अंग
1060
राग मारू
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਅਨਦਿਨੁ ਸਦਾ ਰਹੈ ਰੰਗਿ ਰਾਤਾ ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਭਗਤਿ ਕਰਾਇਦਾ ॥੬॥
ਇਸੁ ਮਨ ਮੰਦਰ ਮਹਿ ਮਨੂਆ ਧਾਵੈ ॥
ਸੁਖੁ ਪਲਰਿ ਤਿਆਗਿ ਮਹਾ ਦੁਖੁ ਪਾਵੈ ॥
ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਭੇਟੇ ਠਉਰ ਨ ਪਾਵੈ ਆਪੇ ਖੇਲੁ ਕਰਾਇਦਾ ॥੭॥
ਆਪਿ ਅਪਰੰਪਰੁ ਆਪਿ ਵੀਚਾਰੀ ॥
ਆਪੇ ਮੇਲੇ ਕਰਣੀ ਸਾਰੀ ॥
ਕਿਆ ਕੋ ਕਾਰ ਕਰੇ ਵੇਚਾਰਾ ਆਪੇ ਬਖਸਿ ਮਿਲਾਇਦਾ ॥੮॥
ਆਪੇ ਸਤਿਗੁਰੁ ਮੇਲੇ ਪੂਰਾ ॥
ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਮਹਾਬਲ ਸੂਰਾ ॥
ਆਪੇ ਮੇਲੇ ਦੇ ਵਡਿਆਈ ਸਚੇ ਸਿਉ ਚਿਤੁ ਲਾਇਦਾ ॥੯॥
ਘਰ ਹੀ ਅੰਦਰਿ ਸਾਚਾ ਸੋਈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਵਿਰਲਾ ਬੂਝੈ ਕੋਈ ॥
ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ਵਸਿਆ ਘਟ ਅੰਤਰਿ ਰਸਨਾ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਦਾ ॥੧੦॥
ਦਿਸੰਤਰੁ ਭਵੈ ਅੰਤਰੁ ਨਹੀ ਭਾਲੇ ॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹਿ ਬਧਾ ਜਮਕਾਲੇ ॥
ਜਮ ਕੀ ਫਾਸੀ ਕਬਹੂ ਨ ਤੂਟੈ ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਭਰਮਾਇਦਾ ॥੧੧॥
ਜਪੁ ਤਪੁ ਸੰਜਮੁ ਹੋਰੁ ਕੋਈ ਨਾਹੀ ॥
ਜਬ ਲਗੁ ਗੁਰ ਕਾ ਸਬਦੁ ਨ ਕਮਾਹੀ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਮਿਲਿਆ ਸਚੁ ਪਾਇਆ ਸਚੇ ਸਚਿ ਸਮਾਇਦਾ ॥੧੨॥
ਕਾਮ ਕਰੋਧੁ ਸਬਲ ਸੰਸਾਰਾ ॥
ਬਹੁ ਕਰਮ ਕਮਾਵਹਿ ਸਭੁ ਦੁਖ ਕਾ ਪਸਾਰਾ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਸੇਵਹਿ ਸੇ ਸੁਖੁ ਪਾਵਹਿ ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਮਿਲਾਇਦਾ ॥੧੩॥
ਪਉਣੁ ਪਾਣੀ ਹੈ ਬੈਸੰਤਰੁ ॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਵਰਤੈ ਸਭ ਅੰਤਰਿ ॥
ਜਿਨਿ ਕੀਤੇ ਜਾ ਤਿਸੈ ਪਛਾਣਹਿ ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਚੁਕਾਇਦਾ ॥੧੪॥
ਇਕਿ ਮਾਇਆ ਮੋਹਿ ਗਰਬਿ ਵਿਆਪੇ ॥
ਹਉਮੈ ਹੋਇ ਰਹੇ ਹੈ ਆਪੇ ॥
ਜਮਕਾਲੈ ਕੀ ਖਬਰਿ ਨ ਪਾਈ ਅੰਤਿ ਗਇਆ ਪਛੁਤਾਇਦਾ ॥੧੫॥
ਜਿਨਿ ਉਪਾਏ ਸੋ ਬਿਧਿ ਜਾਣੈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਦੇਵੈ ਸਬਦੁ ਪਛਾਣੈ ॥
ਨਾਨਕ ਦਾਸੁ ਕਹੈ ਬੇਨੰਤੀ ਸਚਿ ਨਾਮਿ ਚਿਤੁ ਲਾਇਦਾ ॥੧੬॥੨॥੧੬॥
ਇਸੁ ਮਨ ਮੰਦਰ ਮਹਿ ਮਨੂਆ ਧਾਵੈ ॥
ਸੁਖੁ ਪਲਰਿ ਤਿਆਗਿ ਮਹਾ ਦੁਖੁ ਪਾਵੈ ॥
ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਭੇਟੇ ਠਉਰ ਨ ਪਾਵੈ ਆਪੇ ਖੇਲੁ ਕਰਾਇਦਾ ॥੭॥
ਆਪਿ ਅਪਰੰਪਰੁ ਆਪਿ ਵੀਚਾਰੀ ॥
ਆਪੇ ਮੇਲੇ ਕਰਣੀ ਸਾਰੀ ॥
ਕਿਆ ਕੋ ਕਾਰ ਕਰੇ ਵੇਚਾਰਾ ਆਪੇ ਬਖਸਿ ਮਿਲਾਇਦਾ ॥੮॥
ਆਪੇ ਸਤਿਗੁਰੁ ਮੇਲੇ ਪੂਰਾ ॥
ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਮਹਾਬਲ ਸੂਰਾ ॥
