अंग 1078

अंग
1078
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਜਿਸੁ ਨਾਮੈ ਕਉ ਤਰਸਹਿ ਬਹੁ ਦੇਵਾ ॥
ਸਗਲ ਭਗਤ ਜਾ ਕੀ ਕਰਦੇ ਸੇਵਾ ॥
ਅਨਾਥਾ ਨਾਥੁ ਦੀਨ ਦੁਖ ਭੰਜਨੁ ਸੋ ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਤੇ ਪਾਇਣਾ ॥੩॥
ਹੋਰੁ ਦੁਆਰਾ ਕੋਇ ਨ ਸੂਝੈ ॥
ਤ੍ਰਿਭਵਣ ਧਾਵੈ ਤਾ ਕਿਛੂ ਨ ਬੂਝੈ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸਾਹੁ ਭੰਡਾਰੁ ਨਾਮ ਜਿਸੁ ਇਹੁ ਰਤਨੁ ਤਿਸੈ ਤੇ ਪਾਇਣਾ ॥੪॥
ਜਾ ਕੀ ਧੂਰਿ ਕਰੇ ਪੁਨੀਤਾ ॥
ਸੁਰਿ ਨਰ ਦੇਵ ਨ ਪਾਵਹਿ ਮੀਤਾ ॥
ਸਤਿ ਪੁਰਖੁ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪਰਮੇਸਰੁ ਜਿਸੁ ਭੇਟਤ ਪਾਰਿ ਪਰਾਇਣਾ ॥੫॥
ਪਾਰਜਾਤੁ ਲੋੜਹਿ ਮਨ ਪਿਆਰੇ ॥
ਕਾਮਧੇਨੁ ਸੋਹੀ ਦਰਬਾਰੇ ॥
ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਸੰਤੋਖੁ ਸੇਵਾ ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਨਾਮੁ ਕਮਾਇ ਰਸਾਇਣਾ ॥੬॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਮਰਹਿ ਪੰਚ ਧਾਤੂ ॥
ਭੈ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਹੋਵਹਿ ਨਿਰਮਲਾ ਤੂ ॥
ਪਾਰਸੁ ਜਬ ਭੇਟੈ ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਤਾ ਪਾਰਸੁ ਪਰਸਿ ਦਿਖਾਇਣਾ ॥੭॥
ਕਈ ਬੈਕੁੰਠ ਨਾਹੀ ਲਵੈ ਲਾਗੇ ॥
ਮੁਕਤਿ ਬਪੁੜੀ ਭੀ ਗਿਆਨੀ ਤਿਆਗੇ ॥
ਏਕੰਕਾਰੁ ਸਤਿਗੁਰ ਤੇ ਪਾਈਐ ਹਉ ਬਲਿ ਬਲਿ ਗੁਰ ਦਰਸਾਇਣਾ ॥੮॥
ਗੁਰ ਕੀ ਸੇਵ ਨ ਜਾਣੈ ਕੋਈ ॥
ਗੁਰੁ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਅਗੋਚਰੁ ਸੋਈ ॥
ਜਿਸ ਨੋ ਲਾਇ ਲਏ ਸੋ ਸੇਵਕੁ ਜਿਸੁ ਵਡਭਾਗ ਮਥਾਇਣਾ ॥੯॥
ਗੁਰ ਕੀ ਮਹਿਮਾ ਬੇਦ ਨ ਜਾਣਹਿ ॥
ਤੁਛ ਮਾਤ ਸੁਣਿ ਸੁਣਿ ਵਖਾਣਹਿ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਅਪਰੰਪਰ ਸਤਿਗੁਰ ਜਿਸੁ ਸਿਮਰਤ ਮਨੁ ਸੀਤਲਾਇਣਾ ॥੧੦॥
ਜਾ ਕੀ ਸੋਇ ਸੁਣੀ ਮਨੁ ਜੀਵੈ ॥
ਰਿਦੈ ਵਸੈ ਤਾ ਠੰਢਾ ਥੀਵੈ ॥
ਗੁਰੁ ਮੁਖਹੁ ਅਲਾਏ ਤਾ ਸੋਭਾ ਪਾਏ ਤਿਸੁ ਜਮ ਕੈ ਪੰਥਿ ਨ ਪਾਇਣਾ ॥੧੧॥
ਸੰਤਨ ਕੀ ਸਰਣਾਈ ਪੜਿਆ ॥
ਜੀਉ ਪ੍ਰਾਣ ਧਨੁ ਆਗੈ ਧਰਿਆ ॥
ਸੇਵਾ ਸੁਰਤਿ ਨ ਜਾਣਾ ਕਾਈ ਤੁਮ ਕਰਹੁ ਦਇਆ ਕਿਰਮਾਇਣਾ ॥੧੨॥
ਨਿਰਗੁਣ ਕਉ ਸੰਗਿ ਲੇਹੁ ਰਲਾਏ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਮੋਹਿ ਟਹਲੈ ਲਾਏ ॥
ਪਖਾ ਫੇਰਉ ਪੀਸਉ ਸੰਤ ਆਗੈ ਚਰਣ ਧੋਇ ਸੁਖੁ ਪਾਇਣਾ ॥੧੩॥
ਬਹੁਤੁ ਦੁਆਰੇ ਭ੍ਰਮਿ ਭ੍ਰਮਿ ਆਇਆ ॥
ਤੁਮਰੀ ਕ੍ਰਿਪਾ ਤੇ ਤੁਮ ਸਰਣਾਇਆ ॥
ਸਦਾ ਸਦਾ ਸੰਤਹ ਸੰਗਿ ਰਾਖਹੁ ਏਹੁ ਨਾਮ ਦਾਨੁ ਦੇਵਾਇਣਾ ॥੧੪॥
ਭਏ ਕ੍ਰਿਪਾਲ ਗੁਸਾਈ ਮੇਰੇ ॥
ਦਰਸਨੁ ਪਾਇਆ ਸਤਿਗੁਰ ਪੂਰੇ ॥
