अंग
1090
राग मारू
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਪਉੜੀ ॥
ਦੋਵੈ ਤਰਫਾ ਉਪਾਈਓਨੁ ਵਿਚਿ ਸਕਤਿ ਸਿਵ ਵਾਸਾ ॥
ਸਕਤੀ ਕਿਨੈ ਨ ਪਾਇਓ ਫਿਰਿ ਜਨਮਿ ਬਿਨਾਸਾ ॥
ਗੁਰਿ ਸੇਵਿਐ ਸਾਤਿ ਪਾਈਐ ਜਪਿ ਸਾਸ ਗਿਰਾਸਾ ॥
ਸਿਮ੍ਰਿਤਿ ਸਾਸਤ ਸੋਧਿ ਦੇਖੁ ਊਤਮ ਹਰਿ ਦਾਸਾ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮ ਬਿਨਾ ਕੋ ਥਿਰੁ ਨਹੀ ਨਾਮੇ ਬਲਿ ਜਾਸਾ ॥੧੦॥
ਦੋਵੈ ਤਰਫਾ ਉਪਾਈਓਨੁ ਵਿਚਿ ਸਕਤਿ ਸਿਵ ਵਾਸਾ ॥
ਸਕਤੀ ਕਿਨੈ ਨ ਪਾਇਓ ਫਿਰਿ ਜਨਮਿ ਬਿਨਾਸਾ ॥
ਗੁਰਿ ਸੇਵਿਐ ਸਾਤਿ ਪਾਈਐ ਜਪਿ ਸਾਸ ਗਿਰਾਸਾ ॥
ਸਿਮ੍ਰਿਤਿ ਸਾਸਤ ਸੋਧਿ ਦੇਖੁ ਊਤਮ ਹਰਿ ਦਾਸਾ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮ ਬਿਨਾ ਕੋ ਥਿਰੁ ਨਹੀ ਨਾਮੇ ਬਲਿ ਜਾਸਾ ॥੧੦॥
पउड़ी ॥
दोवै तरफा उपाईओनु विचि सकति सिव वासा ॥
सकती किनै न पाइओ फिरि जनमि बिनासा ॥
गुरि सेविऐ साति पाईऐ जपि सास गिरासा ॥
सिम्रिति सासत सोधि देखु ऊतम हरि दासा ॥
नानक नाम बिना को थिरु नही नामे बलि जासा ॥१०॥
दोवै तरफा उपाईओनु विचि सकति सिव वासा ॥
सकती किनै न पाइओ फिरि जनमि बिनासा ॥
गुरि सेविऐ साति पाईऐ जपि सास गिरासा ॥
सिम्रिति सासत सोधि देखु ऊतम हरि दासा ॥
नानक नाम बिना को थिरु नही नामे बलि जासा ॥१०॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ इस सृष्टि में माया और आत्मा (दानों का) वास है (इनके असर तले कोई अहंकार में दूसरों से लड़ते हैं और कोई नाम के धनी हैं) ये दोनों पक्ष प्रभू ने खुद बनाए हैं। माया के असर में रह के किसी ने (रॅब) नहीं पाया। बार-बार पैदा होता मरता है। पर गुरू के हुकम में चलने से खाते-पीते नाम-जप के (हृदय में) ठंढ पड़ती है। (हे भाई !) स्मृतियाँ और शास्त्र (आदि सारे धार्मिक-पुस्तकों को बेशक) खोज के देख लो। अच्छे मनुष्य वे हैं जो प्रभू के सेवक हैं। हे नानक ! ‘नाम’ के बिना कोई वस्तु स्थिर रहने वाली नहीं; मैं सदके हूँ प्रभू के नाम से। 10।
ਸਲੋਕੁ ਮਃ ੩ ॥
ਹੋਵਾ ਪੰਡਿਤੁ ਜੋਤਕੀ ਵੇਦ ਪੜਾ ਮੁਖਿ ਚਾਰਿ ॥