ਆਪੇ ਮੇਲੇ ਦੇ ਵਡਿਆਈ ਸਚੇ ਸਿਉ ਚਿਤੁ ਲਾਇਦਾ ॥੯॥
ਘਰ ਹੀ ਅੰਦਰਿ ਸਾਚਾ ਸੋਈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਵਿਰਲਾ ਬੂਝੈ ਕੋਈ ॥
ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ਵਸਿਆ ਘਟ ਅੰਤਰਿ ਰਸਨਾ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਦਾ ॥੧੦॥
ਦਿਸੰਤਰੁ ਭਵੈ ਅੰਤਰੁ ਨਹੀ ਭਾਲੇ ॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹਿ ਬਧਾ ਜਮਕਾਲੇ ॥
ਜਮ ਕੀ ਫਾਸੀ ਕਬਹੂ ਨ ਤੂਟੈ ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਭਰਮਾਇਦਾ ॥੧੧॥
ਜਪੁ ਤਪੁ ਸੰਜਮੁ ਹੋਰੁ ਕੋਈ ਨਾਹੀ ॥
ਜਬ ਲਗੁ ਗੁਰ ਕਾ ਸਬਦੁ ਨ ਕਮਾਹੀ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਮਿਲਿਆ ਸਚੁ ਪਾਇਆ ਸਚੇ ਸਚਿ ਸਮਾਇਦਾ ॥੧੨॥
ਕਾਮ ਕਰੋਧੁ ਸਬਲ ਸੰਸਾਰਾ ॥
ਬਹੁ ਕਰਮ ਕਮਾਵਹਿ ਸਭੁ ਦੁਖ ਕਾ ਪਸਾਰਾ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਸੇਵਹਿ ਸੇ ਸੁਖੁ ਪਾਵਹਿ ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਮਿਲਾਇਦਾ ॥੧੩॥
ਪਉਣੁ ਪਾਣੀ ਹੈ ਬੈਸੰਤਰੁ ॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਵਰਤੈ ਸਭ ਅੰਤਰਿ ॥
ਜਿਨਿ ਕੀਤੇ ਜਾ ਤਿਸੈ ਪਛਾਣਹਿ ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਚੁਕਾਇਦਾ ॥੧੪॥
ਇਕਿ ਮਾਇਆ ਮੋਹਿ ਗਰਬਿ ਵਿਆਪੇ ॥
ਹਉਮੈ ਹੋਇ ਰਹੇ ਹੈ ਆਪੇ ॥
ਜਮਕਾਲੈ ਕੀ ਖਬਰਿ ਨ ਪਾਈ ਅੰਤਿ ਗਇਆ ਪਛੁਤਾਇਦਾ ॥੧੫॥
ਜਿਨਿ ਉਪਾਏ ਸੋ ਬਿਧਿ ਜਾਣੈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਦੇਵੈ ਸਬਦੁ ਪਛਾਣੈ ॥
ਨਾਨਕ ਦਾਸੁ ਕਹੈ ਬੇਨੰਤੀ ਸਚਿ ਨਾਮਿ ਚਿਤੁ ਲਾਇਦਾ ॥੧੬॥੨॥੧੬॥
अनदिनु सदा रहै रंगि राता करि किरपा भगति कराइदा ॥६॥
इसु मन मंदर महि मनूआ धावै ॥
सुखु पलरि तिआगि महा दुखु पावै ॥
बिनु सतिगुर भेटे ठउर न पावै आपे खेलु कराइदा ॥७॥
आपि अपरंपरु आपि वीचारी ॥
आपे मेले करणी सारी ॥
किआ को कार करे वेचारा आपे बखसि मिलाइदा ॥८॥
आपे सतिगुरु मेले पूरा ॥
सचै सबदि महाबल सूरा ॥
आपे मेले दे वडिआई सचे सिउ चितु लाइदा ॥९॥
घर ही अंदरि साचा सोई ॥
गुरमुखि विरला बूझै कोई ॥
नामु निधानु वसिआ घट अंतरि रसना नामु धिआइदा ॥१०॥
दिसंतरु भवै अंतरु नही भाले ॥
माइआ मोहि बधा जमकाले ॥
जम की फासी कबहू न तूटै दूजै भाइ भरमाइदा ॥११॥
जपु तपु संजमु होरु कोई नाही ॥
जब लगु गुर का सबदु न कमाही ॥
गुर कै सबदि मिलिआ सचु पाइआ सचे सचि समाइदा ॥१२॥
काम करोधु सबल संसारा ॥
बहु करम कमावहि सभु दुख का पसारा ॥
सतिगुर सेवहि से सुखु पावहि सचै सबदि मिलाइदा ॥१३॥
पउणु पाणी है बैसंतरु ॥
माइआ मोहु वरतै सभ अंतरि ॥
