अंग
1050
राग मारू
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਗੁਰਮੁਖਿ ਗਿਆਨੁ ਏਕੋ ਹੈ ਜਾਤਾ ਅਨਦਿਨੁ ਨਾਮੁ ਰਵੀਜੈ ਹੇ ॥੧੩॥
ਬੇਦ ਪੜਹਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਨ ਬੂਝਹਿ ॥
ਮਾਇਆ ਕਾਰਣਿ ਪੜਿ ਪੜਿ ਲੂਝਹਿ ॥
ਅੰਤਰਿ ਮੈਲੁ ਅਗਿਆਨੀ ਅੰਧਾ ਕਿਉ ਕਰਿ ਦੁਤਰੁ ਤਰੀਜੈ ਹੇ ॥੧੪॥
ਬੇਦ ਬਾਦ ਸਭਿ ਆਖਿ ਵਖਾਣਹਿ ॥
ਨ ਅੰਤਰੁ ਭੀਜੈ ਨ ਸਬਦੁ ਪਛਾਣਹਿ ॥
ਪੁੰਨੁ ਪਾਪੁ ਸਭੁ ਬੇਦਿ ਦ੍ਰਿੜਾਇਆ ਗੁਰਮੁਖਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀਜੈ ਹੇ ॥੧੫॥
ਆਪੇ ਸਾਚਾ ਏਕੋ ਸੋਈ ॥
ਤਿਸੁ ਬਿਨੁ ਦੂਜਾ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਈ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਮਨੁ ਸਾਚਾ ਸਚੋ ਸਚੁ ਰਵੀਜੈ ਹੇ ॥੧੬॥੬॥
ਬੇਦ ਪੜਹਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਨ ਬੂਝਹਿ ॥
ਮਾਇਆ ਕਾਰਣਿ ਪੜਿ ਪੜਿ ਲੂਝਹਿ ॥
ਅੰਤਰਿ ਮੈਲੁ ਅਗਿਆਨੀ ਅੰਧਾ ਕਿਉ ਕਰਿ ਦੁਤਰੁ ਤਰੀਜੈ ਹੇ ॥੧੪॥
ਬੇਦ ਬਾਦ ਸਭਿ ਆਖਿ ਵਖਾਣਹਿ ॥
ਨ ਅੰਤਰੁ ਭੀਜੈ ਨ ਸਬਦੁ ਪਛਾਣਹਿ ॥
ਪੁੰਨੁ ਪਾਪੁ ਸਭੁ ਬੇਦਿ ਦ੍ਰਿੜਾਇਆ ਗੁਰਮੁਖਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀਜੈ ਹੇ ॥੧੫॥
ਆਪੇ ਸਾਚਾ ਏਕੋ ਸੋਈ ॥
ਤਿਸੁ ਬਿਨੁ ਦੂਜਾ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਈ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਮਨੁ ਸਾਚਾ ਸਚੋ ਸਚੁ ਰਵੀਜੈ ਹੇ ॥੧੬॥੬॥
गुरमुखि गिआनु एको है जाता अनदिनु नामु रवीजै हे ॥१३॥
बेद पड़हि हरि नामु न बूझहि ॥
माइआ कारणि पड़ि पड़ि लूझहि ॥
अंतरि मैलु अगिआनी अंधा किउ करि दुतरु तरीजै हे ॥१४॥
बेद बाद सभि आखि वखाणहि ॥
न अंतरु भीजै न सबदु पछाणहि ॥
पुंनु पापु सभु बेदि द्रिड़ाइआ गुरमुखि अंम्रितु पीजै हे ॥१५॥
आपे साचा एको सोई ॥
तिसु बिनु दूजा अवरु न कोई ॥
नानक नामि रते मनु साचा सचो सचु रवीजै हे ॥१६॥६॥
बेद पड़हि हरि नामु न बूझहि ॥
माइआ कारणि पड़ि पड़ि लूझहि ॥
अंतरि मैलु अगिआनी अंधा किउ करि दुतरु तरीजै हे ॥१४॥
बेद बाद सभि आखि वखाणहि ॥
न अंतरु भीजै न सबदु पछाणहि ॥
पुंनु पापु सभु बेदि द्रिड़ाइआ गुरमुखि अंम्रितु पीजै हे ॥१५॥
आपे साचा एको सोई ॥
तिसु बिनु दूजा अवरु न कोई ॥
नानक नामि रते मनु साचा सचो सचु रवीजै हे ॥१६॥६॥
