अंग
1075
राग मारू
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਗੁਰੁ ਸਿਮਰਤ ਸਭਿ ਕਿਲਵਿਖ ਨਾਸਹਿ ॥
ਗੁਰੁ ਸਿਮਰਤ ਜਮ ਸੰਗਿ ਨ ਫਾਸਹਿ ॥
ਗੁਰੁ ਸਿਮਰਤ ਮਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਹੋਵੈ ਗੁਰੁ ਕਾਟੇ ਅਪਮਾਨਾ ਹੇ ॥੨॥
ਗੁਰ ਕਾ ਸੇਵਕੁ ਨਰਕਿ ਨ ਜਾਏ ॥
ਗੁਰ ਕਾ ਸੇਵਕੁ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਧਿਆਏ ॥
ਗੁਰ ਕਾ ਸੇਵਕੁ ਸਾਧਸੰਗੁ ਪਾਏ ਗੁਰੁ ਕਰਦਾ ਨਿਤ ਜੀਅ ਦਾਨਾ ਹੇ ॥੩॥
ਗੁਰ ਦੁਆਰੈ ਹਰਿ ਕੀਰਤਨੁ ਸੁਣੀਐ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਭੇਟਿ ਹਰਿ ਜਸੁ ਮੁਖਿ ਭਣੀਐ ॥
ਕਲਿ ਕਲੇਸ ਮਿਟਾਏ ਸਤਿਗੁਰੁ ਹਰਿ ਦਰਗਹ ਦੇਵੈ ਮਾਨਾਂ ਹੇ ॥੪॥
ਅਗਮੁ ਅਗੋਚਰੁ ਗੁਰੂ ਦਿਖਾਇਆ ॥
ਭੂਲਾ ਮਾਰਗਿ ਸਤਿਗੁਰਿ ਪਾਇਆ ॥
ਗੁਰ ਸੇਵਕ ਕਉ ਬਿਘਨੁ ਨ ਭਗਤੀ ਹਰਿ ਪੂਰ ਦ੍ਰਿੜੑਾਇਆ ਗਿਆਨਾਂ ਹੇ ॥੫॥
ਗੁਰਿ ਦ੍ਰਿਸਟਾਇਆ ਸਭਨੀ ਠਾਂਈ ॥
ਜਲਿ ਥਲਿ ਪੂਰਿ ਰਹਿਆ ਗੋਸਾਈ ॥
ਊਚ ਊਨ ਸਭ ਏਕ ਸਮਾਨਾਂ ਮਨਿ ਲਾਗਾ ਸਹਜਿ ਧਿਆਨਾ ਹੇ ॥੬॥
ਗੁਰਿ ਮਿਲਿਐ ਸਭ ਤ੍ਰਿਸਨ ਬੁਝਾਈ ॥
ਗੁਰਿ ਮਿਲਿਐ ਨਹ ਜੋਹੈ ਮਾਈ ॥
ਸਤੁ ਸੰਤੋਖੁ ਦੀਆ ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਨਾਮੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀ ਪਾਨਾਂ ਹੇ ॥੭॥
ਗੁਰ ਕੀ ਬਾਣੀ ਸਭ ਮਾਹਿ ਸਮਾਣੀ ॥
ਆਪਿ ਸੁਣੀ ਤੈ ਆਪਿ ਵਖਾਣੀ ॥
ਜਿਨਿ ਜਿਨਿ ਜਪੀ ਤੇਈ ਸਭਿ ਨਿਸਤ੍ਰੇ ਤਿਨ ਪਾਇਆ ਨਿਹਚਲ ਥਾਨਾਂ ਹੇ ॥੮॥
ਸਤਿਗੁਰ ਕੀ ਮਹਿਮਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਜਾਣੈ ॥
ਜੋ ਕਿਛੁ ਕਰੇ ਸੁ ਆਪਣ ਭਾਣੈ ॥
ਸਾਧੂ ਧੂਰਿ ਜਾਚਹਿ ਜਨ ਤੇਰੇ ਨਾਨਕ ਸਦ ਕੁਰਬਾਨਾਂ ਹੇ ॥੯॥੧॥੪॥
ਗੁਰੁ ਸਿਮਰਤ ਜਮ ਸੰਗਿ ਨ ਫਾਸਹਿ ॥
ਗੁਰੁ ਸਿਮਰਤ ਮਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਹੋਵੈ ਗੁਰੁ ਕਾਟੇ ਅਪਮਾਨਾ ਹੇ ॥੨॥
ਗੁਰ ਕਾ ਸੇਵਕੁ ਨਰਕਿ ਨ ਜਾਏ ॥
ਗੁਰ ਕਾ ਸੇਵਕੁ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਧਿਆਏ ॥
ਗੁਰ ਕਾ ਸੇਵਕੁ ਸਾਧਸੰਗੁ ਪਾਏ ਗੁਰੁ ਕਰਦਾ ਨਿਤ ਜੀਅ ਦਾਨਾ ਹੇ ॥੩॥
ਗੁਰ ਦੁਆਰੈ ਹਰਿ ਕੀਰਤਨੁ ਸੁਣੀਐ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਭੇਟਿ ਹਰਿ ਜਸੁ ਮੁਖਿ ਭਣੀਐ ॥
ਕਲਿ ਕਲੇਸ ਮਿਟਾਏ ਸਤਿਗੁਰੁ ਹਰਿ ਦਰਗਹ ਦੇਵੈ ਮਾਨਾਂ ਹੇ ॥੪॥
ਅਗਮੁ ਅਗੋਚਰੁ ਗੁਰੂ ਦਿਖਾਇਆ ॥
ਭੂਲਾ ਮਾਰਗਿ ਸਤਿਗੁਰਿ ਪਾਇਆ ॥
ਗੁਰ ਸੇਵਕ ਕਉ ਬਿਘਨੁ ਨ ਭਗਤੀ ਹਰਿ ਪੂਰ ਦ੍ਰਿੜੑਾਇਆ ਗਿਆਨਾਂ ਹੇ ॥੫॥
ਗੁਰਿ ਦ੍ਰਿਸਟਾਇਆ ਸਭਨੀ ਠਾਂਈ ॥
ਜਲਿ ਥਲਿ ਪੂਰਿ ਰਹਿਆ ਗੋਸਾਈ ॥
ਊਚ ਊਨ ਸਭ ਏਕ ਸਮਾਨਾਂ ਮਨਿ ਲਾਗਾ ਸਹਜਿ ਧਿਆਨਾ ਹੇ ॥੬॥
