अंग 1064

अंग
1064
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਜਿਸੁ ਭਾਣਾ ਭਾਵੈ ਸੋ ਤੁਝਹਿ ਸਮਾਏ ॥
ਭਾਣੇ ਵਿਚਿ ਵਡੀ ਵਡਿਆਈ ਭਾਣਾ ਕਿਸਹਿ ਕਰਾਇਦਾ ॥੩॥
ਜਾ ਤਿਸੁ ਭਾਵੈ ਤਾ ਗੁਰੂ ਮਿਲਾਏ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਪਦਾਰਥੁ ਪਾਏ ॥
ਤੁਧੁ ਆਪਣੈ ਭਾਣੈ ਸਭ ਸ੍ਰਿਸਟਿ ਉਪਾਈ ਜਿਸ ਨੋ ਭਾਣਾ ਦੇਹਿ ਤਿਸੁ ਭਾਇਦਾ ॥੪॥
ਮਨਮੁਖੁ ਅੰਧੁ ਕਰੇ ਚਤੁਰਾਈ ॥
ਭਾਣਾ ਨ ਮੰਨੇ ਬਹੁਤੁ ਦੁਖੁ ਪਾਈ ॥
ਭਰਮੇ ਭੂਲਾ ਆਵੈ ਜਾਏ ਘਰੁ ਮਹਲੁ ਨ ਕਬਹੂ ਪਾਇਦਾ ॥੫॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਮੇਲੇ ਦੇ ਵਡਿਆਈ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਕੀ ਸੇਵਾ ਧੁਰਿ ਫੁਰਮਾਈ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਸੇਵੇ ਤਾ ਨਾਮੁ ਪਾਏ ਨਾਮੇ ਹੀ ਸੁਖੁ ਪਾਇਦਾ ॥੬॥
ਸਭ ਨਾਵਹੁ ਉਪਜੈ ਨਾਵਹੁ ਛੀਜੈ ॥
ਗੁਰ ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਮਨੁ ਤਨੁ ਭੀਜੈ ॥
ਰਸਨਾ ਨਾਮੁ ਧਿਆਏ ਰਸਿ ਭੀਜੈ ਰਸ ਹੀ ਤੇ ਰਸੁ ਪਾਇਦਾ ॥੭॥
ਮਹਲੈ ਅੰਦਰਿ ਮਹਲੁ ਕੋ ਪਾਏ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਸਚਿ ਚਿਤੁ ਲਾਏ ॥
ਜਿਸ ਨੋ ਸਚੁ ਦੇਇ ਸੋਈ ਸਚੁ ਪਾਏ ਸਚੇ ਸਚਿ ਮਿਲਾਇਦਾ ॥੮॥
ਨਾਮੁ ਵਿਸਾਰਿ ਮਨਿ ਤਨਿ ਦੁਖੁ ਪਾਇਆ ॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਸਭੁ ਰੋਗੁ ਕਮਾਇਆ ॥
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਮਨੁ ਤਨੁ ਹੈ ਕੁਸਟੀ ਨਰਕੇ ਵਾਸਾ ਪਾਇਦਾ ॥੯॥
ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਤਿਨ ਨਿਰਮਲ ਦੇਹਾ ॥
ਨਿਰਮਲ ਹੰਸਾ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਨੇਹਾ ॥
ਨਾਮੁ ਸਲਾਹਿ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਨਿਜ ਘਰਿ ਵਾਸਾ ਪਾਇਦਾ ॥੧੦॥
ਸਭੁ ਕੋ ਵਣਜੁ ਕਰੇ ਵਾਪਾਰਾ ॥
ਵਿਣੁ ਨਾਵੈ ਸਭੁ ਤੋਟਾ ਸੰਸਾਰਾ ॥
ਨਾਗੋ ਆਇਆ ਨਾਗੋ ਜਾਸੀ ਵਿਣੁ ਨਾਵੈ ਦੁਖੁ ਪਾਇਦਾ ॥੧੧॥
ਜਿਸ ਨੋ ਨਾਮੁ ਦੇਇ ਸੋ ਪਾਏ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਹਰਿ ਮੰਨਿ ਵਸਾਏ ॥
ਗੁਰ ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਨਾਮੁ ਵਸਿਆ ਘਟ ਅੰਤਰਿ ਨਾਮੋ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਦਾ ॥੧੨॥
ਨਾਵੈ ਨੋ ਲੋਚੈ ਜੇਤੀ ਸਭ ਆਈ ॥
ਨਾਉ ਤਿਨਾ ਮਿਲੈ ਧੁਰਿ ਪੁਰਬਿ ਕਮਾਈ ॥
ਜਿਨੀ ਨਾਉ ਪਾਇਆ ਸੇ ਵਡਭਾਗੀ ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਮਿਲਾਇਦਾ ॥੧੩॥
ਕਾਇਆ ਕੋਟੁ ਅਤਿ ਅਪਾਰਾ ॥
ਤਿਸੁ ਵਿਚਿ ਬਹਿ ਪ੍ਰਭੁ ਕਰੇ ਵੀਚਾਰਾ ॥
ਸਚਾ ਨਿਆਉ ਸਚੋ ਵਾਪਾਰਾ ਨਿਹਚਲੁ ਵਾਸਾ ਪਾਇਦਾ ॥੧੪॥
ਅੰਤਰ ਘਰ ਬੰਕੇ ਥਾਨੁ ਸੁਹਾਇਆ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਵਿਰਲੈ ਕਿਨੈ ਥਾਨੁ ਪਾਇਆ ॥
ਇਤੁ ਸਾਥਿ ਨਿਬਹੈ ਸਾਲਾਹੇ ਸਚੇ ਹਰਿ ਸਚਾ ਮੰਨਿ ਵਸਾਇਦਾ ॥੧੫॥
ਮੇਰੈ ਕਰਤੈ ਇਕ ਬਣਤ ਬਣਾਈ ॥
ਇਸੁ ਦੇਹੀ ਵਿਚਿ ਸਭ ਵਥੁ ਪਾਈ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਵਣਜਹਿ ਰੰਗਿ ਰਾਤੇ ਗੁਰਮੁਖਿ ਕੋ ਨਾਮੁ ਪਾਇਦਾ ॥੧੬॥੬॥੨੦॥
जिसु भाणा भावै सो तुझहि समाए ॥
भाणे विचि वडी वडिआई भाणा किसहि कराइदा ॥३॥
जा तिसु भावै ता गुरू मिलाए ॥
गुरमुखि नामु पदारथु पाए ॥
