अंग
1091
राग मारू
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਭੋਲਤਣਿ ਭੈ ਮਨਿ ਵਸੈ ਹੇਕੈ ਪਾਧਰ ਹੀਡੁ ॥
ਅਤਿ ਡਾਹਪਣਿ ਦੁਖੁ ਘਣੋ ਤੀਨੇ ਥਾਵ ਭਰੀਡੁ ॥੧॥
ਅਤਿ ਡਾਹਪਣਿ ਦੁਖੁ ਘਣੋ ਤੀਨੇ ਥਾਵ ਭਰੀਡੁ ॥੧॥
भोलतणि भै मनि वसै हेकै पाधर हीडु ॥
अति डाहपणि दुखु घणो तीने थाव भरीडु ॥१॥
अति डाहपणि दुखु घणो तीने थाव भरीडु ॥१॥
हिन्दी अर्थ: वही एक हृदय सरल है जिसके हृदय में भोलापन और (ईश्वरीय) भय के कारण (ईश्वर स्वयं) बसता है। पर जलन और ईष्या के कारण बहुत ही दुख व्यापता है। मन। वाणी और शरीर तीनों ही भ्रष्ट हुए रहते हैं। 1।
ਮਃ ੧ ॥
ਮਾਂਦਲੁ ਬੇਦਿ ਸਿ ਬਾਜਣੋ ਘਣੋ ਧੜੀਐ ਜੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਸਮਾਲਿ ਤੂ ਬੀਜਉ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਇ ॥੨॥
ਮਾਂਦਲੁ ਬੇਦਿ ਸਿ ਬਾਜਣੋ ਘਣੋ ਧੜੀਐ ਜੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਸਮਾਲਿ ਤੂ ਬੀਜਉ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਇ ॥੨॥
मः १ ॥
मांदलु बेदि सि बाजणो घणो धड़ीऐ जोइ ॥
नानक नामु समालि तू बीजउ अवरु न कोइ ॥२॥
मांदलु बेदि सि बाजणो घणो धड़ीऐ जोइ ॥
नानक नामु समालि तू बीजउ अवरु न कोइ ॥२॥
हिन्दी अर्थ: महला १॥ घणा धड़ा (भाव। बहुत सारी दुनिया) देखती है उस ढोल को (जो ढोल) वेदों ने बजाया (भाव। कर्म-काण्ड का रास्ता)। हे नानक ! तू ‘नाम’ सिमर। (इससे अलग) और दूसरा कोई (सही रास्ता) नहीं। 2।
ਮਃ ੧ ॥
ਸਾਗਰੁ ਗੁਣੀ ਅਥਾਹੁ ਕਿਨਿ ਹਾਥਾਲਾ ਦੇਖੀਐ ॥
ਵਡਾ ਵੇਪਰਵਾਹੁ ਸਤਿਗੁਰੁ ਮਿਲੈ ਤ ਪਾਰਿ ਪਵਾ ॥
ਮਝ ਭਰਿ ਦੁਖ ਬਦੁਖ ॥
ਨਾਨਕ ਸਚੇ ਨਾਮ ਬਿਨੁ ਕਿਸੈ ਨ ਲਥੀ ਭੁਖ ॥੩॥
ਸਾਗਰੁ ਗੁਣੀ ਅਥਾਹੁ ਕਿਨਿ ਹਾਥਾਲਾ ਦੇਖੀਐ ॥
ਵਡਾ ਵੇਪਰਵਾਹੁ ਸਤਿਗੁਰੁ ਮਿਲੈ ਤ ਪਾਰਿ ਪਵਾ ॥
ਮਝ ਭਰਿ ਦੁਖ ਬਦੁਖ ॥
ਨਾਨਕ ਸਚੇ ਨਾਮ ਬਿਨੁ ਕਿਸੈ ਨ ਲਥੀ ਭੁਖ ॥੩॥
मः १ ॥
सागरु गुणी अथाहु किनि हाथाला देखीऐ ॥
वडा वेपरवाहु सतिगुरु मिलै त पारि पवा ॥
मझ भरि दुख बदुख ॥
नानक सचे नाम बिनु किसै न लथी भुख ॥३॥
सागरु गुणी अथाहु किनि हाथाला देखीऐ ॥
वडा वेपरवाहु सतिगुरु मिलै त पारि पवा ॥
मझ भरि दुख बदुख ॥
नानक सचे नाम बिनु किसै न लथी भुख ॥३॥
हिन्दी अर्थ: महला १॥ (यह) त्रैगुणी (संसार) (मानो) अति-गहरा समुंद्र है। इसकी थाह किसने पाई है। अगर सतिगुरू (जो इस त्रिगुणी संसार से) बहुत बेपरवाह है मिल जाए तो मैं भी इससे पार लांघ जाऊँ। इस संसार-समुंद्र का बीच का हिस्सा दुखों से भरा हुआ है। हे नानक ! प्रभू के नाम सिमरन के बिना किसी की भी (त्रैगुणी माया की) भूख नहीं उतरती। 3।
