अंग
1083
राग मारू
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਮਿਰਤ ਲੋਕ ਪਇਆਲ ਸਮੀਪਤ ਅਸਥਿਰ ਥਾਨੁ ਜਿਸੁ ਹੈ ਅਭਗਾ ॥੧੨॥
ਪਤਿਤ ਪਾਵਨ ਦੁਖ ਭੈ ਭੰਜਨੁ ॥
ਅਹੰਕਾਰ ਨਿਵਾਰਣੁ ਹੈ ਭਵ ਖੰਡਨੁ ॥
ਭਗਤੀ ਤੋਖਿਤ ਦੀਨ ਕ੍ਰਿਪਾਲਾ ਗੁਣੇ ਨ ਕਿਤ ਹੀ ਹੈ ਭਿਗਾ ॥੧੩॥
ਨਿਰੰਕਾਰੁ ਅਛਲ ਅਡੋਲੋ ॥
ਜੋਤਿ ਸਰੂਪੀ ਸਭੁ ਜਗੁ ਮਉਲੋ ॥
ਸੋ ਮਿਲੈ ਜਿਸੁ ਆਪਿ ਮਿਲਾਏ ਆਪਹੁ ਕੋਇ ਨ ਪਾਵੈਗਾ ॥੧੪॥
ਆਪੇ ਗੋਪੀ ਆਪੇ ਕਾਨਾ ॥
ਆਪੇ ਗਊ ਚਰਾਵੈ ਬਾਨਾ ॥
ਆਪਿ ਉਪਾਵਹਿ ਆਪਿ ਖਪਾਵਹਿ ਤੁਧੁ ਲੇਪੁ ਨਹੀ ਇਕੁ ਤਿਲੁ ਰੰਗਾ ॥੧੫॥
ਏਕ ਜੀਹ ਗੁਣ ਕਵਨ ਬਖਾਨੈ ॥
ਸਹਸ ਫਨੀ ਸੇਖ ਅੰਤੁ ਨ ਜਾਨੈ ॥
ਨਵਤਨ ਨਾਮ ਜਪੈ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ਇਕੁ ਗੁਣੁ ਨਾਹੀ ਪ੍ਰਭ ਕਹਿ ਸੰਗਾ ॥੧੬॥
ਓਟ ਗਹੀ ਜਗਤ ਪਿਤ ਸਰਣਾਇਆ ॥
ਭੈ ਭਇਆਨਕ ਜਮਦੂਤ ਦੁਤਰ ਹੈ ਮਾਇਆ ॥
ਹੋਹੁ ਕ੍ਰਿਪਾਲ ਇਛਾ ਕਰਿ ਰਾਖਹੁ ਸਾਧ ਸੰਤਨ ਕੈ ਸੰਗਿ ਸੰਗਾ ॥੧੭॥
ਦ੍ਰਿਸਟਿਮਾਨ ਹੈ ਸਗਲ ਮਿਥੇਨਾ ॥
ਇਕੁ ਮਾਗਉ ਦਾਨੁ ਗੋਬਿਦ ਸੰਤ ਰੇਨਾ ॥
ਮਸਤਕਿ ਲਾਇ ਪਰਮ ਪਦੁ ਪਾਵਉ ਜਿਸੁ ਪ੍ਰਾਪਤਿ ਸੋ ਪਾਵੈਗਾ ॥੧੮॥
ਜਿਨ ਕਉ ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰੀ ਸੁਖਦਾਤੇ ॥
ਤਿਨ ਸਾਧੂ ਚਰਣ ਲੈ ਰਿਦੈ ਪਰਾਤੇ ॥
ਸਗਲ ਨਾਮ ਨਿਧਾਨੁ ਤਿਨ ਪਾਇਆ ਅਨਹਦ ਸਬਦ ਮਨਿ ਵਾਜੰਗਾ ॥੧੯॥
ਕਿਰਤਮ ਨਾਮ ਕਥੇ ਤੇਰੇ ਜਿਹਬਾ ॥
ਸਤਿ ਨਾਮੁ ਤੇਰਾ ਪਰਾ ਪੂਰਬਲਾ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਭਗਤ ਪਏ ਸਰਣਾਈ ਦੇਹੁ ਦਰਸੁ ਮਨਿ ਰੰਗੁ ਲਗਾ ॥੨੦॥
ਤੇਰੀ ਗਤਿ ਮਿਤਿ ਤੂਹੈ ਜਾਣਹਿ ॥
ਤੂ ਆਪੇ ਕਥਹਿ ਤੈ ਆਪਿ ਵਖਾਣਹਿ ॥
ਨਾਨਕ ਦਾਸੁ ਦਾਸਨ ਕੋ ਕਰੀਅਹੁ ਹਰਿ ਭਾਵੈ ਦਾਸਾ ਰਾਖੁ ਸੰਗਾ ॥੨੧॥੨॥੧੧॥
ਪਤਿਤ ਪਾਵਨ ਦੁਖ ਭੈ ਭੰਜਨੁ ॥
ਅਹੰਕਾਰ ਨਿਵਾਰਣੁ ਹੈ ਭਵ ਖੰਡਨੁ ॥
ਭਗਤੀ ਤੋਖਿਤ ਦੀਨ ਕ੍ਰਿਪਾਲਾ ਗੁਣੇ ਨ ਕਿਤ ਹੀ ਹੈ ਭਿਗਾ ॥੧੩॥
ਨਿਰੰਕਾਰੁ ਅਛਲ ਅਡੋਲੋ ॥
ਜੋਤਿ ਸਰੂਪੀ ਸਭੁ ਜਗੁ ਮਉਲੋ ॥
ਸੋ ਮਿਲੈ ਜਿਸੁ ਆਪਿ ਮਿਲਾਏ ਆਪਹੁ ਕੋਇ ਨ ਪਾਵੈਗਾ ॥੧੪॥
ਆਪੇ ਗੋਪੀ ਆਪੇ ਕਾਨਾ ॥
ਆਪੇ ਗਊ ਚਰਾਵੈ ਬਾਨਾ ॥
ਆਪਿ ਉਪਾਵਹਿ ਆਪਿ ਖਪਾਵਹਿ ਤੁਧੁ ਲੇਪੁ ਨਹੀ ਇਕੁ ਤਿਲੁ ਰੰਗਾ ॥੧੫॥
ਏਕ ਜੀਹ ਗੁਣ ਕਵਨ ਬਖਾਨੈ ॥
ਸਹਸ ਫਨੀ ਸੇਖ ਅੰਤੁ ਨ ਜਾਨੈ ॥