हिन्दी अर्थ: जो मनुष्य गुरू के सन्मुख रहता है वह सिर्फ यही आत्मिक जीवन की सूझ हासिल करता है कि हर वक्त परमात्मा का नाम सिमरना चाहिए। 13। हे भाई ! (पंण्डित लोग) वेद (आदि धर्म-पुस्तकें) पढ़ते हैं। (पर अगर वे) परमात्मा के नाम को (जीवन का मनोरथ) नहीं समझते। तो वे माया (कमाने) के लिए ही (वेदा आदि धर्म-पुस्तकों को) पढ़-पढ़ के (माया के कम चढ़ावे को देख कर अंदर-अंदर से ही) खिझते रहते हैं। हे भाई ! जिस मनुष्य के अंदर (माया के मोह की) मैल है (वह वेद-पाठी पंडित भी हो। तो भी) वह अंधा बेसमझ है। इस तरह यह दुश्तर संसार-समुंद्र तैरा नहीं जा सकता। 14। हे भाई ! सारे (पण्डित लोक) वेद (आदि धम्र पुस्तकों) की चर्चा उचार के (औरों के सामने) व्याख्या करते हैं। (इस तरह) ना (उनका अपना) हृदय भीगता है। ना ही वे सिफत सालाह की बाणी की कद्र समझते हैं। हे भाई ! वेदों ने बार-बार इस बात की ओर ध्यान दिलाया है कि कौन सा पुन्य कर्म है और कौन सा ‘पाप कर्म’ है। आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल तो गुरू के शरण पड़ कर ही पीया जा सकता है। 15। हे भाई ! (अपने जैसा) सिर्फ वह परमत्मा स्वयं ही है जो सदा कायम रहने है। उसके बिना (उस जैसा) है उसके बिना (उस जैसा) और कोई नहीं। हे नानक ! जो मनुष्य परमात्मा के नाम-रंग में रंगे गए हैं। उनका मन अडोल हो जाता है। (इस वासते। हे भाई ! ) सदा कायम रहने वाले परमात्मा को ही सिमरना चाहिए। 16। 6।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਸਚੈ ਸਚਾ ਤਖਤੁ ਰਚਾਇਆ ॥
ਨਿਜ ਘਰਿ ਵਸਿਆ ਤਿਥੈ ਮੋਹੁ ਨ ਮਾਇਆ ॥
ਸਦ ਹੀ ਸਾਚੁ ਵਸਿਆ ਘਟ ਅੰਤਰਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਕਰਣੀ ਸਾਰੀ ਹੇ ॥੧॥
ਸਚਾ ਸਉਦਾ ਸਚੁ ਵਾਪਾਰਾ ॥
ਨ ਤਿਥੈ ਭਰਮੁ ਨ ਦੂਜਾ ਪਸਾਰਾ ॥
ਸਚਾ ਧਨੁ ਖਟਿਆ ਕਦੇ ਤੋਟਿ ਨ ਆਵੈ ਬੂਝੈ ਕੋ ਵੀਚਾਰੀ ਹੇ ॥੨॥
ਸਚੈ ਲਾਏ ਸੇ ਜਨ ਲਾਗੇ ॥
ਅੰਤਰਿ ਸਬਦੁ ਮਸਤਕਿ ਵਡਭਾਗੇ ॥
ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਸਦਾ ਗੁਣ ਗਾਵਹਿ ਸਬਦਿ ਰਤੇ ਵੀਚਾਰੀ ਹੇ ॥੩॥
ਸਚੋ ਸਚਾ ਸਚੁ ਸਾਲਾਹੀ ॥
ਏਕੋ ਵੇਖਾ ਦੂਜਾ ਨਾਹੀ ॥
ਗੁਰਮਤਿ ਊਚੋ ਊਚੀ ਪਉੜੀ ਗਿਆਨਿ ਰਤਨਿ ਹਉਮੈ ਮਾਰੀ ਹੇ ॥੪॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਸਬਦਿ ਜਲਾਇਆ ॥
ਸਚੁ ਮਨਿ ਵਸਿਆ ਜਾ ਤੁਧੁ ਭਾਇਆ ॥
ਸਚੇ ਕੀ ਸਭ ਸਚੀ ਕਰਣੀ ਹਉਮੈ ਤਿਖਾ ਨਿਵਾਰੀ ਹੇ ॥੫॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਸਭੁ ਆਪੇ ਕੀਨਾ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਵਿਰਲੈ ਕਿਨ ਹੀ ਚੀਨਾ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੋਵੈ ਸੁ ਸਚੁ ਕਮਾਵੈ ਸਾਚੀ ਕਰਣੀ ਸਾਰੀ ਹੇ ॥੬॥
