अंग
1077
राग मारू
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਇਕਿ ਭੂਖੇ ਇਕਿ ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਅਘਾਏ ਸਭਸੈ ਤੇਰਾ ਪਾਰਣਾ ॥੩॥
ਆਪੇ ਸਤਿ ਸਤਿ ਸਤਿ ਸਾਚਾ ॥
ਓਤਿ ਪੋਤਿ ਭਗਤਨ ਸੰਗਿ ਰਾਚਾ ॥
ਆਪੇ ਗੁਪਤੁ ਆਪੇ ਹੈ ਪਰਗਟੁ ਅਪਣਾ ਆਪੁ ਪਸਾਰਣਾ ॥੪॥
ਸਦਾ ਸਦਾ ਸਦ ਹੋਵਣਹਾਰਾ ॥
ਊਚਾ ਅਗਮੁ ਅਥਾਹੁ ਅਪਾਰਾ ॥
ਊਣੇ ਭਰੇ ਭਰੇ ਭਰਿ ਊਣੇ ਏਹਿ ਚਲਤ ਸੁਆਮੀ ਕੇ ਕਾਰਣਾ ॥੫॥
ਮੁਖਿ ਸਾਲਾਹੀ ਸਚੇ ਸਾਹਾ ॥
ਨੈਣੀ ਪੇਖਾ ਅਗਮ ਅਥਾਹਾ ॥
ਕਰਨੀ ਸੁਣਿ ਸੁਣਿ ਮਨੁ ਤਨੁ ਹਰਿਆ ਮੇਰੇ ਸਾਹਿਬ ਸਗਲ ਉਧਾਰਣਾ ॥੬॥
ਕਰਿ ਕਰਿ ਵੇਖਹਿ ਕੀਤਾ ਅਪਣਾ ॥
ਜੀਅ ਜੰਤ ਸੋਈ ਹੈ ਜਪਣਾ ॥
ਅਪਣੀ ਕੁਦਰਤਿ ਆਪੇ ਜਾਣੈ ਨਦਰੀ ਨਦਰਿ ਨਿਹਾਲਣਾ ॥੭॥
ਸੰਤ ਸਭਾ ਜਹ ਬੈਸਹਿ ਪ੍ਰਭ ਪਾਸੇ ॥
ਅਨੰਦ ਮੰਗਲ ਹਰਿ ਚਲਤ ਤਮਾਸੇ ॥
ਗੁਣ ਗਾਵਹਿ ਅਨਹਦ ਧੁਨਿ ਬਾਣੀ ਤਹ ਨਾਨਕ ਦਾਸੁ ਚਿਤਾਰਣਾ ॥੮॥
ਆਵਣੁ ਜਾਣਾ ਸਭੁ ਚਲਤੁ ਤੁਮਾਰਾ ॥
ਕਰਿ ਕਰਿ ਦੇਖੈ ਖੇਲੁ ਅਪਾਰਾ ॥
ਆਪਿ ਉਪਾਏ ਉਪਾਵਣਹਾਰਾ ਅਪਣਾ ਕੀਆ ਪਾਲਣਾ ॥੯॥
ਸੁਣਿ ਸੁਣਿ ਜੀਵਾ ਸੋਇ ਤੁਮਾਰੀ ॥
ਸਦਾ ਸਦਾ ਜਾਈ ਬਲਿਹਾਰੀ ॥
ਦੁਇ ਕਰ ਜੋੜਿ ਸਿਮਰਉ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ਮੇਰੇ ਸੁਆਮੀ ਅਗਮ ਅਪਾਰਣਾ ॥੧੦॥
ਤੁਧੁ ਬਿਨੁ ਦੂਜੇ ਕਿਸੁ ਸਾਲਾਹੀ ॥
ਏਕੋ ਏਕੁ ਜਪੀ ਮਨ ਮਾਹੀ ॥
ਹੁਕਮੁ ਬੂਝਿ ਜਨ ਭਏ ਨਿਹਾਲਾ ਇਹ ਭਗਤਾ ਕੀ ਘਾਲਣਾ ॥੧੧॥
ਗੁਰ ਉਪਦੇਸਿ ਜਪੀਐ ਮਨਿ ਸਾਚਾ ॥
ਗੁਰ ਉਪਦੇਸਿ ਰਾਮ ਰੰਗਿ ਰਾਚਾ ॥
ਗੁਰ ਉਪਦੇਸਿ ਤੁਟਹਿ ਸਭਿ ਬੰਧਨ ਇਹੁ ਭਰਮੁ ਮੋਹੁ ਪਰਜਾਲਣਾ ॥੧੨॥
ਜਹ ਰਾਖੈ ਸੋਈ ਸੁਖ ਥਾਨਾ ॥
ਸਹਜੇ ਹੋਇ ਸੋਈ ਭਲ ਮਾਨਾ ॥
ਬਿਨਸੇ ਬੈਰ ਨਾਹੀ ਕੋ ਬੈਰੀ ਸਭੁ ਏਕੋ ਹੈ ਭਾਲਣਾ ॥੧੩॥
ਡਰ ਚੂਕੇ ਬਿਨਸੇ ਅੰਧਿਆਰੇ ॥
ਪ੍ਰਗਟ ਭਏ ਪ੍ਰਭ ਪੁਰਖ ਨਿਰਾਰੇ ॥
ਆਪੁ ਛੋਡਿ ਪਏ ਸਰਣਾਈ ਜਿਸ ਕਾ ਸਾ ਤਿਸੁ ਘਾਲਣਾ ॥੧੪॥
ਐਸਾ ਕੋ ਵਡਭਾਗੀ ਆਇਆ ॥
ਆਠ ਪਹਰ ਜਿਨਿ ਖਸਮੁ ਧਿਆਇਆ ॥
ਤਿਸੁ ਜਨ ਕੈ ਸੰਗਿ ਤਰੈ ਸਭੁ ਕੋਈ ਸੋ ਪਰਵਾਰ ਸਧਾਰਣਾ ॥੧੫॥
ਇਹ ਬਖਸੀਸ ਖਸਮ ਤੇ ਪਾਵਾ ॥
ਆਠ ਪਹਰ ਕਰ ਜੋੜਿ ਧਿਆਵਾ ॥
ਨਾਮੁ ਜਪੀ ਨਾਮਿ ਸਹਜਿ ਸਮਾਵਾ ਨਾਮੁ ਨਾਨਕ ਮਿਲੈ ਉਚਾਰਣਾ ॥੧੬॥੧॥੬॥
ਆਪੇ ਸਤਿ ਸਤਿ ਸਤਿ ਸਾਚਾ ॥
ਓਤਿ ਪੋਤਿ ਭਗਤਨ ਸੰਗਿ ਰਾਚਾ ॥