ਨਵ ਖੰਡ ਮਧੇ ਪੂਜੀਆ ਅਪਣੈ ਚਜਿ ਵੀਚਾਰਿ ॥
ਮਤੁ ਸਚਾ ਅਖਰੁ ਭੁਲਿ ਜਾਇ ਚਉਕੈ ਭਿਟੈ ਨ ਕੋਇ ॥
ਝੂਠੇ ਚਉਕੇ ਨਾਨਕਾ ਸਚਾ ਏਕੋ ਸੋਇ ॥੧॥
ਹੋਵਾ ਪੰਡਿਤੁ ਜੋਤਕੀ ਵੇਦ ਪੜਾ ਮੁਖਿ ਚਾਰਿ ॥
ਨਵ ਖੰਡ ਮਧੇ ਪੂਜੀਆ ਅਪਣੈ ਚਜਿ ਵੀਚਾਰਿ ॥
ਮਤੁ ਸਚਾ ਅਖਰੁ ਭੁਲਿ ਜਾਇ ਚਉਕੈ ਭਿਟੈ ਨ ਕੋਇ ॥
ਝੂਠੇ ਚਉਕੇ ਨਾਨਕਾ ਸਚਾ ਏਕੋ ਸੋਇ ॥੧॥
सलोकु मः ३ ॥
होवा पंडितु जोतकी वेद पड़ा मुखि चारि ॥
नव खंड मधे पूजीआ अपणै चजि वीचारि ॥
मतु सचा अखरु भुलि जाइ चउकै भिटै न कोइ ॥
झूठे चउके नानका सचा एको सोइ ॥१॥
होवा पंडितु जोतकी वेद पड़ा मुखि चारि ॥
नव खंड मधे पूजीआ अपणै चजि वीचारि ॥
मतु सचा अखरु भुलि जाइ चउकै भिटै न कोइ ॥
झूठे चउके नानका सचा एको सोइ ॥१॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला ३॥ हे भाई ! अगर मैं (धर्म-पुस्तकों का) विचारवान बन जाऊँ। ज्योतिषी बन जाऊँ। चारों वेद मुँह-ज़बानी पढ़ सकूँ; अगर अपने आचरण के कारण अपनी सद्-बुद्धि के कारण सारी ही धरती पर मेरी इज्जत हो; (अगर मैं बहुत स्वच्छता रखूँ कि) कहीं कोई (नीची जाति वाला मनुष्य मेरे) चौके को अपवित्र ना कर दे (तो यह सब कुछ व्यर्थ ही है)। हे नानक ! सारे चौके नाशवंत हैं। सदा कायम रहने वाला सिर्फ परमात्मा का नाम ही है (ध्यान इस बात का रखना चाहिए कि) कहीं सदा कायम रहने वाला हरी-नाम (मन से) भूल ना जाए। 1।
ਮਃ ੩ ॥
ਆਪਿ ਉਪਾਏ ਕਰੇ ਆਪਿ ਆਪੇ ਨਦਰਿ ਕਰੇਇ ॥
ਆਪੇ ਦੇ ਵਡਿਆਈਆ ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਸਚਾ ਸੋਇ ॥੨॥
ਆਪਿ ਉਪਾਏ ਕਰੇ ਆਪਿ ਆਪੇ ਨਦਰਿ ਕਰੇਇ ॥
ਆਪੇ ਦੇ ਵਡਿਆਈਆ ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਸਚਾ ਸੋਇ ॥੨॥
मः ३ ॥
आपि उपाए करे आपि आपे नदरि करेइ ॥
आपे दे वडिआईआ कहु नानक सचा सोइ ॥२॥
आपि उपाए करे आपि आपे नदरि करेइ ॥
आपे दे वडिआईआ कहु नानक सचा सोइ ॥२॥
हिन्दी अर्थ: महला ३॥ प्रभू स्वयं ही (जीवों को) पैदा करता है (सब कारज) स्वयं ही करता है। स्वयं ही (जीवों पर) मेहर की नजर करता है। स्वयं ही वडिआईयां देता है; कह। हे नानक ! वह सदा कायम रहने वाला प्रभू स्वयं ही (सब कुछ करने के समर्थ) है। 2।
