अंग 1037

अंग
1037
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੋਇ ਸੁ ਹੁਕਮੁ ਪਛਾਣੈ ਮਾਨੈ ਹੁਕਮੁ ਸਮਾਇਦਾ ॥੯॥
ਹੁਕਮੇ ਆਇਆ ਹੁਕਮਿ ਸਮਾਇਆ ॥
ਹੁਕਮੇ ਦੀਸੈ ਜਗਤੁ ਉਪਾਇਆ ॥
ਹੁਕਮੇ ਸੁਰਗੁ ਮਛੁ ਪਇਆਲਾ ਹੁਕਮੇ ਕਲਾ ਰਹਾਇਦਾ ॥੧੦॥
ਹੁਕਮੇ ਧਰਤੀ ਧਉਲ ਸਿਰਿ ਭਾਰੰ ॥
ਹੁਕਮੇ ਪਉਣ ਪਾਣੀ ਗੈਣਾਰੰ ॥
ਹੁਕਮੇ ਸਿਵ ਸਕਤੀ ਘਰਿ ਵਾਸਾ ਹੁਕਮੇ ਖੇਲ ਖੇਲਾਇਦਾ ॥੧੧॥
ਹੁਕਮੇ ਆਡਾਣੇ ਆਗਾਸੀ ॥
ਹੁਕਮੇ ਜਲ ਥਲ ਤ੍ਰਿਭਵਣ ਵਾਸੀ ॥
ਹੁਕਮੇ ਸਾਸ ਗਿਰਾਸ ਸਦਾ ਫੁਨਿ ਹੁਕਮੇ ਦੇਖਿ ਦਿਖਾਇਦਾ ॥੧੨॥
ਹੁਕਮਿ ਉਪਾਏ ਦਸ ਅਉਤਾਰਾ ॥
ਦੇਵ ਦਾਨਵ ਅਗਣਤ ਅਪਾਰਾ ॥
ਮਾਨੈ ਹੁਕਮੁ ਸੁ ਦਰਗਹ ਪੈਝੈ ਸਾਚਿ ਮਿਲਾਇ ਸਮਾਇਦਾ ॥੧੩॥
ਹੁਕਮੇ ਜੁਗ ਛਤੀਹ ਗੁਦਾਰੇ ॥
ਹੁਕਮੇ ਸਿਧ ਸਾਧਿਕ ਵੀਚਾਰੇ ॥
ਆਪਿ ਨਾਥੁ ਨਥਂੀ ਸਭ ਜਾ ਕੀ ਬਖਸੇ ਮੁਕਤਿ ਕਰਾਇਦਾ ॥੧੪॥
ਕਾਇਆ ਕੋਟੁ ਗੜੈ ਮਹਿ ਰਾਜਾ ॥ ਨੇਬ ਖਵਾਸ ਭਲਾ ਦਰਵਾਜਾ ॥
ਮਿਥਿਆ ਲੋਭੁ ਨਾਹੀ ਘਰਿ ਵਾਸਾ ਲਬਿ ਪਾਪਿ ਪਛੁਤਾਇਦਾ ॥੧੫॥
ਸਤੁ ਸੰਤੋਖੁ ਨਗਰ ਮਹਿ ਕਾਰੀ ॥
ਜਤੁ ਸਤੁ ਸੰਜਮੁ ਸਰਣਿ ਮੁਰਾਰੀ ॥
ਨਾਨਕ ਸਹਜਿ ਮਿਲੈ ਜਗਜੀਵਨੁ ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਪਤਿ ਪਾਇਦਾ ॥੧੬॥੪॥੧੬॥
गुरमुखि होइ सु हुकमु पछाणै मानै हुकमु समाइदा ॥९॥
हुकमे आइआ हुकमि समाइआ ॥
हुकमे दीसै जगतु उपाइआ ॥
हुकमे सुरगु मछु पइआला हुकमे कला रहाइदा ॥१०॥
हुकमे धरती धउल सिरि भारं ॥
हुकमे पउण पाणी गैणारं ॥
हुकमे सिव सकती घरि वासा हुकमे खेल खेलाइदा ॥११॥
हुकमे आडाणे आगासी ॥
हुकमे जल थल त्रिभवण वासी ॥
हुकमे सास गिरास सदा फुनि हुकमे देखि दिखाइदा ॥१२॥
हुकमि उपाए दस अउतारा ॥
देव दानव अगणत अपारा ॥
मानै हुकमु सु दरगह पैझै साचि मिलाइ समाइदा ॥१३॥
हुकमे जुग छतीह गुदारे ॥
हुकमे सिध साधिक वीचारे ॥
आपि नाथु नथंी सभ जा की बखसे मुकति कराइदा ॥१४॥
काइआ कोटु गड़ै महि राजा ॥ नेब खवास भला दरवाजा ॥
मिथिआ लोभु नाही घरि वासा लबि पापि पछुताइदा ॥१५॥
सतु संतोखु नगर महि कारी ॥
जतु सतु संजमु सरणि मुरारी ॥
नानक सहजि मिलै जगजीवनु गुर सबदी पति पाइदा ॥१६॥४॥१६॥

हिन्दी अर्थ: जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है वह परमात्मा की रजा को समझ लेता है और जो रज़ा को (सिर-माथे) मानता है वह (रज़ा के मालिक में ही) लीन हो जाता है। 9। (रज़ा को मान लेने वाले बँदे को यह निष्चय हो जाता है कि) जीव परमात्मा के हुकम अनुसार (जगत में) आता है हुकम अनुसार समा जाता है (जगत से चला जाता है)। उसे ये दिखता है कि सारा जगत हुकम में ही पैदा होता है। प्रभू के हुकम अनुसार ही स्वर्ग-लोक मातृ लोक और पाताल लोक बनता है। प्रभू अपने हुकम में ही अपनी सक्ता से इस (जगत) को आसरा दिए रखता है। 