ਕਾਰ ਕਮਾਈ ਜੋ ਮੇਰੇ ਪ੍ਰਭ ਭਾਈ ॥
ਹਉਮੈ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਸਬਦਿ ਬੁਝਾਈ ॥
ਗੁਰਮਤਿ ਸਦ ਹੀ ਅੰਤਰੁ ਸੀਤਲੁ ਹਉਮੈ ਮਾਰਿ ਨਿਵਾਰੀ ਹੇ ॥੭॥
ਸਚਿ ਲਗੇ ਤਿਨ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਭਾਵੈ ॥
ਸਚੈ ਸਬਦੇ ਸਚਿ ਸੁਹਾਵੈ ॥
ਐਥੈ ਸਾਚੇ ਸੇ ਦਰਿ ਸਾਚੇ ਨਦਰੀ ਨਦਰਿ ਸਵਾਰੀ ਹੇ ॥੮॥
ਬਿਨੁ ਸਾਚੇ ਜੋ ਦੂਜੈ ਲਾਇਆ ॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹ ਦੁਖ ਸਬਾਇਆ ॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਦੁਖੁ ਸੁਖੁ ਜਾਪੈ ਨਾਹੀ ਮਾਇਆ ਮੋਹ ਦੁਖੁ ਭਾਰੀ ਹੇ ॥੯॥
ਸਾਚਾ ਸਬਦੁ ਜਿਨਾ ਮਨਿ ਭਾਇਆ ॥
ਪੂਰਬਿ ਲਿਖਿਆ ਤਿਨੀ ਕਮਾਇਆ ॥
ਸਚੋ ਸੇਵਹਿ ਸਚੁ ਧਿਆਵਹਿ ਸਚਿ ਰਤੇ ਵੀਚਾਰੀ ਹੇ ॥੧੦॥
ਗੁਰ ਕੀ ਸੇਵਾ ਮੀਠੀ ਲਾਗੀ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਸੂਖ ਸਹਜ ਸਮਾਧੀ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਕਰਤਿਆ ਮਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਹੋਆ ਗੁਰ ਕੀ ਸੇਵ ਪਿਆਰੀ ਹੇ ॥੧੧॥
ਸੇ ਜਨ ਸੁਖੀਏ ਸਤਿਗੁਰਿ ਸਚੇ ਲਾਏ ॥
ਆਪੇ ਭਾਣੇ ਆਪਿ ਮਿਲਾਏ ॥
ਸਤਿਗੁਰਿ ਰਾਖੇ ਸੇ ਜਨ ਉਬਰੇ ਹੋਰ ਮਾਇਆ ਮੋਹ ਖੁਆਰੀ ਹੇ ॥੧੨॥
ਸਚੈ ਸਚਾ ਤਖਤੁ ਰਚਾਇਆ ॥
ਨਿਜ ਘਰਿ ਵਸਿਆ ਤਿਥੈ ਮੋਹੁ ਨ ਮਾਇਆ ॥
ਸਦ ਹੀ ਸਾਚੁ ਵਸਿਆ ਘਟ ਅੰਤਰਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਕਰਣੀ ਸਾਰੀ ਹੇ ॥੧॥
ਸਚਾ ਸਉਦਾ ਸਚੁ ਵਾਪਾਰਾ ॥
ਨ ਤਿਥੈ ਭਰਮੁ ਨ ਦੂਜਾ ਪਸਾਰਾ ॥
ਸਚਾ ਧਨੁ ਖਟਿਆ ਕਦੇ ਤੋਟਿ ਨ ਆਵੈ ਬੂਝੈ ਕੋ ਵੀਚਾਰੀ ਹੇ ॥੨॥
ਸਚੈ ਲਾਏ ਸੇ ਜਨ ਲਾਗੇ ॥
ਅੰਤਰਿ ਸਬਦੁ ਮਸਤਕਿ ਵਡਭਾਗੇ ॥
ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਸਦਾ ਗੁਣ ਗਾਵਹਿ ਸਬਦਿ ਰਤੇ ਵੀਚਾਰੀ ਹੇ ॥੩॥
ਸਚੋ ਸਚਾ ਸਚੁ ਸਾਲਾਹੀ ॥
ਏਕੋ ਵੇਖਾ ਦੂਜਾ ਨਾਹੀ ॥
ਗੁਰਮਤਿ ਊਚੋ ਊਚੀ ਪਉੜੀ ਗਿਆਨਿ ਰਤਨਿ ਹਉਮੈ ਮਾਰੀ ਹੇ ॥੪॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਸਬਦਿ ਜਲਾਇਆ ॥
ਸਚੁ ਮਨਿ ਵਸਿਆ ਜਾ ਤੁਧੁ ਭਾਇਆ ॥
ਸਚੇ ਕੀ ਸਭ ਸਚੀ ਕਰਣੀ ਹਉਮੈ ਤਿਖਾ ਨਿਵਾਰੀ ਹੇ ॥੫॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਸਭੁ ਆਪੇ ਕੀਨਾ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਵਿਰਲੈ ਕਿਨ ਹੀ ਚੀਨਾ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੋਵੈ ਸੁ ਸਚੁ ਕਮਾਵੈ ਸਾਚੀ ਕਰਣੀ ਸਾਰੀ ਹੇ ॥੬॥
ਕਾਰ ਕਮਾਈ ਜੋ ਮੇਰੇ ਪ੍ਰਭ ਭਾਈ ॥