ਆਪੇ ਗੁਪਤੁ ਆਪੇ ਹੈ ਪਰਗਟੁ ਅਪਣਾ ਆਪੁ ਪਸਾਰਣਾ ॥੪॥
ਸਦਾ ਸਦਾ ਸਦ ਹੋਵਣਹਾਰਾ ॥
ਊਚਾ ਅਗਮੁ ਅਥਾਹੁ ਅਪਾਰਾ ॥
ਊਣੇ ਭਰੇ ਭਰੇ ਭਰਿ ਊਣੇ ਏਹਿ ਚਲਤ ਸੁਆਮੀ ਕੇ ਕਾਰਣਾ ॥੫॥
ਮੁਖਿ ਸਾਲਾਹੀ ਸਚੇ ਸਾਹਾ ॥
ਨੈਣੀ ਪੇਖਾ ਅਗਮ ਅਥਾਹਾ ॥
ਕਰਨੀ ਸੁਣਿ ਸੁਣਿ ਮਨੁ ਤਨੁ ਹਰਿਆ ਮੇਰੇ ਸਾਹਿਬ ਸਗਲ ਉਧਾਰਣਾ ॥੬॥
ਕਰਿ ਕਰਿ ਵੇਖਹਿ ਕੀਤਾ ਅਪਣਾ ॥
ਜੀਅ ਜੰਤ ਸੋਈ ਹੈ ਜਪਣਾ ॥
ਅਪਣੀ ਕੁਦਰਤਿ ਆਪੇ ਜਾਣੈ ਨਦਰੀ ਨਦਰਿ ਨਿਹਾਲਣਾ ॥੭॥
ਸੰਤ ਸਭਾ ਜਹ ਬੈਸਹਿ ਪ੍ਰਭ ਪਾਸੇ ॥
ਅਨੰਦ ਮੰਗਲ ਹਰਿ ਚਲਤ ਤਮਾਸੇ ॥
ਗੁਣ ਗਾਵਹਿ ਅਨਹਦ ਧੁਨਿ ਬਾਣੀ ਤਹ ਨਾਨਕ ਦਾਸੁ ਚਿਤਾਰਣਾ ॥੮॥
ਆਵਣੁ ਜਾਣਾ ਸਭੁ ਚਲਤੁ ਤੁਮਾਰਾ ॥
ਕਰਿ ਕਰਿ ਦੇਖੈ ਖੇਲੁ ਅਪਾਰਾ ॥
ਆਪਿ ਉਪਾਏ ਉਪਾਵਣਹਾਰਾ ਅਪਣਾ ਕੀਆ ਪਾਲਣਾ ॥੯॥
ਸੁਣਿ ਸੁਣਿ ਜੀਵਾ ਸੋਇ ਤੁਮਾਰੀ ॥
ਸਦਾ ਸਦਾ ਜਾਈ ਬਲਿਹਾਰੀ ॥
ਦੁਇ ਕਰ ਜੋੜਿ ਸਿਮਰਉ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ਮੇਰੇ ਸੁਆਮੀ ਅਗਮ ਅਪਾਰਣਾ ॥੧੦॥
ਤੁਧੁ ਬਿਨੁ ਦੂਜੇ ਕਿਸੁ ਸਾਲਾਹੀ ॥
ਏਕੋ ਏਕੁ ਜਪੀ ਮਨ ਮਾਹੀ ॥
ਹੁਕਮੁ ਬੂਝਿ ਜਨ ਭਏ ਨਿਹਾਲਾ ਇਹ ਭਗਤਾ ਕੀ ਘਾਲਣਾ ॥੧੧॥
ਗੁਰ ਉਪਦੇਸਿ ਜਪੀਐ ਮਨਿ ਸਾਚਾ ॥
ਗੁਰ ਉਪਦੇਸਿ ਰਾਮ ਰੰਗਿ ਰਾਚਾ ॥
ਗੁਰ ਉਪਦੇਸਿ ਤੁਟਹਿ ਸਭਿ ਬੰਧਨ ਇਹੁ ਭਰਮੁ ਮੋਹੁ ਪਰਜਾਲਣਾ ॥੧੨॥
ਜਹ ਰਾਖੈ ਸੋਈ ਸੁਖ ਥਾਨਾ ॥
ਸਹਜੇ ਹੋਇ ਸੋਈ ਭਲ ਮਾਨਾ ॥
ਬਿਨਸੇ ਬੈਰ ਨਾਹੀ ਕੋ ਬੈਰੀ ਸਭੁ ਏਕੋ ਹੈ ਭਾਲਣਾ ॥੧੩॥
ਡਰ ਚੂਕੇ ਬਿਨਸੇ ਅੰਧਿਆਰੇ ॥
ਪ੍ਰਗਟ ਭਏ ਪ੍ਰਭ ਪੁਰਖ ਨਿਰਾਰੇ ॥
ਆਪੁ ਛੋਡਿ ਪਏ ਸਰਣਾਈ ਜਿਸ ਕਾ ਸਾ ਤਿਸੁ ਘਾਲਣਾ ॥੧੪॥
ਐਸਾ ਕੋ ਵਡਭਾਗੀ ਆਇਆ ॥
ਆਠ ਪਹਰ ਜਿਨਿ ਖਸਮੁ ਧਿਆਇਆ ॥
ਤਿਸੁ ਜਨ ਕੈ ਸੰਗਿ ਤਰੈ ਸਭੁ ਕੋਈ ਸੋ ਪਰਵਾਰ ਸਧਾਰਣਾ ॥੧੫॥
ਇਹ ਬਖਸੀਸ ਖਸਮ ਤੇ ਪਾਵਾ ॥
ਆਠ ਪਹਰ ਕਰ ਜੋੜਿ ਧਿਆਵਾ ॥
ਨਾਮੁ ਜਪੀ ਨਾਮਿ ਸਹਜਿ ਸਮਾਵਾ ਨਾਮੁ ਨਾਨਕ ਮਿਲੈ ਉਚਾਰਣਾ ॥੧੬॥੧॥੬॥
इकि भूखे इकि त्रिपति अघाए सभसै तेरा पारणा ॥३॥
आपे सति सति सति साचा ॥
ओति पोति भगतन संगि राचा ॥
आपे गुपतु आपे है परगटु अपणा आपु पसारणा ॥४॥
सदा सदा सद होवणहारा ॥
ऊचा अगमु अथाहु अपारा ॥
ऊणे भरे भरे भरि ऊणे एहि चलत सुआमी के कारणा ॥५॥
मुखि सालाही सचे साहा ॥
