अंग 1087

अंग
1087
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਗੁਣ ਤੇ ਗੁਣ ਮਿਲਿ ਪਾਈਐ ਜੇ ਸਤਿਗੁਰ ਮਾਹਿ ਸਮਾਇ ॥
ਮੋੁਲਿ ਅਮੋੁਲੁ ਨ ਪਾਈਐ ਵਣਜਿ ਨ ਲੀਜੈ ਹਾਟਿ ॥
ਨਾਨਕ ਪੂਰਾ ਤੋਲੁ ਹੈ ਕਬਹੁ ਨ ਹੋਵੈ ਘਾਟਿ ॥੧॥
गुण ते गुण मिलि पाईऐ जे सतिगुर माहि समाइ ॥
मोुलि अमोुलु न पाईऐ वणजि न लीजै हाटि ॥
नानक पूरा तोलु है कबहु न होवै घाटि ॥१॥

हिन्दी अर्थ: (पर अगर कोई कद्र जानने वाला मनुष्य) गुरू में ‘स्वै’ लीन कर दे। तो प्रभू के गुण गाने से। प्रभू की सिफतसालाह में जुड़ने से (प्रभू का ‘नाम’-रूपी कीमती पदार्थ) मिलता है। नाम’ बहुमूल्य पदार्थ है। किसी कीमत से नहीं मिल सकता। किसी दुकान से खरीदा नहीं जा सकता। हे नानक ! (‘नाम’ के मूल्य का) तोल तो बँधा हुआ है। वह कभी कम नहीं हो सकता (भाव। ‘अपने आप को गुरू में लीन करना’- ये बँधा हुआ मूल्य है। और इससे कम कोई उद्यम ‘नाम’ की प्राप्ति के लिए काफी नहीं है)। 1।
ਮਃ ੪ ॥
ਨਾਮ ਵਿਹੂਣੇ ਭਰਮਸਹਿ ਆਵਹਿ ਜਾਵਹਿ ਨੀਤ ॥
ਇਕਿ ਬਾਂਧੇ ਇਕਿ ਢੀਲਿਆ ਇਕਿ ਸੁਖੀਏ ਹਰਿ ਪ੍ਰੀਤਿ ॥
ਨਾਨਕ ਸਚਾ ਮੰਨਿ ਲੈ ਸਚੁ ਕਰਣੀ ਸਚੁ ਰੀਤਿ ॥੨॥
मः ४ ॥
नाम विहूणे भरमसहि आवहि जावहि नीत ॥
इकि बांधे इकि ढीलिआ इकि सुखीए हरि प्रीति ॥
नानक सचा मंनि लै सचु करणी सचु रीति ॥२॥