ਹਉਮੈ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਸਬਦਿ ਬੁਝਾਈ ॥
ਗੁਰਮਤਿ ਸਦ ਹੀ ਅੰਤਰੁ ਸੀਤਲੁ ਹਉਮੈ ਮਾਰਿ ਨਿਵਾਰੀ ਹੇ ॥੭॥
ਸਚਿ ਲਗੇ ਤਿਨ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਭਾਵੈ ॥
ਸਚੈ ਸਬਦੇ ਸਚਿ ਸੁਹਾਵੈ ॥
ਐਥੈ ਸਾਚੇ ਸੇ ਦਰਿ ਸਾਚੇ ਨਦਰੀ ਨਦਰਿ ਸਵਾਰੀ ਹੇ ॥੮॥
ਬਿਨੁ ਸਾਚੇ ਜੋ ਦੂਜੈ ਲਾਇਆ ॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹ ਦੁਖ ਸਬਾਇਆ ॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਦੁਖੁ ਸੁਖੁ ਜਾਪੈ ਨਾਹੀ ਮਾਇਆ ਮੋਹ ਦੁਖੁ ਭਾਰੀ ਹੇ ॥੯॥
ਸਾਚਾ ਸਬਦੁ ਜਿਨਾ ਮਨਿ ਭਾਇਆ ॥
ਪੂਰਬਿ ਲਿਖਿਆ ਤਿਨੀ ਕਮਾਇਆ ॥
ਸਚੋ ਸੇਵਹਿ ਸਚੁ ਧਿਆਵਹਿ ਸਚਿ ਰਤੇ ਵੀਚਾਰੀ ਹੇ ॥੧੦॥
ਗੁਰ ਕੀ ਸੇਵਾ ਮੀਠੀ ਲਾਗੀ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਸੂਖ ਸਹਜ ਸਮਾਧੀ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਕਰਤਿਆ ਮਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਹੋਆ ਗੁਰ ਕੀ ਸੇਵ ਪਿਆਰੀ ਹੇ ॥੧੧॥
ਸੇ ਜਨ ਸੁਖੀਏ ਸਤਿਗੁਰਿ ਸਚੇ ਲਾਏ ॥
ਆਪੇ ਭਾਣੇ ਆਪਿ ਮਿਲਾਏ ॥
ਸਤਿਗੁਰਿ ਰਾਖੇ ਸੇ ਜਨ ਉਬਰੇ ਹੋਰ ਮਾਇਆ ਮੋਹ ਖੁਆਰੀ ਹੇ ॥੧੨॥
मारू महला ३ ॥
सचै सचा तखतु रचाइआ ॥
निज घरि वसिआ तिथै मोहु न माइआ ॥
सद ही साचु वसिआ घट अंतरि गुरमुखि करणी सारी हे ॥१॥
सचा सउदा सचु वापारा ॥
न तिथै भरमु न दूजा पसारा ॥
सचा धनु खटिआ कदे तोटि न आवै बूझै को वीचारी हे ॥२॥
सचै लाए से जन लागे ॥
अंतरि सबदु मसतकि वडभागे ॥
सचै सबदि सदा गुण गावहि सबदि रते वीचारी हे ॥३॥
सचो सचा सचु सालाही ॥
एको वेखा दूजा नाही ॥
गुरमति ऊचो ऊची पउड़ी गिआनि रतनि हउमै मारी हे ॥४॥
माइआ मोहु सबदि जलाइआ ॥
सचु मनि वसिआ जा तुधु भाइआ ॥
सचे की सभ सची करणी हउमै तिखा निवारी हे ॥५॥
माइआ मोहु सभु आपे कीना ॥
गुरमुखि विरलै किन ही चीना ॥
गुरमुखि होवै सु सचु कमावै साची करणी सारी हे ॥६॥
कार कमाई जो मेरे प्रभ भाई ॥
हउमै त्रिसना सबदि बुझाई ॥
गुरमति सद ही अंतरु सीतलु हउमै मारि निवारी हे ॥७॥
सचि लगे तिन सभु किछु भावै ॥
सचै सबदे सचि सुहावै ॥
ऐथै साचे से दरि साचे नदरी नदरि सवारी हे ॥८॥
बिनु साचे जो दूजै लाइआ ॥
माइआ मोह दुख सबाइआ ॥
बिनु गुर दुखु सुखु जापै नाही माइआ मोह दुखु भारी हे ॥९॥
साचा सबदु जिना मनि भाइआ ॥
पूरबि लिखिआ तिनी कमाइआ ॥
सचो सेवहि सचु धिआवहि सचि रते वीचारी हे ॥१०॥
गुर की सेवा मीठी लागी ॥
अनदिनु सूख सहज समाधी ॥