10। प्रभू के हुकम में ही धरती बनी जिसका भार बैल के सिर पर (समझा जाता है)। हुकम में ही हवा पानी (आदि तत्व बने) और आकाश बना। प्रभू के हुकम अनुसार ही जीवात्मा का माया के घर में बसेरा हुआ। प्रभू अपने हुकम में ही (जगत के सारे) करिश्मे कर रहा है। 11। प्रभू के हुकम में ही आकाश (की चादर) तन गई। हुकम में ही पानी धरती व तीनों भवन बने जिनमें वह स्वयं ही व्यापक है। प्रभू अपने हुकम अनुसार ही जीवों को साँसें देता है और सदा रिज़क देता है। प्रभू अपनी रजा में ही जीवों की संभाल कर के सबको देखने की ताकत देता है। 12। प्रभू ने अपने हुकम में ही (विष्णू के) दस अवतार पैदा किए। अनगिनत और बेअंत देवते बनाए और दैत्य बनाए। जो जीव प्रभू के हुकम को मान लेता है वह उसकी दरगाह में आदर पाता है। प्रभू उसको अपने सदा-स्थिर नाम में जोड़ के अपने (चरणों) में लीन कर लेता है। 13। प्रभू ने अपने हुकम के अनुसार ही (‘धुंधूकारा’ के) छक्तिस युग गुजार दिए। अपने हुकम में ही वह सिध-साधक और विचारवान पैदा कर देता है। सारी सृष्टि का वह स्वयं ही पति है। सारी सृष्टि उसी के हुकम में बँधी हुई है। जिस जीव परवह मेहर करता है उसको माया के बँधनों से मुक्ति दे देता है। 14। (प्रभू के हुकम में ही) शरीर किला बना है जिसको (मुँह एक) खूबसूरत सा दरवाजा लगा हुआ है। इस किले में वह खुद ही राजा है। कर्म-इन्द्रियाँ और ज्ञानेन्द्रियाँ उसकी दरबारी हैं। पर झूठा लोभ (चौकीदार होने के कारण) जीव को प्रभू की हजूरी में पहुँचने नहीं देता। लोभ के कारण पाप के कारण जीव पछताता रहता है। 15। जिस शरीर-नगर में सेवा। संतोख। जत। उच्च आचरण और संजम (जैसे उक्तम) कारिंदे हैं (उसमें बसता जीव) परमात्मा की शरण में टिका रहता है। हे नानक ! अडोल आत्मिक अवस्था में टिके उस जीव को जगत का जीवन प्रभू मिल जाता है। गुरू के शबद में जुड़ के वह प्रभू की हजूरी में इज्जत पाता है। 16। 4। 16।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਸੁੰਨ ਕਲਾ ਅਪਰੰਪਰਿ ਧਾਰੀ ॥
ਆਪਿ ਨਿਰਾਲਮੁ ਅਪਰ ਅਪਾਰੀ ॥
ਆਪੇ ਕੁਦਰਤਿ ਕਰਿ ਕਰਿ ਦੇਖੈ ਸੁੰਨਹੁ ਸੁੰਨੁ ਉਪਾਇਦਾ ॥੧॥
ਪਉਣੁ ਪਾਣੀ ਸੁੰਨੈ ਤੇ ਸਾਜੇ ॥
ਸ੍ਰਿਸਟਿ ਉਪਾਇ ਕਾਇਆ ਗੜ ਰਾਜੇ ॥
ਅਗਨਿ ਪਾਣੀ ਜੀਉ ਜੋਤਿ ਤੁਮਾਰੀ ਸੁੰਨੇ ਕਲਾ ਰਹਾਇਦਾ ॥੨॥
ਸੁੰਨਹੁ ਬ੍ਰਹਮਾ ਬਿਸਨੁ ਮਹੇਸੁ ਉਪਾਏ ॥
ਸੁੰਨੇ ਵਰਤੇ ਜੁਗ ਸਬਾਏ ॥
ਇਸੁ ਪਦ ਵੀਚਾਰੇ ਸੋ ਜਨੁ ਪੂਰਾ ਤਿਸੁ ਮਿਲੀਐ ਭਰਮੁ ਚੁਕਾਇਦਾ ॥੩॥
ਸੁੰਨਹੁ ਸਪਤ ਸਰੋਵਰ ਥਾਪੇ ॥
ਜਿਨਿ ਸਾਜੇ ਵੀਚਾਰੇ ਆਪੇ ॥
ਤਿਤੁ ਸਤ ਸਰਿ ਮਨੂਆ ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਵੈ ਫਿਰਿ ਬਾਹੁੜਿ ਜੋਨਿ ਨ ਪਾਇਦਾ ॥੪॥