ਗੁਰਿ ਮਿਲਿਐ ਸਭ ਤ੍ਰਿਸਨ ਬੁਝਾਈ ॥
ਗੁਰਿ ਮਿਲਿਐ ਨਹ ਜੋਹੈ ਮਾਈ ॥
ਸਤੁ ਸੰਤੋਖੁ ਦੀਆ ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਨਾਮੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀ ਪਾਨਾਂ ਹੇ ॥੭॥
ਗੁਰ ਕੀ ਬਾਣੀ ਸਭ ਮਾਹਿ ਸਮਾਣੀ ॥
ਆਪਿ ਸੁਣੀ ਤੈ ਆਪਿ ਵਖਾਣੀ ॥
ਜਿਨਿ ਜਿਨਿ ਜਪੀ ਤੇਈ ਸਭਿ ਨਿਸਤ੍ਰੇ ਤਿਨ ਪਾਇਆ ਨਿਹਚਲ ਥਾਨਾਂ ਹੇ ॥੮॥
ਸਤਿਗੁਰ ਕੀ ਮਹਿਮਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਜਾਣੈ ॥
ਜੋ ਕਿਛੁ ਕਰੇ ਸੁ ਆਪਣ ਭਾਣੈ ॥
ਸਾਧੂ ਧੂਰਿ ਜਾਚਹਿ ਜਨ ਤੇਰੇ ਨਾਨਕ ਸਦ ਕੁਰਬਾਨਾਂ ਹੇ ॥੯॥੧॥੪॥
गुरु सिमरत सभि किलविख नासहि ॥
गुरु सिमरत जम संगि न फासहि ॥
गुरु सिमरत मनु निरमलु होवै गुरु काटे अपमाना हे ॥२॥
गुर का सेवकु नरकि न जाए ॥
गुर का सेवकु पारब्रहमु धिआए ॥
गुर का सेवकु साधसंगु पाए गुरु करदा नित जीअ दाना हे ॥३॥
गुर दुआरै हरि कीरतनु सुणीऐ ॥
सतिगुरु भेटि हरि जसु मुखि भणीऐ ॥
कलि कलेस मिटाए सतिगुरु हरि दरगह देवै मानां हे ॥४॥
अगमु अगोचरु गुरू दिखाइआ ॥
भूला मारगि सतिगुरि पाइआ ॥
गुर सेवक कउ बिघनु न भगती हरि पूर द्रिड़॑ाइआ गिआनां हे ॥५॥
गुरि द्रिसटाइआ सभनी ठांई ॥
जलि थलि पूरि रहिआ गोसाई ॥
ऊच ऊन सभ एक समानां मनि लागा सहजि धिआना हे ॥६॥
गुरि मिलिऐ सभ त्रिसन बुझाई ॥
गुरि मिलिऐ नह जोहै माई ॥
सतु संतोखु दीआ गुरि पूरै नामु अंम्रितु पी पानां हे ॥७॥
गुर की बाणी सभ माहि समाणी ॥
आपि सुणी तै आपि वखाणी ॥
जिनि जिनि जपी तेई सभि निसत्रे तिन पाइआ निहचल थानां हे ॥८॥
सतिगुर की महिमा सतिगुरु जाणै ॥
जो किछु करे सु आपण भाणै ॥
साधू धूरि जाचहि जन तेरे नानक सद कुरबानां हे ॥९॥१॥४॥
गुरु सिमरत जम संगि न फासहि ॥
गुरु सिमरत मनु निरमलु होवै गुरु काटे अपमाना हे ॥२॥
गुर का सेवकु नरकि न जाए ॥
गुर का सेवकु पारब्रहमु धिआए ॥
गुर का सेवकु साधसंगु पाए गुरु करदा नित जीअ दाना हे ॥३॥
गुर दुआरै हरि कीरतनु सुणीऐ ॥
सतिगुरु भेटि हरि जसु मुखि भणीऐ ॥
कलि कलेस मिटाए सतिगुरु हरि दरगह देवै मानां हे ॥४॥
अगमु अगोचरु गुरू दिखाइआ ॥
भूला मारगि सतिगुरि पाइआ ॥
गुर सेवक कउ बिघनु न भगती हरि पूर द्रिड़॑ाइआ गिआनां हे ॥५॥
गुरि द्रिसटाइआ सभनी ठांई ॥
जलि थलि पूरि रहिआ गोसाई ॥