ਸੂਖ ਸਹਜ ਸਦਾ ਆਨੰਦਾ ਨਾਨਕ ਦਾਸ ਦਸਾਇਣਾ ॥੧੫॥੨॥੭॥
जिसु नामै कउ तरसहि बहु देवा ॥
सगल भगत जा की करदे सेवा ॥
अनाथा नाथु दीन दुख भंजनु सो गुर पूरे ते पाइणा ॥३॥
होरु दुआरा कोइ न सूझै ॥
त्रिभवण धावै ता किछू न बूझै ॥
सतिगुरु साहु भंडारु नाम जिसु इहु रतनु तिसै ते पाइणा ॥४॥
जा की धूरि करे पुनीता ॥
सुरि नर देव न पावहि मीता ॥
सति पुरखु सतिगुरु परमेसरु जिसु भेटत पारि पराइणा ॥५॥
पारजातु लोड़हि मन पिआरे ॥
कामधेनु सोही दरबारे ॥
त्रिपति संतोखु सेवा गुर पूरे नामु कमाइ रसाइणा ॥६॥
गुर कै सबदि मरहि पंच धातू ॥
भै पारब्रहम होवहि निरमला तू ॥
पारसु जब भेटै गुरु पूरा ता पारसु परसि दिखाइणा ॥७॥
कई बैकुंठ नाही लवै लागे ॥
मुकति बपुड़ी भी गिआनी तिआगे ॥
एकंकारु सतिगुर ते पाईऐ हउ बलि बलि गुर दरसाइणा ॥८॥
गुर की सेव न जाणै कोई ॥
गुरु पारब्रहमु अगोचरु सोई ॥
जिस नो लाइ लए सो सेवकु जिसु वडभाग मथाइणा ॥९॥
गुर की महिमा बेद न जाणहि ॥
तुछ मात सुणि सुणि वखाणहि ॥
पारब्रहम अपरंपर सतिगुर जिसु सिमरत मनु सीतलाइणा ॥१०॥
जा की सोइ सुणी मनु जीवै ॥
रिदै वसै ता ठंढा थीवै ॥
गुरु मुखहु अलाए ता सोभा पाए तिसु जम कै पंथि न पाइणा ॥११॥
संतन की सरणाई पड़िआ ॥
जीउ प्राण धनु आगै धरिआ ॥
सेवा सुरति न जाणा काई तुम करहु दइआ किरमाइणा ॥१२॥
निरगुण कउ संगि लेहु रलाए ॥
करि किरपा मोहि टहलै लाए ॥
पखा फेरउ पीसउ संत आगै चरण धोइ सुखु पाइणा ॥१३॥
बहुतु दुआरे भ्रमि भ्रमि आइआ ॥
तुमरी क्रिपा ते तुम सरणाइआ ॥
सदा सदा संतह संगि राखहु एहु नाम दानु देवाइणा ॥१४॥
भए क्रिपाल गुसाई मेरे ॥
दरसनु पाइआ सतिगुर पूरे ॥
सूख सहज सदा आनंदा नानक दास दसाइणा ॥१५॥२॥७॥

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! जिस परमात्मा के नाम को अनेकों देवते तरसते हैं। सारे ही भगत जिस प्रभू की सेवा-भक्ति करते हैं। जो परमात्मा निखस्मों का खसम हैं। जो परमात्मा गरीबों के दुख नाश करने वाला है। वह परमात्मा पूरे गुरू से मिलता है। 3। हे भाई ! और कोई दर (ऐसा) नहीं सूझता (जहाँ से रतन-नाम मिल सके)। यदि मनुष्य तीनों भवनों में दौड़-भाग करता फिरे तो भी उसको नाम-रतन की कोई सूझ नहीं पड़ सकती। एक गुरू ही ऐसा शाह है जिसके पास नाम का खजाना है। उस गुरू से नाम-रतन मिल सकता है। 