ਪਉੜੀ ॥
ਜਿਨੀ ਅੰਦਰੁ ਭਾਲਿਆ ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਸੁਹਾਵੈ ॥
ਜੋ ਇਛਨਿ ਸੋ ਪਾਇਦੇ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਵੈ ॥
ਜਿਸ ਨੋ ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰੇ ਤਿਸੁ ਗੁਰੁ ਮਿਲੈ ਸੋ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ॥
ਧਰਮ ਰਾਇ ਤਿਨ ਕਾ ਮਿਤੁ ਹੈ ਜਮ ਮਗਿ ਨ ਪਾਵੈ ॥
ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਵਹਿ ਦਿਨਸੁ ਰਾਤਿ ਹਰਿ ਨਾਮਿ ਸਮਾਵੈ ॥੧੪॥
ਜਿਨੀ ਅੰਦਰੁ ਭਾਲਿਆ ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਸੁਹਾਵੈ ॥
ਜੋ ਇਛਨਿ ਸੋ ਪਾਇਦੇ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਵੈ ॥
ਜਿਸ ਨੋ ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰੇ ਤਿਸੁ ਗੁਰੁ ਮਿਲੈ ਸੋ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ॥
ਧਰਮ ਰਾਇ ਤਿਨ ਕਾ ਮਿਤੁ ਹੈ ਜਮ ਮਗਿ ਨ ਪਾਵੈ ॥
ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਵਹਿ ਦਿਨਸੁ ਰਾਤਿ ਹਰਿ ਨਾਮਿ ਸਮਾਵੈ ॥੧੪॥
पउड़ी ॥
जिनी अंदरु भालिआ गुर सबदि सुहावै ॥
जो इछनि सो पाइदे हरि नामु धिआवै ॥
जिस नो क्रिपा करे तिसु गुरु मिलै सो हरि गुण गावै ॥
धरम राइ तिन का मितु है जम मगि न पावै ॥
हरि नामु धिआवहि दिनसु राति हरि नामि समावै ॥१४॥
जिनी अंदरु भालिआ गुर सबदि सुहावै ॥
जो इछनि सो पाइदे हरि नामु धिआवै ॥
जिस नो क्रिपा करे तिसु गुरु मिलै सो हरि गुण गावै ॥
धरम राइ तिन का मितु है जम मगि न पावै ॥
हरि नामु धिआवहि दिनसु राति हरि नामि समावै ॥१४॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ सतिगुरू के सोहाने शबद से जिन्होंने अपना मन खोजा है वह हरी-नाम सिमरते हैं और मन-इच्छित फल पाते हैं। जिस मनुष्य पर प्रभू मेहर करे उसको गुरू मिलता है और वह प्रभू के गुण गाता है। धर्मराज उनका मित्र बन जाता है उनको वह जम के राह पर नहीं डालता; वह दिन रात हरी-नाम सिमरते हैं और हरी-नाम में जुड़े रहते हैं। 14।
ਸਲੋਕੁ ਮਃ ੧ ॥
ਸੁਣੀਐ ਏਕੁ ਵਖਾਣੀਐ ਸੁਰਗਿ ਮਿਰਤਿ ਪਇਆਲਿ ॥
ਹੁਕਮੁ ਨ ਜਾਈ ਮੇਟਿਆ ਜੋ ਲਿਖਿਆ ਸੋ ਨਾਲਿ ॥
ਕਉਣੁ ਮੂਆ ਕਉਣੁ ਮਾਰਸੀ ਕਉਣੁ ਆਵੈ ਕਉਣੁ ਜਾਇ ॥
ਕਉਣੁ ਰਹਸੀ ਨਾਨਕਾ ਕਿਸ ਕੀ ਸੁਰਤਿ ਸਮਾਇ ॥੧॥
ਸੁਣੀਐ ਏਕੁ ਵਖਾਣੀਐ ਸੁਰਗਿ ਮਿਰਤਿ ਪਇਆਲਿ ॥