ਨਵਤਨ ਨਾਮ ਜਪੈ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ਇਕੁ ਗੁਣੁ ਨਾਹੀ ਪ੍ਰਭ ਕਹਿ ਸੰਗਾ ॥੧੬॥
ਓਟ ਗਹੀ ਜਗਤ ਪਿਤ ਸਰਣਾਇਆ ॥
ਭੈ ਭਇਆਨਕ ਜਮਦੂਤ ਦੁਤਰ ਹੈ ਮਾਇਆ ॥
ਹੋਹੁ ਕ੍ਰਿਪਾਲ ਇਛਾ ਕਰਿ ਰਾਖਹੁ ਸਾਧ ਸੰਤਨ ਕੈ ਸੰਗਿ ਸੰਗਾ ॥੧੭॥
ਦ੍ਰਿਸਟਿਮਾਨ ਹੈ ਸਗਲ ਮਿਥੇਨਾ ॥
ਇਕੁ ਮਾਗਉ ਦਾਨੁ ਗੋਬਿਦ ਸੰਤ ਰੇਨਾ ॥
ਮਸਤਕਿ ਲਾਇ ਪਰਮ ਪਦੁ ਪਾਵਉ ਜਿਸੁ ਪ੍ਰਾਪਤਿ ਸੋ ਪਾਵੈਗਾ ॥੧੮॥
ਜਿਨ ਕਉ ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰੀ ਸੁਖਦਾਤੇ ॥
ਤਿਨ ਸਾਧੂ ਚਰਣ ਲੈ ਰਿਦੈ ਪਰਾਤੇ ॥
ਸਗਲ ਨਾਮ ਨਿਧਾਨੁ ਤਿਨ ਪਾਇਆ ਅਨਹਦ ਸਬਦ ਮਨਿ ਵਾਜੰਗਾ ॥੧੯॥
ਕਿਰਤਮ ਨਾਮ ਕਥੇ ਤੇਰੇ ਜਿਹਬਾ ॥
ਸਤਿ ਨਾਮੁ ਤੇਰਾ ਪਰਾ ਪੂਰਬਲਾ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਭਗਤ ਪਏ ਸਰਣਾਈ ਦੇਹੁ ਦਰਸੁ ਮਨਿ ਰੰਗੁ ਲਗਾ ॥੨੦॥
ਤੇਰੀ ਗਤਿ ਮਿਤਿ ਤੂਹੈ ਜਾਣਹਿ ॥
ਤੂ ਆਪੇ ਕਥਹਿ ਤੈ ਆਪਿ ਵਖਾਣਹਿ ॥
ਨਾਨਕ ਦਾਸੁ ਦਾਸਨ ਕੋ ਕਰੀਅਹੁ ਹਰਿ ਭਾਵੈ ਦਾਸਾ ਰਾਖੁ ਸੰਗਾ ॥੨੧॥੨॥੧੧॥
मिरत लोक पइआल समीपत असथिर थानु जिसु है अभगा ॥१२॥
पतित पावन दुख भै भंजनु ॥
अहंकार निवारणु है भव खंडनु ॥
भगती तोखित दीन क्रिपाला गुणे न कित ही है भिगा ॥१३॥
निरंकारु अछल अडोलो ॥
जोति सरूपी सभु जगु मउलो ॥
सो मिलै जिसु आपि मिलाए आपहु कोइ न पावैगा ॥१४॥
आपे गोपी आपे काना ॥
आपे गऊ चरावै बाना ॥
आपि उपावहि आपि खपावहि तुधु लेपु नही इकु तिलु रंगा ॥१५॥
एक जीह गुण कवन बखानै ॥
सहस फनी सेख अंतु न जानै ॥
नवतन नाम जपै दिनु राती इकु गुणु नाही प्रभ कहि संगा ॥१६॥
ओट गही जगत पित सरणाइआ ॥
भै भइआनक जमदूत दुतर है माइआ ॥
होहु क्रिपाल इछा करि राखहु साध संतन कै संगि संगा ॥१७॥
द्रिसटिमान है सगल मिथेना ॥
इकु मागउ दानु गोबिद संत रेना ॥
मसतकि लाइ परम पदु पावउ जिसु प्रापति सो पावैगा ॥१८॥
जिन कउ क्रिपा करी सुखदाते ॥
तिन साधू चरण लै रिदै पराते ॥
सगल नाम निधानु तिन पाइआ अनहद सबद मनि वाजंगा ॥१९॥
किरतम नाम कथे तेरे जिहबा ॥