ਸੁੰਨਹੁ ਚੰਦੁ ਸੂਰਜੁ ਗੈਣਾਰੇ ॥
ਤਿਸ ਕੀ ਜੋਤਿ ਤ੍ਰਿਭਵਣ ਸਾਰੇ ॥
ਸੁੰਨੇ ਅਲਖ ਅਪਾਰ ਨਿਰਾਲਮੁ ਸੁੰਨੇ ਤਾੜੀ ਲਾਇਦਾ ॥੫॥
ਸੁੰਨਹੁ ਧਰਤਿ ਅਕਾਸੁ ਉਪਾਏ ॥
ਬਿਨੁ ਥੰਮਾ ਰਾਖੇ ਸਚੁ ਕਲ ਪਾਏ ॥
ਤ੍ਰਿਭਵਣ ਸਾਜਿ ਮੇਖੁਲੀ ਮਾਇਆ ਆਪਿ ਉਪਾਇ ਖਪਾਇਦਾ ॥੬॥
ਸੁੰਨਹੁ ਖਾਣੀ ਸੁੰਨਹੁ ਬਾਣੀ ॥
ਸੁੰਨਹੁ ਉਪਜੀ ਸੁੰਨਿ ਸਮਾਣੀ ॥
ਉਤਭੁਜੁ ਚਲਤੁ ਕੀਆ ਸਿਰਿ ਕਰਤੈ ਬਿਸਮਾਦੁ ਸਬਦਿ ਦੇਖਾਇਦਾ ॥੭॥
ਸੁੰਨਹੁ ਰਾਤਿ ਦਿਨਸੁ ਦੁਇ ਕੀਏ ॥
ਓਪਤਿ ਖਪਤਿ ਸੁਖਾ ਦੁਖ ਦੀਏ ॥
ਸੁਖ ਦੁਖ ਹੀ ਤੇ ਅਮਰੁ ਅਤੀਤਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਿਜ ਘਰੁ ਪਾਇਦਾ ॥੮॥
मारू महला १ ॥
सुंन कला अपरंपरि धारी ॥
आपि निरालमु अपर अपारी ॥
आपे कुदरति करि करि देखै सुंनहु सुंनु उपाइदा ॥१॥
पउणु पाणी सुंनै ते साजे ॥
स्रिसटि उपाइ काइआ गड़ राजे ॥
अगनि पाणी जीउ जोति तुमारी सुंने कला रहाइदा ॥२॥
सुंनहु ब्रहमा बिसनु महेसु उपाए ॥
सुंने वरते जुग सबाए ॥
इसु पद वीचारे सो जनु पूरा तिसु मिलीऐ भरमु चुकाइदा ॥३॥
सुंनहु सपत सरोवर थापे ॥
जिनि साजे वीचारे आपे ॥
तितु सत सरि मनूआ गुरमुखि नावै फिरि बाहुड़ि जोनि न पाइदा ॥४॥
सुंनहु चंदु सूरजु गैणारे ॥
तिस की जोति त्रिभवण सारे ॥
सुंने अलख अपार निरालमु सुंने ताड़ी लाइदा ॥५॥
सुंनहु धरति अकासु उपाए ॥
बिनु थंमा राखे सचु कल पाए ॥
त्रिभवण साजि मेखुली माइआ आपि उपाइ खपाइदा ॥६॥
सुंनहु खाणी सुंनहु बाणी ॥
सुंनहु उपजी सुंनि समाणी ॥
उतभुजु चलतु कीआ सिरि करतै बिसमादु सबदि देखाइदा ॥७॥
सुंनहु राति दिनसु दुइ कीए ॥
ओपति खपति सुखा दुख दीए ॥
सुख दुख ही ते अमरु अतीता गुरमुखि निज घरु पाइदा ॥८॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला १॥ उस परमात्मा ने। जिससे परे और कुछ भी नहीं और जो निरोल स्वयं ही स्वयं है। अपनी ताकत खुद ही बनाई हुई है। वह अपर और अपार प्रभू अपने सहारे आप ही है (उसे किसी और आसरे की आवश्यक्ता नहीं पड़ती)। वह परमात्मा सिर्फ वह हालत भी खुद ही पैदा करता है जब उसके अपने आपे के बिना और कुछ भी नहीं होता। और आप ही अपनी कुदरति रच के देखता है। 1। हवा पानी (आदि तत्व) वह निरोल अपने आप से पैदा करता है। सृष्टि पैदा करके (अपने आप से ही) शरीर और शरीर-किलों के राजे (जीव) पैदा करता है। हे प्रभू ! आग पानी आदि तत्वों के बने शरीर में जीवात्मा तेरी ही ज्योति है। तू निरोल अपने आप में अपनी शक्ति टिकाए रखता है। 