अंग
1080
राग मारू
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਸੇਈ ਜਨ ਊਤਮ ਜੋ ਭਾਵਹਿ ਸੁਆਮੀ ਤੁਮ ਮਨਾ ॥੧੬॥੧॥੮॥
कहु नानक सेई जन ऊतम जो भावहि सुआमी तुम मना ॥१६॥१॥८॥
हिन्दी अर्थ: वही मनुष्य श्रेष्ठ हैं जो तुझे अच्छे लगते हैं। 16। 1। 8।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਪ੍ਰਭ ਸਮਰਥ ਸਰਬ ਸੁਖ ਦਾਨਾ ॥
ਸਿਮਰਉ ਨਾਮੁ ਹੋਹੁ ਮਿਹਰਵਾਨਾ ॥
ਹਰਿ ਦਾਤਾ ਜੀਅ ਜੰਤ ਭੇਖਾਰੀ ਜਨੁ ਬਾਂਛੈ ਜਾਚੰਗਨਾ ॥੧॥
ਮਾਗਉ ਜਨ ਧੂਰਿ ਪਰਮ ਗਤਿ ਪਾਵਉ ॥
ਜਨਮ ਜਨਮ ਕੀ ਮੈਲੁ ਮਿਟਾਵਉ ॥
ਦੀਰਘ ਰੋਗ ਮਿਟਹਿ ਹਰਿ ਅਉਖਧਿ ਹਰਿ ਨਿਰਮਲਿ ਰਾਪੈ ਮੰਗਨਾ ॥੨॥
ਸ੍ਰਵਣੀ ਸੁਣਉ ਬਿਮਲ ਜਸੁ ਸੁਆਮੀ ॥
ਏਕਾ ਓਟ ਤਜਉ ਬਿਖੁ ਕਾਮੀ ॥
ਨਿਵਿ ਨਿਵਿ ਪਾਇ ਲਗਉ ਦਾਸ ਤੇਰੇ ਕਰਿ ਸੁਕ੍ਰਿਤੁ ਨਾਹੀ ਸੰਗਨਾ ॥੩॥
ਰਸਨਾ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ਹਰਿ ਤੇਰੇ ॥
ਮਿਟਹਿ ਕਮਾਤੇ ਅਵਗੁਣ ਮੇਰੇ ॥
ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਸੁਆਮੀ ਮਨੁ ਜੀਵੈ ਪੰਚ ਦੂਤ ਤਜਿ ਤੰਗਨਾ ॥੪॥
ਚਰਨ ਕਮਲ ਜਪਿ ਬੋਹਿਥਿ ਚਰੀਐ ॥
ਸੰਤਸੰਗਿ ਮਿਲਿ ਸਾਗਰੁ ਤਰੀਐ ॥
ਅਰਚਾ ਬੰਦਨ ਹਰਿ ਸਮਤ ਨਿਵਾਸੀ ਬਾਹੁੜਿ ਜੋਨਿ ਨ ਨੰਗਨਾ ॥੫॥
ਦਾਸ ਦਾਸਨ ਕੋ ਕਰਿ ਲੇਹੁ ਗੋੁਪਾਲਾ ॥
ਕ੍ਰਿਪਾ ਨਿਧਾਨ ਦੀਨ ਦਇਆਲਾ ॥
ਸਖਾ ਸਹਾਈ ਪੂਰਨ ਪਰਮੇਸੁਰ ਮਿਲੁ ਕਦੇ ਨ ਹੋਵੀ ਭੰਗਨਾ ॥੬॥
ਮਨੁ ਤਨੁ ਅਰਪਿ ਧਰੀ ਹਰਿ ਆਗੈ ॥
ਜਨਮ ਜਨਮ ਕਾ ਸੋਇਆ ਜਾਗੈ ॥
ਜਿਸ ਕਾ ਸਾ ਸੋਈ ਪ੍ਰਤਿਪਾਲਕੁ ਹਤਿ ਤਿਆਗੀ ਹਉਮੈ ਹੰਤਨਾ ॥੭॥
ਜਲਿ ਥਲਿ ਪੂਰਨ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ॥
ਘਟਿ ਘਟਿ ਰਵਿਆ ਅਛਲ ਸੁਆਮੀ ॥
ਭਰਮ ਭੀਤਿ ਖੋਈ ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਏਕੁ ਰਵਿਆ ਸਰਬੰਗਨਾ ॥੮॥
ਜਤ ਕਤ ਪੇਖਉ ਪ੍ਰਭ ਸੁਖ ਸਾਗਰ ॥
ਹਰਿ ਤੋਟਿ ਭੰਡਾਰ ਨਾਹੀ ਰਤਨਾਗਰ ॥
ਅਗਹ ਅਗਾਹ ਕਿਛੁ ਮਿਤਿ ਨਹੀ ਪਾਈਐ ਸੋ ਬੂਝੈ ਜਿਸੁ ਕਿਰਪੰਗਨਾ ॥੯॥
ਛਾਤੀ ਸੀਤਲ ਮਨੁ ਤਨੁ ਠੰਢਾ ॥
ਜਨਮ ਮਰਣ ਕੀ ਮਿਟਵੀ ਡੰਝਾ ॥
ਕਰੁ ਗਹਿ ਕਾਢਿ ਲੀਏ ਪ੍ਰਭਿ ਅਪੁਨੈ ਅਮਿਓ ਧਾਰਿ ਦ੍ਰਿਸਟੰਗਨਾ ॥੧੦॥
ਏਕੋ ਏਕੁ ਰਵਿਆ ਸਭ ਠਾਈ ॥
ਤਿਸੁ ਬਿਨੁ ਦੂਜਾ ਕੋਈ ਨਾਹੀ ॥