सति नामु तेरा परा पूरबला ॥
कहु नानक भगत पए सरणाई देहु दरसु मनि रंगु लगा ॥२०॥
तेरी गति मिति तूहै जाणहि ॥
तू आपे कथहि तै आपि वखाणहि ॥
नानक दासु दासन को करीअहु हरि भावै दासा राखु संगा ॥२१॥२॥११॥
पतित पावन दुख भै भंजनु ॥
अहंकार निवारणु है भव खंडनु ॥
भगती तोखित दीन क्रिपाला गुणे न कित ही है भिगा ॥१३॥
निरंकारु अछल अडोलो ॥
जोति सरूपी सभु जगु मउलो ॥
सो मिलै जिसु आपि मिलाए आपहु कोइ न पावैगा ॥१४॥
आपे गोपी आपे काना ॥
आपे गऊ चरावै बाना ॥
आपि उपावहि आपि खपावहि तुधु लेपु नही इकु तिलु रंगा ॥१५॥
एक जीह गुण कवन बखानै ॥
सहस फनी सेख अंतु न जानै ॥
नवतन नाम जपै दिनु राती इकु गुणु नाही प्रभ कहि संगा ॥१६॥
ओट गही जगत पित सरणाइआ ॥
भै भइआनक जमदूत दुतर है माइआ ॥
होहु क्रिपाल इछा करि राखहु साध संतन कै संगि संगा ॥१७॥
द्रिसटिमान है सगल मिथेना ॥
इकु मागउ दानु गोबिद संत रेना ॥
मसतकि लाइ परम पदु पावउ जिसु प्रापति सो पावैगा ॥१८॥
जिन कउ क्रिपा करी सुखदाते ॥
तिन साधू चरण लै रिदै पराते ॥
सगल नाम निधानु तिन पाइआ अनहद सबद मनि वाजंगा ॥१९॥
किरतम नाम कथे तेरे जिहबा ॥
सति नामु तेरा परा पूरबला ॥
कहु नानक भगत पए सरणाई देहु दरसु मनि रंगु लगा ॥२०॥
तेरी गति मिति तूहै जाणहि ॥
तू आपे कथहि तै आपि वखाणहि ॥
नानक दासु दासन को करीअहु हरि भावै दासा राखु संगा ॥२१॥२॥११॥
हिन्दी अर्थ: मातृ लोक में। पाताल में (सब जीवों के) नजदीक है। उसकी जगह हमेशा कायम रहने वाली है। कभी टूटने वाली नहीं। 12। हे भाई ! परमात्मा विकारियों को पवित्र करने वाला है। (जीवों के) सारे दुख सारे डर दूर करने वाला है। अहंकार दूर करने वाला है और जनम-मरण का चक्कर नाश करने वाला है। हे भाई ! दीनों पर कृपा करने वाला प्रभू भक्ति से खुश होता है। किसी भी अन्य गुण से नहीं पतीजता। 