अंग 1006

अंग
1006
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਅਟਲ ਅਖਇਓ ਦੇਵਾ ਮੋਹਨ ਅਲਖ ਅਪਾਰਾ ॥
ਦਾਨੁ ਪਾਵਉ ਸੰਤਾ ਸੰਗੁ ਨਾਨਕ ਰੇਨੁ ਦਾਸਾਰਾ ॥੪॥੬॥੨੨॥
अटल अखइओ देवा मोहन अलख अपारा ॥
दानु पावउ संता संगु नानक रेनु दासारा ॥४॥६॥२२॥

हिन्दी अर्थ: हे सदा कायम रहने वाले ! हे अविनाशी ! हे प्रकाश रूप ! हे सुंदर स्वरूप वाले ! हे अलख ! हे बेअंत ! हे नानक ! (कह-) तेरे संतों की संगति और दासों की चरण-धूड़ – (मेहर कर) मैं ये ख़ैर प्राप्त कर सकूँ। 4। 6। 22।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਆਘਾਏ ਸੰਤਾ ॥
ਗੁਰ ਜਾਨੇ ਜਿਨ ਮੰਤਾ ॥
ਤਾ ਕੀ ਕਿਛੁ ਕਹਨੁ ਨ ਜਾਈ ॥
ਜਾ ਕਉ ਨਾਮ ਬਡਾਈ ॥੧॥
ਲਾਲੁ ਅਮੋਲਾ ਲਾਲੋ ॥
ਅਗਹ ਅਤੋਲਾ ਨਾਮੋ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਅਵਿਗਤ ਸਿਉ ਮਾਨਿਆ ਮਾਨੋ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਤਤੁ ਗਿਆਨੋ ॥
ਪੇਖਤ ਸਗਲ ਧਿਆਨੋ ॥
ਤਜਿਓ ਮਨ ਤੇ ਅਭਿਮਾਨੋ ॥੨॥
ਨਿਹਚਲੁ ਤਿਨ ਕਾ ਠਾਣਾ ॥
ਗੁਰ ਤੇ ਮਹਲੁ ਪਛਾਣਾ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਗੁਰ ਮਿਲਿ ਜਾਗੇ ॥
ਹਰਿ ਕੀ ਸੇਵਾ ਲਾਗੇ ॥੩॥
ਪੂਰਨ ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਅਘਾਏ ॥
ਸਹਜ ਸਮਾਧਿ ਸੁਭਾਏ ॥
ਹਰਿ ਭੰਡਾਰੁ ਹਾਥਿ ਆਇਆ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰ ਤੇ ਪਾਇਆ ॥੪॥੭॥੨੩॥
मारू महला ५ ॥
त्रिपति आघाए संता ॥
गुर जाने जिन मंता ॥
ता की किछु कहनु न जाई ॥
जा कउ नाम बडाई ॥१॥
लालु अमोला लालो ॥
अगह अतोला नामो ॥१॥ रहाउ ॥
अविगत सिउ मानिआ मानो ॥
गुरमुखि ततु गिआनो ॥
पेखत सगल धिआनो ॥
तजिओ मन ते अभिमानो ॥२॥
निहचलु तिन का ठाणा ॥
गुर ते महलु पछाणा ॥
अनदिनु गुर मिलि जागे ॥
हरि की सेवा लागे ॥३॥
पूरन त्रिपति अघाए ॥
सहज समाधि सुभाए ॥
हरि भंडारु हाथि आइआ ॥
नानक गुर ते पाइआ ॥४॥७॥२३॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला ५॥ हे भाई ! वे (अमूल्य नाम रूपी लाल रत्न का सौदा करके माया की ओर से) पूरी तरह से तृप्त हो गए। जिन संत जनों ने गुरू के उपदेश के साथ गहरी सांझ डाल ली। उनकी (आत्मिक अवस्था इतनी ऊँची बन जाती है कि) बयान नहीं की जा सकती। जिनको परमात्मा का नाम जपने की वडिआई प्राप्त हो जाती है 1। हे भाई ! परमात्मा का नाम एक ऐसा लाल है जो किसी (दुनियावी) कीमति से नहीं मिलता। जो (आसानी से) पकड़ा नहीं जा सकता। जिसके बराबर की और कोई चीज़ नहीं। 