अंग 1058

अंग
1058
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸਦਾ ਕਾਰਜੁ ਸਚਿ ਨਾਮਿ ਸੁਹੇਲਾ ਬਿਨੁ ਸਬਦੈ ਕਾਰਜੁ ਕੇਹਾ ਹੇ ॥੭॥
ਖਿਨ ਮਹਿ ਹਸੈ ਖਿਨ ਮਹਿ ਰੋਵੈ ॥
ਦੂਜੀ ਦੁਰਮਤਿ ਕਾਰਜੁ ਨ ਹੋਵੈ ॥
ਸੰਜੋਗੁ ਵਿਜੋਗੁ ਕਰਤੈ ਲਿਖਿ ਪਾਏ ਕਿਰਤੁ ਨ ਚਲੈ ਚਲਾਹਾ ਹੇ ॥੮॥
ਜੀਵਨ ਮੁਕਤਿ ਗੁਰ ਸਬਦੁ ਕਮਾਏ ॥
ਹਰਿ ਸਿਉ ਸਦ ਹੀ ਰਹੈ ਸਮਾਏ ॥
ਗੁਰ ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਮਿਲੈ ਵਡਿਆਈ ਹਉਮੈ ਰੋਗੁ ਨ ਤਾਹਾ ਹੇ ॥੯॥
ਰਸ ਕਸ ਖਾਏ ਪਿੰਡੁ ਵਧਾਏ ॥
ਭੇਖ ਕਰੈ ਗੁਰ ਸਬਦੁ ਨ ਕਮਾਏ ॥
ਅੰਤਰਿ ਰੋਗੁ ਮਹਾ ਦੁਖੁ ਭਾਰੀ ਬਿਸਟਾ ਮਾਹਿ ਸਮਾਹਾ ਹੇ ॥੧੦॥
ਬੇਦ ਪੜਹਿ ਪੜਿ ਬਾਦੁ ਵਖਾਣਹਿ ॥
ਘਟ ਮਹਿ ਬ੍ਰਹਮੁ ਤਿਸੁ ਸਬਦਿ ਨ ਪਛਾਣਹਿ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੋਵੈ ਸੁ ਤਤੁ ਬਿਲੋਵੈ ਰਸਨਾ ਹਰਿ ਰਸੁ ਤਾਹਾ ਹੇ ॥੧੧॥
ਘਰਿ ਵਥੁ ਛੋਡਹਿ ਬਾਹਰਿ ਧਾਵਹਿ ॥
ਮਨਮੁਖ ਅੰਧੇ ਸਾਦੁ ਨ ਪਾਵਹਿ ॥
ਅਨ ਰਸ ਰਾਤੀ ਰਸਨਾ ਫੀਕੀ ਬੋਲੇ ਹਰਿ ਰਸੁ ਮੂਲਿ ਨ ਤਾਹਾ ਹੇ ॥੧੨॥
ਮਨਮੁਖ ਦੇਹੀ ਭਰਮੁ ਭਤਾਰੋ ॥
ਦੁਰਮਤਿ ਮਰੈ ਨਿਤ ਹੋਇ ਖੁਆਰੋ ॥
ਕਾਮਿ ਕ੍ਰੋਧਿ ਮਨੁ ਦੂਜੈ ਲਾਇਆ ਸੁਪਨੈ ਸੁਖੁ ਨ ਤਾਹਾ ਹੇ ॥੧੩॥
ਕੰਚਨ ਦੇਹੀ ਸਬਦੁ ਭਤਾਰੋ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਭੋਗ ਭੋਗੇ ਹਰਿ ਸਿਉ ਪਿਆਰੋ ॥
ਮਹਲਾ ਅੰਦਰਿ ਗੈਰ ਮਹਲੁ ਪਾਏ ਭਾਣਾ ਬੁਝਿ ਸਮਾਹਾ ਹੇ ॥੧੪॥
ਆਪੇ ਦੇਵੈ ਦੇਵਣਹਾਰਾ ॥
ਤਿਸੁ ਆਗੈ ਨਹੀ ਕਿਸੈ ਕਾ ਚਾਰਾ ॥
ਆਪੇ ਬਖਸੇ ਸਬਦਿ ਮਿਲਾਏ ਤਿਸ ਦਾ ਸਬਦੁ ਅਥਾਹਾ ਹੇ ॥੧੫॥
ਜੀਉ ਪਿੰਡੁ ਸਭੁ ਹੈ ਤਿਸੁ ਕੇਰਾ ॥
ਸਚਾ ਸਾਹਿਬੁ ਠਾਕੁਰੁ ਮੇਰਾ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਬਾਣੀ ਹਰਿ ਪਾਇਆ ਹਰਿ ਜਪੁ ਜਾਪਿ ਸਮਾਹਾ ਹੇ ॥੧੬॥੫॥੧੪॥
सदा कारजु सचि नामि सुहेला बिनु सबदै कारजु केहा हे ॥७॥
खिन महि हसै खिन महि रोवै ॥
दूजी दुरमति कारजु न होवै ॥
संजोगु विजोगु करतै लिखि पाए किरतु न चलै चलाहा हे ॥८॥
जीवन मुकति गुर सबदु कमाए ॥
हरि सिउ सद ही रहै समाए ॥
गुर किरपा ते मिलै वडिआई हउमै रोगु न ताहा हे ॥९॥
रस कस खाए पिंडु वधाए ॥
भेख करै गुर सबदु न कमाए ॥
अंतरि रोगु महा दुखु भारी बिसटा माहि समाहा हे ॥१०॥
बेद पड़हि पड़ि बादु वखाणहि ॥
घट महि ब्रहमु तिसु सबदि न पछाणहि ॥
गुरमुखि होवै सु ततु बिलोवै रसना हरि रसु ताहा हे ॥११॥
घरि वथु छोडहि बाहरि धावहि ॥
मनमुख अंधे सादु न पावहि ॥
अन रस राती रसना फीकी बोले हरि रसु मूलि न ताहा हे ॥१२॥
मनमुख देही भरमु भतारो ॥
दुरमति मरै नित होइ खुआरो ॥
कामि क्रोधि मनु दूजै लाइआ सुपनै सुखु न ताहा हे ॥१३॥
कंचन देही सबदु भतारो ॥
अनदिनु भोग भोगे हरि सिउ पिआरो ॥
महला अंदरि गैर महलु पाए भाणा बुझि समाहा हे ॥१४॥
आपे देवै देवणहारा ॥
तिसु आगै नही किसै का चारा ॥
आपे बखसे सबदि मिलाए तिस दा सबदु अथाहा हे ॥१५॥
जीउ पिंडु सभु है तिसु केरा ॥
सचा साहिबु ठाकुरु मेरा ॥
नानक गुरबाणी हरि पाइआ हरि जपु जापि समाहा हे ॥१६॥५॥१४॥