13। हे भाई ! आकार-रहित परमात्मा को माया छल नहीं सकती। (माया के हमलों के आगे) वह डोलने वाला नहीं। वह निरा नूर ही नूर है (उसके नूर से) सारा जगत खिल रहा है। (उस परमात्मा को) वही मनुष्य (ही) मिल सकता है। जिसको वह स्वयं मिलाता है। (उसकी मेहर के बिना निरे) अपने उद्यम से कोई भी मनुष्य उसको मिल नहीं सकता। 14। हे भाई ! परमात्मा स्वयं ही गोपियाँ है। स्वयं ही कृष्ण है। प्रभू खुद ही गऊओं को वृन्दावन में चराता है । हे प्रभू ! तू स्वयं ही (जीवों को) पैदा करता है। स्वयं ही नाश करता है। दुनिया के रंग-तमाशों का तेरे ऊपर तिल भर भी असर नहीं होता। 15। हे प्रभू ! (मेरी) एक जीभ (तेरे) कौन-कौन से गुण बयान कर सकती है। हजार फनों वाला शेषनाग भी (तेरे गुणों का) अंत नहीं जानता। वह दिन-रात (तेरे) नए-नए नाम जपता है। पर। हे प्रभू ! वह तेरा एक भी गुण बयान नहीं कर सकता। 16। हे जगत के पिता ! मैंने तेरी ओट ली है। मैं तेरी शरण आया हूँ। जमदूत बड़े डरावने हैं। बड़े डर दे रहे हैं। माया (एक ऐसा समुंद्र है जिस) में से पार लांघना मुश्किल है। हे प्रभू ! दयावान हो। मुझे कृपा करके साध-संगति में रख। 17। हे गोबिंद ! ये दिखाई देता पसारा सब नाशवंत है। मैं (तुझसे) एक (यह) दान माँगता हूँ (कि मुझे) संतजनों की चरण-धूड़ (मिले)। (ये धूड़) मैं (अपने) माथे पर लगा के सबसे उच्च दर्जा हासिल करूँ। जिस के भाग्यों में तूने जिस चरण-धूड़ की प्राप्ति लिखी है वही हासिल कर सकता है। 18। हे सुखों के देने वाले ! जिन पर तू मेहर करता है वह गुरू के चरणों को अपने हृदय में परो लेते हैं। उनको सारे खजानों से श्रेष्ठ नाम-खजाना मिल जाता है। उनके मन में (जैसे) एक-रस बाजे बजने लगते हैं। 