ਹੁਕਮੁ ਨ ਜਾਈ ਮੇਟਿਆ ਜੋ ਲਿਖਿਆ ਸੋ ਨਾਲਿ ॥
ਕਉਣੁ ਮੂਆ ਕਉਣੁ ਮਾਰਸੀ ਕਉਣੁ ਆਵੈ ਕਉਣੁ ਜਾਇ ॥
ਕਉਣੁ ਰਹਸੀ ਨਾਨਕਾ ਕਿਸ ਕੀ ਸੁਰਤਿ ਸਮਾਇ ॥੧॥
सलोकु मः १ ॥
सुणीऐ एकु वखाणीऐ सुरगि मिरति पइआलि ॥
हुकमु न जाई मेटिआ जो लिखिआ सो नालि ॥
कउणु मूआ कउणु मारसी कउणु आवै कउणु जाइ ॥
कउणु रहसी नानका किस की सुरति समाइ ॥१॥
सुणीऐ एकु वखाणीऐ सुरगि मिरति पइआलि ॥
हुकमु न जाई मेटिआ जो लिखिआ सो नालि ॥
कउणु मूआ कउणु मारसी कउणु आवै कउणु जाइ ॥
कउणु रहसी नानका किस की सुरति समाइ ॥१॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला १॥ यही बात सुनी जाती है और बयान की जा रही है कि स्वर्ग में धरती पर और पाताल में (तीनों ही लोकों में) प्रभू एक स्वयं ही स्वयं है। उसके हुकम की उलंघना नहीं की जा सकती। (जीवों का) जो जो लेख उसने लिखा है वही (हरेक जीव को) चला रहा है। (सो। ) ना कोई मरता है ना कोई मारता है। ना कोई पैदा होता है ना कोई मरता है। हे नानक ! वह खुद ही आनंद लेने वाला है। उसकी अपनी ही सुरति (अपने आप में) टिकी हुई है। 1।
ਮਃ ੧ ॥
ਹਉ ਮੁਆ ਮੈ ਮਾਰਿਆ ਪਉਣੁ ਵਹੈ ਦਰੀਆਉ ॥
ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਥਕੀ ਨਾਨਕਾ ਜਾ ਮਨੁ ਰਤਾ ਨਾਇ ॥
ਲੋਇਣ ਰਤੇ ਲੋਇਣੀ ਕੰਨੀ ਸੁਰਤਿ ਸਮਾਇ ॥
ਜੀਭ ਰਸਾਇਣਿ ਚੂਨੜੀ ਰਤੀ ਲਾਲ ਲਵਾਇ ॥
ਅੰਦਰੁ ਮੁਸਕਿ ਝਕੋਲਿਆ ਕੀਮਤਿ ਕਹੀ ਨ ਜਾਇ ॥੨॥
ਹਉ ਮੁਆ ਮੈ ਮਾਰਿਆ ਪਉਣੁ ਵਹੈ ਦਰੀਆਉ ॥
ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਥਕੀ ਨਾਨਕਾ ਜਾ ਮਨੁ ਰਤਾ ਨਾਇ ॥
ਲੋਇਣ ਰਤੇ ਲੋਇਣੀ ਕੰਨੀ ਸੁਰਤਿ ਸਮਾਇ ॥
ਜੀਭ ਰਸਾਇਣਿ ਚੂਨੜੀ ਰਤੀ ਲਾਲ ਲਵਾਇ ॥
ਅੰਦਰੁ ਮੁਸਕਿ ਝਕੋਲਿਆ ਕੀਮਤਿ ਕਹੀ ਨ ਜਾਇ ॥੨॥
मः १ ॥
हउ मुआ मै मारिआ पउणु वहै दरीआउ ॥
त्रिसना थकी नानका जा मनु रता नाइ ॥
लोइण रते लोइणी कंनी सुरति समाइ ॥
जीभ रसाइणि चूनड़ी रती लाल लवाइ ॥
अंदरु मुसकि झकोलिआ कीमति कही न जाइ ॥२॥
हउ मुआ मै मारिआ पउणु वहै दरीआउ ॥
त्रिसना थकी नानका जा मनु रता नाइ ॥
लोइण रते लोइणी कंनी सुरति समाइ ॥
जीभ रसाइणि चूनड़ी रती लाल लवाइ ॥
अंदरु मुसकि झकोलिआ कीमति कही न जाइ ॥२॥
हिन्दी अर्थ: महला १॥ जितना समय जीव ‘अहंकार’ का मारा हुआ है उसके अंदर तृष्णा का दरिया बहता रहता है। पर। हे नानक ! जब मन ‘नाम’ में रंगा जाता है तब तृष्णा समाप्त हो जाती है। आँखें अपने आप में रंगी जाती हैं। (निंदा आदि) सुनने की चाहत कानों में ही लीन हो जाती है। जीभ ‘नाम’ सिमर के नाम रसायन में रंग के सुंदर लाल बन जाती है। मन (‘नाम’ में) महक के लपटें देता है। (ऐसे जीवन वाले का) मूल्य नहीं पड़ सकता। 2।