हरि हरि करतिआ मनु निरमलु होआ गुर की सेव पिआरी हे ॥११॥
से जन सुखीए सतिगुरि सचे लाए ॥
आपे भाणे आपि मिलाए ॥
सतिगुरि राखे से जन उबरे होर माइआ मोह खुआरी हे ॥१२॥
सचै सचा तखतु रचाइआ ॥
निज घरि वसिआ तिथै मोहु न माइआ ॥
सद ही साचु वसिआ घट अंतरि गुरमुखि करणी सारी हे ॥१॥
सचा सउदा सचु वापारा ॥
न तिथै भरमु न दूजा पसारा ॥
सचा धनु खटिआ कदे तोटि न आवै बूझै को वीचारी हे ॥२॥
सचै लाए से जन लागे ॥
अंतरि सबदु मसतकि वडभागे ॥
सचै सबदि सदा गुण गावहि सबदि रते वीचारी हे ॥३॥
सचो सचा सचु सालाही ॥
एको वेखा दूजा नाही ॥
गुरमति ऊचो ऊची पउड़ी गिआनि रतनि हउमै मारी हे ॥४॥
माइआ मोहु सबदि जलाइआ ॥
सचु मनि वसिआ जा तुधु भाइआ ॥
सचे की सभ सची करणी हउमै तिखा निवारी हे ॥५॥
माइआ मोहु सभु आपे कीना ॥
गुरमुखि विरलै किन ही चीना ॥
गुरमुखि होवै सु सचु कमावै साची करणी सारी हे ॥६॥
कार कमाई जो मेरे प्रभ भाई ॥
हउमै त्रिसना सबदि बुझाई ॥
गुरमति सद ही अंतरु सीतलु हउमै मारि निवारी हे ॥७॥
सचि लगे तिन सभु किछु भावै ॥
सचै सबदे सचि सुहावै ॥
ऐथै साचे से दरि साचे नदरी नदरि सवारी हे ॥८॥
बिनु साचे जो दूजै लाइआ ॥
माइआ मोह दुख सबाइआ ॥
बिनु गुर दुखु सुखु जापै नाही माइआ मोह दुखु भारी हे ॥९॥
साचा सबदु जिना मनि भाइआ ॥
पूरबि लिखिआ तिनी कमाइआ ॥
सचो सेवहि सचु धिआवहि सचि रते वीचारी हे ॥१०॥
गुर की सेवा मीठी लागी ॥
अनदिनु सूख सहज समाधी ॥
हरि हरि करतिआ मनु निरमलु होआ गुर की सेव पिआरी हे ॥११॥
से जन सुखीए सतिगुरि सचे लाए ॥
आपे भाणे आपि मिलाए ॥
सतिगुरि राखे से जन उबरे होर माइआ मोह खुआरी हे ॥१२॥
हिन्दी अर्थ: मारू महला ३॥ हे भाई ! सदा कायम रहने वाले परमात्मा ने (अपने ‘निज घर’ में बैठने के लिए) सदा कायम रहने वाला तख्त बना रखा है। उस स्वै-स्वरूप में वह अडोल बैठा है। वहाँ माया का मोह असर नहीं कर सकता। हे भाई ! गुरू की शरण पड़ कर जो मनुष्य (हरी-नाम जपने का) श्रेष्ठ करने-योग्य कर्म करता है। उसके हृदय में वह सदा-स्थिर प्रभू हमेशा के लिए आ बसता है। 1। हे भाई ! नाम-धन कमाना ही सदा-स्थिर सौदा है सदा-स्थिर व्यापार है। उस सौदे-व्यापार में कोई भटकना नहीं। कोई माया का पसारा नहीं। यह सदा-स्थिर नाम-धन कमाने से कभी घाटा नहीं पड़ता। पर इस बात को कोई विरला विचारवान ही समझता है। 