अंग 1020

अंग
1020
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਦੋਜਕਿ ਪਾਏ ਸਿਰਜਣਹਾਰੈ ਲੇਖਾ ਮੰਗੈ ਬਾਣੀਆ ॥੨॥
ਸੰਗਿ ਨ ਕੋਈ ਭਈਆ ਬੇਬਾ ॥
ਮਾਲੁ ਜੋਬਨੁ ਧਨੁ ਛੋਡਿ ਵਞੇਸਾ ॥
ਕਰਣ ਕਰੀਮ ਨ ਜਾਤੋ ਕਰਤਾ ਤਿਲ ਪੀੜੇ ਜਿਉ ਘਾਣੀਆ ॥੩॥
ਖੁਸਿ ਖੁਸਿ ਲੈਦਾ ਵਸਤੁ ਪਰਾਈ ॥
ਵੇਖੈ ਸੁਣੇ ਤੇਰੈ ਨਾਲਿ ਖੁਦਾਈ ॥
ਦੁਨੀਆ ਲਬਿ ਪਇਆ ਖਾਤ ਅੰਦਰਿ ਅਗਲੀ ਗਲ ਨ ਜਾਣੀਆ ॥੪॥
ਜਮਿ ਜਮਿ ਮਰੈ ਮਰੈ ਫਿਰਿ ਜੰਮੈ ॥
ਬਹੁਤੁ ਸਜਾਇ ਪਇਆ ਦੇਸਿ ਲੰਮੈ ॥
ਜਿਨਿ ਕੀਤਾ ਤਿਸੈ ਨ ਜਾਣੀ ਅੰਧਾ ਤਾ ਦੁਖੁ ਸਹੈ ਪਰਾਣੀਆ ॥੫॥
ਖਾਲਕ ਥਾਵਹੁ ਭੁਲਾ ਮੁਠਾ ॥
ਦੁਨੀਆ ਖੇਲੁ ਬੁਰਾ ਰੁਠ ਤੁਠਾ ॥
ਸਿਦਕੁ ਸਬੂਰੀ ਸੰਤੁ ਨ ਮਿਲਿਓ ਵਤੈ ਆਪਣ ਭਾਣੀਆ ॥੬॥
ਮਉਲਾ ਖੇਲ ਕਰੇ ਸਭਿ ਆਪੇ ॥ ਇਕਿ ਕਢੇ ਇਕਿ ਲਹਰਿ ਵਿਆਪੇ ॥
ਜਿਉ ਨਚਾਏ ਤਿਉ ਤਿਉ ਨਚਨਿ ਸਿਰਿ ਸਿਰਿ ਕਿਰਤ ਵਿਹਾਣੀਆ ॥੭॥
ਮਿਹਰ ਕਰੇ ਤਾ ਖਸਮੁ ਧਿਆਈ ॥
ਸੰਤਾ ਸੰਗਤਿ ਨਰਕਿ ਨ ਪਾਈ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮ ਦਾਨੁ ਨਾਨਕ ਕਉ ਗੁਣ ਗੀਤਾ ਨਿਤ ਵਖਾਣੀਆ ॥੮॥੨॥੮॥੧੨॥੨੦॥
दोजकि पाए सिरजणहारै लेखा मंगै बाणीआ ॥२॥
संगि न कोई भईआ बेबा ॥
मालु जोबनु धनु छोडि वञेसा ॥
करण करीम न जातो करता तिल पीड़े जिउ घाणीआ ॥३॥
खुसि खुसि लैदा वसतु पराई ॥
वेखै सुणे तेरै नालि खुदाई ॥
दुनीआ लबि पइआ खात अंदरि अगली गल न जाणीआ ॥४॥
जमि जमि मरै मरै फिरि जंमै ॥
बहुतु सजाइ पइआ देसि लंमै ॥
जिनि कीता तिसै न जाणी अंधा ता दुखु सहै पराणीआ ॥५॥
खालक थावहु भुला मुठा ॥
दुनीआ खेलु बुरा रुठ तुठा ॥
सिदकु सबूरी संतु न मिलिओ वतै आपण भाणीआ ॥६॥
मउला खेल करे सभि आपे ॥ इकि कढे इकि लहरि विआपे ॥
जिउ नचाए तिउ तिउ नचनि सिरि सिरि किरत विहाणीआ ॥७॥
मिहर करे ता खसमु धिआई ॥
संता संगति नरकि न पाई ॥
अंम्रित नाम दानु नानक कउ गुण गीता नित वखाणीआ ॥८॥२॥८॥१२॥२०॥