ਪਉੜੀ ॥
ਇਸੁ ਜੁਗ ਮਹਿ ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ਹੈ ਨਾਮੋ ਨਾਲਿ ਚਲੈ ॥
ਏਹੁ ਅਖੁਟੁ ਕਦੇ ਨ ਨਿਖੁਟਈ ਖਾਇ ਖਰਚਿਉ ਪਲੈ ॥
ਹਰਿ ਜਨ ਨੇੜਿ ਨ ਆਵਈ ਜਮਕੰਕਰ ਜਮਕਲੈ ॥
ਸੇ ਸਾਹ ਸਚੇ ਵਣਜਾਰਿਆ ਜਿਨ ਹਰਿ ਧਨੁ ਪਲੈ ॥
ਹਰਿ ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਹਰਿ ਪਾਈਐ ਜਾ ਆਪਿ ਹਰਿ ਘਲੈ ॥੧੫॥
ਇਸੁ ਜੁਗ ਮਹਿ ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ਹੈ ਨਾਮੋ ਨਾਲਿ ਚਲੈ ॥
ਏਹੁ ਅਖੁਟੁ ਕਦੇ ਨ ਨਿਖੁਟਈ ਖਾਇ ਖਰਚਿਉ ਪਲੈ ॥
ਹਰਿ ਜਨ ਨੇੜਿ ਨ ਆਵਈ ਜਮਕੰਕਰ ਜਮਕਲੈ ॥
ਸੇ ਸਾਹ ਸਚੇ ਵਣਜਾਰਿਆ ਜਿਨ ਹਰਿ ਧਨੁ ਪਲੈ ॥
ਹਰਿ ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਹਰਿ ਪਾਈਐ ਜਾ ਆਪਿ ਹਰਿ ਘਲੈ ॥੧੫॥
पउड़ी ॥
इसु जुग महि नामु निधानु है नामो नालि चलै ॥
एहु अखुटु कदे न निखुटई खाइ खरचिउ पलै ॥
हरि जन नेड़ि न आवई जमकंकर जमकलै ॥
से साह सचे वणजारिआ जिन हरि धनु पलै ॥
हरि किरपा ते हरि पाईऐ जा आपि हरि घलै ॥१५॥
इसु जुग महि नामु निधानु है नामो नालि चलै ॥
एहु अखुटु कदे न निखुटई खाइ खरचिउ पलै ॥
हरि जन नेड़ि न आवई जमकंकर जमकलै ॥
से साह सचे वणजारिआ जिन हरि धनु पलै ॥
हरि किरपा ते हरि पाईऐ जा आपि हरि घलै ॥१५॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ मनुष्य जनम में (जीव के लिए परमात्मा का) नाम ही (असल) खजाना है। ‘नाम’ ही (यहाँ से मनुष्य के) साथ जाता है। ये नाम-खजाना अमुक (ना खत्म होने वाला) है कभी समाप्त नहीं होता। बेशक खाओ। खरचो और साथ बाँध लो; (फिर। इस खजाने वाले) भगत जन के पास जमकाल जमदूत भी नहीं आते। जिन्होंने नाम-धन इकट्टा किया है वही सच्चे शाह हैं सच्चे व्यापारी हैं। यह नाम-धन परमात्मा की मेहर से मिलता है जब वह स्वयं (गुरू को जगत में) भेजता है। 15।
ਸਲੋਕੁ ਮਃ ੩ ॥
ਮਨਮੁਖ ਵਾਪਾਰੈ ਸਾਰ ਨ ਜਾਣਨੀ ਬਿਖੁ ਵਿਹਾਝਹਿ ਬਿਖੁ ਸੰਗ੍ਰਹਹਿ ਬਿਖ ਸਿਉ ਧਰਹਿ ਪਿਆਰੁ ॥
ਬਾਹਰਹੁ ਪੰਡਿਤ ਸਦਾਇਦੇ ਮਨਹੁ ਮੂਰਖ ਗਾਵਾਰ ॥
ਹਰਿ ਸਿਉ ਚਿਤੁ ਨ ਲਾਇਨੀ ਵਾਦੀ ਧਰਨਿ ਪਿਆਰੁ ॥
ਵਾਦਾ ਕੀਆ ਕਰਨਿ ਕਹਾਣੀਆ ਕੂੜੁ ਬੋਲਿ ਕਰਹਿ ਆਹਾਰੁ ॥
ਜਗ ਮਹਿ ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਹਰਿ ਨਿਰਮਲਾ ਹੋਰੁ ਮੈਲਾ ਸਭੁ ਆਕਾਰੁ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਨ ਚੇਤਨੀ ਹੋਇ ਮੈਲੇ ਮਰਹਿ ਗਵਾਰ ॥੧॥