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! परमात्मा के सदा-स्थिर नाम में जुड़ने से जनम-मनोरथ सफल होता है। गुरू के शबद के बिना कैसा जनम-मनोरथ। (जीवन निष्फल हो जाता हैं)। 7। हे भाई ! (परमात्मा के नाम से टूटा हुआ मनुष्य) घड़ी में हस पड़ता है और घड़ी में ही रो पड़ता है (हर्ष और सोग के चक्कर में ही पड़ा रहता है। सो) माया के मोह में फसा के रखने वाली खोटी मति से जीवन-मनोरथ सफल नहीं होता। (पर। जीवों के भी क्या वश। ) (हरी-नाम में) जुड़ना और (हरी नाम से) विछुड़ जाना – (पिछले किए कर्मों के अनुसार) करतार ने स्वयं (जीवों के माथे के ऊपर) लिख रखे हैं। ये पूर्बली कर्म-कमाई (जीव से) मिटाए नहीं मिटती। 8। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के शबद अनुसार जीवन जीता है। वह गृहस्त में रहता हुआ ही निर्लिप है। वह सदा ही परमात्मा की याद में लीन रहता है। गुरू की कृपा से उसको (इस लोक में और परलोक में) आदर मिलता है। उसके अंदर अहंकार का रोग नहीं होता। 9। हे भाई ! (दूसरी तरफ देखें त्यागियों का हाल। जो मनुष्य अपनी ओर से ‘त्याग’ करके खट्टे मीठे कसैले आदि) सारे रसों के खाने खाता रहता है। और अपने शरीर को मोटा किए जाता है। (त्यागियों वाला) धार्मिक पहरावा पहनता है। गुरू के शबद अनुसार जीवन नहीं बिताता। उसके अंदर (चस्कों का) रोग है। ये उसे बहुत बड़ा दुख लगा हुआ है। वह हर वक्त विकारों की गंदगी में लीन रहता है। 10। हे भाई ! (पंडित लोग भी) वेद (आदि धर्म पुस्तकें) पढ़ते हैं। (इनको) पढ़ के निरी चर्चा का सिलसिला छेड़े रखते हैं। जो परमात्मा हृदय में ही बस रहा है। उससे गुरू के शबद से सांझ नहीं डालते। पर। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है। वह तत्व को विचारता है। उसकी जीभ में हरी-नाम का स्वाद टिका रहता है। 11। हे भाई ! जो मनुष्य हृदय घर में बस रहे नाम पदार्थ को छोड़ देते हैं। और बाहर भटकते हैं। वे मन के मुरीद और माया के मोह में अंधे हुए मनुष्य हरी-नाम का स्वाद नहीं ले सकते। अन्य स्वादों में मस्त उनकी जीभ फीके बोल ही बोलती रहती है। परमात्मा के नाम का स्वाद उनको बिल्कुल हासिल नहीं होता। 12। हे भाई ! माया की भटकना मन के मुरीद मनुष्य के शरीर की अगुवाई करती है। (इस) खोटी मति के कारण मनमुख आत्मिक मौत सहेड़ लेता है। और सदा ख्वार होता है। मनमुख अपने मन को काम में। क्रोध में। माया के मोह में जोड़े रखता है। (इस वास्ते) उसको कभी भी आत्मिक आनंद नहीं मिलता। 13। हे भाई ! गुरू का शबद जिस मनुष्य के सोने जैसे पवित्र शरीर का रहनुमा बना रहता है। वह मनुष्य परमात्मा के साथ प्यार बनाए रखता है और हर वक्त परमातमा के मिलाप का आनंद पाता है। वह मनुष्य उस बग़ैर-मकान परमात्मा को हरेक शरीर में (बसता) देख लेता है। उसकी रजा को मीठा मान के उसमें लीन रहता है। 14। पर। हे भाई ! (ये शबद की दाति) दे सकने वाला परमात्मा आप ही देता है। उसके सामने किसी का जोर नहीं चलता। वह स्वयं ही बख्शिश करता है और गुरू के शबद में जोड़ता है। हे भाई ! उस मालिक प्रभू का हुकम बहुत गंभीर है। 