ਪਉੜੀ ॥
ਕੰਟਕੁ ਕਾਲੁ ਏਕੁ ਹੈ ਹੋਰੁ ਕੰਟਕੁ ਨ ਸੂਝੈ ॥
ਅਫਰਿਓ ਜਗ ਮਹਿ ਵਰਤਦਾ ਪਾਪੀ ਸਿਉ ਲੂਝੈ ॥
ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਹਰਿ ਭੇਦੀਐ ਹਰਿ ਜਪਿ ਹਰਿ ਬੂਝੈ ॥
ਸੋ ਹਰਿ ਸਰਣਾਈ ਛੁਟੀਐ ਜੋ ਮਨ ਸਿਉ ਜੂਝੈ ॥
ਮਨਿ ਵੀਚਾਰਿ ਹਰਿ ਜਪੁ ਕਰੇ ਹਰਿ ਦਰਗਹ ਸੀਝੈ ॥੧੧॥
ਕੰਟਕੁ ਕਾਲੁ ਏਕੁ ਹੈ ਹੋਰੁ ਕੰਟਕੁ ਨ ਸੂਝੈ ॥
ਅਫਰਿਓ ਜਗ ਮਹਿ ਵਰਤਦਾ ਪਾਪੀ ਸਿਉ ਲੂਝੈ ॥
ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਹਰਿ ਭੇਦੀਐ ਹਰਿ ਜਪਿ ਹਰਿ ਬੂਝੈ ॥
ਸੋ ਹਰਿ ਸਰਣਾਈ ਛੁਟੀਐ ਜੋ ਮਨ ਸਿਉ ਜੂਝੈ ॥
ਮਨਿ ਵੀਚਾਰਿ ਹਰਿ ਜਪੁ ਕਰੇ ਹਰਿ ਦਰਗਹ ਸੀਝੈ ॥੧੧॥
पउड़ी ॥
कंटकु कालु एकु है होरु कंटकु न सूझै ॥
अफरिओ जग महि वरतदा पापी सिउ लूझै ॥
गुर सबदी हरि भेदीऐ हरि जपि हरि बूझै ॥
सो हरि सरणाई छुटीऐ जो मन सिउ जूझै ॥
मनि वीचारि हरि जपु करे हरि दरगह सीझै ॥११॥
कंटकु कालु एकु है होरु कंटकु न सूझै ॥
अफरिओ जग महि वरतदा पापी सिउ लूझै ॥
गुर सबदी हरि भेदीऐ हरि जपि हरि बूझै ॥
सो हरि सरणाई छुटीऐ जो मन सिउ जूझै ॥
मनि वीचारि हरि जपु करे हरि दरगह सीझै ॥११॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (मनुष्य के लिए) मौत (का डर ही) एक (ऐसा) काँटा है (जो हर वक्त दिल में चुभता है) कोई और काँटा (भाव। सहम) इस जैसा नहीं। (यह मौत) सारे जगत में बरत रही है कोई इसको रोक नहीं सकता। (मौत का सहम) विकारी बंदों को (विशेष तौर पर) अड़ाता है (भाव। दबा के रखता है)। जो मनुष्य सतिगुरू के शबद से प्रभू के नाम में परोया जाता है जो अपने मन के साथ टकराव बनाता है वह सिमरन करके (अस्लियत को) समझ लेता है और वह प्रभू की शरण पड़ कर (मौत के सहम से) बच जाता है। जो मनुष्य अपने मन में (प्रभू के गुणों की) विचार करके बँदगी करता है वह प्रभू की हजूरी में परवान होता है। 11।
ਸਲੋਕੁ ਮਃ ੧ ॥