19। हे प्रभू ! (हमारी जीवों की) जीभ तेरे वह नाम उचारती है जो नाम (तेरे गुण देख-देख के जीवों ने) बनाए हुए हैं। पर ‘सतिनामु’ तेरा आदि कदीमी का नाम है (भाव। तू ‘अस्तित्व वाला’ है। तेरा यह ‘अस्तित्व’ जगत-रचना से पहले भी मौजूद था)। हे नानक ! कह- (हे प्रभू !) तेरे भगत तेरी शरण पड़े रहते हैं। तू उनको दर्शन देता है। उनके मन में आनंद बना रहता है। 20। हे प्रभू ! तू कैसा है और कितना बड़ा है- ये बात तू स्वयं ही जानता है। अपनी ‘गति मिति’ तू बता सकता है और खुद ही बयान करता है। हे प्रभू ! नानक को दासों का दास बनाए रख। और। हे हरी ! अगर तेरी मेहर हो तो (नानक को) अपने दासों की संगति में रख। 21। 2। 11।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਅਲਹ ਅਗਮ ਖੁਦਾਈ ਬੰਦੇ ॥
ਛੋਡਿ ਖਿਆਲ ਦੁਨੀਆ ਕੇ ਧੰਧੇ ॥
ਹੋਇ ਪੈ ਖਾਕ ਫਕੀਰ ਮੁਸਾਫਰੁ ਇਹੁ ਦਰਵੇਸੁ ਕਬੂਲੁ ਦਰਾ ॥੧॥
ਸਚੁ ਨਿਵਾਜ ਯਕੀਨ ਮੁਸਲਾ ॥
ਮਨਸਾ ਮਾਰਿ ਨਿਵਾਰਿਹੁ ਆਸਾ ॥
ਦੇਹ ਮਸੀਤਿ ਮਨੁ ਮਉਲਾਣਾ ਕਲਮ ਖੁਦਾਈ ਪਾਕੁ ਖਰਾ ॥੨॥
ਸਰਾ ਸਰੀਅਤਿ ਲੇ ਕੰਮਾਵਹੁ ॥
ਤਰੀਕਤਿ ਤਰਕ ਖੋਜਿ ਟੋਲਾਵਹੁ ॥
ਮਾਰਫਤਿ ਮਨੁ ਮਾਰਹੁ ਅਬਦਾਲਾ ਮਿਲਹੁ ਹਕੀਕਤਿ ਜਿਤੁ ਫਿਰਿ ਨ ਮਰਾ ॥੩॥
ਕੁਰਾਣੁ ਕਤੇਬ ਦਿਲ ਮਾਹਿ ਕਮਾਹੀ ॥
ਦਸ ਅਉਰਾਤ ਰਖਹੁ ਬਦ ਰਾਹੀ ॥
ਪੰਚ ਮਰਦ ਸਿਦਕਿ ਲੇ ਬਾਧਹੁ ਖੈਰਿ ਸਬੂਰੀ ਕਬੂਲ ਪਰਾ ॥੪॥
ਮਕਾ ਮਿਹਰ ਰੋਜਾ ਪੈ ਖਾਕਾ ॥
ਭਿਸਤੁ ਪੀਰ ਲਫਜ ਕਮਾਇ ਅੰਦਾਜਾ ॥
ਹੂਰ ਨੂਰ ਮੁਸਕੁ ਖੁਦਾਇਆ ਬੰਦਗੀ ਅਲਹ ਆਲਾ ਹੁਜਰਾ ॥੫॥
ਅਲਹ ਅਗਮ ਖੁਦਾਈ ਬੰਦੇ ॥
ਛੋਡਿ ਖਿਆਲ ਦੁਨੀਆ ਕੇ ਧੰਧੇ ॥
ਹੋਇ ਪੈ ਖਾਕ ਫਕੀਰ ਮੁਸਾਫਰੁ ਇਹੁ ਦਰਵੇਸੁ ਕਬੂਲੁ ਦਰਾ ॥੧॥
ਸਚੁ ਨਿਵਾਜ ਯਕੀਨ ਮੁਸਲਾ ॥
ਮਨਸਾ ਮਾਰਿ ਨਿਵਾਰਿਹੁ ਆਸਾ ॥
ਦੇਹ ਮਸੀਤਿ ਮਨੁ ਮਉਲਾਣਾ ਕਲਮ ਖੁਦਾਈ ਪਾਕੁ ਖਰਾ ॥੨॥
ਸਰਾ ਸਰੀਅਤਿ ਲੇ ਕੰਮਾਵਹੁ ॥
ਤਰੀਕਤਿ ਤਰਕ ਖੋਜਿ ਟੋਲਾਵਹੁ ॥
ਮਾਰਫਤਿ ਮਨੁ ਮਾਰਹੁ ਅਬਦਾਲਾ ਮਿਲਹੁ ਹਕੀਕਤਿ ਜਿਤੁ ਫਿਰਿ ਨ ਮਰਾ ॥੩॥
ਕੁਰਾਣੁ ਕਤੇਬ ਦਿਲ ਮਾਹਿ ਕਮਾਹੀ ॥
ਦਸ ਅਉਰਾਤ ਰਖਹੁ ਬਦ ਰਾਹੀ ॥
ਪੰਚ ਮਰਦ ਸਿਦਕਿ ਲੇ ਬਾਧਹੁ ਖੈਰਿ ਸਬੂਰੀ ਕਬੂਲ ਪਰਾ ॥੪॥
ਮਕਾ ਮਿਹਰ ਰੋਜਾ ਪੈ ਖਾਕਾ ॥
ਭਿਸਤੁ ਪੀਰ ਲਫਜ ਕਮਾਇ ਅੰਦਾਜਾ ॥
ਹੂਰ ਨੂਰ ਮੁਸਕੁ ਖੁਦਾਇਆ ਬੰਦਗੀ ਅਲਹ ਆਲਾ ਹੁਜਰਾ ॥੫॥