ਮਨਮੁਖ ਵਾਪਾਰੈ ਸਾਰ ਨ ਜਾਣਨੀ ਬਿਖੁ ਵਿਹਾਝਹਿ ਬਿਖੁ ਸੰਗ੍ਰਹਹਿ ਬਿਖ ਸਿਉ ਧਰਹਿ ਪਿਆਰੁ ॥
ਬਾਹਰਹੁ ਪੰਡਿਤ ਸਦਾਇਦੇ ਮਨਹੁ ਮੂਰਖ ਗਾਵਾਰ ॥
ਹਰਿ ਸਿਉ ਚਿਤੁ ਨ ਲਾਇਨੀ ਵਾਦੀ ਧਰਨਿ ਪਿਆਰੁ ॥
ਵਾਦਾ ਕੀਆ ਕਰਨਿ ਕਹਾਣੀਆ ਕੂੜੁ ਬੋਲਿ ਕਰਹਿ ਆਹਾਰੁ ॥
ਜਗ ਮਹਿ ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਹਰਿ ਨਿਰਮਲਾ ਹੋਰੁ ਮੈਲਾ ਸਭੁ ਆਕਾਰੁ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਨ ਚੇਤਨੀ ਹੋਇ ਮੈਲੇ ਮਰਹਿ ਗਵਾਰ ॥੧॥
सलोकु मः ३ ॥
मनमुख वापारै सार न जाणनी बिखु विहाझहि बिखु संग्रहहि बिख सिउ धरहि पिआरु ॥
बाहरहु पंडित सदाइदे मनहु मूरख गावार ॥
हरि सिउ चितु न लाइनी वादी धरनि पिआरु ॥
वादा कीआ करनि कहाणीआ कूड़ु बोलि करहि आहारु ॥
जग महि राम नामु हरि निरमला होरु मैला सभु आकारु ॥
नानक नामु न चेतनी होइ मैले मरहि गवार ॥१॥
मनमुख वापारै सार न जाणनी बिखु विहाझहि बिखु संग्रहहि बिख सिउ धरहि पिआरु ॥
बाहरहु पंडित सदाइदे मनहु मूरख गावार ॥
हरि सिउ चितु न लाइनी वादी धरनि पिआरु ॥
वादा कीआ करनि कहाणीआ कूड़ु बोलि करहि आहारु ॥
जग महि राम नामु हरि निरमला होरु मैला सभु आकारु ॥
नानक नामु न चेतनी होइ मैले मरहि गवार ॥१॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला ३॥ अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य (असल) व्यापार की कद्र नहीं जानते। वे माया का सौदा करते हैं। माया जोड़ते हैं और माया से ही प्यार करते हैं; वे बाहर से तो विद्वान कहलवाते हैं पर असल में मूर्ख हैं गावार हैं। (क्योंकि) वे प्रभू के साथ तो मन नहीं लगाते (विद्या के आसरे) चर्चा में प्यार करते हैं। चर्चा की ही नित्य बातें करते हैं; और रोज़ी कमाते हैं झूठ बोल के। (असल बात यह है कि) नाम सिमरना ही जगत में (पवित्र काम) है। और जो कुछ दिखाई दे रहा है (इसका आहर) मैल पैदा करता है। हे नानक ! जो ‘नाम’ नहीं सिमरते वे मूर्ख नीच जीवन वाले हो के आत्मिक मौत सहते हैं। 1।
ਮਃ ੩ ॥
ਦੁਖੁ ਲਗਾ ਬਿਨੁ ਸੇਵਿਐ ਹੁਕਮੁ ਮੰਨੇ ਦੁਖੁ ਜਾਇ ॥
ਆਪੇ ਦਾਤਾ ਸੁਖੈ ਦਾ ਆਪੇ ਦੇਇ ਸਜਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਏਵੈ ਜਾਣੀਐ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਤਿਸੈ ਰਜਾਇ ॥੨॥
ਦੁਖੁ ਲਗਾ ਬਿਨੁ ਸੇਵਿਐ ਹੁਕਮੁ ਮੰਨੇ ਦੁਖੁ ਜਾਇ ॥
