अंग
1008
राग मारू
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਵੈਦੋ ਨ ਵਾਈ ਭੈਣੋ ਨ ਭਾਈ ਏਕੋ ਸਹਾਈ ਰਾਮੁ ਹੇ ॥੧॥
ਕੀਤਾ ਜਿਸੋ ਹੋਵੈ ਪਾਪਾਂ ਮਲੋ ਧੋਵੈ ਸੋ ਸਿਮਰਹੁ ਪਰਧਾਨੁ ਹੇ ॥੨॥
ਘਟਿ ਘਟੇ ਵਾਸੀ ਸਰਬ ਨਿਵਾਸੀ ਅਸਥਿਰੁ ਜਾ ਕਾ ਥਾਨੁ ਹੇ ॥੩॥
ਆਵੈ ਨ ਜਾਵੈ ਸੰਗੇ ਸਮਾਵੈ ਪੂਰਨ ਜਾ ਕਾ ਕਾਮੁ ਹੇ ॥੪॥
ਭਗਤ ਜਨਾ ਕਾ ਰਾਖਣਹਾਰਾ ॥
ਸੰਤ ਜੀਵਹਿ ਜਪਿ ਪ੍ਰਾਨ ਅਧਾਰਾ ॥
ਕਰਨ ਕਾਰਨ ਸਮਰਥੁ ਸੁਆਮੀ ਨਾਨਕੁ ਤਿਸੁ ਕੁਰਬਾਨੁ ਹੇ ॥੫॥੨॥੩੨॥
ਵੈਦੋ ਨ ਵਾਈ ਭੈਣੋ ਨ ਭਾਈ ਏਕੋ ਸਹਾਈ ਰਾਮੁ ਹੇ ॥੧॥
ਕੀਤਾ ਜਿਸੋ ਹੋਵੈ ਪਾਪਾਂ ਮਲੋ ਧੋਵੈ ਸੋ ਸਿਮਰਹੁ ਪਰਧਾਨੁ ਹੇ ॥੨॥
ਘਟਿ ਘਟੇ ਵਾਸੀ ਸਰਬ ਨਿਵਾਸੀ ਅਸਥਿਰੁ ਜਾ ਕਾ ਥਾਨੁ ਹੇ ॥੩॥
ਆਵੈ ਨ ਜਾਵੈ ਸੰਗੇ ਸਮਾਵੈ ਪੂਰਨ ਜਾ ਕਾ ਕਾਮੁ ਹੇ ॥੪॥
ਭਗਤ ਜਨਾ ਕਾ ਰਾਖਣਹਾਰਾ ॥
ਸੰਤ ਜੀਵਹਿ ਜਪਿ ਪ੍ਰਾਨ ਅਧਾਰਾ ॥
ਕਰਨ ਕਾਰਨ ਸਮਰਥੁ ਸੁਆਮੀ ਨਾਨਕੁ ਤਿਸੁ ਕੁਰਬਾਨੁ ਹੇ ॥੫॥੨॥੩੨॥
मारू महला ५ ॥
वैदो न वाई भैणो न भाई एको सहाई रामु हे ॥१॥
कीता जिसो होवै पापां मलो धोवै सो सिमरहु परधानु हे ॥२॥
घटि घटे वासी सरब निवासी असथिरु जा का थानु हे ॥३॥
आवै न जावै संगे समावै पूरन जा का कामु हे ॥४॥
भगत जना का राखणहारा ॥
संत जीवहि जपि प्रान अधारा ॥
करन कारन समरथु सुआमी नानकु तिसु कुरबानु हे ॥५॥२॥३२॥
वैदो न वाई भैणो न भाई एको सहाई रामु हे ॥१॥
कीता जिसो होवै पापां मलो धोवै सो सिमरहु परधानु हे ॥२॥
घटि घटे वासी सरब निवासी असथिरु जा का थानु हे ॥३॥
आवै न जावै संगे समावै पूरन जा का कामु हे ॥४॥
भगत जना का राखणहारा ॥
संत जीवहि जपि प्रान अधारा ॥
करन कारन समरथु सुआमी नानकु तिसु कुरबानु हे ॥५॥२॥३२॥
हिन्दी अर्थ: मारू महला ५॥ हे भाई ! (दुख-दर्द के समय) सिर्फ एक परमात्मा ही मदद करने वाला होता है। ना कोई वैद्य ना ही किसी वैद्य की दवाई; ना कोई बहन ना ही कोई भाई- कोई भी मददगार नहीं होता। 1। हे भाई ! उस परमात्मा का सिमरन करते रहो जिसका किया हरेक काम (जगत में) हो रहा है। जो (जीवों के) पापों की मैल धोता है। हे भाई ! वह परमात्मा ही (जगत में) शिरोमणि है। 2। हे भाई ! (उस परमात्मा का ही सिमरन करो) जिसका आसन सदा अडोल रहने वाला है। जो हरेक शरीर में बसता है। जो सब जीवों में निवास रखने वाला है। 