ਆਦਿ ਮਧਿ ਅੰਤਿ ਪ੍ਰਭੁ ਰਵਿਆ ਤ੍ਰਿਸਨ ਬੁਝੀ ਭਰਮੰਗਨਾ ॥੧੧॥
ਗੁਰੁ ਪਰਮੇਸਰੁ ਗੁਰੁ ਗੋਬਿੰਦੁ ॥
ਗੁਰੁ ਕਰਤਾ ਗੁਰੁ ਸਦ ਬਖਸੰਦੁ ॥
ਗੁਰ ਜਪੁ ਜਾਪਿ ਜਪਤ ਫਲੁ ਪਾਇਆ ਗਿਆਨ ਦੀਪਕੁ ਸੰਤ ਸੰਗਨਾ ॥੧੨॥
ਜੋ ਪੇਖਾ ਸੋ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਸੁਆਮੀ ॥
ਜੋ ਸੁਨਣਾ ਸੋ ਪ੍ਰਭ ਕੀ ਬਾਨੀ ॥
ਜੋ ਕੀਨੋ ਸੋ ਤੁਮਹਿ ਕਰਾਇਓ ਸਰਣਿ ਸਹਾਈ ਸੰਤਹ ਤਨਾ ॥੧੩॥
ਜਾਚਕੁ ਜਾਚੈ ਤੁਮਹਿ ਅਰਾਧੈ ॥
ਪਤਿਤ ਪਾਵਨ ਪੂਰਨ ਪ੍ਰਭ ਸਾਧੈ ॥
ਏਕੋ ਦਾਨੁ ਸਰਬ ਸੁਖ ਗੁਣ ਨਿਧਿ ਆਨ ਮੰਗਨ ਨਿਹਕਿੰਚਨਾ ॥੧੪॥
ਪ੍ਰਭ ਸਮਰਥ ਸਰਬ ਸੁਖ ਦਾਨਾ ॥
ਸਿਮਰਉ ਨਾਮੁ ਹੋਹੁ ਮਿਹਰਵਾਨਾ ॥
ਹਰਿ ਦਾਤਾ ਜੀਅ ਜੰਤ ਭੇਖਾਰੀ ਜਨੁ ਬਾਂਛੈ ਜਾਚੰਗਨਾ ॥੧॥
ਮਾਗਉ ਜਨ ਧੂਰਿ ਪਰਮ ਗਤਿ ਪਾਵਉ ॥
ਜਨਮ ਜਨਮ ਕੀ ਮੈਲੁ ਮਿਟਾਵਉ ॥
ਦੀਰਘ ਰੋਗ ਮਿਟਹਿ ਹਰਿ ਅਉਖਧਿ ਹਰਿ ਨਿਰਮਲਿ ਰਾਪੈ ਮੰਗਨਾ ॥੨॥
ਸ੍ਰਵਣੀ ਸੁਣਉ ਬਿਮਲ ਜਸੁ ਸੁਆਮੀ ॥
ਏਕਾ ਓਟ ਤਜਉ ਬਿਖੁ ਕਾਮੀ ॥
ਨਿਵਿ ਨਿਵਿ ਪਾਇ ਲਗਉ ਦਾਸ ਤੇਰੇ ਕਰਿ ਸੁਕ੍ਰਿਤੁ ਨਾਹੀ ਸੰਗਨਾ ॥੩॥
ਰਸਨਾ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ਹਰਿ ਤੇਰੇ ॥
ਮਿਟਹਿ ਕਮਾਤੇ ਅਵਗੁਣ ਮੇਰੇ ॥
ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਸੁਆਮੀ ਮਨੁ ਜੀਵੈ ਪੰਚ ਦੂਤ ਤਜਿ ਤੰਗਨਾ ॥੪॥
ਚਰਨ ਕਮਲ ਜਪਿ ਬੋਹਿਥਿ ਚਰੀਐ ॥
ਸੰਤਸੰਗਿ ਮਿਲਿ ਸਾਗਰੁ ਤਰੀਐ ॥
ਅਰਚਾ ਬੰਦਨ ਹਰਿ ਸਮਤ ਨਿਵਾਸੀ ਬਾਹੁੜਿ ਜੋਨਿ ਨ ਨੰਗਨਾ ॥੫॥
ਦਾਸ ਦਾਸਨ ਕੋ ਕਰਿ ਲੇਹੁ ਗੋੁਪਾਲਾ ॥
ਕ੍ਰਿਪਾ ਨਿਧਾਨ ਦੀਨ ਦਇਆਲਾ ॥
ਸਖਾ ਸਹਾਈ ਪੂਰਨ ਪਰਮੇਸੁਰ ਮਿਲੁ ਕਦੇ ਨ ਹੋਵੀ ਭੰਗਨਾ ॥੬॥
ਮਨੁ ਤਨੁ ਅਰਪਿ ਧਰੀ ਹਰਿ ਆਗੈ ॥
ਜਨਮ ਜਨਮ ਕਾ ਸੋਇਆ ਜਾਗੈ ॥
ਜਿਸ ਕਾ ਸਾ ਸੋਈ ਪ੍ਰਤਿਪਾਲਕੁ ਹਤਿ ਤਿਆਗੀ ਹਉਮੈ ਹੰਤਨਾ ॥੭॥
ਜਲਿ ਥਲਿ ਪੂਰਨ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ॥
ਘਟਿ ਘਟਿ ਰਵਿਆ ਅਛਲ ਸੁਆਮੀ ॥
ਭਰਮ ਭੀਤਿ ਖੋਈ ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਏਕੁ ਰਵਿਆ ਸਰਬੰਗਨਾ ॥੮॥
ਜਤ ਕਤ ਪੇਖਉ ਪ੍ਰਭ ਸੁਖ ਸਾਗਰ ॥
ਹਰਿ ਤੋਟਿ ਭੰਡਾਰ ਨਾਹੀ ਰਤਨਾਗਰ ॥
ਅਗਹ ਅਗਾਹ ਕਿਛੁ ਮਿਤਿ ਨਹੀ ਪਾਈਐ ਸੋ ਬੂਝੈ ਜਿਸੁ ਕਿਰਪੰਗਨਾ ॥੯॥
ਛਾਤੀ ਸੀਤਲ ਮਨੁ ਤਨੁ ਠੰਢਾ ॥
ਜਨਮ ਮਰਣ ਕੀ ਮਿਟਵੀ ਡੰਝਾ ॥
