अंग
1026
राग मारू
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਛੋਡਿਹੁ ਨਿੰਦਾ ਤਾਤਿ ਪਰਾਈ ॥
ਪੜਿ ਪੜਿ ਦਝਹਿ ਸਾਤਿ ਨ ਆਈ ॥
ਮਿਲਿ ਸਤਸੰਗਤਿ ਨਾਮੁ ਸਲਾਹਹੁ ਆਤਮ ਰਾਮੁ ਸਖਾਈ ਹੇ ॥੭॥
ਛੋਡਹੁ ਕਾਮ ਕ੍ਰੋਧੁ ਬੁਰਿਆਈ ॥
ਹਉਮੈ ਧੰਧੁ ਛੋਡਹੁ ਲੰਪਟਾਈ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਸਰਣਿ ਪਰਹੁ ਤਾ ਉਬਰਹੁ ਇਉ ਤਰੀਐ ਭਵਜਲੁ ਭਾਈ ਹੇ ॥੮॥
ਆਗੈ ਬਿਮਲ ਨਦੀ ਅਗਨਿ ਬਿਖੁ ਝੇਲਾ ॥
ਤਿਥੈ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਈ ਜੀਉ ਇਕੇਲਾ ॥
ਭੜ ਭੜ ਅਗਨਿ ਸਾਗਰੁ ਦੇ ਲਹਰੀ ਪੜਿ ਦਝਹਿ ਮਨਮੁਖ ਤਾਈ ਹੇ ॥੯॥
ਗੁਰ ਪਹਿ ਮੁਕਤਿ ਦਾਨੁ ਦੇ ਭਾਣੈ ॥
ਜਿਨਿ ਪਾਇਆ ਸੋਈ ਬਿਧਿ ਜਾਣੈ ॥
ਜਿਨ ਪਾਇਆ ਤਿਨ ਪੂਛਹੁ ਭਾਈ ਸੁਖੁ ਸਤਿਗੁਰ ਸੇਵ ਕਮਾਈ ਹੇ ॥੧੦॥
ਗੁਰ ਬਿਨੁ ਉਰਝਿ ਮਰਹਿ ਬੇਕਾਰਾ ॥
ਜਮੁ ਸਿਰਿ ਮਾਰੇ ਕਰੇ ਖੁਆਰਾ ॥
ਬਾਧੇ ਮੁਕਤਿ ਨਾਹੀ ਨਰ ਨਿੰਦਕ ਡੂਬਹਿ ਨਿੰਦ ਪਰਾਈ ਹੇ ॥੧੧॥
ਬੋਲਹੁ ਸਾਚੁ ਪਛਾਣਹੁ ਅੰਦਰਿ ॥
ਦੂਰਿ ਨਾਹੀ ਦੇਖਹੁ ਕਰਿ ਨੰਦਰਿ ॥
ਬਿਘਨੁ ਨਾਹੀ ਗੁਰਮੁਖਿ ਤਰੁ ਤਾਰੀ ਇਉ ਭਵਜਲੁ ਪਾਰਿ ਲੰਘਾਈ ਹੇ ॥੧੨॥
ਦੇਹੀ ਅੰਦਰਿ ਨਾਮੁ ਨਿਵਾਸੀ ॥
ਆਪੇ ਕਰਤਾ ਹੈ ਅਬਿਨਾਸੀ ॥
ਨਾ ਜੀਉ ਮਰੈ ਨ ਮਾਰਿਆ ਜਾਈ ਕਰਿ ਦੇਖੈ ਸਬਦਿ ਰਜਾਈ ਹੇ ॥੧੩॥
ਓਹੁ ਨਿਰਮਲੁ ਹੈ ਨਾਹੀ ਅੰਧਿਆਰਾ ॥
ਓਹੁ ਆਪੇ ਤਖਤਿ ਬਹੈ ਸਚਿਆਰਾ ॥
ਸਾਕਤ ਕੂੜੇ ਬੰਧਿ ਭਵਾਈਅਹਿ ਮਰਿ ਜਨਮਹਿ ਆਈ ਜਾਈ ਹੇ ॥੧੪॥
ਗੁਰ ਕੇ ਸੇਵਕ ਸਤਿਗੁਰ ਪਿਆਰੇ ॥
ਓਇ ਬੈਸਹਿ ਤਖਤਿ ਸੁ ਸਬਦੁ ਵੀਚਾਰੇ ॥
ਤਤੁ ਲਹਹਿ ਅੰਤਰਗਤਿ ਜਾਣਹਿ ਸਤਸੰਗਤਿ ਸਾਚੁ ਵਡਾਈ ਹੇ ॥੧੫॥
ਆਪਿ ਤਰੈ ਜਨੁ ਪਿਤਰਾ ਤਾਰੇ ॥
ਸੰਗਤਿ ਮੁਕਤਿ ਸੁ ਪਾਰਿ ਉਤਾਰੇ ॥
ਨਾਨਕੁ ਤਿਸ ਕਾ ਲਾਲਾ ਗੋਲਾ ਜਿਨਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਰਿ ਲਿਵ ਲਾਈ ਹੇ ॥੧੬॥੬॥
ਪੜਿ ਪੜਿ ਦਝਹਿ ਸਾਤਿ ਨ ਆਈ ॥
ਮਿਲਿ ਸਤਸੰਗਤਿ ਨਾਮੁ ਸਲਾਹਹੁ ਆਤਮ ਰਾਮੁ ਸਖਾਈ ਹੇ ॥੭॥
ਛੋਡਹੁ ਕਾਮ ਕ੍ਰੋਧੁ ਬੁਰਿਆਈ ॥
ਹਉਮੈ ਧੰਧੁ ਛੋਡਹੁ ਲੰਪਟਾਈ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਸਰਣਿ ਪਰਹੁ ਤਾ ਉਬਰਹੁ ਇਉ ਤਰੀਐ ਭਵਜਲੁ ਭਾਈ ਹੇ ॥੮॥
ਆਗੈ ਬਿਮਲ ਨਦੀ ਅਗਨਿ ਬਿਖੁ ਝੇਲਾ ॥
ਤਿਥੈ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਈ ਜੀਉ ਇਕੇਲਾ ॥
ਭੜ ਭੜ ਅਗਨਿ ਸਾਗਰੁ ਦੇ ਲਹਰੀ ਪੜਿ ਦਝਹਿ ਮਨਮੁਖ ਤਾਈ ਹੇ ॥੯॥
ਗੁਰ ਪਹਿ ਮੁਕਤਿ ਦਾਨੁ ਦੇ ਭਾਣੈ ॥