1। रहाउ। हे भाई ! (जिनको नाम रूपी लाल प्राप्त हो गया) अदृष्ट परमात्मा के साथ उनका मन पतीज गया। गुरू की शरण पड़ कर उनको असल आत्मिक जीवन की सूझ प्राप्त हो गई। सारे जगत से मेल-मिलाप रखते हुए उनकी सुरति प्रभू-चरणों में रहती है। वे अपने मन से अहंकार दूर कर लेते हैं। 2। हे भाई ! (जिन्हें नाम-लाल मिल गया) उनका आत्मिक ठिकाना अटल हो जाता है (उनका मन माया से डोलने से हट जाता है)। वे मनुष्य गुरू से (शिक्षा ले के) प्रभू-चरणों से गहरी सांझ डाल लेते हैं। गुरू को मिल के (गुरू की शरण पड़ कर) वे हर वक्त (माया के हमलों से) सचेत रहते हैं। सदा परमात्मा की सेवा-भगती में लगे रहते हैं। 3। हे भाई ! (जिनको नाम-लाल मिल जाता है) वे माया की तृष्णा से पूरी तरह से तृप्त रहते हैं। वे प्रभू के प्यार में टिके रहते हैं। उनकी आत्मिक अडोलता वाली समाधि बनी रहती है। (क्योंकि) परमात्मा का नाम-खजाना उनके हाथ आ जाता है। पर। हे नानक ! (ये खजाना) गुरू से ही मिलता है। 4। 7। 23।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੫ ਘਰੁ ੬ ਦੁਪਦੇ
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਛੋਡਿ ਸਗਲ ਸਿਆਣਪਾ ਮਿਲਿ ਸਾਧ ਤਿਆਗਿ ਗੁਮਾਨੁ ॥
ਅਵਰੁ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਮਿਥਿਆ ਰਸਨਾ ਰਾਮ ਰਾਮ ਵਖਾਨੁ ॥੧॥
ਮੇਰੇ ਮਨ ਕਰਨ ਸੁਣਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ॥
ਮਿਟਹਿ ਅਘ ਤੇਰੇ ਜਨਮ ਜਨਮ ਕੇ ਕਵਨੁ ਬਪੁਰੋ ਜਾਮੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਦੂਖ ਦੀਨ ਨ ਭਉ ਬਿਆਪੈ ਮਿਲੈ ਸੁਖ ਬਿਸ੍ਰਾਮੁ ॥
ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਨਾਨਕੁ ਬਖਾਨੈ ਹਰਿ ਭਜਨੁ ਤਤੁ ਗਿਆਨੁ ॥੨॥੧॥੨੪॥
मारू महला ५ घरु ६ दुपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
छोडि सगल सिआणपा मिलि साध तिआगि गुमानु ॥
अवरु सभु किछु मिथिआ रसना राम राम वखानु ॥१॥
मेरे मन करन सुणि हरि नामु ॥
मिटहि अघ तेरे जनम जनम के कवनु बपुरो जामु ॥१॥ रहाउ ॥
दूख दीन न भउ बिआपै मिलै सुख बिस्रामु ॥
गुर प्रसादि नानकु बखानै हरि भजनु ततु गिआनु ॥२॥१॥२४॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला ५ घरु ६ दुपदे ੴ सतिगुर प्रसादि॥ हे भाई ! सारी (फोकी) चतुराईयाँ छोड़ दे। गुरू को मिल के (अपने अंदर से) अहंकार दूर कर। अपनी जीभ से परमात्मा का नाम सिमरा कर। (नाम के बिना) और सब कुछ नाशवंत है। 1। हे मेरे मन ! कानों से परमात्मा का नाम सुना कर। (नाम की बरकति से) तेरे अनेकों जन्मों के (किए हुए) पाप मिट जाएंगे। बेचारा जम भी कौन है (जो तुझे डरा सके) । 