ਕਰੁ ਗਹਿ ਕਾਢਿ ਲੀਏ ਪ੍ਰਭਿ ਅਪੁਨੈ ਅਮਿਓ ਧਾਰਿ ਦ੍ਰਿਸਟੰਗਨਾ ॥੧੦॥
ਏਕੋ ਏਕੁ ਰਵਿਆ ਸਭ ਠਾਈ ॥
ਤਿਸੁ ਬਿਨੁ ਦੂਜਾ ਕੋਈ ਨਾਹੀ ॥
ਆਦਿ ਮਧਿ ਅੰਤਿ ਪ੍ਰਭੁ ਰਵਿਆ ਤ੍ਰਿਸਨ ਬੁਝੀ ਭਰਮੰਗਨਾ ॥੧੧॥
ਗੁਰੁ ਪਰਮੇਸਰੁ ਗੁਰੁ ਗੋਬਿੰਦੁ ॥
ਗੁਰੁ ਕਰਤਾ ਗੁਰੁ ਸਦ ਬਖਸੰਦੁ ॥
ਗੁਰ ਜਪੁ ਜਾਪਿ ਜਪਤ ਫਲੁ ਪਾਇਆ ਗਿਆਨ ਦੀਪਕੁ ਸੰਤ ਸੰਗਨਾ ॥੧੨॥
ਜੋ ਪੇਖਾ ਸੋ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਸੁਆਮੀ ॥
ਜੋ ਸੁਨਣਾ ਸੋ ਪ੍ਰਭ ਕੀ ਬਾਨੀ ॥
ਜੋ ਕੀਨੋ ਸੋ ਤੁਮਹਿ ਕਰਾਇਓ ਸਰਣਿ ਸਹਾਈ ਸੰਤਹ ਤਨਾ ॥੧੩॥
ਜਾਚਕੁ ਜਾਚੈ ਤੁਮਹਿ ਅਰਾਧੈ ॥
ਪਤਿਤ ਪਾਵਨ ਪੂਰਨ ਪ੍ਰਭ ਸਾਧੈ ॥
ਏਕੋ ਦਾਨੁ ਸਰਬ ਸੁਖ ਗੁਣ ਨਿਧਿ ਆਨ ਮੰਗਨ ਨਿਹਕਿੰਚਨਾ ॥੧੪॥
मारू महला ५ ॥
प्रभ समरथ सरब सुख दाना ॥
सिमरउ नामु होहु मिहरवाना ॥
हरि दाता जीअ जंत भेखारी जनु बांछै जाचंगना ॥१॥
मागउ जन धूरि परम गति पावउ ॥
जनम जनम की मैलु मिटावउ ॥
दीरघ रोग मिटहि हरि अउखधि हरि निरमलि रापै मंगना ॥२॥
स्रवणी सुणउ बिमल जसु सुआमी ॥
एका ओट तजउ बिखु कामी ॥
निवि निवि पाइ लगउ दास तेरे करि सुक्रितु नाही संगना ॥३॥
रसना गुण गावै हरि तेरे ॥
मिटहि कमाते अवगुण मेरे ॥
सिमरि सिमरि सुआमी मनु जीवै पंच दूत तजि तंगना ॥४॥
चरन कमल जपि बोहिथि चरीऐ ॥
संतसंगि मिलि सागरु तरीऐ ॥
अरचा बंदन हरि समत निवासी बाहुड़ि जोनि न नंगना ॥५॥
दास दासन को करि लेहु गोुपाला ॥
क्रिपा निधान दीन दइआला ॥
सखा सहाई पूरन परमेसुर मिलु कदे न होवी भंगना ॥६॥
मनु तनु अरपि धरी हरि आगै ॥
जनम जनम का सोइआ जागै ॥
जिस का सा सोई प्रतिपालकु हति तिआगी हउमै हंतना ॥७॥
जलि थलि पूरन अंतरजामी ॥
घटि घटि रविआ अछल सुआमी ॥
भरम भीति खोई गुरि पूरै एकु रविआ सरबंगना ॥८॥
जत कत पेखउ प्रभ सुख सागर ॥
हरि तोटि भंडार नाही रतनागर ॥
अगह अगाह किछु मिति नही पाईऐ सो बूझै जिसु किरपंगना ॥९॥
छाती सीतल मनु तनु ठंढा ॥
जनम मरण की मिटवी डंझा ॥
करु गहि काढि लीए प्रभि अपुनै अमिओ धारि द्रिसटंगना ॥१०॥