ऊच ऊन सभ एक समानां मनि लागा सहजि धिआना हे ॥६॥
गुरि मिलिऐ सभ त्रिसन बुझाई ॥
गुरि मिलिऐ नह जोहै माई ॥
सतु संतोखु दीआ गुरि पूरै नामु अंम्रितु पी पानां हे ॥७॥
गुर की बाणी सभ माहि समाणी ॥
आपि सुणी तै आपि वखाणी ॥
जिनि जिनि जपी तेई सभि निसत्रे तिन पाइआ निहचल थानां हे ॥८॥
सतिगुर की महिमा सतिगुरु जाणै ॥
जो किछु करे सु आपण भाणै ॥
साधू धूरि जाचहि जन तेरे नानक सद कुरबानां हे ॥९॥१॥४॥
हिन्दी अर्थ: हे भाई ! गुरू को (हर वक्त) याद करते हुए सारे पाप नाश हो जाते हैं। गुरू को याद करते हुए (जीव) जम की फाही में नहीं फसते (आत्मिक मौत से बचे रहते हैं)। गुरू को याद करते हुए मन पवित्र हो जाता है। (और इस तरह) गुरू मनुष्य को (लोक-परलोक की) निरादरी से बचा लेता है। 2। हे भाई ! गुरू का सेवक नर्क में नहीं पड़ता। (क्योंकि) गुरू का सेवक परमात्मा का सिमरन करता रहता है। गुरू का सेवक साध-संगति (का मिलाप) हासिल कर लेता है। (साध-संगति में) गुरू उसको सदा आत्मिक जीवन की दाति बख्शता है। 3। हे भाई ! गुरू के दर पर रह के परमात्मा की सिफतसालाह सुननी चाहिए। हरी का यश मुँह से उच्चारण करना चाहिए (जिसको) गुरू मिल जाता है (वह मनुष्य सदा ये उद्यम करता है)। हे भाई ! गुरू (मनुष्य के) सारे झगड़े-कलेश मिटा देता है। गुरू मनुष्य को परमात्मा की हजूरी में आदर-सत्कार देता है। 4। गुरू ने ही उसको अपहुँच और अगोचर परमात्मा के दर्शन करवाए हैं। हे भाई ! कुमार्ग पर जा रहे मनुष्य को गुरू ने ही (सदा) सही जीवन-राह पर डाला है। भगती की बरकति से गुरू के सेवक के जीवन-सफर में कोई रुकावट नहीं पड़ती गुरू ही पूर्ण परमात्मा के साथ गहरी सांझ सेवक के हृदय में पक्की करता है। 5। हे भाई ! गुरू ने (ही सेवक को परमात्मा) सब जगह बसता दिखाया है (और बताया है कि) सृष्टि का मालिक जल में धरती में (हर जगह) व्यापक है। ऊँची और खाली सब जगहों पर एक समान ही व्यापक है। (गुरू के माध्यम से ही सेवक के) मन में आत्मिक अडोलता की बरकति से प्रभू-चरणों में सुरति जुड़ती है। 6। यदि मनुष्य को गुरू मिल जाए तो वह (मनुष्य के अंदर से) सारी तृष्णा (की आग) बुझा देता है। मनुष्य पर माया अपना प्रभाव नहीं डाल सकती। (जिस मनुष्य को पूरे गुरू ने सत और संतोख बख्शा। ) वह आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल खुद पीता है व औरों को भी पिलाता है। 