1। रहाउ। हे भाई ! नानक कहता है (जो मनुष्य नाम सिमरता है उस पर दुनिया के) दुख। मुथाजगी। (हरेक किस्म का) डर – (इनमें से कोई भी) अपना जोर नहीं डाल सकते। परमात्मा का भजन करना ही असल आत्मिक जीवन की सूझ है (पर ये नाम) गुरू की कृपा से (ही मिलता है)। 2। 1। 24।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਜਿਨੀ ਨਾਮੁ ਵਿਸਾਰਿਆ ਸੇ ਹੋਤ ਦੇਖੇ ਖੇਹ ॥
ਪੁਤ੍ਰ ਮਿਤ੍ਰ ਬਿਲਾਸ ਬਨਿਤਾ ਤੂਟਤੇ ਏ ਨੇਹ ॥੧॥
ਮੇਰੇ ਮਨ ਨਾਮੁ ਨਿਤ ਨਿਤ ਲੇਹ ॥
ਜਲਤ ਨਾਹੀ ਅਗਨਿ ਸਾਗਰ ਸੂਖੁ ਮਨਿ ਤਨਿ ਦੇਹ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਬਿਰਖ ਛਾਇਆ ਜੈਸੇ ਬਿਨਸਤ ਪਵਨ ਝੂਲਤ ਮੇਹ ॥
ਹਰਿ ਭਗਤਿ ਦ੍ਰਿੜੁ ਮਿਲੁ ਸਾਧ ਨਾਨਕ ਤੇਰੈ ਕਾਮਿ ਆਵਤ ਏਹ ॥੨॥੨॥੨੫॥
मारू महला ५ ॥
जिनी नामु विसारिआ से होत देखे खेह ॥
पुत्र मित्र बिलास बनिता तूटते ए नेह ॥१॥
मेरे मन नामु नित नित लेह ॥
जलत नाही अगनि सागर सूखु मनि तनि देह ॥१॥ रहाउ ॥
बिरख छाइआ जैसे बिनसत पवन झूलत मेह ॥
हरि भगति द्रिड़ु मिलु साध नानक तेरै कामि आवत एह ॥२॥२॥२५॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला ५॥ (हे मेरे मन !) जिन मनुष्यों ने परमात्मा का नाम भुला दिया। वह (विकारों की आग के समुंद्र में जल के) राख होते देखे जाते हैं। पुत्र। मित्र। स्त्री (आदि संबंधी जिनसे मनुष्य दुनियां की) रंग-रलियाँ (करता है) – ये सारे प्यार (आखिर) टूट जाते हैं। 1। हे मेरे मन ! सदा ही परमात्मा का नाम जपा कर। (हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा का नाम जपता है वह तृष्णा की) आग के समुंद्रों में जलता नहीं। उसके मन में तन में देही में सुख-आनंद बना रहता है। 1। रहाउ। हे नानक ! (कह- हे भाई !) जैसे वृक्ष की छाया नाश हो जाती है। (जल्दी ही बदलती जाती है) वैसे ही हवा भी बादलों को उड़ा के ले जाती है (और उनकी छाया समाप्त हो जाती है इसी तरह दुनियावी विलास नाशवंत हैं)। हे भाई ! गुरू को मिल और अपने हृदय में परमात्मा की भक्ति पक्की कर। यही तेरे काम आने वाली है। 2। 2। 25।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਪੁਰਖੁ ਪੂਰਨ ਸੁਖਹ ਦਾਤਾ ਸੰਗਿ ਬਸਤੋ ਨੀਤ ॥
ਮਰੈ ਨ ਆਵੈ ਨ ਜਾਇ ਬਿਨਸੈ ਬਿਆਪਤ ਉਸਨ ਨ ਸੀਤ ॥੧॥
ਮੇਰੇ ਮਨ ਨਾਮ ਸਿਉ ਕਰਿ ਪ੍ਰੀਤਿ ॥
ਚੇਤਿ ਮਨ ਮਹਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਿਧਾਨਾ ਏਹ ਨਿਰਮਲ ਰੀਤਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕ੍ਰਿਪਾਲ ਦਇਆਲ ਗੋਪਾਲ ਗੋਬਿਦ ਜੋ ਜਪੈ ਤਿਸੁ ਸੀਧਿ ॥