एको एकु रविआ सभ ठाई ॥
तिसु बिनु दूजा कोई नाही ॥
आदि मधि अंति प्रभु रविआ त्रिसन बुझी भरमंगना ॥११॥
गुरु परमेसरु गुरु गोबिंदु ॥
गुरु करता गुरु सद बखसंदु ॥
गुर जपु जापि जपत फलु पाइआ गिआन दीपकु संत संगना ॥१२॥
जो पेखा सो सभु किछु सुआमी ॥
जो सुनणा सो प्रभ की बानी ॥
जो कीनो सो तुमहि कराइओ सरणि सहाई संतह तना ॥१३॥
जाचकु जाचै तुमहि अराधै ॥
पतित पावन पूरन प्रभ साधै ॥
एको दानु सरब सुख गुण निधि आन मंगन निहकिंचना ॥१४॥
प्रभ समरथ सरब सुख दाना ॥
सिमरउ नामु होहु मिहरवाना ॥
हरि दाता जीअ जंत भेखारी जनु बांछै जाचंगना ॥१॥
मागउ जन धूरि परम गति पावउ ॥
जनम जनम की मैलु मिटावउ ॥
दीरघ रोग मिटहि हरि अउखधि हरि निरमलि रापै मंगना ॥२॥
स्रवणी सुणउ बिमल जसु सुआमी ॥
एका ओट तजउ बिखु कामी ॥
निवि निवि पाइ लगउ दास तेरे करि सुक्रितु नाही संगना ॥३॥
रसना गुण गावै हरि तेरे ॥
मिटहि कमाते अवगुण मेरे ॥
सिमरि सिमरि सुआमी मनु जीवै पंच दूत तजि तंगना ॥४॥
चरन कमल जपि बोहिथि चरीऐ ॥
संतसंगि मिलि सागरु तरीऐ ॥
अरचा बंदन हरि समत निवासी बाहुड़ि जोनि न नंगना ॥५॥
दास दासन को करि लेहु गोुपाला ॥
क्रिपा निधान दीन दइआला ॥
सखा सहाई पूरन परमेसुर मिलु कदे न होवी भंगना ॥६॥
मनु तनु अरपि धरी हरि आगै ॥
जनम जनम का सोइआ जागै ॥
जिस का सा सोई प्रतिपालकु हति तिआगी हउमै हंतना ॥७॥
जलि थलि पूरन अंतरजामी ॥
घटि घटि रविआ अछल सुआमी ॥
भरम भीति खोई गुरि पूरै एकु रविआ सरबंगना ॥८॥
जत कत पेखउ प्रभ सुख सागर ॥
हरि तोटि भंडार नाही रतनागर ॥
अगह अगाह किछु मिति नही पाईऐ सो बूझै जिसु किरपंगना ॥९॥
छाती सीतल मनु तनु ठंढा ॥
जनम मरण की मिटवी डंझा ॥
करु गहि काढि लीए प्रभि अपुनै अमिओ धारि द्रिसटंगना ॥१०॥
एको एकु रविआ सभ ठाई ॥
तिसु बिनु दूजा कोई नाही ॥
आदि मधि अंति प्रभु रविआ त्रिसन बुझी भरमंगना ॥११॥