नैणी पेखा अगम अथाहा ॥
करनी सुणि सुणि मनु तनु हरिआ मेरे साहिब सगल उधारणा ॥६॥
करि करि वेखहि कीता अपणा ॥
जीअ जंत सोई है जपणा ॥
अपणी कुदरति आपे जाणै नदरी नदरि निहालणा ॥७॥
संत सभा जह बैसहि प्रभ पासे ॥
अनंद मंगल हरि चलत तमासे ॥
गुण गावहि अनहद धुनि बाणी तह नानक दासु चितारणा ॥८॥
आवणु जाणा सभु चलतु तुमारा ॥
करि करि देखै खेलु अपारा ॥
आपि उपाए उपावणहारा अपणा कीआ पालणा ॥९॥
सुणि सुणि जीवा सोइ तुमारी ॥
सदा सदा जाई बलिहारी ॥
दुइ कर जोड़ि सिमरउ दिनु राती मेरे सुआमी अगम अपारणा ॥१०॥
तुधु बिनु दूजे किसु सालाही ॥
एको एकु जपी मन माही ॥
हुकमु बूझि जन भए निहाला इह भगता की घालणा ॥११॥
गुर उपदेसि जपीऐ मनि साचा ॥
गुर उपदेसि राम रंगि राचा ॥
गुर उपदेसि तुटहि सभि बंधन इहु भरमु मोहु परजालणा ॥१२॥
जह राखै सोई सुख थाना ॥
सहजे होइ सोई भल माना ॥
बिनसे बैर नाही को बैरी सभु एको है भालणा ॥१३॥
डर चूके बिनसे अंधिआरे ॥
प्रगट भए प्रभ पुरख निरारे ॥
आपु छोडि पए सरणाई जिस का सा तिसु घालणा ॥१४॥
ऐसा को वडभागी आइआ ॥
आठ पहर जिनि खसमु धिआइआ ॥
तिसु जन कै संगि तरै सभु कोई सो परवार सधारणा ॥१५॥
इह बखसीस खसम ते पावा ॥
आठ पहर कर जोड़ि धिआवा ॥
नामु जपी नामि सहजि समावा नामु नानक मिलै उचारणा ॥१६॥१॥६॥
आपे सति सति सति साचा ॥
ओति पोति भगतन संगि राचा ॥
आपे गुपतु आपे है परगटु अपणा आपु पसारणा ॥४॥
सदा सदा सद होवणहारा ॥
ऊचा अगमु अथाहु अपारा ॥
ऊणे भरे भरे भरि ऊणे एहि चलत सुआमी के कारणा ॥५॥
मुखि सालाही सचे साहा ॥
नैणी पेखा अगम अथाहा ॥
करनी सुणि सुणि मनु तनु हरिआ मेरे साहिब सगल उधारणा ॥६॥
करि करि वेखहि कीता अपणा ॥
जीअ जंत सोई है जपणा ॥
अपणी कुदरति आपे जाणै नदरी नदरि निहालणा ॥७॥
संत सभा जह बैसहि प्रभ पासे ॥
अनंद मंगल हरि चलत तमासे ॥
