अंग
1041
राग मारू
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸਚ ਬਿਨੁ ਭਵਜਲੁ ਜਾਇ ਨ ਤਰਿਆ ॥
ਏਹੁ ਸਮੁੰਦੁ ਅਥਾਹੁ ਮਹਾ ਬਿਖੁ ਭਰਿਆ ॥
ਰਹੈ ਅਤੀਤੁ ਗੁਰਮਤਿ ਲੇ ਊਪਰਿ ਹਰਿ ਨਿਰਭਉ ਕੈ ਘਰਿ ਪਾਇਆ ॥੬॥
ਝੂਠੀ ਜਗ ਹਿਤ ਕੀ ਚਤੁਰਾਈ ॥
ਬਿਲਮ ਨ ਲਾਗੈ ਆਵੈ ਜਾਈ ॥
ਨਾਮੁ ਵਿਸਾਰਿ ਚਲਹਿ ਅਭਿਮਾਨੀ ਉਪਜੈ ਬਿਨਸਿ ਖਪਾਇਆ ॥੭॥
ਉਪਜਹਿ ਬਿਨਸਹਿ ਬੰਧਨ ਬੰਧੇ ॥
ਹਉਮੈ ਮਾਇਆ ਕੇ ਗਲਿ ਫੰਧੇ ॥
ਜਿਸੁ ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਨਾਹੀ ਮਤਿ ਗੁਰਮਤਿ ਸੋ ਜਮ ਪੁਰਿ ਬੰਧਿ ਚਲਾਇਆ ॥੮॥
ਗੁਰ ਬਿਨੁ ਮੋਖ ਮੁਕਤਿ ਕਿਉ ਪਾਈਐ ॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਕਿਉ ਧਿਆਈਐ ॥
ਗੁਰਮਤਿ ਲੇਹੁ ਤਰਹੁ ਭਵ ਦੁਤਰੁ ਮੁਕਤਿ ਭਏ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ॥੯॥
ਗੁਰਮਤਿ ਕ੍ਰਿਸਨਿ ਗੋਵਰਧਨ ਧਾਰੇ ॥
ਗੁਰਮਤਿ ਸਾਇਰਿ ਪਾਹਣ ਤਾਰੇ ॥
ਗੁਰਮਤਿ ਲੇਹੁ ਪਰਮ ਪਦੁ ਪਾਈਐ ਨਾਨਕ ਗੁਰਿ ਭਰਮੁ ਚੁਕਾਇਆ ॥੧੦॥
ਗੁਰਮਤਿ ਲੇਹੁ ਤਰਹੁ ਸਚੁ ਤਾਰੀ ॥
ਆਤਮ ਚੀਨਹੁ ਰਿਦੈ ਮੁਰਾਰੀ ॥
ਜਮ ਕੇ ਫਾਹੇ ਕਾਟਹਿ ਹਰਿ ਜਪਿ ਅਕੁਲ ਨਿਰੰਜਨੁ ਪਾਇਆ ॥੧੧॥
ਗੁਰਮਤਿ ਪੰਚ ਸਖੇ ਗੁਰ ਭਾਈ ॥
ਗੁਰਮਤਿ ਅਗਨਿ ਨਿਵਾਰਿ ਸਮਾਈ ॥
ਮਨਿ ਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਜਪਹੁ ਜਗਜੀਵਨ ਰਿਦ ਅੰਤਰਿ ਅਲਖੁ ਲਖਾਇਆ ॥੧੨॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਬੂਝੈ ਸਬਦਿ ਪਤੀਜੈ ॥
ਉਸਤਤਿ ਨਿੰਦਾ ਕਿਸ ਕੀ ਕੀਜੈ ॥
ਚੀਨਹੁ ਆਪੁ ਜਪਹੁ ਜਗਦੀਸਰੁ ਹਰਿ ਜਗੰਨਾਥੁ ਮਨਿ ਭਾਇਆ ॥੧੩॥
ਜੋ ਬ੍ਰਹਮੰਡਿ ਖੰਡਿ ਸੋ ਜਾਣਹੁ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਬੂਝਹੁ ਸਬਦਿ ਪਛਾਣਹੁ ॥
ਘਟਿ ਘਟਿ ਭੋਗੇ ਭੋਗਣਹਾਰਾ ਰਹੈ ਅਤੀਤੁ ਸਬਾਇਆ ॥੧੪॥
ਗੁਰਮਤਿ ਬੋਲਹੁ ਹਰਿ ਜਸੁ ਸੂਚਾ ॥
ਗੁਰਮਤਿ ਆਖੀ ਦੇਖਹੁ ਊਚਾ ॥
ਸ੍ਰਵਣੀ ਨਾਮੁ ਸੁਣੈ ਹਰਿ ਬਾਣੀ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਰੰਗਿ ਰੰਗਾਇਆ ॥੧੫॥੩॥੨੦॥
ਏਹੁ ਸਮੁੰਦੁ ਅਥਾਹੁ ਮਹਾ ਬਿਖੁ ਭਰਿਆ ॥
ਰਹੈ ਅਤੀਤੁ ਗੁਰਮਤਿ ਲੇ ਊਪਰਿ ਹਰਿ ਨਿਰਭਉ ਕੈ ਘਰਿ ਪਾਇਆ ॥੬॥
ਝੂਠੀ ਜਗ ਹਿਤ ਕੀ ਚਤੁਰਾਈ ॥
ਬਿਲਮ ਨ ਲਾਗੈ ਆਵੈ ਜਾਈ ॥
ਨਾਮੁ ਵਿਸਾਰਿ ਚਲਹਿ ਅਭਿਮਾਨੀ ਉਪਜੈ ਬਿਨਸਿ ਖਪਾਇਆ ॥੭॥
ਉਪਜਹਿ ਬਿਨਸਹਿ ਬੰਧਨ ਬੰਧੇ ॥
ਹਉਮੈ ਮਾਇਆ ਕੇ ਗਲਿ ਫੰਧੇ ॥
ਜਿਸੁ ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਨਾਹੀ ਮਤਿ ਗੁਰਮਤਿ ਸੋ ਜਮ ਪੁਰਿ ਬੰਧਿ ਚਲਾਇਆ ॥੮॥