मारू महला ५ ॥
अलह अगम खुदाई बंदे ॥
छोडि खिआल दुनीआ के धंधे ॥
होइ पै खाक फकीर मुसाफरु इहु दरवेसु कबूलु दरा ॥१॥
सचु निवाज यकीन मुसला ॥
मनसा मारि निवारिहु आसा ॥
देह मसीति मनु मउलाणा कलम खुदाई पाकु खरा ॥२॥
सरा सरीअति ले कंमावहु ॥
तरीकति तरक खोजि टोलावहु ॥
मारफति मनु मारहु अबदाला मिलहु हकीकति जितु फिरि न मरा ॥३॥
कुराणु कतेब दिल माहि कमाही ॥
दस अउरात रखहु बद राही ॥
पंच मरद सिदकि ले बाधहु खैरि सबूरी कबूल परा ॥४॥
मका मिहर रोजा पै खाका ॥
भिसतु पीर लफज कमाइ अंदाजा ॥
हूर नूर मुसकु खुदाइआ बंदगी अलह आला हुजरा ॥५॥
अलह अगम खुदाई बंदे ॥
छोडि खिआल दुनीआ के धंधे ॥
होइ पै खाक फकीर मुसाफरु इहु दरवेसु कबूलु दरा ॥१॥
सचु निवाज यकीन मुसला ॥
मनसा मारि निवारिहु आसा ॥
देह मसीति मनु मउलाणा कलम खुदाई पाकु खरा ॥२॥
सरा सरीअति ले कंमावहु ॥
तरीकति तरक खोजि टोलावहु ॥
मारफति मनु मारहु अबदाला मिलहु हकीकति जितु फिरि न मरा ॥३॥
कुराणु कतेब दिल माहि कमाही ॥
दस अउरात रखहु बद राही ॥
पंच मरद सिदकि ले बाधहु खैरि सबूरी कबूल परा ॥४॥
मका मिहर रोजा पै खाका ॥
भिसतु पीर लफज कमाइ अंदाजा ॥
हूर नूर मुसकु खुदाइआ बंदगी अलह आला हुजरा ॥५॥
हिन्दी अर्थ: मारू महला ५॥ हे अल्लाह के बँदे ! हे अपहुँच रॅब के बंदे ! हे ख़ुदा के बंदे ! (निरे) दुनिया वाले ख्याल छोड़ दे। (निरे) दुनियावी झमेले छोड़ दे। रॅब के फकीरों के पैरों की खाक हो के (दुनिया में) मुसाफिर बना रह। इस तरह का फकीर रॅब के दर पर कबूल हो जाता है। 1। हे ख़ुदा के बंदे ! सदा कायम रहने वाले रॅब के नाम (की याद) को (अपनी) निमाज़ बना। रॅब के ऊपर भरोसा – ये तेरा मुसल्ला हो। हे ख़ुदा के फकीर ! (अपने अंदर से) मन का फुरना मार के खत्म कर दे- इसको डंडा बना। (तेरा यह) शरीर (तेरी) मस्जिद हो। (तेरा) मन (उस मस्जिद में) मुल्ला (बना रहे)। (इस मन को सदा) पवित्र और साफ रख- ये तेरे लिए ख़ुदाई कलमा है। 