3। हे भाई ! (उसी परमात्मा का ही सिमरन करो) जिसका हरेक काम मुकम्मल (अभूल) है। जो ना पैदा होता है ना मरता है। पर हरेक जीव के साथ गुप्त बसता है। 4। हे भाई ! वह परमात्मा अपने भक्तों की रक्षा करने वाला है। वह हरेक के प्राणों का आसरा है। संत जन (उसका नाम) जप के आत्मिक जीवन हासिल करते रहते हैं। वह परमात्मा इस जगत-रचना का मूल है। सारी ताकतों का मालिक है। सब का पति है। हे भाई ! नानक (सदा) उससे बलिहार जाता है। 5। 2। 32।
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੯ ॥
ਹਰਿ ਕੋ ਨਾਮੁ ਸਦਾ ਸੁਖਦਾਈ ॥
ਜਾ ਕਉ ਸਿਮਰਿ ਅਜਾਮਲੁ ਉਧਰਿਓ ਗਨਿਕਾ ਹੂ ਗਤਿ ਪਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਪੰਚਾਲੀ ਕਉ ਰਾਜ ਸਭਾ ਮਹਿ ਰਾਮ ਨਾਮ ਸੁਧਿ ਆਈ ॥
ਤਾ ਕੋ ਦੂਖੁ ਹਰਿਓ ਕਰੁਣਾ ਮੈ ਅਪਨੀ ਪੈਜ ਬਢਾਈ ॥੧॥
ਜਿਹ ਨਰ ਜਸੁ ਕਿਰਪਾ ਨਿਧਿ ਗਾਇਓ ਤਾ ਕਉ ਭਇਓ ਸਹਾਈ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਮੈ ਇਹੀ ਭਰੋਸੈ ਗਹੀ ਆਨਿ ਸਰਨਾਈ ॥੨॥੧॥
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੯ ॥
ਹਰਿ ਕੋ ਨਾਮੁ ਸਦਾ ਸੁਖਦਾਈ ॥
ਜਾ ਕਉ ਸਿਮਰਿ ਅਜਾਮਲੁ ਉਧਰਿਓ ਗਨਿਕਾ ਹੂ ਗਤਿ ਪਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਪੰਚਾਲੀ ਕਉ ਰਾਜ ਸਭਾ ਮਹਿ ਰਾਮ ਨਾਮ ਸੁਧਿ ਆਈ ॥
ਤਾ ਕੋ ਦੂਖੁ ਹਰਿਓ ਕਰੁਣਾ ਮੈ ਅਪਨੀ ਪੈਜ ਬਢਾਈ ॥੧॥
ਜਿਹ ਨਰ ਜਸੁ ਕਿਰਪਾ ਨਿਧਿ ਗਾਇਓ ਤਾ ਕਉ ਭਇਓ ਸਹਾਈ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਮੈ ਇਹੀ ਭਰੋਸੈ ਗਹੀ ਆਨਿ ਸਰਨਾਈ ॥੨॥੧॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मारू महला ९ ॥
हरि को नामु सदा सुखदाई ॥
जा कउ सिमरि अजामलु उधरिओ गनिका हू गति पाई ॥१॥ रहाउ ॥
पंचाली कउ राज सभा महि राम नाम सुधि आई ॥
ता को दूखु हरिओ करुणा मै अपनी पैज बढाई ॥१॥
जिह नर जसु किरपा निधि गाइओ ता कउ भइओ सहाई ॥
कहु नानक मै इही भरोसै गही आनि सरनाई ॥२॥१॥
मारू महला ९ ॥
हरि को नामु सदा सुखदाई ॥
जा कउ सिमरि अजामलु उधरिओ गनिका हू गति पाई ॥१॥ रहाउ ॥
पंचाली कउ राज सभा महि राम नाम सुधि आई ॥