ਗੁਰ ਬਿਨੁ ਮੋਖ ਮੁਕਤਿ ਕਿਉ ਪਾਈਐ ॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਕਿਉ ਧਿਆਈਐ ॥
ਗੁਰਮਤਿ ਲੇਹੁ ਤਰਹੁ ਭਵ ਦੁਤਰੁ ਮੁਕਤਿ ਭਏ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ॥੯॥
ਗੁਰਮਤਿ ਕ੍ਰਿਸਨਿ ਗੋਵਰਧਨ ਧਾਰੇ ॥
ਗੁਰਮਤਿ ਸਾਇਰਿ ਪਾਹਣ ਤਾਰੇ ॥
ਗੁਰਮਤਿ ਲੇਹੁ ਪਰਮ ਪਦੁ ਪਾਈਐ ਨਾਨਕ ਗੁਰਿ ਭਰਮੁ ਚੁਕਾਇਆ ॥੧੦॥
ਗੁਰਮਤਿ ਲੇਹੁ ਤਰਹੁ ਸਚੁ ਤਾਰੀ ॥
ਆਤਮ ਚੀਨਹੁ ਰਿਦੈ ਮੁਰਾਰੀ ॥
ਜਮ ਕੇ ਫਾਹੇ ਕਾਟਹਿ ਹਰਿ ਜਪਿ ਅਕੁਲ ਨਿਰੰਜਨੁ ਪਾਇਆ ॥੧੧॥
ਗੁਰਮਤਿ ਪੰਚ ਸਖੇ ਗੁਰ ਭਾਈ ॥
ਗੁਰਮਤਿ ਅਗਨਿ ਨਿਵਾਰਿ ਸਮਾਈ ॥
ਮਨਿ ਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਜਪਹੁ ਜਗਜੀਵਨ ਰਿਦ ਅੰਤਰਿ ਅਲਖੁ ਲਖਾਇਆ ॥੧੨॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਬੂਝੈ ਸਬਦਿ ਪਤੀਜੈ ॥
ਉਸਤਤਿ ਨਿੰਦਾ ਕਿਸ ਕੀ ਕੀਜੈ ॥
ਚੀਨਹੁ ਆਪੁ ਜਪਹੁ ਜਗਦੀਸਰੁ ਹਰਿ ਜਗੰਨਾਥੁ ਮਨਿ ਭਾਇਆ ॥੧੩॥
ਜੋ ਬ੍ਰਹਮੰਡਿ ਖੰਡਿ ਸੋ ਜਾਣਹੁ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਬੂਝਹੁ ਸਬਦਿ ਪਛਾਣਹੁ ॥
ਘਟਿ ਘਟਿ ਭੋਗੇ ਭੋਗਣਹਾਰਾ ਰਹੈ ਅਤੀਤੁ ਸਬਾਇਆ ॥੧੪॥
ਗੁਰਮਤਿ ਬੋਲਹੁ ਹਰਿ ਜਸੁ ਸੂਚਾ ॥
ਗੁਰਮਤਿ ਆਖੀ ਦੇਖਹੁ ਊਚਾ ॥
ਸ੍ਰਵਣੀ ਨਾਮੁ ਸੁਣੈ ਹਰਿ ਬਾਣੀ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਰੰਗਿ ਰੰਗਾਇਆ ॥੧੫॥੩॥੨੦॥
सच बिनु भवजलु जाइ न तरिआ ॥
एहु समुंदु अथाहु महा बिखु भरिआ ॥
रहै अतीतु गुरमति ले ऊपरि हरि निरभउ कै घरि पाइआ ॥६॥
झूठी जग हित की चतुराई ॥
बिलम न लागै आवै जाई ॥
नामु विसारि चलहि अभिमानी उपजै बिनसि खपाइआ ॥७॥
उपजहि बिनसहि बंधन बंधे ॥
हउमै माइआ के गलि फंधे ॥
जिसु राम नामु नाही मति गुरमति सो जम पुरि बंधि चलाइआ ॥८॥
गुर बिनु मोख मुकति किउ पाईऐ ॥
बिनु गुर राम नामु किउ धिआईऐ ॥
गुरमति लेहु तरहु भव दुतरु मुकति भए सुखु पाइआ ॥९॥
गुरमति क्रिसनि गोवरधन धारे ॥
गुरमति साइरि पाहण तारे ॥
गुरमति लेहु परम पदु पाईऐ नानक गुरि भरमु चुकाइआ ॥१०॥
गुरमति लेहु तरहु सचु तारी ॥
आतम चीनहु रिदै मुरारी ॥
जम के फाहे काटहि हरि जपि अकुल निरंजनु पाइआ ॥११॥
गुरमति पंच सखे गुर भाई ॥
गुरमति अगनि निवारि समाई ॥
मनि मुखि नामु जपहु जगजीवन रिद अंतरि अलखु लखाइआ ॥१२॥
गुरमुखि बूझै सबदि पतीजै ॥
उसतति निंदा किस की कीजै ॥