गुण गावहि अनहद धुनि बाणी तह नानक दासु चितारणा ॥८॥
आवणु जाणा सभु चलतु तुमारा ॥
करि करि देखै खेलु अपारा ॥
आपि उपाए उपावणहारा अपणा कीआ पालणा ॥९॥
सुणि सुणि जीवा सोइ तुमारी ॥
सदा सदा जाई बलिहारी ॥
दुइ कर जोड़ि सिमरउ दिनु राती मेरे सुआमी अगम अपारणा ॥१०॥
तुधु बिनु दूजे किसु सालाही ॥
एको एकु जपी मन माही ॥
हुकमु बूझि जन भए निहाला इह भगता की घालणा ॥११॥
गुर उपदेसि जपीऐ मनि साचा ॥
गुर उपदेसि राम रंगि राचा ॥
गुर उपदेसि तुटहि सभि बंधन इहु भरमु मोहु परजालणा ॥१२॥
जह राखै सोई सुख थाना ॥
सहजे होइ सोई भल माना ॥
बिनसे बैर नाही को बैरी सभु एको है भालणा ॥१३॥
डर चूके बिनसे अंधिआरे ॥
प्रगट भए प्रभ पुरख निरारे ॥
आपु छोडि पए सरणाई जिस का सा तिसु घालणा ॥१४॥
ऐसा को वडभागी आइआ ॥
आठ पहर जिनि खसमु धिआइआ ॥
तिसु जन कै संगि तरै सभु कोई सो परवार सधारणा ॥१५॥
इह बखसीस खसम ते पावा ॥
आठ पहर कर जोड़ि धिआवा ॥
नामु जपी नामि सहजि समावा नामु नानक मिलै उचारणा ॥१६॥१॥६॥
हिन्दी अर्थ: तूने कई तो ऐसे पैदा किए हैं जो सदा तृष्णा के अधीन रहते हैं। और कई पूरी तरह से तृप्त हैं। हरेक जीव को तेरा ही सहारा है। 3। हे भाई ! परमात्मा सिर्फ स्वयं ही सदा कायम रहने वाला है। ताने-पेटे की तरह अपले भक्तों के साथ रचा-मिला रहता है। (जीवात्मा के रूप में हरेक जीव के अंदर) खुद ही छुपा हुआ है। यह दिखाई देता पसारा भी वह खुद ही है। (जगत-रूप में) उसने अपने आप को खुद ही खिलारा हुआ है। 4। हे भाई ! परमात्मा सदा ही सदा ही जीवित रहने वाला है। (आत्मिक अवस्था में) वह बहुत ऊँचा है। अपहुँच है। अथाह है। बेअंत है। उस मालिक प्रभू के ये करिश्मे-तमाशे हैं कि खाली (बर्तन) भर देता है और भरों को खाली कर देता है। 