ता को दूखु हरिओ करुणा मै अपनी पैज बढाई ॥१॥
जिह नर जसु किरपा निधि गाइओ ता कउ भइओ सहाई ॥
कहु नानक मै इही भरोसै गही आनि सरनाई ॥२॥१॥
हिन्दी अर्थ: ੴ सतिगुर प्रसादि॥ मारू महला ९॥ हे भाई ! परमात्मा का नाम सदा आत्मिक आनंद देने वाला है। जिस नाम को सिमर के अजामल विकारों से बच गया था। (इस नाम को सिमर के) वेश्वा ने भी उच्च आत्मिक अवस्था हासिल कर ली थी। 1। रहाउ। हे भाई ! दुर्याधन के राज-दरबार में द्रोपदी ने (भी) परमात्मा के नाम का ध्यान धरा था। और। तरस-स्वरूप परमात्मा ने उसका दुख दूर किया था। (और इस तरह) अपना रसूख बढ़ाया था। 1। हे भाई ! जिन भी लोगों ने कृपा के खजाने परमात्मा की सिफत-सालाह की। परमात्मा उनका मददगार (हो के) पहुँचा। हे नानक ! कह- मैंने भी इसी ही भरोसे में आ कर परमात्मा की शरण ली है। 2। 1।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੯ ॥
ਅਬ ਮੈ ਕਹਾ ਕਰਉ ਰੀ ਮਾਈ ॥
ਸਗਲ ਜਨਮੁ ਬਿਖਿਅਨ ਸਿਉ ਖੋਇਆ ਸਿਮਰਿਓ ਨਾਹਿ ਕਨੑਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਾਲ ਫਾਸ ਜਬ ਗਰ ਮਹਿ ਮੇਲੀ ਤਿਹ ਸੁਧਿ ਸਭ ਬਿਸਰਾਈ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮ ਬਿਨੁ ਯਾ ਸੰਕਟ ਮਹਿ ਕੋ ਅਬ ਹੋਤ ਸਹਾਈ ॥੧॥
ਜੋ ਸੰਪਤਿ ਅਪਨੀ ਕਰਿ ਮਾਨੀ ਛਿਨ ਮਹਿ ਭਈ ਪਰਾਈ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਯਹ ਸੋਚ ਰਹੀ ਮਨਿ ਹਰਿ ਜਸੁ ਕਬਹੂ ਨ ਗਾਈ ॥੨॥੨॥
ਅਬ ਮੈ ਕਹਾ ਕਰਉ ਰੀ ਮਾਈ ॥
ਸਗਲ ਜਨਮੁ ਬਿਖਿਅਨ ਸਿਉ ਖੋਇਆ ਸਿਮਰਿਓ ਨਾਹਿ ਕਨੑਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਾਲ ਫਾਸ ਜਬ ਗਰ ਮਹਿ ਮੇਲੀ ਤਿਹ ਸੁਧਿ ਸਭ ਬਿਸਰਾਈ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮ ਬਿਨੁ ਯਾ ਸੰਕਟ ਮਹਿ ਕੋ ਅਬ ਹੋਤ ਸਹਾਈ ॥੧॥
ਜੋ ਸੰਪਤਿ ਅਪਨੀ ਕਰਿ ਮਾਨੀ ਛਿਨ ਮਹਿ ਭਈ ਪਰਾਈ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਯਹ ਸੋਚ ਰਹੀ ਮਨਿ ਹਰਿ ਜਸੁ ਕਬਹੂ ਨ ਗਾਈ ॥੨॥੨॥
मारू महला ९ ॥
अब मै कहा करउ री माई ॥
सगल जनमु बिखिअन सिउ खोइआ सिमरिओ नाहि कन॑ाई ॥१॥ रहाउ ॥
काल फास जब गर महि मेली तिह सुधि सभ बिसराई ॥
राम नाम बिनु या संकट महि को अब होत सहाई ॥१॥