चीनहु आपु जपहु जगदीसरु हरि जगंनाथु मनि भाइआ ॥१३॥
जो ब्रहमंडि खंडि सो जाणहु ॥
गुरमुखि बूझहु सबदि पछाणहु ॥
घटि घटि भोगे भोगणहारा रहै अतीतु सबाइआ ॥१४॥
गुरमति बोलहु हरि जसु सूचा ॥
गुरमति आखी देखहु ऊचा ॥
स्रवणी नामु सुणै हरि बाणी नानक हरि रंगि रंगाइआ ॥१५॥३॥२०॥
एहु समुंदु अथाहु महा बिखु भरिआ ॥
रहै अतीतु गुरमति ले ऊपरि हरि निरभउ कै घरि पाइआ ॥६॥
झूठी जग हित की चतुराई ॥
बिलम न लागै आवै जाई ॥
नामु विसारि चलहि अभिमानी उपजै बिनसि खपाइआ ॥७॥
उपजहि बिनसहि बंधन बंधे ॥
हउमै माइआ के गलि फंधे ॥
जिसु राम नामु नाही मति गुरमति सो जम पुरि बंधि चलाइआ ॥८॥
गुर बिनु मोख मुकति किउ पाईऐ ॥
बिनु गुर राम नामु किउ धिआईऐ ॥
गुरमति लेहु तरहु भव दुतरु मुकति भए सुखु पाइआ ॥९॥
गुरमति क्रिसनि गोवरधन धारे ॥
गुरमति साइरि पाहण तारे ॥
गुरमति लेहु परम पदु पाईऐ नानक गुरि भरमु चुकाइआ ॥१०॥
गुरमति लेहु तरहु सचु तारी ॥
आतम चीनहु रिदै मुरारी ॥
जम के फाहे काटहि हरि जपि अकुल निरंजनु पाइआ ॥११॥
गुरमति पंच सखे गुर भाई ॥
गुरमति अगनि निवारि समाई ॥
मनि मुखि नामु जपहु जगजीवन रिद अंतरि अलखु लखाइआ ॥१२॥
गुरमुखि बूझै सबदि पतीजै ॥
उसतति निंदा किस की कीजै ॥
चीनहु आपु जपहु जगदीसरु हरि जगंनाथु मनि भाइआ ॥१३॥
जो ब्रहमंडि खंडि सो जाणहु ॥
गुरमुखि बूझहु सबदि पछाणहु ॥
घटि घटि भोगे भोगणहारा रहै अतीतु सबाइआ ॥१४॥
गुरमति बोलहु हरि जसु सूचा ॥
गुरमति आखी देखहु ऊचा ॥
स्रवणी नामु सुणै हरि बाणी नानक हरि रंगि रंगाइआ ॥१५॥३॥२०॥
हिन्दी अर्थ: सदा-स्थिर परमात्मा के नाम सिमरन के बिना इसमें से पार नहीं लांघा जा सकता। यह संसार-समुंद्र बहुत ही गहरा है और (विकारों के) जहर से भरा हुआ है। जो मनुष्य गुरू की मति लेता है वह विकारों से निर्लिप रहता है वह जहर भरे समुंद्र से ऊपर-ऊपर रहता है। उसको परमात्मा मिल जाता है और वह ऐसे (आत्मिक) ठिकाने में पहुँच जाता है जहाँ वह विकारों के डर-सहम से परे हो जाता है। 