हिन्दी अर्थ: (ये यकीन जानो कि ऐसों को) सृजनहार ने नर्क में डाल रखा है। उनसे धर्मराज (उनके किए कर्मों का) लेखा माँगता है। 2। हे भाई ! (जगत से जाने के वक्त) ना कोई भाई ना कोई बहिन। कोई भी जीव के साथ नहीं जाता। माल। धन। जवानी- हरेक जीव अवश्य ही यहाँ से छोड़ के चला जाएगा। जिन मनुष्यों ने जगत के रचयता बख्शिंद प्रभू के साथ सांझ डाली। वह (दुखों में) इस तरह पीढ़े जाते हैं जैसे तिलों की घाणी में तिल। 3। हे भाई ! तू पराया माल-धन छीन-छीन के इकट्ठा करता रहता है। तेरे साथ बसता रॅब (तेरी हरेक करतूत को) देखता है (तेरे हरेक बोल को) सुनता है। तू दुनिया (के स्वादों) के चस्के में फसा पड़ा है (मानो गहरे) गड्ढे में गिरा पड़ा है। आगे घटित होने वाली बात को समझता ही नहीं। 4। हे भाई ! जब मनुष्य (जनम-मरन के चक्कर के) लंबे रास्ते पर पड़ जाता है। ये बार-बार पैदा हो के (बार-बार) मरता है। जनम-मरण के चक्कर में पड़ जाता है। तब यह (जनम-मरण के चक्कर का) दुख सहता है। इसको बहुत सजा मिलती है। हे भाई ! जब मनुष्य (माया के मोह में) अंधा (हो के) उस परमात्मा के साथ सांझ नहीं डालता जिसने इसको पैदा किया है। 5। वह मनुष्य सृजनहार से टूटा रहता है। वह अपने आत्मिक जीवन की राशि-पूँजी लुटा बैठता है; यह जगत-तमाशा उसको बुरा (दुखी करता है)। कभी (माया के गवा बैठने पर ये) घबरा जाता है। कभी माया के मिलने पर ये खुश हो हो के बैठता है। हे भाई ! जिस मनुष्य को गुरू नहीं मिलता। वह अपने मन का मुरीद हो के भटकता फिरता है। उसके अंदर माया की तरफ से ना शांति है ना तृप्ति; 6। (पर। हे भाई ! जीवों के भी क्या वश। ) परमात्मा स्वयं ही सारे खेल कर रहा है। कई ऐसे हैं जो माया के मोह की लहरों में फंसे हुए हैं। कई ऐसे हैं जिनको उसने इन लहरों में से निकाल लिया है। हे भाई ! परमात्मा जैसे-जैसे जीवों को (माया के हाथों में) नचाता है। वैसे-वैसे जीव नाचते हैं। हरेक जीव के सिर पर (उसके पिछले जन्मों के किए कर्मों की) कमाई असर डाल रही है। 7। हे भाई ! परमात्मा स्वयं मेहर करे। तो ही मैं उस पति-प्रभू को सिमर सका हूँ। (जो मनुष्य सिमरता है) वह संत जनों की संगति में रह के नर्क में नहीं पड़ता। हे प्रभू ! नानक को आत्मिक जीवन देने वाला अपना नाम-दान दे। (ता कि मैं नानक) तेरी सिफत-सालाह के गीत सदा गाता रहूँ। 8। 2। 8। 12। 20।