5। हे सदा कायम रहने वाले पातशाह ! (मेहर कर) मैं मुँह से तेरी सिफतसालाह करता रहूँ। हे अपहुँच और अथाह प्रभू ! (कृपा कर। हर जगह) मैं (तुझे) आँखों से देखूँ। कानों से तेरी सिफतसालाह सुन-सुन के मेरा मन मेरा तन (आत्मिक जीवन से) हरा-भरा हुआ रहे। हे मेरे मालिक ! तू सब जीवों का बेड़ा पार करने वाला है। 6। हे प्रभू ! तू सब जीवों को पैदा कर-कर के अपने पैदा किए हुओं की संभाल करने वाला है। हे भाई ! सारे जीव-जंतु उसी सृजनहार को जपते हैं। अपनी कुदरति (पैदा करने की ताकत) को खुद ही जानता है। मेहर का मालिक प्रभू मेहर की निगाह से सबकी ओर देखता है। 7। हे भाई ! जिस साध-संगति में (संत जन) प्रभू के चरणों में बैठते हैं। प्रभू के करिश्मों-तमाशों का जिकर करके आत्मिक आनंद खुशियाँ लेते हैं। और एक-रस सुर में बाणी के द्वारा प्रभू के गुण गाते हैं। (यदि प्रभू की मेहर हो तो) उस साध-संगति में दास नानक भी उसके गुण अपने दिल में बसाए। 8। हे प्रभू ! (जीवों का) पैदा होने और मरना- ये सारा तेरा (रचा हुआ) खेल है। हे भाई ! बेअंत प्रभू ये खेल कर कर के देख रहा है। पैदा करने की समर्थता वाला प्रभू स्वयं (जीवों को) पैदा करता है। अपने पैदा किए हुए (जीवों) को (स्वयं ही) पालता है। 9। हे प्रभू ! तेरी शोभा सुन-सुन के मैं आत्मिक जीवन हासिल करता हूँ। मैं तुझसे सदा ही सदके जाता हूँ। हे मेरे अपहुँच और बेअंत मालिक ! (जब तेरी मेहर होती है) मैं दोनों हाथ जोड़ के दिन-रात तुझे सिमरता हूँ। 10। हे प्रभू ! तुझे छोड़ के मैं किसी और की सिफतसालाह नहीं कर सकता। मैं अपने मन में सिर्फ एक तुझे ही जपता हूँ। तेरे सेवक तेरी रज़ा को समझ के सदा प्रसन्न रहते हैं – ये है तेरे भक्तों की घाल-कमाई। 