ਜਿਨਿ ਪਾਇਆ ਸੋਈ ਬਿਧਿ ਜਾਣੈ ॥
ਜਿਨ ਪਾਇਆ ਤਿਨ ਪੂਛਹੁ ਭਾਈ ਸੁਖੁ ਸਤਿਗੁਰ ਸੇਵ ਕਮਾਈ ਹੇ ॥੧੦॥
ਗੁਰ ਬਿਨੁ ਉਰਝਿ ਮਰਹਿ ਬੇਕਾਰਾ ॥
ਜਮੁ ਸਿਰਿ ਮਾਰੇ ਕਰੇ ਖੁਆਰਾ ॥
ਬਾਧੇ ਮੁਕਤਿ ਨਾਹੀ ਨਰ ਨਿੰਦਕ ਡੂਬਹਿ ਨਿੰਦ ਪਰਾਈ ਹੇ ॥੧੧॥
ਬੋਲਹੁ ਸਾਚੁ ਪਛਾਣਹੁ ਅੰਦਰਿ ॥
ਦੂਰਿ ਨਾਹੀ ਦੇਖਹੁ ਕਰਿ ਨੰਦਰਿ ॥
ਬਿਘਨੁ ਨਾਹੀ ਗੁਰਮੁਖਿ ਤਰੁ ਤਾਰੀ ਇਉ ਭਵਜਲੁ ਪਾਰਿ ਲੰਘਾਈ ਹੇ ॥੧੨॥
ਦੇਹੀ ਅੰਦਰਿ ਨਾਮੁ ਨਿਵਾਸੀ ॥
ਆਪੇ ਕਰਤਾ ਹੈ ਅਬਿਨਾਸੀ ॥
ਨਾ ਜੀਉ ਮਰੈ ਨ ਮਾਰਿਆ ਜਾਈ ਕਰਿ ਦੇਖੈ ਸਬਦਿ ਰਜਾਈ ਹੇ ॥੧੩॥
ਓਹੁ ਨਿਰਮਲੁ ਹੈ ਨਾਹੀ ਅੰਧਿਆਰਾ ॥
ਓਹੁ ਆਪੇ ਤਖਤਿ ਬਹੈ ਸਚਿਆਰਾ ॥
ਸਾਕਤ ਕੂੜੇ ਬੰਧਿ ਭਵਾਈਅਹਿ ਮਰਿ ਜਨਮਹਿ ਆਈ ਜਾਈ ਹੇ ॥੧੪॥
ਗੁਰ ਕੇ ਸੇਵਕ ਸਤਿਗੁਰ ਪਿਆਰੇ ॥
ਓਇ ਬੈਸਹਿ ਤਖਤਿ ਸੁ ਸਬਦੁ ਵੀਚਾਰੇ ॥
ਤਤੁ ਲਹਹਿ ਅੰਤਰਗਤਿ ਜਾਣਹਿ ਸਤਸੰਗਤਿ ਸਾਚੁ ਵਡਾਈ ਹੇ ॥੧੫॥
ਆਪਿ ਤਰੈ ਜਨੁ ਪਿਤਰਾ ਤਾਰੇ ॥
ਸੰਗਤਿ ਮੁਕਤਿ ਸੁ ਪਾਰਿ ਉਤਾਰੇ ॥
ਨਾਨਕੁ ਤਿਸ ਕਾ ਲਾਲਾ ਗੋਲਾ ਜਿਨਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਰਿ ਲਿਵ ਲਾਈ ਹੇ ॥੧੬॥੬॥
छोडिहु निंदा ताति पराई ॥
पड़ि पड़ि दझहि साति न आई ॥
मिलि सतसंगति नामु सलाहहु आतम रामु सखाई हे ॥७॥
छोडहु काम क्रोधु बुरिआई ॥
हउमै धंधु छोडहु लंपटाई ॥
सतिगुर सरणि परहु ता उबरहु इउ तरीऐ भवजलु भाई हे ॥८॥
आगै बिमल नदी अगनि बिखु झेला ॥
तिथै अवरु न कोई जीउ इकेला ॥
भड़ भड़ अगनि सागरु दे लहरी पड़ि दझहि मनमुख ताई हे ॥९॥
गुर पहि मुकति दानु दे भाणै ॥
जिनि पाइआ सोई बिधि जाणै ॥
जिन पाइआ तिन पूछहु भाई सुखु सतिगुर सेव कमाई हे ॥१०॥
गुर बिनु उरझि मरहि बेकारा ॥
जमु सिरि मारे करे खुआरा ॥
बाधे मुकति नाही नर निंदक डूबहि निंद पराई हे ॥११॥
बोलहु साचु पछाणहु अंदरि ॥
दूरि नाही देखहु करि नंदरि ॥
बिघनु नाही गुरमुखि तरु तारी इउ भवजलु पारि लंघाई हे ॥१२॥
देही अंदरि नामु निवासी ॥
आपे करता है अबिनासी ॥
ना जीउ मरै न मारिआ जाई करि देखै सबदि रजाई हे ॥१३॥
ओहु निरमलु है नाही अंधिआरा ॥
ओहु आपे तखति बहै सचिआरा ॥
साकत कूड़े बंधि भवाईअहि मरि जनमहि आई जाई हे ॥१४॥
गुर के सेवक सतिगुर पिआरे ॥
ओइ बैसहि तखति सु सबदु वीचारे ॥
