Lulla Family

अंग 990

अंग
990
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
पाप पथर तरणु न जाई ॥
भउ बेड़ा जीउ चड़ाऊ ॥
कहु नानक देवै काहू ॥4॥2॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: पापों के पत्थर लाद के जिंदगी की बेड़ी इन बवण्डरों में से पार नहीं लांघ सकती। अगर परमात्मा के डर-अदब की बेड़ी तैयार की जाए। और उस बेड़ी में जीव सवार हो। तब ही (संसार-समुंद्र के विकारों के बवण्डरों में से) पार लांघा जा सकता है। पर हे नानक ! कह-ऐसी बेड़ी किसी विरले को ही परमात्मा देता है। 4। 2।
मारू महला 1 घरु 1 ॥
करणी कागदु मनु मसवाणी बुरा भला दुइ लेख पए ॥
जिउ जिउ किरतु चलाए तिउ चलीऐ तउ गुण नाही अंतु हरे ॥1॥
चित चेतसि की नही बावरिआ ॥
हरि बिसरत तेरे गुण गलिआ ॥1॥ रहाउ ॥
जाली रैनि जालु दिनु हूआ जेती घड़ी फाही तेती ॥
रसि रसि चोग चुगहि नित फासहि छूटसि मूड़े कवन गुणी ॥2॥
काइआ आरणु मनु विचि लोहा पंच अगनि तितु लागि रही ॥
कोइले पाप पड़े तिसु ऊपरि मनु जलिआ संन॑ी चिंत भई ॥3॥
भइआ मनूरु कंचनु फिरि होवै जे गुरु मिलै तिनेहा ॥
एकु नामु अंम्रितु ओहु देवै तउ नानक त्रिसटसि देहा ॥4॥3॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: मारू महला 1 घरु 1॥ हे हरी ! आपके गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता (तूने आश्चर्यजनक खेल रची है कि आपकी कुदरति में जीवों का) आचरण। मानो। कागज है। मन दवात है (उस बन रहे आचरण-कागज़ पर मन के संस्कारों की स्याही से) अच्छे-बुरे (नए) लेख लिखे जा रहे हैं (भाव। मन में अब तक के इकट्ठे हुए संस्कारों की प्रेरणा से जीव जो नए अच्छे-बुरे काम करता है। वह काम आचरण-रूप कागज़ पर नए अच्छे-बुरे संस्कार उकरते जाते हैं)। (इसी तरह) पिछले किए कर्मों के संस्कारों का समूह-रूप स्वभाव ज्यों-ज्यों जीवों को प्रेरित करता है वैसे वैसे ही वह जीवन-राह पर चल सकता है। 1। हे कमले मन ! आप परमात्मा को क्यों याद नहीं करता। ज्यों-ज्यों आप परमात्मा को बिसार रहा है। त्यों-त्यों आपके (अंदर से) गुण घटते जा रहे हैं। 1। रहाउ। (हे मन पंछी ! परमात्मा को बिसारने से आपकी जिंदगी का हरेक) दिन और हरेक रात (आपको माया में फसाने के लिए) जाल का काम दे रहा है। आपकी उम्र की जितनी भी घड़ियां हैं वह सारी ही (आपको फसाने के लिए) फंदे बनती जा रही हैं। आप बड़े स्वाद ले ले के विकारों की चोग चुग रहा है और विकारों में दिन-ब-दिन और फसता जा रहा है। हे मूर्ख मन ! इनमें से कौन से गुणों के साथ खलासी हासिल करेगा। 2। मनुष्य का शरीर। मानो। (लोहार की) भट्टी है। उस भट्टी में मन। मानो। लोहा है और उस पर कामादिक पाँच आग्नियां जल रही हैं। (कामादिक की तपस को तेज करने के लिए) उस पर पापों के (जलते) कोयले पड़े हुए हैं। मन (इस आग में) जल रहा है। चिंता की संनी है (जो इसको पकड़ के हर तरफ से जलाने में मदद दे रही है)। 3। पर हे नानक ! अगर समर्थ गुरू मिल जाए तो वह जल के निकम्मा लोहा हो चुके मन को भी सोना बना देता है। वह आत्मिक जीवन देने वाला परमात्मा का नाम देता है जिसकी बरकति से शरीर टिक जाता है (भाव। इन्द्रियां विकारों से हट जाती हैं)। 4। 3।
मारू महला 1 ॥
बिमल मझारि बससि निरमल जल पदमनि जावल रे ॥
पदमनि जावल जल रस संगति संगि दोख नही रे ॥1॥
दादर तू कबहि न जानसि रे ॥
भखसि सिबालु बससि निरमल जल अंम्रितु न लखसि रे ॥1॥ रहाउ ॥
बसु जल नित न वसत अलीअल मेर चचा गुन रे ॥
चंद कुमुदनी दूरहु निवससि अनभउ कारनि रे ॥2॥
अंम्रित खंडु दूधि मधु संचसि तू बन चातुर रे ॥
अपना आपु तू कबहु न छोडसि पिसन प्रीति जिउ रे ॥3॥
पंडित संगि वसहि जन मूरख आगम सास सुने ॥
अपना आपु तू कबहु न छोडसि सुआन पूछि जिउ रे ॥4॥
इकि पाखंडी नामि न राचहि इक हरि हरि चरणी रे ॥