ਮਾਰੂ ਸੋਲਹੇ ਮਹਲਾ ੧
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਸਾਚਾ ਸਚੁ ਸੋਈ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਈ ॥
ਜਿਨਿ ਸਿਰਜੀ ਤਿਨ ਹੀ ਫੁਨਿ ਗੋਈ ॥
ਜਿਉ ਭਾਵੈ ਤਿਉ ਰਾਖਹੁ ਰਹਣਾ ਤੁਮ ਸਿਉ ਕਿਆ ਮੁਕਰਾਈ ਹੇ ॥੧॥
ਆਪਿ ਉਪਾਏ ਆਪਿ ਖਪਾਏ ॥
ਆਪੇ ਸਿਰਿ ਸਿਰਿ ਧੰਧੈ ਲਾਏ ॥
ਆਪੇ ਵੀਚਾਰੀ ਗੁਣਕਾਰੀ ਆਪੇ ਮਾਰਗਿ ਲਾਈ ਹੇ ॥੨॥
ਆਪੇ ਦਾਨਾ ਆਪੇ ਬੀਨਾ ॥
ਆਪੇ ਆਪੁ ਉਪਾਇ ਪਤੀਨਾ ॥
ਆਪੇ ਪਉਣੁ ਪਾਣੀ ਬੈਸੰਤਰੁ ਆਪੇ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਈ ਹੇ ॥੩॥
ਆਪੇ ਸਸਿ ਸੂਰਾ ਪੂਰੋ ਪੂਰਾ ॥
ਆਪੇ ਗਿਆਨਿ ਧਿਆਨਿ ਗੁਰੁ ਸੂਰਾ ॥
ਕਾਲੁ ਜਾਲੁ ਜਮੁ ਜੋਹਿ ਨ ਸਾਕੈ ਸਾਚੇ ਸਿਉ ਲਿਵ ਲਾਈ ਹੇ ॥੪॥
ਆਪੇ ਪੁਰਖੁ ਆਪੇ ਹੀ ਨਾਰੀ ॥
ਆਪੇ ਪਾਸਾ ਆਪੇ ਸਾਰੀ ॥
ਆਪੇ ਪਿੜ ਬਾਧੀ ਜਗੁ ਖੇਲੈ ਆਪੇ ਕੀਮਤਿ ਪਾਈ ਹੇ ॥੫॥
ਆਪੇ ਭਵਰੁ ਫੁਲੁ ਫਲੁ ਤਰਵਰੁ ॥
ਆਪੇ ਜਲੁ ਥਲੁ ਸਾਗਰੁ ਸਰਵਰੁ ॥
ਆਪੇ ਮਛੁ ਕਛੁ ਕਰਣੀਕਰੁ ਤੇਰਾ ਰੂਪੁ ਨ ਲਖਣਾ ਜਾਈ ਹੇ ॥੬॥
ਆਪੇ ਦਿਨਸੁ ਆਪੇ ਹੀ ਰੈਣੀ ॥
ਆਪਿ ਪਤੀਜੈ ਗੁਰ ਕੀ ਬੈਣੀ ॥
ਆਦਿ ਜੁਗਾਦਿ ਅਨਾਹਦਿ ਅਨਦਿਨੁ ਘਟਿ ਘਟਿ ਸਬਦੁ ਰਜਾਈ ਹੇ ॥੭॥
ਆਪੇ ਰਤਨੁ ਅਨੂਪੁ ਅਮੋਲੋ ॥
ਆਪੇ ਪਰਖੇ ਪੂਰਾ ਤੋਲੋ ॥
मारू सोलहे महला १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
साचा सचु सोई अवरु न कोई ॥
जिनि सिरजी तिन ही फुनि गोई ॥
जिउ भावै तिउ राखहु रहणा तुम सिउ किआ मुकराई हे ॥१॥
आपि उपाए आपि खपाए ॥
आपे सिरि सिरि धंधै लाए ॥
आपे वीचारी गुणकारी आपे मारगि लाई हे ॥२॥
आपे दाना आपे बीना ॥
आपे आपु उपाइ पतीना ॥
आपे पउणु पाणी बैसंतरु आपे मेलि मिलाई हे ॥३॥
आपे ससि सूरा पूरो पूरा ॥
आपे गिआनि धिआनि गुरु सूरा ॥
कालु जालु जमु जोहि न साकै साचे सिउ लिव लाई हे ॥४॥
आपे पुरखु आपे ही नारी ॥
आपे पासा आपे सारी ॥
आपे पिड़ बाधी जगु खेलै आपे कीमति पाई हे ॥५॥
आपे भवरु फुलु फलु तरवरु ॥
आपे जलु थलु सागरु सरवरु ॥
आपे मछु कछु करणीकरु तेरा रूपु न लखणा जाई हे ॥६॥
आपे दिनसु आपे ही रैणी ॥
आपि पतीजै गुर की बैणी ॥
आदि जुगादि अनाहदि अनदिनु घटि घटि सबदु रजाई हे ॥७॥
आपे रतनु अनूपु अमोलो ॥
आपे परखे पूरा तोलो ॥