2। हे भाई ! (इस नाम-धन के व्यापार में) वही मनुष्य लगते हैं। जिनको सदा-स्थिर परमात्मा ने स्वयं लगाया है। उनके हृदय में गुरू का शबद बसता है। उनके माथे पर अच्छे भाग्य जाग उठते हैं। वह मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू की सिफत-सालाह के शबद से सदा हरी-गुण गाते रहते हैं। वह मनुष्य गुरू-शबद (के रंग) में रंगे रहते हैं। वह उच्च विचार के मालिक बन जाते हैं। 3। हे भाई ! मैं तो सदा उस सदा कायम रहने वाले परमात्मा की ही सिफत-सालाह करता हूँ। मैं तो (हर जगह) सिर्फ उस परमात्मा को ही देखता हूँ। (मुझे उसके बिना) कोई और नहीं (दिखाई देता)। हे भाई ! गुरू की मति पर चल कर (परमात्मा की सिफत-सालाह करनी – यह ही परमात्मा के चरणों तक पहुँचने के लिए) सबसे ऊँची सीढ़ी है। इस श्रेष्ठ ज्ञान की बरकति से मनुष्य (अपने अंदर से) अहंकार मार खत्म कर देता है। 4। हे प्रभू ! जिस मनुष्य ने गुरू के शबद की बरकति से (अपने अंदर से) माया का मोह जला डाला। जब वह मनुष्य तुझे अच्छा लग पड़ा तब तेरा सदा-स्थिर नाम उस के मन में बस गया। हे भाई ! जिस मनुष्य ने (अपने अंदर से) अहंकार दूर कर लिया। माया की तृष्णा दूर कर ली। उसको अभूल परमात्मा की सारी कार अभूल प्रतीत होने लग गई। 5। हे भाई ! माया का सारा मोह परमात्मा ने स्वयं ही पैदा किया है। पर ये बात किसी उस विरले ने ही पहचानी है जो गुरू के सन्मुख रहता है। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ जाता है। वह मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू के नाम सिमरन की कमाई करता है। उसको नाम-सिमरन वाली कार ही श्रेष्ठ लगती है। 6। हे भाई ! जिस मनुष्य ने वह कार करनी आरम्भ कर दी जो मेरे प्रभू को पसंद आती है (जिस मनुष्य ने प्रभू की रजा में चलना आरम्भ कर दिया)। जिसने गुरू के शबद द्वारा (अपने अंदर से) अहंकार दूर कर लिया। माया की तृष्णा मिटा ली। गुरू की मति पर चल कर उसका हृदय सदा ही शांत रहता है। 7। हे भाई ! जो मनुष्य सदा-स्थिर हरी-नाम में जुड़ते हैं। उनको परमात्मा का किया हुआ हरेक काम भला प्रतीत होता है। हे भाई ! सदा-स्थिर प्रभू की सिफत-सालाह की बाणी से सदा-स्थिर प्रभू में टिक के मनुष्य अपना जीवन सुंदर बना लेता है। (सिमरन की बरकति से जो मनुष्य) इस लोक में सुर्खरू हो जाते हैं। वे मनुष्य प्रभू की हजूरी में भी सुर्खरू हो जाते हैं। मेहर की निगाह वाले परमात्मा की मेहर की नज़र उनका जीवन सँवार देती है। 