गुरु परमेसरु गुरु गोबिंदु ॥
गुरु करता गुरु सद बखसंदु ॥
गुर जपु जापि जपत फलु पाइआ गिआन दीपकु संत संगना ॥१२॥
जो पेखा सो सभु किछु सुआमी ॥
जो सुनणा सो प्रभ की बानी ॥
जो कीनो सो तुमहि कराइओ सरणि सहाई संतह तना ॥१३॥
जाचकु जाचै तुमहि अराधै ॥
पतित पावन पूरन प्रभ साधै ॥
एको दानु सरब सुख गुण निधि आन मंगन निहकिंचना ॥१४॥
हिन्दी अर्थ: मारू महला ५॥ हे सारी ताकतों के मालिक प्रभू ! हे सारे सुख देने वाले ! (मेरे पर) मेहरवान हो। मैं तेरा नाम सिमरता रहूँ। हे भाई ! परमात्मा दातें देने वाला है। सारे जीव (उसके दर के) मंगते हैं। (नानक उसका) दास मंगता बन के (उससे नाम की दाति) माँगता है। 1। हे भाई ! (प्रभू के दर से) मैं (उसके) सेवकों की चरण-धूल माँगता हूँ ताकि मैं सबसे ऊँची आत्मिक अवस्था हासिल कर सकूँ। और अनेकों जन्मों की (विकारों की) मैल दूर कर सकूँ। हे भाई ! हरी-नाम की दवाई से बड़े-बड़े रोग दूर हो जाते हैं। मैं भी (उसके दर से) माँगता हूँ कि उसके पवित्र नाम में (मेरा मन) रंगा रहे। 2। हे स्वामी ! (मेहर कर) मैं (अपने) कानों से तेरा पवित्र नाम सुनता रहूँ। मुझे सिर्फ तेरा ही आसरा है। (मेहर कर) मैं आत्मिक मौत लाने वाली काम वासना त्याग दूँ। मैं झुक-झुक के तेरे सेवकों के चरणों में लगता रहूँ। ये नेक कमाई करते हुए मुझे कभी शर्म महिसूस ना हो। 3। हे स्वामी ! हे हरी ! (मेहर कर) मेरी जीभ तेरे गुण गाती रहे। और। मेरे (पिछले) किए हुए अवगुण मिट जाएं। (मेहर कर) तेरा नाम सिमर-सिमर के (और। सिमरन की बरकति से) दुखी करने वाले कामादिक पाँच वैरियों का साथ छोड़ के मेरा मन आत्मिक जीवन प्राप्त कर ले। 4। हे भाई ! (संसार-समुंद्र से पार लांघने के लिए परमात्मा के) सुंदर चरणों का ध्यान धर के (नाम-) जहाज में चढ़ना चाहिए। गुरू की संगति में मिल के (संसार-) समुंद्र से पार लांघा जा सकता है। परमात्मा को सब जीवों में एक-समान बस रहा जान लेना- यही है उसकी अर्चना-पूजा। यही है उसके आगे वंदना। (इस तरह) बार-बार जूनियों में पड़ कर दुखी नहीं होते। 