जिनि कीते जा तिसै पछाणहि माइआ मोहु चुकाइदा ॥१४॥
इकि माइआ मोहि गरबि विआपे ॥
हउमै होइ रहे है आपे ॥
जमकालै की खबरि न पाई अंति गइआ पछुताइदा ॥१५॥
जिनि उपाए सो बिधि जाणै ॥
गुरमुखि देवै सबदु पछाणै ॥
नानक दासु कहै बेनंती सचि नामि चितु लाइदा ॥१६॥२॥१६॥
इसु मन मंदर महि मनूआ धावै ॥
सुखु पलरि तिआगि महा दुखु पावै ॥
बिनु सतिगुर भेटे ठउर न पावै आपे खेलु कराइदा ॥७॥
आपि अपरंपरु आपि वीचारी ॥
आपे मेले करणी सारी ॥
किआ को कार करे वेचारा आपे बखसि मिलाइदा ॥८॥
आपे सतिगुरु मेले पूरा ॥
सचै सबदि महाबल सूरा ॥
आपे मेले दे वडिआई सचे सिउ चितु लाइदा ॥९॥
घर ही अंदरि साचा सोई ॥
गुरमुखि विरला बूझै कोई ॥
नामु निधानु वसिआ घट अंतरि रसना नामु धिआइदा ॥१०॥
दिसंतरु भवै अंतरु नही भाले ॥
माइआ मोहि बधा जमकाले ॥
जम की फासी कबहू न तूटै दूजै भाइ भरमाइदा ॥११॥
जपु तपु संजमु होरु कोई नाही ॥
जब लगु गुर का सबदु न कमाही ॥
गुर कै सबदि मिलिआ सचु पाइआ सचे सचि समाइदा ॥१२॥
काम करोधु सबल संसारा ॥
बहु करम कमावहि सभु दुख का पसारा ॥
सतिगुर सेवहि से सुखु पावहि सचै सबदि मिलाइदा ॥१३॥
पउणु पाणी है बैसंतरु ॥
माइआ मोहु वरतै सभ अंतरि ॥
जिनि कीते जा तिसै पछाणहि माइआ मोहु चुकाइदा ॥१४॥
इकि माइआ मोहि गरबि विआपे ॥
हउमै होइ रहे है आपे ॥
जमकालै की खबरि न पाई अंति गइआ पछुताइदा ॥१५॥
जिनि उपाए सो बिधि जाणै ॥
गुरमुखि देवै सबदु पछाणै ॥
नानक दासु कहै बेनंती सचि नामि चितु लाइदा ॥१६॥२॥१६॥
हिन्दी अर्थ: (इस भक्ति के द्वारा) मनुष्य हर वक्त सदा ही परमात्मा के प्रेम-रंग में रंगा रह सकता है। (पर यह उसकी मेहर ही है) परमात्मा कृपा करके (स्वयं ही जीव से अपनी) भगती करवाता है। 6। हे भाई ! (मनुष्य के) इस शरीर में (रहने वाला) चंचल मन (हर वक्त) भटकता फिरता है। (विकारों की) पराली (तुच्छ वस्तु) की खातिर आत्मिक आनंद को त्याग के बड़ा दुख पाता है। गुरू को मिले बिना इसे शांति वाली जगह नहीं मिलती; (पर। जीवों के भी क्या वश। उनसे ये) खेल परमात्मा स्वयं ही करवाता है। 7। हे भाई ! बेअंत परमात्मा स्वयं ही आत्मिक जीवन की विचार बख्शने वाला है। (नाम जपने की) श्रेष्ठ करणी दे के खुद ही (जीव को अपने साथ) मिलाता है। जीव बेचारा अपने आप कोई (अच्छा बुरा) काम नहीं कर सकता। परमात्मा स्वयं ही बख्शिश करके (अपने चरणों में जीव को) जोड़ता है। 