जो संपति अपनी करि मानी छिन महि भई पराई ॥
कहु नानक यह सोच रही मनि हरि जसु कबहू न गाई ॥२॥२॥
अब मै कहा करउ री माई ॥
सगल जनमु बिखिअन सिउ खोइआ सिमरिओ नाहि कन॑ाई ॥१॥ रहाउ ॥
काल फास जब गर महि मेली तिह सुधि सभ बिसराई ॥
राम नाम बिनु या संकट महि को अब होत सहाई ॥१॥
जो संपति अपनी करि मानी छिन महि भई पराई ॥
कहु नानक यह सोच रही मनि हरि जसु कबहू न गाई ॥२॥२॥
हिन्दी अर्थ: मारू महला ९॥ हे माँ ! समय बीत जाने पर मैं क्या कर सकता हूँ। (भाव। वक्त बीत जाने पर मनुष्य कुछ भी नहीं कर सकता)। जिस मनुष्य ने सारी जिंदगी विषय-विकारों में गवा ली। और। परमात्मा का सिमरन कभी भी ना किया (वह समय बीत जाने पर फिर कुछ नहीं हो सकता)। 1। रहाउ। हे माँ ! जब जमराज (मनुष्य के) गले में मौत का फंदा डाल देता है। तब वह उसकी सारी सुध-बुध भुला देता है। उस बिपता में परमात्मा के नाम के बिना और कोई भी मददगार नहीं बन सकता (जमों के फंदों से। आत्मिक मौत से सहम से सिर्फ हरी-नाम ही बचाता है)। 1। हे माँ ! जिन धन-पदार्थों को मनुष्य हमेशा अपना समझे रखता है (जब मौत आती है। वह धन-पदार्थ) एक छिन में बेगाना हो जाता है। हे नानक ! कह-उस वक्त मनुष्य के मन में यह पछतावा रह जाता है कि परमात्मा की सिफत सालाह कभी भी ना की। 2। 2।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੯ ॥
ਮਾਈ ਮੈ ਮਨ ਕੋ ਮਾਨੁ ਨ ਤਿਆਗਿਓ ॥
ਮਾਇਆ ਕੇ ਮਦਿ ਜਨਮੁ ਸਿਰਾਇਓ ਰਾਮ ਭਜਨਿ ਨਹੀ ਲਾਗਿਓ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਮ ਕੋ ਡੰਡੁ ਪਰਿਓ ਸਿਰ ਊਪਰਿ ਤਬ ਸੋਵਤ ਤੈ ਜਾਗਿਓ ॥
ਕਹਾ ਹੋਤ ਅਬ ਕੈ ਪਛੁਤਾਏ ਛੂਟਤ ਨਾਹਿਨ ਭਾਗਿਓ ॥੧॥
ਇਹ ਚਿੰਤਾ ਉਪਜੀ ਘਟ ਮਹਿ ਜਬ ਗੁਰ ਚਰਨਨ ਅਨੁਰਾਗਿਓ ॥
ਸੁਫਲੁ ਜਨਮੁ ਨਾਨਕ ਤਬ ਹੂਆ ਜਉ ਪ੍ਰਭ ਜਸ ਮਹਿ ਪਾਗਿਓ ॥੨॥੩॥
ਮਾਈ ਮੈ ਮਨ ਕੋ ਮਾਨੁ ਨ ਤਿਆਗਿਓ ॥
ਮਾਇਆ ਕੇ ਮਦਿ ਜਨਮੁ ਸਿਰਾਇਓ ਰਾਮ ਭਜਨਿ ਨਹੀ ਲਾਗਿਓ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਮ ਕੋ ਡੰਡੁ ਪਰਿਓ ਸਿਰ ਊਪਰਿ ਤਬ ਸੋਵਤ ਤੈ ਜਾਗਿਓ ॥
ਕਹਾ ਹੋਤ ਅਬ ਕੈ ਪਛੁਤਾਏ ਛੂਟਤ ਨਾਹਿਨ ਭਾਗਿਓ ॥੧॥
ਇਹ ਚਿੰਤਾ ਉਪਜੀ ਘਟ ਮਹਿ ਜਬ ਗੁਰ ਚਰਨਨ ਅਨੁਰਾਗਿਓ ॥