ਆਪੇ ਦਾਤਾ ਸੁਖੈ ਦਾ ਆਪੇ ਦੇਇ ਸਜਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਏਵੈ ਜਾਣੀਐ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਤਿਸੈ ਰਜਾਇ ॥੨॥
मः ३ ॥
दुखु लगा बिनु सेविऐ हुकमु मंने दुखु जाइ ॥
आपे दाता सुखै दा आपे देइ सजाइ ॥
नानक एवै जाणीऐ सभु किछु तिसै रजाइ ॥२॥
दुखु लगा बिनु सेविऐ हुकमु मंने दुखु जाइ ॥
आपे दाता सुखै दा आपे देइ सजाइ ॥
नानक एवै जाणीऐ सभु किछु तिसै रजाइ ॥२॥
हिन्दी अर्थ: महला ३॥ (प्रभू का) सिमरन किए बिना मनुष्य को दुख व्यापता है। जब (प्रभू का) हुकम मानता है (भाव। रज़ा में चलता है) तो दुख दूर हो जाता है (क्योंकि प्रभू) खुद ही सुख देने वाला है और स्वयं ही सज़ा देने वाला है। हे नानक ! हुकम में चलने से ही ये समझ पड़ती है कि सब कुछ प्रभू की रज़ा में हो रहा है। 2।
ਪਉੜੀ ॥
ਹਰਿ ਨਾਮ ਬਿਨਾ ਜਗਤੁ ਹੈ ਨਿਰਧਨੁ ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਨਾਹੀ ॥
ਦੂਜੈ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਇਆ ਹਉਮੈ ਦੁਖੁ ਪਾਹੀ ॥
ਹਰਿ ਨਾਮ ਬਿਨਾ ਜਗਤੁ ਹੈ ਨਿਰਧਨੁ ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਨਾਹੀ ॥
ਦੂਜੈ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਇਆ ਹਉਮੈ ਦੁਖੁ ਪਾਹੀ ॥
पउड़ी ॥
हरि नाम बिना जगतु है निरधनु बिनु नावै त्रिपति नाही ॥
दूजै भरमि भुलाइआ हउमै दुखु पाही ॥
हरि नाम बिना जगतु है निरधनु बिनु नावै त्रिपति नाही ॥
दूजै भरमि भुलाइआ हउमै दुखु पाही ॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ प्रभू के ‘नाम’ के बिना जगत कंगाल है (क्योंकि चाहे कितनी ही माया इकट्ठी कर ले) ‘नाम’ के बिना संतोख नहीं आता; माया के मोह के कारण भटकना में पड़ कर गलत रास्ते पर पड़ा रहता है। अहंकार के कारण ही जीव दुख पाते हैं।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 1091 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।
गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।
Civil Services के interview के बाद का wait, घर का माहौल।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 47 पंक्तियों का है, 10 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1091” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 1092 →, पीछे का: ← अंग 1090।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।