8। हे भाई ! (परमात्मा) स्वयं ही (मनुष्य को) पूरा गुरू मिलाता है। और। सिफत-सालाह वाले शबद में जोड़ के (विकारों के मुकाबले के लिए) आत्मिक बल वाला सूरमा बना देता है। प्रभू स्वयं ही (जीव को अपने साथ) मिलाता है। (उसको लोक-परलोक में) इज्जत देता है। हे भाई ! (जिसको अपने साथ मिलाता है। वह मनुष्य) उस सदा कायम रहने वाले परमात्मा के साथ (अपना) चिक्त जोड़े रखता है। 9। हे भाई ! सदा कायम रहने वाला परमात्मा (हरेक मनुष्य के) हृदय में घर में ही बसता है। पर गुरू के सन्मुख रहने वाला कोई विरला मनुष्य (यह भेद) समझता है। (जो यह भेद समझ लेता है) उसके दिल में (सारे सुखों का) खजाना हरी-नाम टिका रहता है। वह मनुष्य अपनी जीभ से हरी-नाम जपता रहता है। 10। हे भाई ! (जो मनुष्य त्याग आदि वाला भेष धार के तीर्थ आदिक) और-और जगह भटकता फिरता है। पर अपने हृदय को नहीं खोजता। वह मनुष्य माया के मोह में बँधा रहता है। वह मनुष्य आत्मिक मौत के काबू में आया रहता है। उसका जनम-मरण का चक्र कभी समाप्त नहीं होता। वह मनुष्य और-और के प्यार में फस के भटकता फिरता है। 11। कोई जप कोई तप कोई संजम (इस जीवन-यात्रा में) और कोई उद्यम उनकी सहायता नहीं करता। हे भाई ! जब तक मनुष्य गुरू के शबद के (हृदय में बसाने की) कमाई नहीं करते। जो मनुष्य गुरू के शबद में जुड़ता है। वह मनुष्य सदा कायम रहने वाले हरी-नाम में लीन रहता है। 12। हे भाई ! काम और क्रोध जगत में बड़े बली हैं। (जीव इनके प्रभाव में फसे रहते हैं। पर दुनिया को पतियाने की खातिर तीर्थ-यात्रा आदि धार्मिक निहित हुए) अनेकों कर्म (भी) करते हें। ये सारा दुखों का ही पसारा (बना रहता) है। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ते हैं। वे आत्मिक आनंद पाते हैं। (गुरू उनको) सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह के शबद में जोड़ता है। 13। हे भाई ! (वैसे तो इस शरीर के) हवा। पानी। आग (आदि सादे से ही तत्व हैं। पर) सब जीवों अंदर माया का मोह (अपना) जोर बनाए रखता है। जब (कोई भाग्यशाली) उस परमात्मा के साथ सांझ डालते हैं जिस ने (उनको) पैदा किया है। तो (वह परमात्मा उनके अंदर से) माया का मोह दूर कर देता है। 14। हे भाई ! कई (जीव ऐसे हैं जो हर वक्त) माया के मोह में अहंकार में ग्रसे रहते हैं। अहंकार का पुतला ही बने रहते हैं। (पर जिस भी ऐसे मनुष्य को इस) आत्मिक मौत की समझ नहीं पड़ती। वह अंत में यहाँ से हाथ मलता ही जाता है। 