अंग 1022

अंग
1022
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਗੰਗਾ ਜਮੁਨਾ ਕੇਲ ਕੇਦਾਰਾ ॥
ਕਾਸੀ ਕਾਂਤੀ ਪੁਰੀ ਦੁਆਰਾ ॥
ਗੰਗਾ ਸਾਗਰੁ ਬੇਣੀ ਸੰਗਮੁ ਅਠਸਠਿ ਅੰਕਿ ਸਮਾਈ ਹੇ ॥੯॥
ਆਪੇ ਸਿਧ ਸਾਧਿਕੁ ਵੀਚਾਰੀ ॥
ਆਪੇ ਰਾਜਨੁ ਪੰਚਾ ਕਾਰੀ ॥
ਤਖਤਿ ਬਹੈ ਅਦਲੀ ਪ੍ਰਭੁ ਆਪੇ ਭਰਮੁ ਭੇਦੁ ਭਉ ਜਾਈ ਹੇ ॥੧੦॥
ਆਪੇ ਕਾਜੀ ਆਪੇ ਮੁਲਾ ॥
ਆਪਿ ਅਭੁਲੁ ਨ ਕਬਹੂ ਭੁਲਾ ॥
ਆਪੇ ਮਿਹਰ ਦਇਆਪਤਿ ਦਾਤਾ ਨਾ ਕਿਸੈ ਕੋ ਬੈਰਾਈ ਹੇ ॥੧੧॥
ਜਿਸੁ ਬਖਸੇ ਤਿਸੁ ਦੇ ਵਡਿਆਈ ॥
ਸਭਸੈ ਦਾਤਾ ਤਿਲੁ ਨ ਤਮਾਈ ॥
ਭਰਪੁਰਿ ਧਾਰਿ ਰਹਿਆ ਨਿਹਕੇਵਲੁ ਗੁਪਤੁ ਪ੍ਰਗਟੁ ਸਭ ਠਾਈ ਹੇ ॥੧੨॥
ਕਿਆ ਸਾਲਾਹੀ ਅਗਮ ਅਪਾਰੈ ॥
ਸਾਚੇ ਸਿਰਜਣਹਾਰ ਮੁਰਾਰੈ ॥
ਜਿਸ ਨੋ ਨਦਰਿ ਕਰੇ ਤਿਸੁ ਮੇਲੇ ਮੇਲਿ ਮਿਲੈ ਮੇਲਾਈ ਹੇ ॥੧੩॥
ਬ੍ਰਹਮਾ ਬਿਸਨੁ ਮਹੇਸੁ ਦੁਆਰੈ ॥
ਊਭੇ ਸੇਵਹਿ ਅਲਖ ਅਪਾਰੈ ॥
ਹੋਰ ਕੇਤੀ ਦਰਿ ਦੀਸੈ ਬਿਲਲਾਦੀ ਮੈ ਗਣਤ ਨ ਆਵੈ ਕਾਈ ਹੇ ॥੧੪॥
ਸਾਚੀ ਕੀਰਤਿ ਸਾਚੀ ਬਾਣੀ ॥
ਹੋਰ ਨ ਦੀਸੈ ਬੇਦ ਪੁਰਾਣੀ ॥
ਪੂੰਜੀ ਸਾਚੁ ਸਚੇ ਗੁਣ ਗਾਵਾ ਮੈ ਧਰ ਹੋਰ ਨ ਕਾਈ ਹੇ ॥੧੫॥
ਜੁਗੁ ਜੁਗੁ ਸਾਚਾ ਹੈ ਭੀ ਹੋਸੀ ॥
ਕਉਣੁ ਨ ਮੂਆ ਕਉਣੁ ਨ ਮਰਸੀ ॥
ਨਾਨਕੁ ਨੀਚੁ ਕਹੈ ਬੇਨੰਤੀ ਦਰਿ ਦੇਖਹੁ ਲਿਵ ਲਾਈ ਹੇ ॥੧੬॥੨॥
गंगा जमुना केल केदारा ॥
कासी कांती पुरी दुआरा ॥
गंगा सागरु बेणी संगमु अठसठि अंकि समाई हे ॥९॥
आपे सिध साधिकु वीचारी ॥
आपे राजनु पंचा कारी ॥
तखति बहै अदली प्रभु आपे भरमु भेदु भउ जाई हे ॥१०॥
आपे काजी आपे मुला ॥
आपि अभुलु न कबहू भुला ॥
आपे मिहर दइआपति दाता ना किसै को बैराई हे ॥११॥
जिसु बखसे तिसु दे वडिआई ॥
सभसै दाता तिलु न तमाई ॥
भरपुरि धारि रहिआ निहकेवलु गुपतु प्रगटु सभ ठाई हे ॥१२॥
किआ सालाही अगम अपारै ॥
साचे सिरजणहार मुरारै ॥
जिस नो नदरि करे तिसु मेले मेलि मिलै मेलाई हे ॥१३॥
ब्रहमा बिसनु महेसु दुआरै ॥
ऊभे सेवहि अलख अपारै ॥
होर केती दरि दीसै बिललादी मै गणत न आवै काई हे ॥१४॥
साची कीरति साची बाणी ॥
होर न दीसै बेद पुराणी ॥
पूंजी साचु सचे गुण गावा मै धर होर न काई हे ॥१५॥
जुगु जुगु साचा है भी होसी ॥
कउणु न मूआ कउणु न मरसी ॥
नानकु नीचु कहै बेनंती दरि देखहु लिव लाई हे ॥१६॥२॥

हिन्दी अर्थ: गंगा। जमुना। बिंद्रावन। केदार। काशी। कांति। द्वारका पुरी। सागर-गंगा। त्रिवेणी का संगम आदिक अढ़सठ तीर्थ उस करतार प्रभू की अपनी ही गोद में टिके हुए हैं। 9। (प्रभू के स्वयं से पैदा हुई सृष्टि में कहीं त्यागी हैं तो कहीं राजा हैं। सो। ) प्रभू स्वयं ही योग-साधना में सिद्ध-हस्त योगी है। स्वयं ही योग-साधना करने वाला है। स्वयं ही योग-साधना की विचार करने वाला है। प्रभू स्वयं ही राजा है स्वयं ही (अपने राज में) पँच-चौधरी बनाने वाला है। न्याय करने वाला प्रभू स्वयं ही तख़्त पर बैठा हुआ है। (उसकी अपनी ही मेहर से जगत में से) भटकना। (परस्पर) दूरियां और डर-सहम दूर होता है। 