ततु लहहि अंतरगति जाणहि सतसंगति साचु वडाई हे ॥१५॥
आपि तरै जनु पितरा तारे ॥
संगति मुकति सु पारि उतारे ॥
नानकु तिस का लाला गोला जिनि गुरमुखि हरि लिव लाई हे ॥१६॥६॥
पड़ि पड़ि दझहि साति न आई ॥
मिलि सतसंगति नामु सलाहहु आतम रामु सखाई हे ॥७॥
छोडहु काम क्रोधु बुरिआई ॥
हउमै धंधु छोडहु लंपटाई ॥
सतिगुर सरणि परहु ता उबरहु इउ तरीऐ भवजलु भाई हे ॥८॥
आगै बिमल नदी अगनि बिखु झेला ॥
तिथै अवरु न कोई जीउ इकेला ॥
भड़ भड़ अगनि सागरु दे लहरी पड़ि दझहि मनमुख ताई हे ॥९॥
गुर पहि मुकति दानु दे भाणै ॥
जिनि पाइआ सोई बिधि जाणै ॥
जिन पाइआ तिन पूछहु भाई सुखु सतिगुर सेव कमाई हे ॥१०॥
गुर बिनु उरझि मरहि बेकारा ॥
जमु सिरि मारे करे खुआरा ॥
बाधे मुकति नाही नर निंदक डूबहि निंद पराई हे ॥११॥
बोलहु साचु पछाणहु अंदरि ॥
दूरि नाही देखहु करि नंदरि ॥
बिघनु नाही गुरमुखि तरु तारी इउ भवजलु पारि लंघाई हे ॥१२॥
देही अंदरि नामु निवासी ॥
आपे करता है अबिनासी ॥
ना जीउ मरै न मारिआ जाई करि देखै सबदि रजाई हे ॥१३॥
ओहु निरमलु है नाही अंधिआरा ॥
ओहु आपे तखति बहै सचिआरा ॥
साकत कूड़े बंधि भवाईअहि मरि जनमहि आई जाई हे ॥१४॥
गुर के सेवक सतिगुर पिआरे ॥
ओइ बैसहि तखति सु सबदु वीचारे ॥
ततु लहहि अंतरगति जाणहि सतसंगति साचु वडाई हे ॥१५॥
आपि तरै जनु पितरा तारे ॥
संगति मुकति सु पारि उतारे ॥
नानकु तिस का लाला गोला जिनि गुरमुखि हरि लिव लाई हे ॥१६॥६॥
हिन्दी अर्थ: (हे भाई !) पराई ईष्या और पराई निंदा छोड़ दो। (जो निंदा और ईष्या करते हैं वे निंदा और ईष्या की जलन में) पड़-पड़ कर जलते हैं (उनको अपने आप को भी) आत्मिक शांति नहीं मिलती। (हे भाई !) सत-संगति में मिल के प्रभू के नाम की सिफत-सालाह करो (जो लोग सिफत-सालाह करते हैं) परमात्मा उनका (सदा का) साथी बन जाता है। 7। हे भाई ! काम-क्रोध आदि मंद-कर्म त्यागो। अहंकार की उलझन छोड़ो। (विकारों में) खचित होने से बचो। (पर इन विकारों से) तब ही बच सकोगे अगर सतिगुरू का आसरा लोगे। इसी तरह ही (भाव। गुरू की शरण पड़ कर ही) संसार-समुंद्र से पार लांघा जा सकता है। 