2। हे ख़ुदा के बंदे ! (ख़ुदा का नाम) ले के बँदगी की कमाई करा कर- यह है असल शरह शरीअति (बाहरी धार्मिक रहन-सहन)। हे रॅब के बंदे ! (स्वैभाव) त्याग के (अपने अंदर बसते रॅब को) खोज के ढूँढ- ये है मन को साफ़ रखने का तरीका। हे अब्दाल फकीर ! अपने मन को वश में रख – यह है मारफति (आत्मिक जीवन की सूझ)। रॅब से मिला रह- ये है हकीकति (चौथा पद)। (ये हकीकति ऐसी है कि) इससे दोबारा आत्मिक मौत नहीं होती। 3। हे ख़ुदा के बंदे ! अपने दिल में खुदा के नाम की कमाई करता रह- ये है कुरान। ये है कतेबों की तालीम। हे ख़ुदा के बंदे ! अपनी दस इन्द्रियों को बुरे रास्तों से रोक के रख ! सिदक की मदद से पाँच कामादिक शूरवीरों को पकड़ के बाँध के रख। संतोख की ख़ैर की बरकति से तू खुदा के दर पर कबूल हो जाएगा। 4। हे ख़ुदा के बँदे ! (दिल में सबक लिए) तरस को (हॅज-स्थान) मक्का (समझ)। (सबके) पैरों की ख़ाक हुए रहना (असल) रोज़ा है। गुरू के बचनों पर पूरी तरह से चलना -ये है बहिश्त। ख़ुदा के नूर का जहूर ही हूरें हैं। ख़ुदा की बूँदगी ही कसतूरी है। ख़ुदा की बँदगी ही सबसे बढ़िया हुजरा है (जहाँ मन विकारों से हट के एक ठिकाने पर रह सकता है)। 5।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 1083 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
Diwali की पहली रात, अकेले बालकनी में पटाख़ों के बीच एक specific shift।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 44 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1083” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 1084 →, पीछे का: ← अंग 1082।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।