हिन्दी अर्थ: महला ४॥ जो मनुष्य ‘नाम’ से टूटे हुए हैं वह भटकते हैं (भटकना के कारण) नित्य पैदा होते मरते हैं ( भाव। ‘वासना’ पूरी करने के लिए जनम-मरण के चक्कर में पड़े रहते हैं); सो। कई जीव (इन ‘वासनाओं’ से) बंधे हुए हैं। कईयों ने बँधन कुछ ढीले कर लिए हैं और कई प्रभू के प्यार में रह के (बिल्कुल) सुखी हो गए हैं। हे नानक ! जो मनुष्य सदा स्थिर परमात्मा को अपने मन में पक्का कर लेता है। सदा-स्थिर नाम उसके लिए करने-योग्य काम है सदा-स्थिर नाम ही उसकी जीवन-जुगति हो जाता है। 2।
ਪਉੜੀ ॥
ਗੁਰ ਤੇ ਗਿਆਨੁ ਪਾਇਆ ਅਤਿ ਖੜਗੁ ਕਰਾਰਾ ॥
ਦੂਜਾ ਭ੍ਰਮੁ ਗੜੁ ਕਟਿਆ ਮੋਹੁ ਲੋਭੁ ਅਹੰਕਾਰਾ ॥
ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਮਨਿ ਵਸਿਆ ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਵੀਚਾਰਾ ॥
ਸਚ ਸੰਜਮਿ ਮਤਿ ਊਤਮਾ ਹਰਿ ਲਗਾ ਪਿਆਰਾ ॥
ਸਭੁ ਸਚੋ ਸਚੁ ਵਰਤਦਾ ਸਚੁ ਸਿਰਜਣਹਾਰਾ ॥੧॥
पउड़ी ॥
गुर ते गिआनु पाइआ अति खड़गु करारा ॥
दूजा भ्रमु गड़ु कटिआ मोहु लोभु अहंकारा ॥
हरि का नामु मनि वसिआ गुर सबदि वीचारा ॥
सच संजमि मति ऊतमा हरि लगा पिआरा ॥
सभु सचो सचु वरतदा सचु सिरजणहारा ॥१॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (ज्ञान। मानो) बहुत ही तेजधार खड़ग है। यह ज्ञान गुरू से मिलता है। (जिसको मिला है उसका) माया की खातिर भटकना। मोह। लोभ। अहंकार-रूप किला (जिसमें वह घिरा हुआ था। इस ज्ञान-खड़ग से) काटा जाता है; गुरू के शबद में सुरति जोड़ने से उसके मन में परमात्मा का नाम बस जाता है। सिमरन के संजम से उसकी मति उक्तम हो जाती है। ईश्वर उसको प्यारा लगने लग जाता है; (आखिर उसकी ये हालत हो जाती है कि) सदा-स्थिर सृजनहार उसको हर जगह बसता दिखता है। 1।
ਸਲੋਕੁ ਮਃ ੩ ॥
ਕੇਦਾਰਾ ਰਾਗਾ ਵਿਚਿ ਜਾਣੀਐ ਭਾਈ ਸਬਦੇ ਕਰੇ ਪਿਆਰੁ ॥
ਸਤਸੰਗਤਿ ਸਿਉ ਮਿਲਦੋ ਰਹੈ ਸਚੇ ਧਰੇ ਪਿਆਰੁ ॥
ਵਿਚਹੁ ਮਲੁ ਕਟੇ ਆਪਣੀ ਕੁਲਾ ਕਾ ਕਰੇ ਉਧਾਰੁ ॥
ਗੁਣਾ ਕੀ ਰਾਸਿ ਸੰਗ੍ਰਹੈ ਅਵਗਣ ਕਢੈ ਵਿਡਾਰਿ ॥
ਨਾਨਕ ਮਿਲਿਆ ਸੋ ਜਾਣੀਐ ਗੁਰੂ ਨ ਛੋਡੈ ਆਪਣਾ ਦੂਜੈ ਨ ਧਰੇ ਪਿਆਰੁ ॥੧॥
सलोकु मः ३ ॥
केदारा रागा विचि जाणीऐ भाई सबदे करे पिआरु ॥
सतसंगति सिउ मिलदो रहै सचे धरे पिआरु ॥
विचहु मलु कटे आपणी कुला का करे उधारु ॥
गुणा की रासि संग्रहै अवगण कढै विडारि ॥
नानक मिलिआ सो जाणीऐ गुरू न छोडै आपणा दूजै न धरे पिआरु ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला ३॥ हे भाई ! केदारा राग को (और बाकी के) रागों में तभी जानो (भाव। केदारा राग की उपमा तभी करनी चाहिए। यदि इसे गाने वाला) गुरू के शबद में प्यार करने लग जाए। वह सत्संगति से मिला रहे और सच्चे प्रभु से प्रेम करे। अंदर से अपनी मैल भी काटे और अपनी कुलों का भी उद्धार कर ले। गुणों की पूँजी इकट्ठी करे और अवगुणों को मार के निकाल दे। हे नानक ! (केदारा राग से रॅब में) जुड़ा हुआ उसे समझो जो कभी भी अपने गुरू का आसरा ना छोड़े और माया में मोह ना डाले। 1।
ਮਃ ੪ ॥
ਸਾਗਰੁ ਦੇਖਉ ਡਰਿ ਮਰਉ ਭੈ ਤੇਰੈ ਡਰੁ ਨਾਹਿ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਸੰਤੋਖੀਆ ਨਾਨਕ ਬਿਗਸਾ ਨਾਇ ॥੨॥
मः ४ ॥
सागरु देखउ डरि मरउ भै तेरै डरु नाहि ॥
गुर कै सबदि संतोखीआ नानक बिगसा नाइ ॥२॥