8। निंदा तात पराई कोम क्रोध बुराई वाले जीवन में पड़ कर निरोल आग की नदी में से गुजरने वाला जीवन-राह बन जाता है वहाँ वह लाटें निकलती हैं जो आत्मिक जीवन को मार-मुकाती हैं। उस आत्मिक बिपता में कोई और साथी नहीं बनता। अकेली अपनी जीवात्मा ही दुख सहती है। (निंदा-ईष्या-काम-क्रोध आदि की) आग का समुंद्र इतने शोले भड़काता है इतनी लाटें छोड़ता हैं कि अपने मन के पीछे चलने वाले बंदे उस में पड़ कर जलते हैं (आत्मिक जीवन तबाह कर लेते हैं और दुखी होते हैं)। 9। (इस आग के समुंद्र से) मुक्ति (का उपाय) गुरू के पास ही है। गुरू अपनी रजा में (परमात्मा के नाम की) ख़ैर डालता है। जिसने यह ख़ैर प्राप्त की वह (वह इस समुंद्र में से बच निकलने का) भेद समझ लेता है। जिन्हें गुरू से नाम-दान मिलता है। हे भाई ! उनसे पूछ के देख लो (वे बताते हैं कि) सतिगुरू की बताई हुई सेवा करने से आत्मिक आनंद मिलता है। 10। गुरू की शरण पड़े बिना जीव विकारों में फस के आत्मिक मौत सहेड़ लेते हैं। (आत्मिक) मौत (उनके) सिर पर (बार-बार) चोट मारती है और (उनको) दुखी करती (रहती है)। (निंदा के फंदे में) बँधे हुए निंदक लोगों को (निंदा की वादी में से) मुक्ति नसीब नहीं होती। पराई निंदा (के समुंद्र में) सदा गोते खाते रहते हैं। 11। (हे भाई !) सदा-स्थिर प्रभू का नाम जपो। उसको अपने अंदर बसता प्रतीत करो। ध्यान लगा के देखो। वह तुमसे दूर नहीं। गुरू की शरण पड़ कर (नाम जपो। नाम सिमरन की) तैराकी तैरो (जीवन-यात्रा में कोई) रुकावट नहीं आएगी। गुरू इस तरह (भाव। नाम जपा के) संसार-समुंद्र से पार लंघा लेता है। 12। परमात्मा का नाम हरेक जीव के शरीर के अंदर निवास रखता है। अविनाशी करतार स्वयं ही (हरेक के अंदर) मौजूद है। (जीव उस परमात्मा की ही अंश है। इस वास्ते) जीवात्मा ना मरती है। ना ही इसको कोई मार सकता है। रजा का मालिक करतार (जीव) पैदा करके अपने हुकम में (सबकी) संभाल करता है। 