7। हे भाई ! गुरू की बाणी सब जीवों के हृदय में टिकने योग्य है। गुरू ने (परमात्मा से) खुद सुनी और (दुनिया के जीवों को) खुद सुनाई है। जिस जिस मनुष्य ने यह बाणी हृदय में बसाई है। वह सारे संसार-समुंद्र से पार लांघ गए। उन्होंने वह आत्मिक ठिकाना हासिल कर लिया है जो (माया के प्रभाव तहत) डोलता नहीं। 8। हे भाई ! गुरू की उच्च-आत्मिकता गुरू (ही) जानता है (गुरू ही जानता है कि परमात्मा) जो कुछ करता है अपनी रजा में करता है। हे नानक ! (कह- हे प्रभू !) तेरे सेवक गुरू के चरणों की धूल माँगते हैं और (गुरू से) सदा सदके जाते हैं। 9। 1। 4।
ਮਾਰੂ ਸੋਲਹੇ ਮਹਲਾ ੫
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਆਦਿ ਨਿਰੰਜਨੁ ਪ੍ਰਭੁ ਨਿਰੰਕਾਰਾ ॥
ਸਭ ਮਹਿ ਵਰਤੈ ਆਪਿ ਨਿਰਾਰਾ ॥
ਵਰਨੁ ਜਾਤਿ ਚਿਹਨੁ ਨਹੀ ਕੋਈ ਸਭ ਹੁਕਮੇ ਸ੍ਰਿਸਟਿ ਉਪਾਇਦਾ ॥੧॥
ਲਖ ਚਉਰਾਸੀਹ ਜੋਨਿ ਸਬਾਈ ॥
ਮਾਣਸ ਕਉ ਪ੍ਰਭਿ ਦੀਈ ਵਡਿਆਈ ॥
ਇਸੁ ਪਉੜੀ ਤੇ ਜੋ ਨਰੁ ਚੂਕੈ ਸੋ ਆਇ ਜਾਇ ਦੁਖੁ ਪਾਇਦਾ ॥੨॥
ਕੀਤਾ ਹੋਵੈ ਤਿਸੁ ਕਿਆ ਕਹੀਐ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਪਦਾਰਥੁ ਲਹੀਐ ॥
ਜਿਸੁ ਆਪਿ ਭੁਲਾਏ ਸੋਈ ਭੂਲੈ ਸੋ ਬੂਝੈ ਜਿਸਹਿ ਬੁਝਾਇਦਾ ॥੩॥
ਹਰਖ ਸੋਗ ਕਾ ਨਗਰੁ ਇਹੁ ਕੀਆ ॥
ਸੇ ਉਬਰੇ ਜੋ ਸਤਿਗੁਰ ਸਰਣੀਆ ॥
ਤ੍ਰਿਹਾ ਗੁਣਾ ਤੇ ਰਹੈ ਨਿਰਾਰਾ ਸੋ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸੋਭਾ ਪਾਇਦਾ ॥੪॥
ਅਨਿਕ ਕਰਮ ਕੀਏ ਬਹੁਤੇਰੇ ॥ ਜੋ ਕੀਜੈ ਸੋ ਬੰਧਨੁ ਪੈਰੇ ॥
ਕੁਰੁਤਾ ਬੀਜੁ ਬੀਜੇ ਨਹੀ ਜੰਮੈ ਸਭੁ ਲਾਹਾ ਮੂਲੁ ਗਵਾਇਦਾ ॥੫॥
ਕਲਜੁਗ ਮਹਿ ਕੀਰਤਨੁ ਪਰਧਾਨਾ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਪੀਐ ਲਾਇ ਧਿਆਨਾ ॥
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਆਦਿ ਨਿਰੰਜਨੁ ਪ੍ਰਭੁ ਨਿਰੰਕਾਰਾ ॥
ਸਭ ਮਹਿ ਵਰਤੈ ਆਪਿ ਨਿਰਾਰਾ ॥
ਵਰਨੁ ਜਾਤਿ ਚਿਹਨੁ ਨਹੀ ਕੋਈ ਸਭ ਹੁਕਮੇ ਸ੍ਰਿਸਟਿ ਉਪਾਇਦਾ ॥੧॥
ਲਖ ਚਉਰਾਸੀਹ ਜੋਨਿ ਸਬਾਈ ॥
ਮਾਣਸ ਕਉ ਪ੍ਰਭਿ ਦੀਈ ਵਡਿਆਈ ॥
ਇਸੁ ਪਉੜੀ ਤੇ ਜੋ ਨਰੁ ਚੂਕੈ ਸੋ ਆਇ ਜਾਇ ਦੁਖੁ ਪਾਇਦਾ ॥੨॥
ਕੀਤਾ ਹੋਵੈ ਤਿਸੁ ਕਿਆ ਕਹੀਐ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਪਦਾਰਥੁ ਲਹੀਐ ॥
ਜਿਸੁ ਆਪਿ ਭੁਲਾਏ ਸੋਈ ਭੂਲੈ ਸੋ ਬੂਝੈ ਜਿਸਹਿ ਬੁਝਾਇਦਾ ॥੩॥
ਹਰਖ ਸੋਗ ਕਾ ਨਗਰੁ ਇਹੁ ਕੀਆ ॥