15। हे भाई ! ये जिंद और ये शरीर सब कुछ उस परमात्मा का ही दिया हुआ है। हे भाई ! मेरा वह मालिक-प्रभू सदा कायम रहने वाला है। हे नानक ! (कोई भाग्यशाली मनुष्य) गुरू की बाणी के द्वारा उस परमात्मा को पा लेता है। उस हरी के नाम का जाप जप के उस में समाया रहता है। 16। 5। 14।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਦ ਬੇਦ ਬੀਚਾਰੁ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਗਿਆਨੁ ਧਿਆਨੁ ਆਪਾਰੁ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਕਾਰ ਕਰੇ ਪ੍ਰਭ ਭਾਵੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਪੂਰਾ ਪਾਇਦਾ ॥੧॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਮਨੂਆ ਉਲਟਿ ਪਰਾਵੈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਬਾਣੀ ਨਾਦੁ ਵਜਾਵੈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਚਿ ਰਤੇ ਬੈਰਾਗੀ ਨਿਜ ਘਰਿ ਵਾਸਾ ਪਾਇਦਾ ॥੨॥
ਗੁਰ ਕੀ ਸਾਖੀ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਭਾਖੀ ॥
ਸਚੈ ਸਬਦੇ ਸਚੁ ਸੁਭਾਖੀ ॥
ਸਦਾ ਸਚਿ ਰੰਗਿ ਰਾਤਾ ਮਨੁ ਮੇਰਾ ਸਚੇ ਸਚਿ ਸਮਾਇਦਾ ॥੩॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਮਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਸਤ ਸਰਿ ਨਾਵੈ ॥
ਮੈਲੁ ਨ ਲਾਗੈ ਸਚਿ ਸਮਾਵੈ ॥
ਸਚੋ ਸਚੁ ਕਮਾਵੈ ਸਦ ਹੀ ਸਚੀ ਭਗਤਿ ਦ੍ਰਿੜਾਇਦਾ ॥੪॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਚੁ ਬੈਣੀ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਚੁ ਨੈਣੀ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਚੁ ਕਮਾਵੈ ਕਰਣੀ ॥
ਸਦ ਹੀ ਸਚੁ ਕਹੈ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ਅਵਰਾ ਸਚੁ ਕਹਾਇਦਾ ॥੫॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਚੀ ਊਤਮ ਬਾਣੀ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਚੋ ਸਚੁ ਵਖਾਣੀ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਦ ਸੇਵਹਿ ਸਚੋ ਸਚਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਬਦੁ ਸੁਣਾਇਦਾ ॥੬॥
मारू महला ३ ॥
गुरमुखि नाद बेद बीचारु ॥
गुरमुखि गिआनु धिआनु आपारु ॥
गुरमुखि कार करे प्रभ भावै गुरमुखि पूरा पाइदा ॥१॥
गुरमुखि मनूआ उलटि परावै ॥
गुरमुखि बाणी नादु वजावै ॥
गुरमुखि सचि रते बैरागी निज घरि वासा पाइदा ॥२॥
गुर की साखी अंम्रित भाखी ॥
सचै सबदे सचु सुभाखी ॥
सदा सचि रंगि राता मनु मेरा सचे सचि समाइदा ॥३॥
गुरमुखि मनु निरमलु सत सरि नावै ॥
मैलु न लागै सचि समावै ॥
सचो सचु कमावै सद ही सची भगति द्रिड़ाइदा ॥४॥
गुरमुखि सचु बैणी गुरमुखि सचु नैणी ॥
गुरमुखि सचु कमावै करणी ॥
सद ही सचु कहै दिनु राती अवरा सचु कहाइदा ॥५॥
गुरमुखि सची ऊतम बाणी ॥
गुरमुखि सचो सचु वखाणी ॥