13। वह परमात्मा शुद्ध-स्वरूप है। उसमें (माया के मोह आदि का) रक्ती भर भी अंधेरा नहीं। वह सत्य-स्वरूप प्रभू स्वयं ही (हरेक के) हृदय तख़्त पर बैठा हुआ है। पर माया-गसित जीव माया के मोह में बँध के भटकना में पड़े हुए हैं। मरते हैं पैदा होते हैं। उनका ये आवागवन का चक्र बना रहता है। 14। गुरू से प्यार करने वाले गुरू के सेवक (माया-मोह से निर्लिप रह के) हृदय-तख़्त पर बैठे रहते हैं। गुरू के शबद को अपनी सोच के मण्डल में टिकाते हैं। वे जगत के मूल प्रभू को पा लेते हैं। अपने अंदर बसता पहचान लेते हैं। साध-संगति में टिक के सदा-स्थिर प्रभू को सिमरते हैं। और आदर पाते हैं। 15। (जो मनुष्य नाम सिमरता है) वह स्वयं संसार-समुंद्र से पार लांघ जाता है। अपने पित्रों को (पिता-दादा आदि बुजुर्गों को) भी पार लंघा लेता है। उसकी संगति में आने वालों को भी माया के बँधनों से स्वतंत्रता मिल जाती है। वह सेवक उनको पार लंघा देता है। जिस मनुष्य ने गुरू की शरण पड़ कर परमात्मा के चरणों में सुरति जोड़ी है नानक (भी) उस (भाग्यशाली) का सेवक है गुलाम है। 16। 6।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਕੇਤੇ ਜੁਗ ਵਰਤੇ ਗੁਬਾਰੈ ॥
ਤਾੜੀ ਲਾਈ ਅਪਰ ਅਪਾਰੈ ॥
ਧੁੰਧੂਕਾਰਿ ਨਿਰਾਲਮੁ ਬੈਠਾ ਨਾ ਤਦਿ ਧੰਧੁ ਪਸਾਰਾ ਹੇ ॥੧॥
ਜੁਗ ਛਤੀਹ ਤਿਨੈ ਵਰਤਾਏ ॥
ਜਿਉ ਤਿਸੁ ਭਾਣਾ ਤਿਵੈ ਚਲਾਏ ॥
ਤਿਸਹਿ ਸਰੀਕੁ ਨ ਦੀਸੈ ਕੋਈ ਆਪੇ ਅਪਰ ਅਪਾਰਾ ਹੇ ॥੨॥
ਗੁਪਤੇ ਬੂਝਹੁ ਜੁਗ ਚਤੁਆਰੇ ॥
ਘਟਿ ਘਟਿ ਵਰਤੈ ਉਦਰ ਮਝਾਰੇ ॥
ਜੁਗੁ ਜੁਗੁ ਏਕਾ ਏਕੀ ਵਰਤੈ ਕੋਈ ਬੂਝੈ ਗੁਰ ਵੀਚਾਰਾ ਹੇ ॥੩॥
ਬਿੰਦੁ ਰਕਤੁ ਮਿਲਿ ਪਿੰਡੁ ਸਰੀਆ ॥
ਪਉਣੁ ਪਾਣੀ ਅਗਨੀ ਮਿਲਿ ਜੀਆ ॥
ਆਪੇ ਚੋਜ ਕਰੇ ਰੰਗ ਮਹਲੀ ਹੋਰ ਮਾਇਆ ਮੋਹ ਪਸਾਰਾ ਹੇ ॥੪॥
ਗਰਭ ਕੁੰਡਲ ਮਹਿ ਉਰਧ ਧਿਆਨੀ ॥
ਆਪੇ ਜਾਣੈ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ॥
ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ਸਚੁ ਨਾਮੁ ਸਮਾਲੇ ਅੰਤਰਿ ਉਦਰ ਮਝਾਰਾ ਹੇ ॥੫॥
ਕੇਤੇ ਜੁਗ ਵਰਤੇ ਗੁਬਾਰੈ ॥
ਤਾੜੀ ਲਾਈ ਅਪਰ ਅਪਾਰੈ ॥
ਧੁੰਧੂਕਾਰਿ ਨਿਰਾਲਮੁ ਬੈਠਾ ਨਾ ਤਦਿ ਧੰਧੁ ਪਸਾਰਾ ਹੇ ॥੧॥