6। जगत के (पदार्थोंके) मोह की समझदारी व्यर्थ ही जाती है क्योंकि (जगत की माया का साथ समाप्त होने में) ज्यादा समय नहीं लगता और मनुष्य इस मोह के कारण जनम-मरण में पड़ जाता है। माया का गुमान करने वाले व्यक्ति परमात्मा का नाम भुला के (यहाँ से खाली हाथ) चल पड़ते हैं। (जो भी प्रभू का नाम बिसारता है वह) पैदा होता है मरता है पैदा होता है मरता है और दुखी होता है। 7। वे इन बँधनों में बँधे हुए जनम-मरण के चक्करों में पड़े रहते हैं। जिन लोगों के गले में अहंकार और माया के फंदेपड़े रहते हैं। जिस मनुष्य को सतिगुरू की मति के द्वारा परमात्मा का नाम प्राप्त नहीं हुआ। वह मोह के बँधनों में बाँध के जम के शहर में धकेला जाता है। 8। गुरू की शरण के बिना (अहंकार माया के बँधनों से) खलासी किसी भी हालत में नहीं मिल सकती। क्योंकि। गुरू की शरण में आए बिना परमात्मा का नाम नहीं सिमरा जा सकता। (हे भाई !) गुरू की मति पर चल कर (नाम सिमरो। इस तरह) उस संसार-समुंद्र में से पार लांघ जाओगे जिसमें से पार लांघना बहुत मुश्किल है। जो लोग (नाम सिमर के) विकारों से बच निकले उनको आत्मिक आनंद प्राप्त हो गया। 9। गुरू की मति पर चल कर नाम सिमरने से बड़ी ऊँची आत्मिक अवस्था हासिल हो जाती है (बड़ा आत्मिक बल प्राप्त हो जाता है) इसी गुरमति की बरकति से कृष्ण (जी) ने गौवर्धन पर्वत को (उंगलियों पर) उठा लिया था और (श्री राम चंद्र जी ने) पत्थर समुंद्र में तैरा दिए थे। हे नानक ! (जो भी मनुष्य गुरू की शरण आया) गुरू ने उसकी भटकना समाप्त कर दी। 10। (हे भाई !) गुरू की मति ग्रहण करो और सदा-स्थिर प्रभू का नाम सिमरो। इस तरह संसार-समुंद्र से पार लांघने के लिए तैरो। अपने आत्मिक जीवन को ध्यान से देखो और परमात्मा को अपने हृदय में बसाओ। परमात्मा का नाम जप के जप के देश ले जाने वाले बँधन काटे जाते हैं। जो भी मनुष्य नाम जपता है उसको वह परमात्मा मिल जाता है जिसका कोई विशेष कुल नहीं है और जो माया के प्रभाव से ऊपर है। 11। गुरू की मति पर चलने से सत-संतोख आदि पाँचों मनुष्य के आत्मिक साथी बन जाते हैं गुर-भाई बन जाते हैं। गुरू की मति तृष्णा की आग को दूर कर के नाम में जोड़ देती है। (हे भाई !) जगत के जीवन प्रभू का नाम अपने मन में अपने मुँह से जपते रहो। (जो मनुष्य जपता है वह) अपने दिल में अदृष्ट प्रभू के दर्शन कर लेता है। 12। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर (ये जीवन-जुगति) समझ लेता है वह गुरू के शबद में जुड़ कर आत्मिक शांति हासिल कर लेता है। यह फिर ना किसी की खुशामद उस्तति करता है ना किसी की निंदा करता है। (हे भाई !) अपने आत्मिक जीवन को (हमेशा) पड़तालते रहो। और जगत के मालिक (का नाम) जपते रहो। (जो मनुष्य नाम जपता है) उसको जगत का नाथ हरि अपने मन में प्यारा लगने लग जाता है। 13। जो परमात्मा सारी सृष्टि में बसता है उसको अपने शरीर में बसता पहचानो। गुरू की शरण पड़ कर यह भेद समझो। गुरू के शबद में जुड़ कर इस अस्लियत को पहचानो। दुनिया के सारे पदार्थों को भोग सकने वाला परमात्मा हरेक शरीर में व्यापक हो के सारे भोग भोग रहा है। फिर भी सारी सृष्टि से निर्लिप रहता है। 14। (हे भाई !) गुरू की मति के द्वारा परमात्मा की सिफत-सालाह करो जो जीवन को पवित्र बना देती है। गुरू की शिक्षा पर चल कर उस सबसे ऊँचे परमात्मा को अपनी आँखों से (अंदर-बाहर हर जगह) देखो। हे नानक ! जो मनुष्य अपने कानों से परमात्मा का नाम सुनता है प्रभू की सिफत-सालाह सुनता है वह परमात्मा के प्रेम-रंग में रंगा जाता है। 125। 3। 20।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਕਾਮੁ ਕ੍ਰੋਧੁ ਪਰਹਰੁ ਪਰ ਨਿੰਦਾ ॥
ਲਬੁ ਲੋਭੁ ਤਜਿ ਹੋਹੁ ਨਿਚਿੰਦਾ ॥
ਭ੍ਰਮ ਕਾ ਸੰਗਲੁ ਤੋੜਿ ਨਿਰਾਲਾ ਹਰਿ ਅੰਤਰਿ ਹਰਿ ਰਸੁ ਪਾਇਆ ॥੧॥
ਨਿਸਿ ਦਾਮਨਿ ਜਿਉ ਚਮਕਿ ਚੰਦਾਇਣੁ ਦੇਖੈ ॥
ਅਹਿਨਿਸਿ ਜੋਤਿ ਨਿਰੰਤਰਿ ਪੇਖੈ ॥
ਆਨੰਦ ਰੂਪੁ ਅਨੂਪੁ ਸਰੂਪਾ ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਦੇਖਾਇਆ ॥੨॥
ਸਤਿਗੁਰ ਮਿਲਹੁ ਆਪੇ ਪ੍ਰਭੁ ਤਾਰੇ ॥
ਸਸਿ ਘਰਿ ਸੂਰੁ ਦੀਪਕੁ ਗੈਣਾਰੇ ॥
ਦੇਖਿ ਅਦਿਸਟੁ ਰਹਹੁ ਲਿਵ ਲਾਗੀ ਸਭੁ ਤ੍ਰਿਭਵਣਿ ਬ੍ਰਹਮੁ ਸਬਾਇਆ ॥੩॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਰਸੁ ਪਾਏ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਭਉ ਜਾਏ ॥
ਅਨਭਉ ਪਦੁ ਪਾਵੈ ਆਪੁ ਗਵਾਏ ॥
ਊਚੀ ਪਦਵੀ ਊਚੋ ਊਚਾ ਨਿਰਮਲ ਸਬਦੁ ਕਮਾਇਆ ॥੪॥
ਅਦ੍ਰਿਸਟ ਅਗੋਚਰੁ ਨਾਮੁ ਅਪਾਰਾ ॥
