और ही) अनेकों (मिथे हुए धार्मिक) कर्मों पर जोर देता है। पर जो मनुष्य मन के हठ से (ऐसे) कर्म (करता रहता है। वह) बार-बार जूनियों में पड़ता है।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 1055 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।
AIIMS के बाहर रात 2 बजे का इंतज़ार, परिवार वाले उम्मीद और थकान के बीच।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 47 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1055” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 1056 →, पीछे का: ← अंग 1054।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।