11। हे भाई ! गुरू के उपदेश से मन में सदा-स्थिर प्रभू का नाम जपना चाहिए। गुरू के उपदेश पर चल के मन प्रभू के प्रेम-रंग में रंगा रहता है। हे भाई ! गुरू के उपदेश की बरकति से (मनुष्य के अंदर से माया-मोह के) सारे बँधन टूट जाते हैं। मनुष्य की यह भटकना। मनुष्य का यह मोह अच्छी तरह जल जाता है। 12। हे भाई ! (‘अैसा को वडभागी आइआ’ जो ये निश्चय रखता है कि) जहाँ (परमात्मा हमें) रखता है वही (हमारे लिए) सुख देने वाली जगह है। (जो मनुष्य) जो कुछ रजा में हो रहा है उसको भलाई के लिए मानता है। (जिस मनुष्य के अंदर से) सारे वैर-विरोध मिट जाते हैं। (जिसको जगत में) कोई वैरी नहीं दिखता। (जो) हर जगह सिर्फ परमात्मा को ही देखता है। 13। हे भाई ! (‘अैसा को वडभागी आइआ’। जिसके अंदर से) सारे भय समाप्त हो जाते हैं। आत्मिक जीवन के रास्ते के सारे अंधेरे दूर हो जाते हैं। (जिसके अंदर) निर्लिप प्रभू प्रकट हो जाता है। (जो मनुष्य) स्वैभाव दूर करके परमात्मा की शरण पड़ता है। जिस प्रभू का पैदा किया हुआ है उसी (के सिमरन) की घाल-कमाई करता है। 14। हे भाई ! कोई विरला ही ऐसा भाग्यशाली मनुष्य पैदा होता है। जो आठों पहर मालिक-प्रभू का नाम याद करता है। उस मनुष्य की संगति में (रह के) हरेक मनुष्य संसार-समुंद्र से पार लांघ जाता है। वह मनुष्य अपने परिवार के लिए सहारा बन जाता है। 15। हे नानक ! (कह-हे भाई ! अगर मेरे मालिक की मेरे ऊपर मेहर हो तो) मैं उस मालिक से ये दाति हासिल करूँ कि आठों पहर दोनों हाथ जोड़ के उसका नाम सिमरता रहूँ। उसका नाम जपता रहूँ। उसके नाम में आत्मिक अडोलता में लीन रहूँ। मुझे उसका नाम जपने की दाति मिली रहे। 16। 1। 6।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਸੂਰਤਿ ਦੇਖਿ ਨ ਭੂਲੁ ਗਵਾਰਾ ॥
ਮਿਥਨ ਮੋਹਾਰਾ ਝੂਠੁ ਪਸਾਰਾ ॥
ਜਗ ਮਹਿ ਕੋਈ ਰਹਣੁ ਨ ਪਾਏ ਨਿਹਚਲੁ ਏਕੁ ਨਾਰਾਇਣਾ ॥੧॥
ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਕੀ ਪਉ ਸਰਣਾਈ ॥
ਮੋਹੁ ਸੋਗੁ ਸਭੁ ਭਰਮੁ ਮਿਟਾਈ ॥