हिन्दी अर्थ: मारू सोलहे महला १ ੴ सतिगुर प्रसादि॥ वह परमात्मा ही सदा स्थिर रहने वाला है। सदा अटल रहने वाला है। कोई और उस जैसा नहीं। जिस (प्रभू) ने (ये रचना) रची है उसने ही दोबारा नाश किया है (वही इसको नाश करने वाला है)। हे प्रभू ! जैसे तुझे अच्छा लगता है वैसे ही तू हम जीवों को रखता है। वैसे ही हम रह सकते हैं। हम जीव तेरे (हुकम) के आगे कोई ना-नुक्कर नहीं कर सकते। 1। परमात्मा स्वयं ही (जीवों को) पैदा करता है स्वयं ही मारता है। स्वयं ही हरेक जीव को उसके किए कर्मों के संस्कारों के अनुसार दुनियां के धंधों में लगाता है। प्रभू स्वयं ही जीवों के कर्मों को विचारने वाला है। स्वयं ही (जीवों के अंदर) गुण पैदा करने वाला है। खुद ही (जीवों को) सही जीवन-रास्ते पर लाता है। 2। परमात्मा स्वयं ही सब जीवों के दिल की जानने वाला है। स्वयं ही जीवों के किए कर्मों को देखने वाला है। प्रभू स्वयं ही अपने आप को (सृष्टि के रूप में) प्रकट करके (स्वयं ही इसको देख-देख के) खुश हो रहा है। परमात्मा खुद ही (अपने आप से) हवा-पानी-आग (आदि तत्व पैदा करने वाला) है। प्रभू ने स्वयं ही (इन तत्वों को) इकट्ठा करके जगत-रचना की है। 3। हर जगह रौशनी देने वाला परमात्मा स्वयं ही सूर्य है स्वयं ही चँद्रमा है। प्रभू खुद ही ज्ञान का मालिक और सुरति का मालिक सूरमा गुरू है। जिस भी जीव ने उस सदा-स्थिर प्रभू से पे्रम-लगन लगाई है जमराज उसकी ओर देख भी नहीं सकता। 4। (हरेक) मर्द भी प्रभू स्वयं ही है और (हरेक) स्त्री भी स्वयं ही है। प्रभू खुद ही (ये जगत रूप) चौपड़ (की खेल) है और खुद ही (चौपड़ की जीव-) नर्दें है। परमात्मा ने स्वयं ही ये जगत (चौपड़ की खेल-रूप) मैदान को तैयार किया है। स्वयं ही इस खेल को परख रहा है। 5। तू स्वयं ही भौरा है। स्वयं ही फूल है। तू खुद ही फल है। और खुद ही वृक्ष है। तू स्वयं ही पानी है। स्वयं ही सूखी हुई धरती है। तू स्वयं ही समुंद्र है स्वयं ही तालाब है। तू स्वयं ही मछली है तू स्वयं ही कछूआ है।(हे प्रभू !) तेरा सही स्वरूप क्या है। – ये बयान नहीं किया जा सकता। तू स्वयं ही (अपने आप से) सारी रचना रचने वाला है। 6। परमात्मा खुद ही दिन है खुद ही रात है। वह खुद ही गुरू के वचनों के द्वारा खुश हो रहा है। सारे जगत का मूल है। जुगों से भी आदि से है। उसका ना कभी नाश हो सकता है। हर वक्त हरेक शरीर में उसी रजा के मालिक की जीवन-रौंअ रुमक रही है। 7। प्रभू स्वयं ही एक ऐसा रतन है जिस जैसा और कोई नहीं और जिसका मूल्य नहीं डाला जा सकता। प्रभू स्वयं ही उस रत्न को परखता है। और ठीक तरह तौलता है।

संदर्भ: यह अंग 1020 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।

गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।

Faridabad-Delhi border के पास सर्दियों की धुंध में सुबह का सूरज।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 43 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1020” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 1021 →, पीछे का: ← अंग 1019

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।