2। ब्रहमा विष्णू शिव निरोल अपने आप से ही परमात्मा ने पैदा किए। सारे अनेकों जुग निरोल उसके अपने आप में ही बीतते गए। जो मनुष्य इस (हैरान कर देने वाली) हालत को अपने सोच-मण्डल में टिकाता है वह (और और आसरे ढूँढने की) गलती नहीं करता। ऐसे पूर्ण मनुष्य की संगति करनी चाहिए वह औरों की भटकना भी दूर कर देता है। 3। परमात्मा ने (जीवों की पाँच ज्ञानेन्द्रियों। मन और बुद्धि – इन) सात सरोवरों को भी अपने आप से ही बनाया है। जिस परमात्मा ने जीव पैदा किए हैं वह स्वयं ही उनको अपनी सोच मण्डल में रखता है। जिस मनुष्य का मन गुरू की शरण पड़ कर उस शांति के सर (प्रभू) में स्नान करता है। वह दोबारा जूनियों के चक्कर में नहीं पड़ता। 4। चाँद सूरज आकाश भी प्रभू के निरोल अपने ही आप से बने। उसकी अपनी ही ज्योति सारे तीनों भवनों में पसर रही है। वह अदृष्ट और बेअंत परमात्मा निरोल अपने आप में किसी अन्य आसरे से बेमुहताज रहता है। और अपने ही आप में मस्त रहता है। 5। परमात्मा ने धरती आकाश निरोल अपने आप से ही पैदा किए। वह सदा-स्थिर रहने वाला प्रभू अपनी ताकत के सहारे ही बिना किसी और स्तम्भ के टिकाए रखता है। तीनों भवन पैदा करके परमात्मा स्वयं ही इनको माया की तड़ागी (में बाँधे रखता है)। स्वयं ही पैदा करता है स्वयं ही नाश करता है। 6। प्रभू निरोल अपने आप से ही जीव-उत्पक्ति की चार खाणियां बनाता है और जीवों की बाणी रचता है। उसके निरोल अपने आप से ही सृष्टि पैदा होती है और उसके आपे में ही समा जाती है। सबसे पहले करतार ने जगत-रचना का कुछ ऐसा करिश्मा रचा जैसे धरती में बनस्पति अपने आप उग पड़ती है। अपने हुकम से यह हैरान करने वाला तमाशा दिखा देता है। 7। निरोल अपने आप से ही परमात्मा ने दोनों दिन और रात बना दिए। खुद ही जीवों को जनम और मरण। सुख और दुख देता है। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर सुखों-दुखों से निर्लिप हो जाता है वह अटल आत्मिक जीवन वाला बन जाता है। वह उस घर को ढूँढ लेता है जो सदा उसका अपना बना रहता है (भाव। वह सदा के लिए प्रभू के चरणों में जुड़ जाता है)। 8।

संदर्भ: यह अंग 1037 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।

गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।

Janmashtami की मधुर रात, मंदिर में 12 बजे का दर्शन।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 46 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1037” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 1038 →, पीछे का: ← अंग 1036

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।