ਕਾਮੁ ਕ੍ਰੋਧੁ ਪਰਹਰੁ ਪਰ ਨਿੰਦਾ ॥
ਲਬੁ ਲੋਭੁ ਤਜਿ ਹੋਹੁ ਨਿਚਿੰਦਾ ॥
ਭ੍ਰਮ ਕਾ ਸੰਗਲੁ ਤੋੜਿ ਨਿਰਾਲਾ ਹਰਿ ਅੰਤਰਿ ਹਰਿ ਰਸੁ ਪਾਇਆ ॥੧॥
ਨਿਸਿ ਦਾਮਨਿ ਜਿਉ ਚਮਕਿ ਚੰਦਾਇਣੁ ਦੇਖੈ ॥
ਅਹਿਨਿਸਿ ਜੋਤਿ ਨਿਰੰਤਰਿ ਪੇਖੈ ॥
ਆਨੰਦ ਰੂਪੁ ਅਨੂਪੁ ਸਰੂਪਾ ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਦੇਖਾਇਆ ॥੨॥
ਸਤਿਗੁਰ ਮਿਲਹੁ ਆਪੇ ਪ੍ਰਭੁ ਤਾਰੇ ॥
ਸਸਿ ਘਰਿ ਸੂਰੁ ਦੀਪਕੁ ਗੈਣਾਰੇ ॥
ਦੇਖਿ ਅਦਿਸਟੁ ਰਹਹੁ ਲਿਵ ਲਾਗੀ ਸਭੁ ਤ੍ਰਿਭਵਣਿ ਬ੍ਰਹਮੁ ਸਬਾਇਆ ॥੩॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਰਸੁ ਪਾਏ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਭਉ ਜਾਏ ॥
ਅਨਭਉ ਪਦੁ ਪਾਵੈ ਆਪੁ ਗਵਾਏ ॥
ਊਚੀ ਪਦਵੀ ਊਚੋ ਊਚਾ ਨਿਰਮਲ ਸਬਦੁ ਕਮਾਇਆ ॥੪॥
ਅਦ੍ਰਿਸਟ ਅਗੋਚਰੁ ਨਾਮੁ ਅਪਾਰਾ ॥
मारू महला १ ॥
कामु क्रोधु परहरु पर निंदा ॥
लबु लोभु तजि होहु निचिंदा ॥
भ्रम का संगलु तोड़ि निराला हरि अंतरि हरि रसु पाइआ ॥१॥
निसि दामनि जिउ चमकि चंदाइणु देखै ॥
अहिनिसि जोति निरंतरि पेखै ॥
आनंद रूपु अनूपु सरूपा गुरि पूरै देखाइआ ॥२॥
सतिगुर मिलहु आपे प्रभु तारे ॥
ससि घरि सूरु दीपकु गैणारे ॥
देखि अदिसटु रहहु लिव लागी सभु त्रिभवणि ब्रहमु सबाइआ ॥३॥
अंम्रित रसु पाए त्रिसना भउ जाए ॥
अनभउ पदु पावै आपु गवाए ॥
ऊची पदवी ऊचो ऊचा निरमल सबदु कमाइआ ॥४॥
अद्रिसट अगोचरु नामु अपारा ॥
कामु क्रोधु परहरु पर निंदा ॥
लबु लोभु तजि होहु निचिंदा ॥
भ्रम का संगलु तोड़ि निराला हरि अंतरि हरि रसु पाइआ ॥१॥
निसि दामनि जिउ चमकि चंदाइणु देखै ॥
अहिनिसि जोति निरंतरि पेखै ॥
आनंद रूपु अनूपु सरूपा गुरि पूरै देखाइआ ॥२॥
सतिगुर मिलहु आपे प्रभु तारे ॥
ससि घरि सूरु दीपकु गैणारे ॥
देखि अदिसटु रहहु लिव लागी सभु त्रिभवणि ब्रहमु सबाइआ ॥३॥
अंम्रित रसु पाए त्रिसना भउ जाए ॥
अनभउ पदु पावै आपु गवाए ॥
ऊची पदवी ऊचो ऊचा निरमल सबदु कमाइआ ॥४॥
अद्रिसट अगोचरु नामु अपारा ॥