ਸੁਫਲੁ ਜਨਮੁ ਨਾਨਕ ਤਬ ਹੂਆ ਜਉ ਪ੍ਰਭ ਜਸ ਮਹਿ ਪਾਗਿਓ ॥੨॥੩॥
मारू महला ९ ॥
माई मै मन को मानु न तिआगिओ ॥
माइआ के मदि जनमु सिराइओ राम भजनि नही लागिओ ॥१॥ रहाउ ॥
जम को डंडु परिओ सिर ऊपरि तब सोवत तै जागिओ ॥
कहा होत अब कै पछुताए छूटत नाहिन भागिओ ॥१॥
इह चिंता उपजी घट महि जब गुर चरनन अनुरागिओ ॥
सुफलु जनमु नानक तब हूआ जउ प्रभ जस महि पागिओ ॥२॥३॥
माई मै मन को मानु न तिआगिओ ॥
माइआ के मदि जनमु सिराइओ राम भजनि नही लागिओ ॥१॥ रहाउ ॥
जम को डंडु परिओ सिर ऊपरि तब सोवत तै जागिओ ॥
कहा होत अब कै पछुताए छूटत नाहिन भागिओ ॥१॥
इह चिंता उपजी घट महि जब गुर चरनन अनुरागिओ ॥
सुफलु जनमु नानक तब हूआ जउ प्रभ जस महि पागिओ ॥२॥३॥
हिन्दी अर्थ: मारू महला ९॥ हे माँ ! (जब से मैंने गुरू-चरणों में प्यार डाला है। तब से मैं पछता रहा हूँ कि) मैंने अपने मन का अहंकार नहीं छोड़ा। माया के नशे में मैंने अपनी उम्र गुजार दी। और। परमात्मा के भजन में ना लगा। 1। रहाउ। (हे भाई ! मनुष्य माया की नींद में गाफिल पड़ा रहता है) जब जमदूत का डंडा (इस के) सिर पर बजता है। तब (माया के मोह की नींद में से) सोया हुआ जागता है। पर उस वक्त के पछतावे से कुछ सँवरता नहीं। (क्योंकि उस समय जमों से) भागने पर बचाव नहीं हो सकता। 1। हे भाई ! जब मनुष्य गुरू के चरणों में प्यार डालता है। तब उसके हृदय में यह फुरना उठता है (कि प्रभू के भजन के बिना उम्र व्यर्थ ही बीतती रही)। हे नानक ! मनुष्य की जिंदगी कामयाब तब ही होती है जब (यह गुरू की शरण पड़ कर) परमात्मा की सिफत-सालाह में जुड़ता है। 2। 3।
ਮਾਰੂ ਅਸਟਪਦੀਆ ਮਹਲਾ ੧ ਘਰੁ ੧
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਬੇਦ ਪੁਰਾਣ ਕਥੇ ਸੁਣੇ ਹਾਰੇ ਮੁਨੀ ਅਨੇਕਾ ॥
ਅਠਸਠਿ ਤੀਰਥ ਬਹੁ ਘਣਾ ਭ੍ਰਮਿ ਥਾਕੇ ਭੇਖਾ ॥
ਸਾਚੋ ਸਾਹਿਬੁ ਨਿਰਮਲੋ ਮਨਿ ਮਾਨੈ ਏਕਾ ॥੧॥
ਤੂ ਅਜਰਾਵਰੁ ਅਮਰੁ ਤੂ ਸਭ ਚਾਲਣਹਾਰੀ ॥
ਨਾਮੁ ਰਸਾਇਣੁ ਭਾਇ ਲੈ ਪਰਹਰਿ ਦੁਖੁ ਭਾਰੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਬੇਦ ਪੁਰਾਣ ਕਥੇ ਸੁਣੇ ਹਾਰੇ ਮੁਨੀ ਅਨੇਕਾ ॥