तुधु आपणै भाणै सभ स्रिसटि उपाई जिस नो भाणा देहि तिसु भाइदा ॥४॥
मनमुखु अंधु करे चतुराई ॥
भाणा न मंने बहुतु दुखु पाई ॥
भरमे भूला आवै जाए घरु महलु न कबहू पाइदा ॥५॥
सतिगुरु मेले दे वडिआई ॥
सतिगुर की सेवा धुरि फुरमाई ॥
सतिगुर सेवे ता नामु पाए नामे ही सुखु पाइदा ॥६॥
सभ नावहु उपजै नावहु छीजै ॥
गुर किरपा ते मनु तनु भीजै ॥
रसना नामु धिआए रसि भीजै रस ही ते रसु पाइदा ॥७॥
महलै अंदरि महलु को पाए ॥
गुर कै सबदि सचि चितु लाए ॥
जिस नो सचु देइ सोई सचु पाए सचे सचि मिलाइदा ॥८॥
नामु विसारि मनि तनि दुखु पाइआ ॥
माइआ मोहु सभु रोगु कमाइआ ॥
बिनु नावै मनु तनु है कुसटी नरके वासा पाइदा ॥९॥
नामि रते तिन निरमल देहा ॥
निरमल हंसा सदा सुखु नेहा ॥
नामु सलाहि सदा सुखु पाइआ निज घरि वासा पाइदा ॥१०॥
सभु को वणजु करे वापारा ॥
विणु नावै सभु तोटा संसारा ॥
नागो आइआ नागो जासी विणु नावै दुखु पाइदा ॥११॥
जिस नो नामु देइ सो पाए ॥
गुर कै सबदि हरि मंनि वसाए ॥
गुर किरपा ते नामु वसिआ घट अंतरि नामो नामु धिआइदा ॥१२॥
नावै नो लोचै जेती सभ आई ॥
नाउ तिना मिलै धुरि पुरबि कमाई ॥
जिनी नाउ पाइआ से वडभागी गुर कै सबदि मिलाइदा ॥१३॥
काइआ कोटु अति अपारा ॥
तिसु विचि बहि प्रभु करे वीचारा ॥
सचा निआउ सचो वापारा निहचलु वासा पाइदा ॥१४॥
अंतर घर बंके थानु सुहाइआ ॥
गुरमुखि विरलै किनै थानु पाइआ ॥
इतु साथि निबहै सालाहे सचे हरि सचा मंनि वसाइदा ॥१५॥
मेरै करतै इक बणत बणाई ॥
इसु देही विचि सभ वथु पाई ॥
नानक नामु वणजहि रंगि राते गुरमुखि को नामु पाइदा ॥१६॥६॥२०॥

हिन्दी अर्थ: जिस मनुष्य को तेरा भाणा भा जाता है। वह तेरे (चरणों) में लीन हो जाता है। हे भाई ! परमात्मा की रजा में रहने से बड़ी इज्जत मिलती है। पर किसी विरले को रजा में चलाता है। 3। हे भाई ! जब उस परमात्मा को अच्छा लगता है। तब वह (किसी भाग्यशाली को) गुरू से मिलाता है। और। गुरू के सन्मुख होने से मनुष्य परमात्मा का श्रेष्ठ नाम प्राप्त कर लेता है। हे भाई ! ये सारी सृष्टि तूने अपनी रजा में पैदा की है। जिस मनुष्य को तू अपनी रज़ा मानने की ताकत देता है। उसको तेरी रजा प्यारी लगती है। 4। हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाला और माया के मोह में अंधा हो चुका मनुष्य (अपनी ओर से बहुत सारी) समझदारियाँ करता है। (पर जब तक वह परमात्मा के) किए को मीठा करके नहीं मानता (तब तक वह) बहुत दुख पाता है। मन का मुरीद मनुष्य भटकना के कारण गलत रास्ते पर पड़ा हुआ जनम-मरण के चक्कर में पड़ जाता है। वह कभी भी (इस तरह) परमात्मा के चरणों में जगह नहीं पा सकता। 5। हे भाई ! (जिस मनुष्य को परमात्मा) गुरू मिलवाता है। (उसको लोक-परलोक की) इज्जत बख्शता है। गुरू की बताई हुई कार करने का हुकम धुर से ही प्रभू ने दिया हुआ है। जब मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है तब वह परमात्मा का नाम प्राप्त कर लेता है। और। नाम में जुड़ के ही आत्मिक आनंद पाता है। 