हिन्दी अर्थ: मारू महला १॥ (हे भाई ! अपने अंदर से) काम क्रोध और पराई निंदा दूर कर। लब और लोभ त्याग के निष्चिंत हो जा (भाव। अगर तू काम। क्रोध। पराई निंदा। लब और लोभ दूर कर लेगा। तो तेरा मन हर वक्त शांत रहेगा)। जो मनुष्य (इन विकारों की कई किस्मों की) भटकनों की जंजीरों को तोड़ के निर्लिप हो जाता है वह परमात्मा को अपने अंदर ही पा लेता है। वह परमात्मा का नाम-रस प्राप्त करता है। 1। जैसे रात के वक्त बिजली की चमक से मनुष्य (अंधेरे में) रौशनी देख लेता है। इसी तरह (गुरू की शरण पड़ कर सिमरन की बरकति से) दिन-रात (हर वक्त) परमात्मा की ज्योति को हर जगह व्यापक देख सकता है। वह आनंद-रूप और आनंद-स्वरूप प्रभू (जिस किसी ने देखा है) पूरे गुरू ने ही दिखाया है। 2। (हे भाई !) सतिगुरू की शरण पड़ो (जो मनुष्य गुरू को मिलता है उसको) परमात्मा स्वयं ही (संसार-समुंद्र से) पार लंघा लेता है। उसके शांत हृदय में ज्ञान का प्रकाश हो जाता है। उसके हृदय-क्षितिज (हृदय-आकाश) में (मानो) दीया जग उठता है। (हे भाई ! अपने अंदर) अदृष्ट प्रभू को देख के उसमें सुरति जोड़े रखो। (जो मनुष्य ये उद्यम करता है उसको) हर जगह सारे त्रिभवणी जगत में परमात्मा ही परमात्मा दिखता है। 3। जो मनुष्य आत्मिक जीवन देने वाला नाम-रस प्राप्त करता है उसकी तृष्णा समाप्त हो जाती है उसका सहम दूर हो जाता है। उसको वह आत्मिक अवस्था मिल जाती है जहाँ ज्ञान का प्रकाश होता है। वह स्वै भाव दूर कर लेता है। वह बड़ी ऊँची आत्मिक अवस्था पा लेता है। ऊँचे से ऊँचा आत्मिक दर्जा हासिल करता है। जीवन को पवित्र करने वाला गुरू-शबद वह मनुष्य अपने अंदर कमाता है (भाव। गुरू-शबद के अनुसार जीवन-घाड़त घड़ता है)। 4। अदृश्य और बेअंत प्रभू का नाम मनुष्य की ज्ञानेन्द्रियों की पहुँच से परे है।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 1041 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।
गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।
Civil Services के interview के बाद का wait, घर का माहौल।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 44 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1041” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 1042 →, पीछे का: ← अंग 1040।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।