ਏਕੋ ਮੰਤ੍ਰੁ ਦ੍ਰਿੜਾਏ ਅਉਖਧੁ ਸਚੁ ਨਾਮੁ ਰਿਦ ਗਾਇਣਾ ॥੨॥
ਸੂਰਤਿ ਦੇਖਿ ਨ ਭੂਲੁ ਗਵਾਰਾ ॥
ਮਿਥਨ ਮੋਹਾਰਾ ਝੂਠੁ ਪਸਾਰਾ ॥
ਜਗ ਮਹਿ ਕੋਈ ਰਹਣੁ ਨ ਪਾਏ ਨਿਹਚਲੁ ਏਕੁ ਨਾਰਾਇਣਾ ॥੧॥
ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਕੀ ਪਉ ਸਰਣਾਈ ॥
ਮੋਹੁ ਸੋਗੁ ਸਭੁ ਭਰਮੁ ਮਿਟਾਈ ॥
ਏਕੋ ਮੰਤ੍ਰੁ ਦ੍ਰਿੜਾਏ ਅਉਖਧੁ ਸਚੁ ਨਾਮੁ ਰਿਦ ਗਾਇਣਾ ॥੨॥
मारू महला ५ ॥
सूरति देखि न भूलु गवारा ॥
मिथन मोहारा झूठु पसारा ॥
जग महि कोई रहणु न पाए निहचलु एकु नाराइणा ॥१॥
गुर पूरे की पउ सरणाई ॥
मोहु सोगु सभु भरमु मिटाई ॥
एको मंत्रु द्रिड़ाए अउखधु सचु नामु रिद गाइणा ॥२॥
सूरति देखि न भूलु गवारा ॥
मिथन मोहारा झूठु पसारा ॥
जग महि कोई रहणु न पाए निहचलु एकु नाराइणा ॥१॥
गुर पूरे की पउ सरणाई ॥
मोहु सोगु सभु भरमु मिटाई ॥
एको मंत्रु द्रिड़ाए अउखधु सचु नामु रिद गाइणा ॥२॥
हिन्दी अर्थ: मारू महला ५॥ हे मूर्ख ! (जगत के पदार्थों की) सूरत देख के गलती ना खा। ये सारा झूठे मोह का झूठा पसारा है। जगत में कोई भी सदा के लिए टिका नहीं रह सकता। सिर्फ एक परमात्मा सदा कायम रहने वाला है। 1। हे भाई ! पूरे गुरू की शरण पड़ा रह। गुरू (शरण पड़े मनुष्य का) मोह-सोग और सारा भरम मिटा देता है। गुरू एक ही उपदेश हृदय में बसाता है। एक ही दवाई देता है कि हृदय में सदा कायम रहने वाला हरी-नाम सिमरना चाहिए। ै2।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 1077 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
Punjabi Bagh के gurdwara में अरदास के बाद का calm।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 47 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1077” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 1078 →, पीछे का: ← अंग 1076।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।