हिन्दी अर्थ: महला ४॥ (हे प्रभू !) जब मैं (इस संसार-) समुंद्र को देखता हूँ तो डर के मारे सहम जाता हूँ (कि कैसे इसमें से बच के पार होऊँगा। पर) तेरे डर में रहने से (इस संसार-समुंद्र का कोई) डर नहीं रह जाता; क्योंकि। हे नानक ! गुरू के शबद से मैं संतोख वाला बन रहा हूँ और प्रभू के नाम से मैं खिलता हूँ। 2।
ਮਃ ੪ ॥
ਚੜਿ ਬੋਹਿਥੈ ਚਾਲਸਉ ਸਾਗਰੁ ਲਹਰੀ ਦੇਇ ॥
ਠਾਕ ਨ ਸਚੈ ਬੋਹਿਥੈ ਜੇ ਗੁਰੁ ਧੀਰਕ ਦੇਇ ॥
ਤਿਤੁ ਦਰਿ ਜਾਇ ਉਤਾਰੀਆ ਗੁਰੁ ਦਿਸੈ ਸਾਵਧਾਨੁ ॥
ਨਾਨਕ ਨਦਰੀ ਪਾਈਐ ਦਰਗਹ ਚਲੈ ਮਾਨੁ ॥੩॥
मः ४ ॥
चड़ि बोहिथै चालसउ सागरु लहरी देइ ॥
ठाक न सचै बोहिथै जे गुरु धीरक देइ ॥
तितु दरि जाइ उतारीआ गुरु दिसै सावधानु ॥
नानक नदरी पाईऐ दरगह चलै मानु ॥३॥

हिन्दी अर्थ: महला ४॥ (संसार-) समुंद्र (तो विकारों की लहरों से) ठाठा मार रहा है पर मैं (गुरू-शबद-रूप) जहाज में चढ़ के (इस समुंद्र में से) पार हो जाऊँगा। अगर सतिगुरू हौसला दे तो इस सच्चे जहाज में चढ़ने से (यात्रा में) कोई रोक (कोई मुश्किल) नहीं आएगी। मुझे अपना गुरू सावधान दिखाई दे रहा है (मेरा दृढ़ निश्चय है कि गुरू मुझे) उस (प्रभू के) दर पर जा उतारेगा। हे नानक ! (ये गुरू का शबद जहाज) प्रभू की मेहर से मिलता है (इसकी बरकति से) प्रभू की हजूरी में आदर मिलता है। 3।
ਪਉੜੀ ॥
ਨਿਹਕੰਟਕ ਰਾਜੁ ਭੁੰਚਿ ਤੂ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਚੁ ਕਮਾਈ ॥
ਸਚੈ ਤਖਤਿ ਬੈਠਾ ਨਿਆਉ ਕਰਿ ਸਤਸੰਗਤਿ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਈ ॥
ਸਚਾ ਉਪਦੇਸੁ ਹਰਿ ਜਾਪਣਾ ਹਰਿ ਸਿਉ ਬਣਿ ਆਈ ॥
ਐਥੈ ਸੁਖਦਾਤਾ ਮਨਿ ਵਸੈ ਅੰਤਿ ਹੋਇ ਸਖਾਈ ॥
ਹਰਿ ਸਿਉ ਪ੍ਰੀਤਿ ਊਪਜੀ ਗੁਰਿ ਸੋਝੀ ਪਾਈ ॥੨॥
पउड़ी ॥
निहकंटक राजु भुंचि तू गुरमुखि सचु कमाई ॥
सचै तखति बैठा निआउ करि सतसंगति मेलि मिलाई ॥
सचा उपदेसु हरि जापणा हरि सिउ बणि आई ॥
ऐथै सुखदाता मनि वसै अंति होइ सखाई ॥
हरि सिउ प्रीति ऊपजी गुरि सोझी पाई ॥२॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (हे भाई !) गुरू के सन्मुख हो के सिमरन की कमाई कर (और इस तरह) निहकंटक राज का भोग कर। (क्योंकि) जो प्रभू सदा-स्थिर तख्त पर बैठ कर न्याय कर रहा है वह तुझे सत्संग में मिला देगा। वहाँ नाम-सिमरन की सच्ची शिक्षा कमाने से तेरी प्रभू से (समीपता) बन आएगी। इस जीवन में सुखदाता प्रभू मन में बसेगा और अंत के समय भी साथी बनेगा। जिस मनुष्य को सतिगुरू ने समझ बख्शी उसका प्रभू के साथ प्यार बन जाता है। 2।
ਸਲੋਕੁ ਮਃ ੧ ॥
ਭੂਲੀ ਭੂਲੀ ਮੈ ਫਿਰੀ ਪਾਧਰੁ ਕਹੈ ਨ ਕੋਇ ॥
ਪੂਛਹੁ ਜਾਇ ਸਿਆਣਿਆ ਦੁਖੁ ਕਾਟੈ ਮੇਰਾ ਕੋਇ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸਾਚਾ ਮਨਿ ਵਸੈ ਸਾਜਨੁ ਉਤ ਹੀ ਠਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਮਨੁ ਤ੍ਰਿਪਤਾਸੀਐ ਸਿਫਤੀ ਸਾਚੈ ਨਾਇ ॥੧॥
सलोकु मः १ ॥
भूली भूली मै फिरी पाधरु कहै न कोइ ॥
पूछहु जाइ सिआणिआ दुखु काटै मेरा कोइ ॥
सतिगुरु साचा मनि वसै साजनु उत ही ठाइ ॥
नानक मनु त्रिपतासीऐ सिफती साचै नाइ ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला १॥ बहुत समय से विछड़ी हुई मैं भटक रही हूँ। मुझे कोई सीधा सपाट रास्ता नहीं बताता। कोई जा के किसी सियाने लोगों से पूछो भला जो कोई मेरा कष्ट काट दे। हे नानक ! अगर सच्चा गुरू मन में आ बसे तो सज्जन प्रभू भी उसी जगह (भाव। हृदय में ही मिल जाता है)। प्रभू की सिफत सालाह करने से और प्रभू का नाम सिमरने से मन भटकने से हट जाता है। 1।
ਮਃ ੩ ॥
ਆਪੇ ਕਰਣੀ ਕਾਰ ਆਪਿ ਆਪੇ ਕਰੇ ਰਜਾਇ ॥
ਆਪੇ ਕਿਸ ਹੀ ਬਖਸਿ ਲਏ ਆਪੇ ਕਾਰ ਕਮਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਚਾਨਣੁ ਗੁਰ ਮਿਲੇ ਦੁਖ ਬਿਖੁ ਜਾਲੀ ਨਾਇ ॥੨॥
मः ३ ॥
आपे करणी कार आपि आपे करे रजाइ ॥
आपे किस ही बखसि लए आपे कार कमाइ ॥
नानक चानणु गुर मिले दुख बिखु जाली नाइ ॥२॥