5। मुझे अपने दासों का दास बना ले। हे गोपाल ! हे कृपा के खजाने ! हे दीनों पर दया करने वाले ! हे सर्व-व्यापक परमेश्वर ! तू ही मेरा मित्र है। तू ही मेरा मददगार है। मुझे मिल। तुझसे मेरा कभी विछोड़ा ना हो। 6। हे भाई ! जिस मनुष्य ने अपना मन अपना तन परमात्मा के आगे भेटा कर दिया। वह मनुष्य अनेकों जन्मों का सोया हुआ (भी) जाग उठता है (आत्मिक जीवन की सूझ वाला हो जाता है)। जिस परमात्मा ने उसको पैदा किया था। वही उसका रखवाला बन जाता है। वह मनुष्य आत्मिक मौत लाने वाले अहंकार को सदा के लिए त्याग देता है। 7। उसको परमात्मा सबमें व्यापक दिख जाता है; (उसको ये दिखाई दे जाता है कि) सबके दिलों की जानने वाला प्रभू जल में धरती में सब जगह व्यापक है। हे भाई ! पूरे गुरू ने (जिस मनुष्य की परमात्मा से विछोड़ा डालने वाली) भटकना की दीवार दूर कर दी। माया से ना छला जा सकने वाला हरी हरेक शरीर में मौजूद है। 8। हे भाई ! मैं जिस तरफ भी देखता हूँ। सुखों का समुंद्र परमात्मा ही (बस रहा है)। रत्नों की खान उस परमात्मा के खजानों में कभी कमी नहीं आती। हे भाई ! उस परमात्मा की हस्ती की कोई हद-बंदी नहीं पा सकता जो हरेक समय की पकड़ से परे है जिसको नापा नहीं जा सकता। पर। यह बात वह मनुष्य समझता है जिस पर उसकी कृपा हो। 9। उनका हृदय शांत हो गया है। उनका मन उनका तन शांत हो गया है। उनकी वह जलन मिट गई है जो जनम-मरण के चक्करों में डालती है। हे भाई ! आत्मिक जीवन देने वाली निगाह करके प्यारे प्रभू ने जिन (भाग्यशालियों) को (उनका) हाथ पकड़ कर (संसार-समुंद्र में से) निकाल लिया है। 