ਨਵਲ ਨਵਤਨ ਚਤੁਰ ਸੁੰਦਰ ਮਨੁ ਨਾਨਕ ਤਿਸੁ ਸੰਗਿ ਬੀਧਿ ॥੨॥੩॥੨੬॥
मारू महला ५ ॥
पुरखु पूरन सुखह दाता संगि बसतो नीत ॥
मरै न आवै न जाइ बिनसै बिआपत उसन न सीत ॥१॥
मेरे मन नाम सिउ करि प्रीति ॥
चेति मन महि हरि हरि निधाना एह निरमल रीति ॥१॥ रहाउ ॥
क्रिपाल दइआल गोपाल गोबिद जो जपै तिसु सीधि ॥
नवल नवतन चतुर सुंदर मनु नानक तिसु संगि बीधि ॥२॥३॥२६॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला ५॥ हे मेरे मन ! वह सर्व-व्यापक परमात्मा सारे सुख देने वाला है। और सदा ही (हरेक के) साथ बसता है। वह ना पैदा होता है ना मरता है। वह नाश-रहित है। ना खुशी ना ग़मी – कोई भी उसके ऊपर अपना प्रभाव नहीं डाल सकता। 1। हे मेरे मन ! परमात्मा के नाम से प्यार डाले रख। हे भाई ! जो प्रभू सारे गुणों का खजाना है उसको अपने मन में याद किया कर। जिंदगी को पवित्र रखने का यही तरीका है। 1। रहाउ। हे भाई ! परमात्मा कृपा का घर है दया का श्रोत है। सृष्टि को पालने वाला गोबिंद है। जो मनुष्य (उसका नाम) जपता है उसको जिंदगी में कामयाबी प्राप्त हो जाती है। हे नानक ! (कह- हे भाई !) परमात्मा हर वक्त नया है (परमात्मा का प्यार हर वक्त नया है)। परमात्मा समझदार है सुंदर है। उससे (उसके चरणों में) अपना मन परोए रख। 2। 3। 26।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਚਲਤ ਬੈਸਤ ਸੋਵਤ ਜਾਗਤ ਗੁਰ ਮੰਤ੍ਰੁ ਰਿਦੈ ਚਿਤਾਰਿ ॥
ਚਰਣ ਸਰਣ ਭਜੁ ਸੰਗਿ ਸਾਧੂ ਭਵ ਸਾਗਰ ਉਤਰਹਿ ਪਾਰਿ ॥੧॥
मारू महला ५ ॥
चलत बैसत सोवत जागत गुर मंत्रु रिदै चितारि ॥
चरण सरण भजु संगि साधू भव सागर उतरहि पारि ॥१॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला ५॥ हे भाई ! चलते फिरते। बैठते। सोए हुए। जागते हुए – हर वक्त गुरू का उपदेश हृदय में याद रख। गुरू की संगति में रह के (परमात्मा के) चरणों का आसरा ले। (इस तरह) तू संसार-समुंद्र से पार लांघ जाएगा। 1।

संदर्भ: यह अंग 1006 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

Lodhi Gardens में सुबह की walk, घूमते-घूमते एक पुरानी पंक्ति।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 46 पंक्तियों का है, 6 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1006” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 1007 →, पीछे का: ← अंग 1005

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।