4। हे भाई ! जिस (प्रभू) की चरण-धूल पवित्र कर देती है। हे मित्र ! उसको देवते मनुष्य प्राप्त नहीं कर सकते। सिर्फ हरी-रूप गुरू पुरख ही है जिसको मिलने से (संसार-समुंद्र से) पार लांघा जा सकता है। 5। हे प्यारे मन ! अगर तू (स्वर्ग का) पारजात (वृक्ष) हासिल करना चाहता है। यदि तू चाहता है कि कामधेनु तेरे दरवाजे पर शोभायमान हो। तो पूरे गुरू की शरण पड़ा रह। गुरू से पूर्ण संतोख प्राप्त कर। (गुरू के बताए हुए रास्ते पर चल के) नाम-सिमरन की कमाई कर। हरी-नाम ही सारे रसों का श्रोत है। 6। हे प्यारे मन ! गुरू के शबद की बरकति सेकामादिक पाँचों विषौ मर जाते हैं। (गुरू के शबद से) परमात्मा के भय-अदब में रह के तू पवित्र हो जाएगा। (हे मन ! गुरू ही) पारस है। जब पूरा गुरू पारस मिल जाता है। तो उस पारस को छूने से (परमात्मा हर जगह) दिखाई दे जाता है। 7। हे भाई ! अनेकों बैकुंठ (गुरू के दर्शनों की) बराबरी नहीं कर सकते। जो मनुष्य (गुरू के द्वारा) परमात्मा के साथ सांझ डालता है। वह मुक्ति को भी एक तुच्छ सी वस्तु समझ के (इसकी लालसा) त्याग देता है। हे भाई ! गुरू के माध्यम से परमात्मा के साथ मिलाप होता है। मैं तो गुरू के दर्शनों से सदा सदके हूँ सदा बलिहार हॅँ। 8। हे भाई ! गुरू की शरण (पड़ने का क्या महातम है। – ये भेद निरे दिमागी तौर पर) कोई मनुष्य नहीं समझ सकता (शरण पड़ के ही समझ पड़ती है)। गुरू (आत्मिक जीवन में) वही परमात्मा में जो ज्ञानेन्द्रियों की पहुँच से परे है। जिस मनुष्य के माथे के भाग्य जाग उठें। जिसको (परमात्मा खुद गुरू के चरणों से) लगाता है वह गुरू का सेवक बनता है। 9। हे भाई ! गुरू की उच्चात्मिकता वेद (भी) नहीं जानते। वे (औरों से) सुन-सुन के रक्ती-मात्र ही बयान कर सके हैं। हे भाई ! गुरू (उच्च आत्मिकता में) वह परमात्मा ही है जो परे से परे हैं और जिसका नाम सिमरने से मन शीतल हो जाता है। 10। हे भाई ! जिस (गुरू) की शोभा सुन के मन आत्मिक जीवन प्राप्त करता है। अगर गुरू (मनुष्य के) हृदय में आ बसे। तो हृदय शांत हो जाता है। अगर मनुष्य गुरू के रास्ते पर चल के हरी-नाम सिमरे। तो मनुष्य (लोक-परलोक में) शोभा कमाता है। गुरू उस मनुष्य को जमराज के रास्ते पर नहीं पड़ने देता। 