6। हे भाई ! नाम (सिमरन) से हरेक (गुण मनुष्य के अंदर) पैदा हो जाता है। नाम (सिमरन) से (हरेक अवगुण मनुष्य के अंदर से) नाश हो जाता है। हे भाई ! गुरू की कृपा से (ही मनुष्य का) मन (मनुष्य का) तन (नाम-रस में) भीगता है। (जब मनुष्य अपनी) जीभ से हरी-नाम सिमरता है। वह आनंद में भीग जाता है। उस आनंद से ही मनुष्य और आत्मिक आनंद प्राप्त करता है। 7। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के शबद द्वारा (अपने) शरीर में परमात्मा का ठिकाना पा लेता है। वह सदा-स्थिर हरी-नाम में चिक्त जोड़े रखता है। पर। हे भाई ! जिस मनुष्य को सदा-स्थिर प्रभू अपना सदा-स्थिर हरी-नाम देता है। वही यह हरी-नाम हासिल करता है। और वह हर वक्त इस सदा-स्थिर हरी-नाम में एक-मेक हुआ रहता है। 8। परमात्मा का नाम भुला के उसने अपने मन में तन में दुख ही पाया है। हे भाई ! (जिस मनुष्य के मन में हर वक्त) माया का मोह (प्रबल है; उस ने) निरा (आत्मिक) रोग कमाया है। प्रभू के नाम के बिना (मनुष्य का) मन भी रोगी। तन (भाव। ज्ञानेन्द्रियां) भी रोगी (विकारी)। वह नर्क में ही पड़ा रहता है। 9। हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा के नाम-रंग में रंगे जाते हैं। उनके शरीर विकारों से बचे रहते हैं। उनकी आत्मा पवित्र रहती है। वे (प्रभू चरणों से) प्यार (जोड़ के) सदा आत्मिक आनंद भोगते हैं। हे भाई ! परमात्मा के नाम की सिफत-सालाह करके मनुष्य सदा सुख पाता है। प्रभू-चरणों में उसका निवास बना रहता है। 10। हे भाई ! (जगत में आ के) हरेक जीव वाणज्य-व्यापार (आदि कोई ना कोई कार-व्यवहार) करता है। पर प्रभू के नाम से वंचित रह के जगत में निरा घाटा (ही घाटा) है। (क्योंकि जगत में जीव) नंगा ही आता है (और यहाँ से) नंगा ही चला जाएगा (दुनिया वाली कमाई यहीं रह जाएगी)। प्रभू के नाम से टूटा हुआ दुख ही सहता है। 11। हे भाई ! जिस मनुष्य को परमात्मा अपना नाम देता है वह (ही यह दाति) हासिल करता है। वह मनुष्य गुरू के शबद से हरी-नाम को अपने मन में बसा लेता है। गुरू की किरपा से उसके हृदय में परमात्मा का नाम बसता है वह हर वक्त हरी-नाम ही सिमरता रहता है। 12। हे भाई ! जितनी भी लुकाई (जगत में) पैदा होती है (वह सारी) परमात्मा का नाम प्राप्त करने की तमन्ना रखती है। पर परमात्मा का नाम उनको ही मिलता है जिन्होंने प्रभू की रजा के अनुसार पिछले जनम में (नाम जपने की) कमाई की हुई होती है। हे भाई ! जिनको परमात्मा का नाम मिल जाता है। वे बड़े भाग्यों वाले बन जाते हैं। (ऐसे भाग्यशालियों को परमात्मा) गुरू के शबद से (अपने साथ) मिला लेता है। 