15। पर। हे भाई ! (जीवों के भी क्या वश। ) जिस परमात्मा ने (जीव) पैदा किए हैं वह ही (इस आत्मिक मौत से बचाने का) ढंग जानता है। (वह इस सूझ में जिस जीव को) गुरू की शरण डाल के देता है। वह गुरू के शबद के साथ सांझ डाल लेता है। नानक दास विनती करता है- हे भाई ! वह मनुष्य अपना चिक्त सदा कायम रहने वाले हरी-नाम में जोड़े रखता है। 16। 2। 16।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਆਦਿ ਜੁਗਾਦਿ ਦਇਆਪਤਿ ਦਾਤਾ ॥
ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਪਛਾਤਾ ॥
ਤੁਧੁਨੋ ਸੇਵਹਿ ਸੇ ਤੁਝਹਿ ਸਮਾਵਹਿ ਤੂ ਆਪੇ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਇਦਾ ॥੧॥
ਅਗਮ ਅਗੋਚਰੁ ਕੀਮਤਿ ਨਹੀ ਪਾਈ ॥
ਜੀਅ ਜੰਤ ਤੇਰੀ ਸਰਣਾਈ ॥
ਜਿਉ ਤੁਧੁ ਭਾਵੈ ਤਿਵੈ ਚਲਾਵਹਿ ਤੂ ਆਪੇ ਮਾਰਗਿ ਪਾਇਦਾ ॥੨॥
ਹੈ ਭੀ ਸਾਚਾ ਹੋਸੀ ਸੋਈ ॥
ਆਪੇ ਸਾਜੇ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਈ ॥
ਸਭਨਾ ਸਾਰ ਕਰੇ ਸੁਖਦਾਤਾ ਆਪੇ ਰਿਜਕੁ ਪਹੁਚਾਇਦਾ ॥੩॥
ਅਗਮ ਅਗੋਚਰੁ ਅਲਖ ਅਪਾਰਾ ॥
ਕੋਇ ਨ ਜਾਣੈ ਤੇਰਾ ਪਰਵਾਰਾ ॥
ਆਪਣਾ ਆਪੁ ਪਛਾਣਹਿ ਆਪੇ ਗੁਰਮਤੀ ਆਪਿ ਬੁਝਾਇਦਾ ॥੪॥
ਪਾਤਾਲ ਪੁਰੀਆ ਲੋਅ ਆਕਾਰਾ ॥ ਤਿਸੁ ਵਿਚਿ ਵਰਤੈ ਹੁਕਮੁ ਕਰਾਰਾ ॥
ਆਦਿ ਜੁਗਾਦਿ ਦਇਆਪਤਿ ਦਾਤਾ ॥
ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਪਛਾਤਾ ॥
ਤੁਧੁਨੋ ਸੇਵਹਿ ਸੇ ਤੁਝਹਿ ਸਮਾਵਹਿ ਤੂ ਆਪੇ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਇਦਾ ॥੧॥
ਅਗਮ ਅਗੋਚਰੁ ਕੀਮਤਿ ਨਹੀ ਪਾਈ ॥
ਜੀਅ ਜੰਤ ਤੇਰੀ ਸਰਣਾਈ ॥
ਜਿਉ ਤੁਧੁ ਭਾਵੈ ਤਿਵੈ ਚਲਾਵਹਿ ਤੂ ਆਪੇ ਮਾਰਗਿ ਪਾਇਦਾ ॥੨॥
ਹੈ ਭੀ ਸਾਚਾ ਹੋਸੀ ਸੋਈ ॥
ਆਪੇ ਸਾਜੇ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਈ ॥
ਸਭਨਾ ਸਾਰ ਕਰੇ ਸੁਖਦਾਤਾ ਆਪੇ ਰਿਜਕੁ ਪਹੁਚਾਇਦਾ ॥੩॥
ਅਗਮ ਅਗੋਚਰੁ ਅਲਖ ਅਪਾਰਾ ॥
ਕੋਇ ਨ ਜਾਣੈ ਤੇਰਾ ਪਰਵਾਰਾ ॥
ਆਪਣਾ ਆਪੁ ਪਛਾਣਹਿ ਆਪੇ ਗੁਰਮਤੀ ਆਪਿ ਬੁਝਾਇਦਾ ॥੪॥
ਪਾਤਾਲ ਪੁਰੀਆ ਲੋਅ ਆਕਾਰਾ ॥ ਤਿਸੁ ਵਿਚਿ ਵਰਤੈ ਹੁਕਮੁ ਕਰਾਰਾ ॥
मारू महला ३ ॥
आदि जुगादि दइआपति दाता ॥
पूरे गुर कै सबदि पछाता ॥
तुधुनो सेवहि से तुझहि समावहि तू आपे मेलि मिलाइदा ॥१॥
अगम अगोचरु कीमति नही पाई ॥
जीअ जंत तेरी सरणाई ॥
जिउ तुधु भावै तिवै चलावहि तू आपे मारगि पाइदा ॥२॥
है भी साचा होसी सोई ॥
आपे साजे अवरु न कोई ॥
सभना सार करे सुखदाता आपे रिजकु पहुचाइदा ॥३॥
अगम अगोचरु अलख अपारा ॥
कोइ न जाणै तेरा परवारा ॥
आपणा आपु पछाणहि आपे गुरमती आपि बुझाइदा ॥४॥
पाताल पुरीआ लोअ आकारा ॥ तिसु विचि वरतै हुकमु करारा ॥
आदि जुगादि दइआपति दाता ॥
पूरे गुर कै सबदि पछाता ॥
तुधुनो सेवहि से तुझहि समावहि तू आपे मेलि मिलाइदा ॥१॥