ਸੇ ਉਬਰੇ ਜੋ ਸਤਿਗੁਰ ਸਰਣੀਆ ॥
ਤ੍ਰਿਹਾ ਗੁਣਾ ਤੇ ਰਹੈ ਨਿਰਾਰਾ ਸੋ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸੋਭਾ ਪਾਇਦਾ ॥੪॥
ਅਨਿਕ ਕਰਮ ਕੀਏ ਬਹੁਤੇਰੇ ॥ ਜੋ ਕੀਜੈ ਸੋ ਬੰਧਨੁ ਪੈਰੇ ॥
ਕੁਰੁਤਾ ਬੀਜੁ ਬੀਜੇ ਨਹੀ ਜੰਮੈ ਸਭੁ ਲਾਹਾ ਮੂਲੁ ਗਵਾਇਦਾ ॥੫॥
ਕਲਜੁਗ ਮਹਿ ਕੀਰਤਨੁ ਪਰਧਾਨਾ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਪੀਐ ਲਾਇ ਧਿਆਨਾ ॥
मारू सोलहे महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
आदि निरंजनु प्रभु निरंकारा ॥
सभ महि वरतै आपि निरारा ॥
वरनु जाति चिहनु नही कोई सभ हुकमे स्रिसटि उपाइदा ॥१॥
लख चउरासीह जोनि सबाई ॥
माणस कउ प्रभि दीई वडिआई ॥
इसु पउड़ी ते जो नरु चूकै सो आइ जाइ दुखु पाइदा ॥२॥
कीता होवै तिसु किआ कहीऐ ॥
गुरमुखि नामु पदारथु लहीऐ ॥
जिसु आपि भुलाए सोई भूलै सो बूझै जिसहि बुझाइदा ॥३॥
हरख सोग का नगरु इहु कीआ ॥
से उबरे जो सतिगुर सरणीआ ॥
त्रिहा गुणा ते रहै निरारा सो गुरमुखि सोभा पाइदा ॥४॥
अनिक करम कीए बहुतेरे ॥ जो कीजै सो बंधनु पैरे ॥
कुरुता बीजु बीजे नही जंमै सभु लाहा मूलु गवाइदा ॥५॥
कलजुग महि कीरतनु परधाना ॥
गुरमुखि जपीऐ लाइ धिआना ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
आदि निरंजनु प्रभु निरंकारा ॥
सभ महि वरतै आपि निरारा ॥
वरनु जाति चिहनु नही कोई सभ हुकमे स्रिसटि उपाइदा ॥१॥
लख चउरासीह जोनि सबाई ॥
माणस कउ प्रभि दीई वडिआई ॥
इसु पउड़ी ते जो नरु चूकै सो आइ जाइ दुखु पाइदा ॥२॥
कीता होवै तिसु किआ कहीऐ ॥
गुरमुखि नामु पदारथु लहीऐ ॥
जिसु आपि भुलाए सोई भूलै सो बूझै जिसहि बुझाइदा ॥३॥
हरख सोग का नगरु इहु कीआ ॥
से उबरे जो सतिगुर सरणीआ ॥
त्रिहा गुणा ते रहै निरारा सो गुरमुखि सोभा पाइदा ॥४॥
अनिक करम कीए बहुतेरे ॥ जो कीजै सो बंधनु पैरे ॥
कुरुता बीजु बीजे नही जंमै सभु लाहा मूलु गवाइदा ॥५॥
कलजुग महि कीरतनु परधाना ॥
गुरमुखि जपीऐ लाइ धिआना ॥