13। हे भाई ! (मनुष्य का यह) शरीर उस बहुत बेअंत परमात्मा (के रहने) के लिए किला है। इस किले में बैठ के परमात्मा (कई किस्मों के) विचार करता रहता है। उस परमात्मा का न्याय सदा कायम रहने वाला है। जो मनुष्य सदा-स्थिर हरी-नाम सिमरन का व्यापार करता है। वह (इस किले में) भटकना से रहित निवास प्राप्त किए रहता है। 14। हे भाई ! (नाम-सिमरन की बरकति से शरीर के मन बुद्धि आदि) अंदर के घर सुंदर बने रहते हैं। हृदय-स्थल भी खूबसूरत बना रहता है। किसी उस विरले मनुष्य को ये स्थान प्राप्त होता है जो गुरू के सन्मुख रहता है। जो मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू की सिफत-सालाह करता रहता है और सदा-स्थिर हरी-नाम को अपने मन में बसाए रखता है। उस मनुष्य की प्रभू के साथ प्रीति इस (मन बुद्धि आदिक वाले) साथ में पूरी तरह से खरी उतरती है। 15। हे भाई ! मेरे करतार ने यह एक (अजीब) बिउंत बना दी है कि उसने मनुष्य के शरीर में (ही उसके आत्मिक जीवन की) सारी राशि-पूँजी डाल रखी है। हे नानक ! जो मनुष्य (गुरू की शरण पड़ कर) परमात्मा के नाम का वाणज्य करते रहते हैं। वे उसके प्रेम-रंग में रंगे रहते हैं। हे भाई ! कोई वह मनुष्य ही परमात्मा का नाम प्राप्त करता है जो गुरू के सन्मुख रहता है। 16। 6। 20।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਕਾਇਆ ਕੰਚਨੁ ਸਬਦੁ ਵੀਚਾਰਾ ॥
ਤਿਥੈ ਹਰਿ ਵਸੈ ਜਿਸ ਦਾ ਅੰਤੁ ਨ ਪਾਰਾਵਾਰਾ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਹਰਿ ਸੇਵਿਹੁ ਸਚੀ ਬਾਣੀ ਹਰਿ ਜੀਉ ਸਬਦਿ ਮਿਲਾਇਦਾ ॥੧॥
मारू महला ३ ॥
काइआ कंचनु सबदु वीचारा ॥
तिथै हरि वसै जिस दा अंतु न पारावारा ॥
अनदिनु हरि सेविहु सची बाणी हरि जीउ सबदि मिलाइदा ॥१॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला ३॥ हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के शबद को अपने हृदय में बसाता है। (शबद की बरकति से विकारों से बच सकने से उसका) शरीर सोने जैसा शुद्ध हो जाता है। जिस परमात्मा के गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता। जिस परमात्मा की हस्ती का इस पार उस पार के छोर का अंत नहीं पाया जा सकता। वह परमात्मा उस (मनुष्य के) हृदय में आ बसता है। हे भाई ! सदा-स्थिर प्रभू की सिफतसालाह की बाणी के द्वारा परमात्मा की सेवा-भगती करते रहा करो। परमात्मा गुरू के शबद में जोड़ के अपने साथ मिला लेता है। 1।

संदर्भ: यह अंग 1064 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।

Janpath की सड़क-side चाय और बीच में एक quiet moment।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 45 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1064” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 1065 →, पीछे का: ← अंग 1063

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।