गुरमुखि सद सेवहि सचो सचा गुरमुखि सबदु सुणाइदा ॥६॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला ३॥ (जोगी नाद बजाते हैं। पण्डित वेद पढ़ते हैं। पर) हरी-नाम को मन में बसाना ही गुरमुख (गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य) के लिए नाद (का बजाना और) वेद (का पाठ) है। बेअंत प्रभू का सिमरन ही गुरमुख के लिए ज्ञान (-चर्चा) और समाधि है। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य (वह) कार करता है जो प्रभू को अच्छी लगती है (गुरमुख परमात्मा की रजा में चलता है)। (इस तरह) गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य पूरन प्रभू का मिलाप हासिल कर लेता है। 1। हे भाई ! गुरू की शरण रहने वाला मनुष्य (अपने) मन को (माया के मोह से) रोक के रखता है। वह गुरबाणी को हृदय में बसाता है (मानो। जोगी की तरह) नाद बजा रहा है। गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य सदा-स्थिर हरी-नाम में रंगे रहते हैं। (इस तरह) माया की ओर से निर्लिप रह के प्रभू चरणों में टिके रहते हैं। 2। हे भाई ! जो मनुष्य आत्मिक जीवन देने वाली गुरबाणी उचारता रहता है। सदा स्थिर प्रभू की सिफत-सालाह वाली बाणी के द्वारा सदा स्थिर हरी-नाम सिमरता रहता है। उसका ममता में फसने वाला मन सदा हरी-नाम के प्रेम-रंग में रंगा रहता है। वह सदा कायम रहने वाले परमात्मा में ही लीन रहता है। 3। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है। उसका मन पवित्र हो जाता है। वह संतोख के सरोवर (हरी-नाम) में स्नान करता है; उसको (विकारों की) मैल नहीं चिपकती। वह सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा में समाया रहता है। वह मनुष्य हर वक्त सदा स्थिर हरी-नाम सिमरन की कमाई करता है। वह मनुष्य सदा साथ निभने वाली भक्ति (अपने हृदय में) पक्के तौर पर टिकाए रखता है। 5। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है। उसके वचनों में प्रभू बसता है। उसकी आँखों में प्रभू बसता है (वह हर वक्त नाम सिमरता है। हर तरफ परमात्मा को ही देखता है)। वह सदा स्थिर प्रभू के नाम सिमरन की कमाई करता है। यही उसके लिए करने योग्य काम है। गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य दिन-रात सदा ही सिमरन करता है। और। औरों को भी सिमरन करने के लिए प्रेरित करता है। 5। हे भाई ! सदा स्थिर प्रभू की सिफत-सालाह वाली उक्तम बाणी ही गुरमुख (सदा उचारता है)। वह हर वक्त सदा स्थिर प्रभू का नाम ही उच्चारता है। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाले बंदे सदा ही सदा-स्थिर परमात्मा की सेवा-भक्ति करते हैं। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के सन्मुख रहता है। वह (औरों को भी) बाणी ही सुनाता है। 6।

संदर्भ: यह अंग 1058 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।

Gurgaon-Delhi border पर शाम 8 बजे की रुकी हुई traffic।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 47 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1058” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 1059 →, पीछे का: ← अंग 1057

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।