हिन्दी अर्थ: महला ३॥ प्रभू अपनी रजा में स्वयं ही करने-योग्य काम करता है। आप ही जीव को बख्शता है आप ही (जिस पर मेहर करे उसमें साक्षात हो के भक्ति की) कार कमाता है। हे नानक ! गुरू को मिल के जिसके हृदय में प्रकाश होता है वह ‘नाम’ सिमर के विष-रूपी माया से पैदा हुए दुखों को जला देता है। 2।
ਪਉੜੀ ॥
ਮਾਇਆ ਵੇਖਿ ਨ ਭੁਲੁ ਤੂ ਮਨਮੁਖ ਮੂਰਖਾ ॥
ਚਲਦਿਆ ਨਾਲਿ ਨ ਚਲਈ ਸਭੁ ਝੂਠੁ ਦਰਬੁ ਲਖਾ ॥
ਅਗਿਆਨੀ ਅੰਧੁ ਨ ਬੂਝਈ ਸਿਰ ਊਪਰਿ ਜਮ ਖੜਗੁ ਕਲਖਾ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਉਬਰੇ ਜਿਨ ਹਰਿ ਰਸੁ ਚਖਾ ॥
पउड़ी ॥
माइआ वेखि न भुलु तू मनमुख मूरखा ॥
चलदिआ नालि न चलई सभु झूठु दरबु लखा ॥
अगिआनी अंधु न बूझई सिर ऊपरि जम खड़गु कलखा ॥
गुर परसादी उबरे जिन हरि रसु चखा ॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे मूर्ख ! हे मन के गुलाम ! माया को देख के गलती ना कर। यह (यहाँ से) चलने के वक्त किसी के साथ नहीं जाती। सो। सारे धन को झूठा साथी जान। (पर इस माया को देख के) मूर्ख अंधा मनुष्य नहीं समझता कि सिर पर जम की मौत की तलवार भी है (और इस माया से साथ टूटना है)। जिन मनुष्यों ने हरी-नाम का रस चखा है वह गुरू की मेहर से (माया में मोह डालने की गलती से) बच जाते हैं;

संदर्भ: यह अंग 1087 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Raam Daas Ji।

Janmashtami की मधुर रात, मंदिर में 12 बजे का दर्शन।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 47 पंक्तियों का है, 10 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1087” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 1088 →, पीछे का: ← अंग 1086

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।