अगम अगोचरु कीमति नही पाई ॥
जीअ जंत तेरी सरणाई ॥
जिउ तुधु भावै तिवै चलावहि तू आपे मारगि पाइदा ॥२॥
है भी साचा होसी सोई ॥
आपे साजे अवरु न कोई ॥
सभना सार करे सुखदाता आपे रिजकु पहुचाइदा ॥३॥
अगम अगोचरु अलख अपारा ॥
कोइ न जाणै तेरा परवारा ॥
आपणा आपु पछाणहि आपे गुरमती आपि बुझाइदा ॥४॥
पाताल पुरीआ लोअ आकारा ॥ तिसु विचि वरतै हुकमु करारा ॥
हिन्दी अर्थ: मारू महला ३॥ हे प्रभू ! तू (जगत के) शुरू से। जुगों के आरम्भ से दया का मालिक है (सारे सुख पदार्थ) देने वाला है। पूरे गुरू के शबद से तेरे साथ जान-पहचान बन सकती है। जो मनुष्य सेवा-भगती करते हैं। वे तेरे (चरणों) में लीन रहते हैं। तू स्वयं ही (उनको गुरू से) मिला के (अपने साथ) मिलाता है। 1। हे प्रभू ! तू अपहुँच है। ज्ञान-इन्द्रियों के द्वारा तुझे समझा नहीं जा सकता। तेरा मूल्य नहीं पाया जा सकता (किसी दुनियावी पदार्थ के बदले तेरी प्राप्ति नहीं हो सकती)। सारे जीव-जंतु तेरे ही आसरे हैं। जैसे तुझे अच्छा लगता है। तू जीवों को कारे लगाता है। तू स्वयं ही (जीवों को) सही जीवन राह पर चलाता है। 2। हे भाई ! सदा कायम रहने वाला परमात्मा इस वक्त भी मौजूद है। वह सदा कायम रहेगा। वह स्वयं ही (सृष्टि) पैदा करता है। (उसके बिना पैदा करने वाला) और कोई नहीं। वह सारे सुख देने वाला परमात्मा स्वयं ही सब जीवों की संभाल करता है। वह स्वयं ही सबको रिजक पहुँचाता है। 3। हे प्रभू ! तू अपहुँच है। तू अगोचर है। तू अलॅख है। तू बेअंत है। कोई भी जान नहीं सकता कि तेरा कितना बड़ा परिवार है। अपने आप को (अपनी बुजुर्गी को) तू स्वयं ही समझता है। गुरू की मति दे के तू स्वयं ही (जीवों को सही जीवन-रास्ता) समझाता है। 4। हे भाई ! (अनेकों) पाताल। (अनेकों) पुरियाँ। (अनेकों) मण्डल – ये सारा दिखाई देता जगत (परमात्मा का पैदा किया हुआ है)। इस में परमात्मा का कठोर हुकम जगत की कार चला रहा है।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 1060 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।
IGI Airport की 3 बजे की flight का इंतज़ार, सब लोग phones पर, मन कहीं और।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 45 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1060” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 1061 →, पीछे का: ← अंग 1059।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।