ਜੁਗ ਛਤੀਹ ਤਿਨੈ ਵਰਤਾਏ ॥
ਜਿਉ ਤਿਸੁ ਭਾਣਾ ਤਿਵੈ ਚਲਾਏ ॥
ਤਿਸਹਿ ਸਰੀਕੁ ਨ ਦੀਸੈ ਕੋਈ ਆਪੇ ਅਪਰ ਅਪਾਰਾ ਹੇ ॥੨॥
ਗੁਪਤੇ ਬੂਝਹੁ ਜੁਗ ਚਤੁਆਰੇ ॥
ਘਟਿ ਘਟਿ ਵਰਤੈ ਉਦਰ ਮਝਾਰੇ ॥
ਜੁਗੁ ਜੁਗੁ ਏਕਾ ਏਕੀ ਵਰਤੈ ਕੋਈ ਬੂਝੈ ਗੁਰ ਵੀਚਾਰਾ ਹੇ ॥੩॥
ਬਿੰਦੁ ਰਕਤੁ ਮਿਲਿ ਪਿੰਡੁ ਸਰੀਆ ॥
ਪਉਣੁ ਪਾਣੀ ਅਗਨੀ ਮਿਲਿ ਜੀਆ ॥
ਆਪੇ ਚੋਜ ਕਰੇ ਰੰਗ ਮਹਲੀ ਹੋਰ ਮਾਇਆ ਮੋਹ ਪਸਾਰਾ ਹੇ ॥੪॥
ਗਰਭ ਕੁੰਡਲ ਮਹਿ ਉਰਧ ਧਿਆਨੀ ॥
ਆਪੇ ਜਾਣੈ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ॥
ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ਸਚੁ ਨਾਮੁ ਸਮਾਲੇ ਅੰਤਰਿ ਉਦਰ ਮਝਾਰਾ ਹੇ ॥੫॥
मारू महला १ ॥
केते जुग वरते गुबारै ॥
ताड़ी लाई अपर अपारै ॥
धुंधूकारि निरालमु बैठा ना तदि धंधु पसारा हे ॥१॥
जुग छतीह तिनै वरताए ॥
जिउ तिसु भाणा तिवै चलाए ॥
तिसहि सरीकु न दीसै कोई आपे अपर अपारा हे ॥२॥
गुपते बूझहु जुग चतुआरे ॥
घटि घटि वरतै उदर मझारे ॥
जुगु जुगु एका एकी वरतै कोई बूझै गुर वीचारा हे ॥३॥
बिंदु रकतु मिलि पिंडु सरीआ ॥
पउणु पाणी अगनी मिलि जीआ ॥
आपे चोज करे रंग महली होर माइआ मोह पसारा हे ॥४॥
गरभ कुंडल महि उरध धिआनी ॥
आपे जाणै अंतरजामी ॥
सासि सासि सचु नामु समाले अंतरि उदर मझारा हे ॥५॥
केते जुग वरते गुबारै ॥
ताड़ी लाई अपर अपारै ॥
धुंधूकारि निरालमु बैठा ना तदि धंधु पसारा हे ॥१॥
जुग छतीह तिनै वरताए ॥
जिउ तिसु भाणा तिवै चलाए ॥
तिसहि सरीकु न दीसै कोई आपे अपर अपारा हे ॥२॥
गुपते बूझहु जुग चतुआरे ॥
घटि घटि वरतै उदर मझारे ॥
जुगु जुगु एका एकी वरतै कोई बूझै गुर वीचारा हे ॥३॥
बिंदु रकतु मिलि पिंडु सरीआ ॥
पउणु पाणी अगनी मिलि जीआ ॥
आपे चोज करे रंग महली होर माइआ मोह पसारा हे ॥४॥
गरभ कुंडल महि उरध धिआनी ॥
आपे जाणै अंतरजामी ॥
सासि सासि सचु नामु समाले अंतरि उदर मझारा हे ॥५॥