11। हे प्रभू ! मैं भी तेरे संत जनों की शरण पड़ा हूँ। मैंने अपनी जिंद। अपने प्राण। अपना धन संत जनों के आगे ला रखा है। मैं सेवा-भगती करने की कोई सूझ नहीं जानता। मुझ निमाणे पर तू स्वयं ही किरपा कर। 12। हे प्रभू ! मुझ गुण-हीन को गुरू की संगति में मिलाए रख। मुझे गुरू की सेवा अहल में जोड़े रख। मैं गुरू के दर पर पंखा फेरता रहूँ। (चक्की) पीसता रहूँ। और गुरू के चरण धो के आनंद लेता रहूं। 13। हे प्रभू ! मैं दरवाजों पर भटक-भटक के आया हूँ। तेरी ही कृपा से (अब) तेरी शरण आया हूँ। मुझे सदा ही अपने संत जनों की संगति में रख। और उनसे अपने नाम की खैर डलवा। 14। हे नानक ! (कह- हे भाई !) जब (अब) मेरा मालिक प्रभू दयावान हुआ। तो मुझे पूरे गुरू के दर्शन हुए। अब मेरे अंदर सदा आत्मिक अडोलता और सुख-आनंद बने रहते हैं। मैं उसके दासों का दास बना रहता हूँ। 15। 2। 7।
ਮਾਰੂ ਸੋਲਹੇ ਮਹਲਾ ੫
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਸਿਮਰੈ ਧਰਤੀ ਅਰੁ ਆਕਾਸਾ ॥
ਸਿਮਰਹਿ ਚੰਦ ਸੂਰਜ ਗੁਣਤਾਸਾ ॥
ਪਉਣ ਪਾਣੀ ਬੈਸੰਤਰ ਸਿਮਰਹਿ ਸਿਮਰੈ ਸਗਲ ਉਪਾਰਜਨਾ ॥੧॥
मारू सोलहे महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सिमरै धरती अरु आकासा ॥
सिमरहि चंद सूरज गुणतासा ॥
पउण पाणी बैसंतर सिमरहि सिमरै सगल उपारजना ॥१॥

हिन्दी अर्थ: मारू सोलहे महला ५ ੴ सतिगुर प्रसादि॥ हे भाई ! धरती परमात्मा की रजा में चल रही है आकाश उसकी रजा में है। चाँद और सूरज उस गुणों के खजाने प्रभू की रजा में चल रहे हैं। हवा पानी आग (आदिक तत्व) प्रभू की रजा में काम करि रहे हैं। सारी सृष्टि उसकी रजा में काम कर रही है। 1।

संदर्भ: यह अंग 1078 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

Sangam Vihar में सुबह 4 बजे जब रसोई शुरू होती है।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 44 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1078” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 1079 →, पीछे का: ← अंग 1077

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।