पूरबि लिखिआ पावसि नानक रसना नामु जपि रे ॥5॥4॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: मारू महला 1॥ हे मेंढक ! साफ सरोवर के साफ-सुथरे पानी में कमल-फूल और जाला बसते हैं। कमल फूल उस जाले और पानी की संगति में रहता है। पर उनकी संगति में उसको कोई दाग नहीं लगता (कमल-फूल हमेशा निर्लिप ही रहता है)। 1। हे मेंढक ! आप कभी भी समझदारी नहीं करता। आप साफ-सुथरे पानी में बसता है। पर आप उस साफ-पवित्र पानी को पहचानता नहीं (उसकी कद्र नहीं जानता। और सदा) जाला ही खाता रहता है (जो उस साफ पानी में पड़ जाता है)। 1। रहाउ। हे मेंढक ! (आपका) सदा पानी का वास है। भौरा (पानी में) नहीं बसता। (फिर भी) वह (फूल की) चोटी का रस लेता है (चूसता है)। कुमुदनी चाँद को दूर से (देख के खिल उठती है और) सिर झुका देती है। क्योंकि उसके अंदर चाँद के लिए दिल से कसक है। 2। (थन के) दूध में (परमात्मा) खण्ड और शहद (जैसी) अमृत (मिठास इकट्टी करता है)। पर जैसे (थन से चिपके हुए) चिच्चड़ की (लहू के साथ) प्रीति है (दूध से नहीं। वैसे ही) हे पानी के चतुर मेंढक ! आप (भी) अपना स्वभाव कभी नहीं छोड़ता (पानी में बसते कमल के फूल की आपको समझ नहीं। आप पानी का जाला ही खुश हैं हैं के खाता है)। 3। विद्वानों की संगति में मूर्ख लोग बसते हैं। उनसे वे वेद-शास्त्र भी सुनते हैं (पर। रहते मूर्ख ही हैं। अपनी मूर्खता का स्वभाव नहीं त्यागते)। जैसे कुत्ते की पूँछ (कभी अपना टेढ़ा-पन नहीं छोड़ती। वैसे ही हे मेंढक !) आप कभी अपना स्वभाव नहीं छोड़ता। 4। कई ऐसे पाखण्डी लोग होते हैं जो परमात्मा के नाम से प्यार नहीं डालते (सदा पाखण्ड की ओर ही रुचि रखते हैं)। कई ऐसे हैं (भाग्यशाली) जो प्रभू-चरणों में सुरति जोड़ते हैं। हे नानक ! आप परमात्मा का नाम अपनी जीभ से जपा कर। धुर से परमात्मा से मिली बख्शिश के अनुसार आपको ये दाति प्राप्ति हैं जाएगी। 5। 4।
मारू महला 1 ॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: मारू महला 1॥
सलोकु ॥
पतित पुनीत असंख होहि हरि चरनी मनु लाग ॥
अठसठि तीरथ नामु प्रभ नानक जिसु मसतकि भाग ॥1॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ बेअंत वह विकारी मनुष्य भी पवित्र हो जाते हैं जिनका मन परमात्मा के चरणों में लग जाता है। अढ़सठ तीर्थ परमात्मा का नाम ही है। पर। हे नानक ! (ये नाम उसको ही मिलता है) जिसके माथे पर (अच्छे) भाग्य हों। 1।
सबदु ॥
सखी सहेली गरबि गहेली ॥
सुणि सह की इक बात सुहेली ॥1॥
जो मै बेदन सा किसु आखा माई ॥
हरि बिनु जीउ न रहै कैसे राखा माई ॥1॥ रहाउ ॥
हउ दोहागणि खरी रंञाणी ॥
गइआ सु जोबनु धन पछुताणी ॥2॥
तू दाना साहिबु सिरि मेरा ॥
खिजमति करी जनु बंदा तेरा ॥3॥
भणति नानकु अंदेसा एही ॥
बिनु दरसन कैसे रवउ सनेही ॥4॥5॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: शब्द॥ हे अपने ही रस के गुमान में मस्त सखिए ! (हे मेरे कान ! हे मेरी जीभ !)। पति-प्रभू की ही सिफत-सालाह की ही बात सुन (और कर)। ये बात सुख देने वाली है। 1। हे (मेरी) माँ ! मैं किसे बताऊँ अपने दिल की पीड़ा। (बेगानी पीड़ा की सार कोई नहीं समझ सकता)। हे माँ ! परमात्मा (की याद) के बिना मेरी जिंद रह नहीं सकती। सिमरन के बिना मुझे और कोई तरीका सूझता नहीं जिससे मैं इसको घबराहट से बचा सकूँ। 1। रहाउ। जिस स्त्री का जब वह जोबन गुजर जाता है जो उसको पति से मिल सकता है तब वह पछताती है। (इसी तरह अगर मेरी एक सांस भी प्रभू-मिलाप के बिना गुजरे तो) मैं (अपने आप को) बुरे भाग्यों वाली (समझती हूँ)। मैं बड़ी दुखी (होती हूँ)। 2। (हे प्रभू !) आप मेरे सिर पर मालिक है। आप मेरे दिल की जानता है (मेरी तमन्ना है कि) आपकी चाकरी करता रहूँ। मैं आपका दास बना रहूँ। मैं आपका गुलाम बना रहूँ। 3। नानक कहता है- मुझे यही चिंता रहती है कि मैं कहीं परमात्मा के दर्शनों से वंचित ही ना रह जाऊँ। कोई ऐसा तरीका हो जिससे मैं उस प्यारे प्रभू से मिल सकूँ। 4। 5।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “पापों के पत्थर लाद के जिंदगी की बेड़ी इन बवण्डरों में से पार नहीं लांघ सकती।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।