हिन्दी अर्थ: मारू महला १॥ अनेकों ही युग घोर अंधकार में गुजर गए। (भाव। सृष्टि-रचना से पहले बेअंत समय ऐसी हालत थी जिसके बाबत कुछ भी समझ नहीं आ सकती)। तब अपर-अपार परमात्मा ने (अपने आप में) समाधि लगाई हुई थी। उस घुप अंधेरे में प्रभू स्वयं निर्लिप बैठा हुआ था। तब ना जगत का पसारा था और ना ही माया वाली दौड़-भाग थी। 1। (घोर अंधकार के) छक्तिस युग उस परमात्मा ने ही बरताए रखे। जैसे उसे अच्छा लगा उसी तरह (उस घुप अंधेरे वाली कार ही) चलाता रहा। वह परमात्मा स्वयं ही स्वयं है। उससे परे और कोई हस्ती नहीं। उसका परला छोर नहीं पाया जा सकता। कोई भी उसके बराबर का नहीं दिखता। 2। (अब जब उसने जगत-रचना रच ली है। तो भी। हे भाई ! उसी को) चारों जुगों (जगत के अंदर) गुप्त व्यापक जानो। वह हरेक शरीर के अंदर हरेक के हृदय में मौजूद है। वह अकेला स्वयं ही हरेक युग में (सारी सृष्टि के अंदर) रम रहा है- इस भेद को कोई वह विरला व्यक्ति समझता है जो गुरू (की बाणी) की विचार करता है। 3। (उस परमात्मा के हुकम में ही) पिता के वीर्य की बूँद और माता के पेट के लहू ने मिल के (मनुष्य का) शरीर बना दिया। हवा-पानी-आग (आदि तत्वों ने मिल के) जीव रच दिए। हरेक शरीर में बैठा परमात्मा स्वयं ही सब चोज-तमाशे कर रहा है। उसने स्वयं ही माया के मोह का खिलारा पसारा हुआ है। 4। (उस प्रभू के हुकम अनुसार ही) जीव माँ के पेट में अल्टा (लटक के) प्रभू-चरणों में सुरति जोड़े रखता है। प्रभू अंतरजामी स्वयं ही (जीव के दिल की) जानता है। जीव माँ के पेट के अंदर हर सांस में सदा-स्थिर परमात्मा का नाम चेते करता रहता है। 5।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 1026 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।
गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।
Chittaranjan Park के Bengali-दुर्गा-puja के बीच पंडाल में किसी quiet pause में।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 46 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1026” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 1027 →, पीछे का: ← अंग 1025।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।