10। (सब जीवों में स्वयं ही व्यापक होने के कारण) प्रभू स्वयं ही काज़ी है स्वयं ही मुल्ला है (जीव तो माया के मोह में फस के भूलें करते रहते हैं। पर सबमें व्यापक होते हुए भी प्रभू) आप अभुल है। वह कभी गलती नहीं करता। वह किसी के साथ वैर भी नहीं करता। वह सदा मेहर का मालिक है दया का श्रोत है सब जीवों को दातें देता है। 11। प्रभू जिस जीव पर बख्शिश करता है उसको वडिआई देता है। हरेक जीव को दातें देने वाला है (उसको किसी जीव से किसी किस्म का) रक्ती भर भी कोई लालच नहीं। सब जीवों में व्यापक हो के सबको आसरा दे रहा है (सबमें होते हुए भी स्वयं) पवित्र हस्ती वाला है। दिखाई देता जगत हो अथवा अदृश्य। प्रभू हर जगह मौजूद है। 12। परमात्मा अपहुँच है। उसके गुणों का उस पार का छोर नहीं मिल सकता। वह सदा-स्थिर रहने वाला है। सब जीवों को पैदा करने वाला है। और दैत्यों को नाश करने वाला है। मैं उसकी कौन-कौन सी सिफत बयान कर सकता हूँ। जिस जीव पर मेहर की नजर करता है उसको अपने चरणों में जोड़ लेता है। वह जीव प्रभू के चरणों में मिला रहता है। प्रभू खुद ही मिलाए रखता है। 13। (बड़े-बड़े देवते भी) क्या ब्रहमा। क्या विष्णु। और क्या शिव – सारे उस अलख और अपार प्रभू के दर पर खड़े हुए सेवा में हाजिर रहते हैं। और भी इतनी बेअंत दुनिया उसके दर पर तरले लेती दिखाई दे रही है कि मुझसे कोई गिनती नहीं हो सकती। 14। परमात्मा की सिफत-सालाह और सिफत-सालाह की बाणी ही सदा-स्थिर रहने वाला सरमाया है। वेद-पुराण आदिक धर्म-पुस्तकों में भी इस राशि-पूँजी के बिना और सदा-स्थिर रहने वाला पदार्थ नहीं दिखता। प्रभू का नाम ही अटल पूँजी है। मैं सदा उस अटल प्रभू के गुण गाता हूँ। मुझे उसके बिना और कोई आसरा नहीं दिखता। 15। प्रभू हरेक युग में कायम रहने वाला है। अब भी मौजूद है। सदा ही कायम रहेगा। जगत में और जो भी जीव आया वह (आखिर) मर गया। जो भी आएगा वह (अवश्य) मरेगा। गरीब नानक विनती करता है- हे प्रभू ! तू अपने दरबार में बैठा सब जीवों की बड़े ध्यान से संभाल कर रहा है। 16। 2।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਦੂਜੀ ਦੁਰਮਤਿ ਅੰਨੀ ਬੋਲੀ ॥
ਕਾਮ ਕ੍ਰੋਧ ਕੀ ਕਚੀ ਚੋਲੀ ॥
ਘਰਿ ਵਰੁ ਸਹਜੁ ਨ ਜਾਣੈ ਛੋਹਰਿ ਬਿਨੁ ਪਿਰ ਨੀਦ ਨ ਪਾਈ ਹੇ ॥੧॥
ਅੰਤਰਿ ਅਗਨਿ ਜਲੈ ਭੜਕਾਰੇ ॥
ਮਨਮੁਖੁ ਤਕੇ ਕੁੰਡਾ ਚਾਰੇ ॥
ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਸੇਵੇ ਕਿਉ ਸੁਖੁ ਪਾਈਐ ਸਾਚੇ ਹਾਥਿ ਵਡਾਈ ਹੇ ॥੨॥
ਕਾਮੁ ਕ੍ਰੋਧੁ ਅਹੰਕਾਰੁ ਨਿਵਾਰੇ ॥
ਤਸਕਰ ਪੰਚ ਸਬਦਿ ਸੰਘਾਰੇ ॥
ਗਿਆਨ ਖੜਗੁ ਲੈ ਮਨ ਸਿਉ ਲੂਝੈ ਮਨਸਾ ਮਨਹਿ ਸਮਾਈ ਹੇ ॥੩॥
ਮਾ ਕੀ ਰਕਤੁ ਪਿਤਾ ਬਿਦੁ ਧਾਰਾ ॥
ਮੂਰਤਿ ਸੂਰਤਿ ਕਰਿ ਆਪਾਰਾ ॥
ਜੋਤਿ ਦਾਤਿ ਜੇਤੀ ਸਭ ਤੇਰੀ ਤੂ ਕਰਤਾ ਸਭ ਠਾਈ ਹੇ ॥੪॥
ਤੁਝ ਹੀ ਕੀਆ ਜੰਮਣ ਮਰਣਾ ॥
ਗੁਰ ਤੇ ਸਮਝ ਪੜੀ ਕਿਆ ਡਰਣਾ ॥
ਤੂ ਦਇਆਲੁ ਦਇਆ ਕਰਿ ਦੇਖਹਿ ਦੁਖੁ ਦਰਦੁ ਸਰੀਰਹੁ ਜਾਈ ਹੇ ॥੫॥
ਨਿਜ ਘਰਿ ਬੈਸਿ ਰਹੇ ਭਉ ਖਾਇਆ ॥
ਧਾਵਤ ਰਾਖੇ ਠਾਕਿ ਰਹਾਇਆ ॥
ਕਮਲ ਬਿਗਾਸ ਹਰੇ ਸਰ ਸੁਭਰ ਆਤਮ ਰਾਮੁ ਸਖਾਈ ਹੇ ॥੬॥
ਮਰਣੁ ਲਿਖਾਇ ਮੰਡਲ ਮਹਿ ਆਏ ॥
ਕਿਉ ਰਹੀਐ ਚਲਣਾ ਪਰਥਾਏ ॥
ਸਚਾ ਅਮਰੁ ਸਚੇ ਅਮਰਾ ਪੁਰਿ ਸੋ ਸਚੁ ਮਿਲੈ ਵਡਾਈ ਹੇ ॥੭॥
ਆਪਿ ਉਪਾਇਆ ਜਗਤੁ ਸਬਾਇਆ ॥
ਜਿਨਿ ਸਿਰਿਆ ਤਿਨਿ ਧੰਧੈ ਲਾਇਆ ॥
मारू महला १ ॥
दूजी दुरमति अंनी बोली ॥
काम क्रोध की कची चोली ॥
घरि वरु सहजु न जाणै छोहरि बिनु पिर नीद न पाई हे ॥१॥
अंतरि अगनि जलै भड़कारे ॥
मनमुखु तके कुंडा चारे ॥
बिनु सतिगुर सेवे किउ सुखु पाईऐ साचे हाथि वडाई हे ॥२॥
कामु क्रोधु अहंकारु निवारे ॥
तसकर पंच सबदि संघारे ॥
गिआन खड़गु लै मन सिउ लूझै मनसा मनहि समाई हे ॥३॥
मा की रकतु पिता बिदु धारा ॥
मूरति सूरति करि आपारा ॥
जोति दाति जेती सभ तेरी तू करता सभ ठाई हे ॥४॥
तुझ ही कीआ जंमण मरणा ॥
गुर ते समझ पड़ी किआ डरणा ॥
तू दइआलु दइआ करि देखहि दुखु दरदु सरीरहु जाई हे ॥५॥
निज घरि बैसि रहे भउ खाइआ ॥
धावत राखे ठाकि रहाइआ ॥
कमल बिगास हरे सर सुभर आतम रामु सखाई हे ॥६॥
मरणु लिखाइ मंडल महि आए ॥
किउ रहीऐ चलणा परथाए ॥
सचा अमरु सचे अमरा पुरि सो सचु मिलै वडाई हे ॥७॥
आपि उपाइआ जगतु सबाइआ ॥
जिनि सिरिआ तिनि धंधै लाइआ ॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला १॥ प्रभू के बिना किसी और आसरे की झाक ऐसी दुर्मति है कि इसमें फसी हुई जीव स्त्री अंधी और बहरी हो जाती है (ना वह आँखों से परमात्मा को देख सकती है। ना वह कानों से परमात्मा की सिफत-सालाह सुन सकती है)। उसका शरीर काम-क्रोध आदि में गलता रहता है। पति-प्रभू उसके हृदय-घर में बसता है। पर वह अंजान जीव-स्त्री उसको पहचान नहीं सकती। आत्मिक अडोलता उसके अंदर ही है पर वह समझ नहीं सकती। पति-प्रभू से विछुड़ी हुई को शांति नसीब नहीं होती। 1। (अपने मन के पीछे चलने वाले- मनमुख के ) अंदर तृष्णा की आग भड़-भड़ करके जलती है। मनमुख मनुष्य (माया) की खातिर चारों तरफ़ भटकता है। सतिगुरू की बताई हुई सेवा करे बिना आत्मिक आनंद नहीं मिल सकता। यह वडिआई सदा-स्थिर प्रभू के अपने हाथ में है (जिस पर मेहर करे उसी को देता है)। 