हिन्दी अर्थ: मारू सोलहे महला ५ ੴ सतिगुर प्रसादि॥ हे भाई ! वह परमात्मा। जो सबका मूल है जो माया के प्रभाव से रहित हैऔर जिसका कोई खास स्वरूप बताया नहीं जा सकता। सब जीवों में मौजूद है। और फिर भी निर्लिप रहता है। उस का कोई (ब्राहमण खत्री आदि) वर्ण नहीं। कोई जाति नहीं। कोई चिन्ह नहीं। वह अपने हुकम अनुसार ही सारी सृष्टि पैदा करता है। 1। हे भाई ! सारी चौरासी लाख जूनियों में से परमात्मा ने मानस जनम को वडिआई दी है। पर जो मनुष्य इस सीढ़ी पर से भटक जाता है। वह जनम-मरण के चक्करों में पड़ कर दुख भोगता है। 2। हे भाई ! परमात्मा के पैदा किए हुए की वडिआई करना व्यर्थ है (परमात्मा की सिफतसालाह करनी चाहिए) गुरू की शरण पड़ के परमात्मा का कीमती नाम प्राप्त करना चाहिए। (पर जीव के वश की बात नहीं है) जिस मनुष्य को परमात्मा खुद गलत रास्ते पर डाल देता है। वह मनुष्य गलत रास्ते पर पड़ा रहता है। वह मनुष्य ही सही जीवन-राह समझता है जिसको परमात्मा खुद समझाता है। 3। हे भाई ! परमात्मा ने इस मनुष्य-शरीर को खुशी-ग़मी का नगर बना दिया है। वह मनुष्य ही (इनके प्रभाव से) बचते हैं जो गुरू की शरण पड़ते हैं। जो मनुष्य गुरू के सन्मुख हो के माया के तीन गुणों से निराला रहता है वह (लोक परलोक में) शोभा कमाता है। 4। हे भाई ! (नाम सिमरन के बिना तीर्थ-स्नान आदि भले ही) अनेकों बहुत सारे (मिथे हुए धार्मिक) कर्म किए जाएं। जो भी ऐसा कर्म किया जाता है। वह इस जीवन-सफर में मनुष्य के पैरों में फंदा बनता है। (मनुष्य के आत्मिक जीवन के लिए हरी-नाम के सिमरन की आवश्यक्ता है। और और कर्म यूँ ही व्यर्थ हैं। जैसे। ) बे-ऋतु में (बहार के बिना) बीजा हुआ बीज उगता नहीं। मनुष्य कमाई भी गवाता है और राशि-पूँजी भी गवाता है। 5। हे भाई ! (जुगों का बटवारा करने वालों के अनुसार भी) कलियुग में कीर्तन ही प्रधान कर्म है। (वैसे तो सदा ही) गुरू की शरण पड़ कर सुरति जोड़ के परमात्मा का नाम जपना चाहिए।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 1075 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
Greater Kailash के बाज़ार में सर्दियों की धूप, और कोई पुराना दोस्त मिल जाए।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 42 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1075” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 1076 →, पीछे का: ← अंग 1074।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।