8। हे भाई ! सदा-स्थिर प्रभू (के नाम) से टूट कर जो मनुष्य माया के प्यार में मस्त रहता है। उसको माया के मोह के सारे दुख (चिपके रहते हैं)। माया के मोह का बहुत सारा दुख उसको बना रहता है। गुरू की शरण के बिना ये समझ नहीं आती कि दुख कैसे दूर हो और सुख कैसे मिले। 9। हे भाई ! जिन मनुष्यों के मन में सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह की बाणी प्यारी लगने लग जाती है। वही मनुष्य पूर्बले जनम में किए कर्मों के संस्कारों के अनुसार (नाम सिमरन की) कमाई करते हैं। वह मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू की सेवा-भक्ति करते हैं। सदा-स्थिर प्रभू को सिमरते हैं। सदा-स्थिर प्रभू के नाम-रंग में रंगे जाते हैं। और ऊँची सूझ वाले हो जाते हैं। 10। हे भाई ! जिस मनुष्य को गुरू की (बताई) सेवा प्यारी लगती है। वह हर वक्त आत्मिक आनंद पाता है। उसकी आत्मिक अडोलता वाली समाधि बनी रहती है। परमात्मा का नाम जपते उसका मन पवित्र हो जाता है। गुरू की शरण पड़े रहना उसको अच्छा लगता है। 11। हे भाई ! जिन मनुष्यों को गुरू ने सदा-स्थिर प्रभू की याद में जोड़ दिया। वे सुखी जीवन व्यतीत करते हैं। (ये परमात्मा की अपनी ही मेहर है। प्रभू को) स्वयं ही (ऐसे मनुष्य) अच्छे लगे। और। स्वयं ही उसने (अपने चरणों में) जोड़ लिए। हे भाई ! गुरू ने जिन मनुष्यों की रक्षा की। वे मनुष्य (माया के मोह से) बच गए। बाकी की दुनिया माया के मोह का संताप ही (सारी उम्र) सहती रही। 12।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 1050 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।
दिल्ली के सुबह 5 बजे के gurdwara में जब रागी पहली पंक्ति गाता है, हवा में एक specific quietness आती है।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 47 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1050” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 1051 →, पीछे का: ← अंग 1049।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।