राजन कउनु तुमारै आवै ॥ ऐसो भाउ बिदर को देखिओ ओहु गरीबु मोहि भावै ॥1॥ रहाउ ॥ हसती देखि भरम ते भूला स्री भगवानु न जानिआ ॥ तुमरो दूधु बिदर को पान॑ो अंम्रितु करि मै मानिआ ॥1॥ खीर समानि सागु मै पाइआ गुन गावत रैनि बिहानी ॥ कबीर को ठाकुरु अनद बिनोदी जाति न काहू की मानी ॥2॥9॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: हे राजा (दुर्योधन) ! आपके घर कौन आए। (मुझे आपके घर आने की उत्सुक्ता ही नहीं हैं सकती)। मैंने बिदर का इतना प्रेम देखा है कि वह गरीब (भी) मुझे प्यारा लगता है। 1। रहाउ। आप हाथी (आदि) देख के मान में आ के टूट चुका है। परमात्मा को भुला बैठा है। एक तरफ आपका दूध है। दूसरी तरफ बिदर का पानी है; ये पानी मुझे अमृत दिखता है। 1। (बिदर के घर का पकाया हुआ) साग (आपकी रसोई की पकी) खीर जैसा मुझे (मीठा) लगता है। (क्योंकि बिदर के पास रह कर मेरी) रात प्रभू के गुण गाते हुए बीती है। कबीर का मालिक प्रभू आनंद और मौज का मालिक है (जैसे उसने कृष्ण-रूप में आ के किसी ऊँचे मरातबे की परवाह नहीं की। वैसे) वह किसी की ऊँची जाति की परवाह नहीं करता। 2। 9।
सलोक कबीर ॥ गगन दमामा बाजिओ परिओ नीसानै घाउ ॥ खेतु जु मांडिओ सूरमा अब जूझन को दाउ ॥1॥ सूरा सो पहिचानीऐ जु लरै दीन के हेत ॥ पुरजा पुरजा कटि मरै कबहू न छाडै खेतु ॥2॥2॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: जो मनुष्य इस जगत-रूपी रण-भूमि में वीर हो के विकारों के मुकाबले में डट के खड़ा है। और यह समझता है कि ये मानस-जीवन ही मौका है जब इनके साथ लड़ा जा सकता है। वह है असली शूरवीर (सूरमा)। उसके दसम-द्वार पर धौंसा बजता है। उसके निशाने पर चोट लगती है (भाव। उसका मन प्रभू-चरणों में ऊँची उड़ानें लगाता है। जहाँ किसी विकार की सुनवाई नहीं हो सकती। उसके हृदय में प्रभू-चरणों से जुड़े रहने की कसक पड़ती है)। 1। (हाँ। एक और भी शूरवीर है) उस मनुष्य को भी सूरमा समझना चाहिए जो गरीबों की खातिर लड़ता है। (गरीब के लिए लड़ता-लड़ता) टुकड़े-टुकड़े हो के मरता है। पर लड़ाई के मैदान को कभी नहीं छोड़ता (पर पीछे को पैर नहीं हटाता। अपनी जान बचाने के लिए गरीब की पकड़ी हुई बाँह नहीं छोड़ता)। 2। 2।
कबीर का सबदु रागु मारू बाणी नामदेउ जी की ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ चारि मुकति चारै सिधि मिलि कै दूलह प्रभ की सरनि परिओ ॥ मुकति भइओ चउहूं जुग जानिओ जसु कीरति माथै छत्रु धरिओ ॥1॥ राजा राम जपत को को न तरिओ ॥ गुर उपदेसि साध की संगति भगतु भगतु ता को नामु परिओ ॥1॥ रहाउ ॥ संख चक्र माला तिलकु बिराजित देखि प्रतापु जमु डरिओ ॥ निरभउ भए राम बल गरजित जनम मरन संताप हिरिओ ॥2॥ अंबरीक कउ दीओ अभै पदु राजु भभीखन अधिक करिओ ॥ नउ निधि ठाकुरि दई सुदामै ध्रूअ अटलु अजहू न टरिओ ॥3॥ भगत हेति मारिओ हरनाखसु नरसिंघ रूप होइ देह धरिओ ॥ नामा कहै भगति बसि केसव अजहूं बलि के दुआर खरो ॥4॥1॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: कबीर का सबदु रागु मारू बाणी नामदेउ जी की सतिगुर प्रसादि॥ (जगत में) चार किस्म की मुक्तियां (मिथी गई हैं)। ये चारों मुक्तियां (अठारह) सिद्धियों के साथ मिल के पति (-प्रभू) की शरण पड़ी हुई हैं। (जो मनुष्य उस प्रभू का नाम सिमरता है। उसको ये हरेक किस्म की) मुक्ति मिल जाती है। वह मनुष्य चारों युगों में मशहूर हो जाता है। उसकी (हर जगह) शोभा होती है। उसके सिर पर छत्र झूलता है। 1। प्रकाश-रूप परमात्मा का नाम सिमर के बेअंत जीव तैर गए हैं। जिस जिस मनुष्य ने अपने गुरू की शिक्षा पर चल के साध-संगति की। उसका नाम भगत पड़ गया। 1। रहाउ। (प्रभू का) संख। चक्र। माला। तिलक आदि चमकता देख के। प्रताप देख के। जमराज भी सहम जाता है (जिन्होंने उस प्रभू को सिमरा है) उनको कोई डर नहीं रह जाता (क्योंकि उनसे तो जम भी डरता है)। प्रभू का प्रताप उनके अंदर उछाले मारता है। उनके जनम-मरण के कलेश नाश हो जाते हैं। 2। (अंबरीक ने नाम सिमरा। प्रभू ने) अंबरीक को निर्भयता का उच्चतम दर्जा बख्शा (और दुर्वासा उसका कुछ ना बिगाड़ सका)। प्रभू ने विभीषण को राज दे के बड़ा बना दिया; सुदामा (गरीब) को ठाकुर ने नौ निधियां दे दीं। ध्रुव को अटल पदवी बख्शी जो आज तक कायम है। 3। प्रभू ने अपने भक्त (प्रहलाद) की खातिर नरसिंघ का रूप धारण किया। और हरणाकश को मारा। नामदेव कहता है- परमात्मा भगती के अधीन है। (देखो !) अभी तक वह (अपने भगत राजा) बलि के दरवाजे पर खड़ा हुआ है। 4। 1।
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: मारू कबीर जीउ॥ हे कमले मनुष्य ! तूने धर्म (मनुष्य जीवन का फर्ज) बिसार दिया है। आप पशुओं की तरह पेट भर के सोया रहता है; तूने मानस जीवन को ऐसे ही गवा लिया है। 1। रहाउ। आप कभी सत्संग में नहीं गया। जगत के झूठे धंधों में ही मस्त है; कौए। कुत्ते। सूअर की तरह भटकता ही (जगत से) चला जाएगा। 1। जो मनुष्य मन। वचन व कर्म द्वारा और को तुच्छ जानते हैं और अपने आप को बड़े समझते हैं। ऐसे लोग मैंने नर्क में जाते देखें हैं (भाव। नित्य ये देखने में आता है कि ऐसे अहंकारी मनुष्य अहंकार में इस तरह दुखी होते हैं जैसे दोज़क की आग में जल रहे हों)। 2। काम वश हो के। क्रोध अधीन हो के। चतुराईयाँ। ठॅगीयां। नकारेपन में। दूसरों की निंदा करके (हे कमले !) तूने जीवन गुजार दिया है। कभी प्रभू को याद नहीं किया। 3। कबीर कहता है- मूर्ख मूढ़ गवार मनुष्य परमात्मा को नहीं सिमरता। प्रभू के नाम के साथ सांझ नहीं डालता। (संसार-समुंद्र में से) कैसे पार लंघेगा। 41।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
कबीर पन्द्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, मगर रामानन्द-शिष्य परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, ज़बान सीधी है, कई बार चुभने वाली। उनकी कुछ रचनाएँ बीजक में हैं, कुछ आदि ग्रंथ में, कुछ अनेक संप्रदायों में बिखरी हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे राजा (दुर्योधन) ! आपके घर कौन आए।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।