ਅਠਸਠਿ ਤੀਰਥ ਬਹੁ ਘਣਾ ਭ੍ਰਮਿ ਥਾਕੇ ਭੇਖਾ ॥
ਸਾਚੋ ਸਾਹਿਬੁ ਨਿਰਮਲੋ ਮਨਿ ਮਾਨੈ ਏਕਾ ॥੧॥
ਤੂ ਅਜਰਾਵਰੁ ਅਮਰੁ ਤੂ ਸਭ ਚਾਲਣਹਾਰੀ ॥
ਨਾਮੁ ਰਸਾਇਣੁ ਭਾਇ ਲੈ ਪਰਹਰਿ ਦੁਖੁ ਭਾਰੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
मारू असटपदीआ महला १ घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
बेद पुराण कथे सुणे हारे मुनी अनेका ॥
अठसठि तीरथ बहु घणा भ्रमि थाके भेखा ॥
साचो साहिबु निरमलो मनि मानै एका ॥१॥
तू अजरावरु अमरु तू सभ चालणहारी ॥
नामु रसाइणु भाइ लै परहरि दुखु भारी ॥१॥ रहाउ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
बेद पुराण कथे सुणे हारे मुनी अनेका ॥
अठसठि तीरथ बहु घणा भ्रमि थाके भेखा ॥
साचो साहिबु निरमलो मनि मानै एका ॥१॥
तू अजरावरु अमरु तू सभ चालणहारी ॥
नामु रसाइणु भाइ लै परहरि दुखु भारी ॥१॥ रहाउ ॥
हिन्दी अर्थ: मारू असटपदीआ महला १ घरु १ ੴ सतिगुर प्रसादि॥ अनेकों ऋषि मुनि (मौनधारी) वेद-पुराण (आदि धर्म-पुस्तकें) सुना-सुना के सुन-सुन के थक गए। सब भेषों के अनेकों साधू अढ़सठ तीर्थों पर भटक-भटक के थक गए (परन्तु परमात्मा को प्रसन्न ना कर सके)। वह सदा-स्थिर रहने वाला पवित्र मालिक सिर्फ मन (की पवित्रता) के द्वारा ही पतीजता है। 1। हे प्रभू ! सारी सृष्टि नाशवंत है। (पर) तू कभी बूढ़ा नहीं होता। तू अति श्रेष्ठ है। तू मौत से रहित है। तेरा नाम सारे रसों का श्रोत है। जो जीव (तेरा नाम) प्रेम से जपता है। वह अपना बड़े से बड़ा दुख दूर कर लेता है। 1। रहाउ।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 1008 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Tegh Bahaadur Ji।
Gurgaon-Delhi border पर शाम 8 बजे की रुकी हुई traffic।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 37 पंक्तियों का है, 5 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1008” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 1009 →, पीछे का: ← अंग 1007।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।