10। (उसको यह दिखाई दे जाता है कि) परमात्मा ही परमात्मा सब जगह बस रहा है। उसके बिना (उस जैसा) और कोई नहीं। वह परमात्मा ही जगत-रचना के आरम्भ में था। वह परमात्मा ही अब मौजूद है। वह परमात्मा ही जगत के अंत में होगा। हे भाई ! (गुरू की कृपा से जिस मनुष्य की माया की) तृष्णा समाप्त हो जाती है भटकना खत्म हो जाती है 11। (उसको ये दिखाई दे जाता है कि) गुरू परमेश्वर (का रूप) है गुरू गोबिंद (का रूप) है। गुरू करतार (का रूप है) गुरू सदा बख्शिशें करने वाला है। हे भाई ! साध-संगति में टिक के गुरू का बताया हुआ हरी-नाम का जाप जपते हुए जिस मनुष्य के अंदर आत्मिक जीवन की सूझ का दीया जल उठता है जिसको ये फल प्राप्त हो जाता है 12। हे भाई ! (संसार में) मैं जो कुछ देखता हूँ सब कुछ मालिक-प्रभू (का ही रूप) है। जो कुछ मैं सुनता हूँ। प्रभू ही हर जगह स्वयं बोल रहा है। हे प्रभू ! जो कुछ जीव करते हैं। वह तू ही कर रहा है। तू शरण पड़ने वालों की सहायता करने वाला है। तू (अपने) संतों का सहारा है। 13। (तेरे दर का) मंगता (दास) तुझसे ही माँगता है तुझे ही आराधता है। हे पतित-पावन प्रभू ! हे पूरन साधु प्रभू ! हे सारे सुख देने वाले प्रभू ! गुणों के खजाने प्रभू ! (तेरा दास तुझसे) सिर्फ (तेरे नाम का) दान (ही माँगता है)। और माँगें माँगना बेअर्थ हैं (निकम्मी हैं)। 14।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 1080 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
New Friends Colony के पाँच-मंज़िला flat की terrace पर रात की हवा।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 44 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1080” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 1081 →, पीछे का: ← अंग 1079।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।