2। गुरू के शबद में जुड़ के कामादिक पाँच चोरों को मारता है। (गुरू की शरण पड़ कर जो मनुष्य अपने अंदर से) काम-क्रोध-अहंकार दूर करता है। गुरू से मिले ज्ञान की तलवार ले के अपने मन के साथ लड़ाई करता है। उसके मन का मायावी फुरना मन में ही समाप्त हो जाता है (भाव। मन में मायावी फुरने उठते ही नहीं)। 3। हे अपार प्रभू ! माँ के रक्त और पिता के वीर्य की बूँद को मिला के तूने मनुष्य का बुत बना दिया। सुंदर चेहरा बना दिया। हरेक जीव के अंदर तेरी ही ज्योति है। जो भी पदार्थों की बख्शिश है सब तेरी ही है। तू सृजनहार हर जगह मौजूद है। 4। हे प्रभू ! जनम और मरण (का सिलसिला) तूने ही बनाया है। जिस मनुष्य को गुरू से यह सूझ पड़ जाए वह फिर मौत से नहीं डरता। हे प्रभू ! तू दया का घर है। जिस मनुष्य की ओर तू निगाह करके देखता है उसके शरीर में से दुख-दर्द दूर हो जाता है। 5। (गुरू की शरण पड़ कर) जो मनुष्य अपने हृदय (में बसते परमात्मा की याद) में टिके रहते हैं वे मौत का डर समाप्त कर लेते हैं। वे अपने मन को माया के पीछे दौड़ने से बचा लेते हैं और (माया की ओर से) रोक के (प्रभू-चरणों में) टिकाते हैं। उनके हृदय-कमल खिल उठते हैं। हरे हो जाते हैं। उनके (ज्ञान-इन्द्रिय-रूप) तालाब (नाम-अमृत से) लबालब भरे रहते हैं। सार्व-व्यापक परमात्मा उनका (सदा के लिए) मित्र बन जाता है। 6। जो भी जीव जगत में आते हैं वह मौत (का परवाना अपने सिर पर) लिखा के ही आते हैं। किसी भी हालत में कोई भी जीव यहाँ सदा नहीं रह सकता। हरेक ने अवश्य परलोक में जाना है। परमात्मा का यह सदा-कायम रहने वाला हुकम (अमर) है। जो लोग सदा-स्थिर प्रभू की सदा-स्थिर पुरी में टिके रहते हैं उनको सदा-स्थिर प्रभू मिल जाता है। उनको (प्रभू-मिलाप की यह) महिमा मिलती है। 7। यह सारा जगत प्रभू ने स्वयं ही पैदा किया है। जिस (प्रभू) ने (जगत) पैदा किया है उसने (स्वयं ही) इसको माया की दौड़-भाग में लगा दिया है।

संदर्भ: यह अंग 1022 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।

गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।

Noida के office-tower की 15वीं मंज़िल से शाम का Delhi-view।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 48 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1022” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 1023 →, पीछे का: ← अंग 1021

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।