ਹੁਕਮਿ ਰਜਾਈ ਸਾਖਤੀ ਦਰਗਹ ਸਚੁ ਕਬੂਲੁ ॥
ਸਾਹਿਬੁ ਲੇਖਾ ਮੰਗਸੀ ਦੁਨੀਆ ਦੇਖਿ ਨ ਭੂਲੁ ॥
ਦਿਲ ਦਰਵਾਨੀ ਜੋ ਕਰੇ ਦਰਵੇਸੀ ਦਿਲੁ ਰਾਸਿ ॥
ਇਸਕ ਮੁਹਬਤਿ ਨਾਨਕਾ ਲੇਖਾ ਕਰਤੇ ਪਾਸਿ ॥੧॥
ਹੁਕਮਿ ਰਜਾਈ ਸਾਖਤੀ ਦਰਗਹ ਸਚੁ ਕਬੂਲੁ ॥
ਸਾਹਿਬੁ ਲੇਖਾ ਮੰਗਸੀ ਦੁਨੀਆ ਦੇਖਿ ਨ ਭੂਲੁ ॥
ਦਿਲ ਦਰਵਾਨੀ ਜੋ ਕਰੇ ਦਰਵੇਸੀ ਦਿਲੁ ਰਾਸਿ ॥
ਇਸਕ ਮੁਹਬਤਿ ਨਾਨਕਾ ਲੇਖਾ ਕਰਤੇ ਪਾਸਿ ॥੧॥
सलोकु मः १ ॥
हुकमि रजाई साखती दरगह सचु कबूलु ॥
साहिबु लेखा मंगसी दुनीआ देखि न भूलु ॥
दिल दरवानी जो करे दरवेसी दिलु रासि ॥
इसक मुहबति नानका लेखा करते पासि ॥१॥
हुकमि रजाई साखती दरगह सचु कबूलु ॥
साहिबु लेखा मंगसी दुनीआ देखि न भूलु ॥
दिल दरवानी जो करे दरवेसी दिलु रासि ॥
इसक मुहबति नानका लेखा करते पासि ॥१॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला १॥ परमात्मा के हुकम में चलने से परमात्मा से बन जाती है। प्रभू की हजूरी में सच (भाव। सिमरन) परवान है। हे भाई ! दुनिया को देख के (सिमरन को भूलने की) गलती ना खा। मालिक (तेरे कर्मों का) लेखा माँगेगा। जो मनुष्य दिल की रक्षा करता है। दिल को सीधे राह पर रखने की फकीरी कमाता है। हे नानक ! उसके प्यार मुहब्बत का हिसाब करतार के पास है (भाव। प्रभू उसके प्यार को जानता है)। 1।
ਮਃ ੧ ॥
ਅਲਗਉ ਜੋਇ ਮਧੂਕੜਉ ਸਾਰੰਗਪਾਣਿ ਸਬਾਇ ॥
ਹੀਰੈ ਹੀਰਾ ਬੇਧਿਆ ਨਾਨਕ ਕੰਠਿ ਸੁਭਾਇ ॥੨॥
ਅਲਗਉ ਜੋਇ ਮਧੂਕੜਉ ਸਾਰੰਗਪਾਣਿ ਸਬਾਇ ॥
ਹੀਰੈ ਹੀਰਾ ਬੇਧਿਆ ਨਾਨਕ ਕੰਠਿ ਸੁਭਾਇ ॥੨॥
मः १ ॥
अलगउ जोइ मधूकड़उ सारंगपाणि सबाइ ॥
हीरै हीरा बेधिआ नानक कंठि सुभाइ ॥२॥
अलगउ जोइ मधूकड़उ सारंगपाणि सबाइ ॥
हीरै हीरा बेधिआ नानक कंठि सुभाइ ॥२॥
हिन्दी अर्थ: महला १॥ (जो जीव-) भौरा निर्लिप रह कर हर जगह परमात्मा को देखता है। जिसकी आत्मा परमात्मा में परोई हुई है। हे नानक ! वह प्रभू-प्रेम के द्वारा प्रभू के गले से (लगा हुआ) है। 2।
ਪਉੜੀ ॥
ਮਨਮੁਖ ਕਾਲੁ ਵਿਆਪਦਾ ਮੋਹਿ ਮਾਇਆ ਲਾਗੇ ॥
ਖਿਨ ਮਹਿ ਮਾਰਿ ਪਛਾੜਸੀ ਭਾਇ ਦੂਜੈ ਠਾਗੇ ॥
ਫਿਰਿ ਵੇਲਾ ਹਥਿ ਨ ਆਵਈ ਜਮ ਕਾ ਡੰਡੁ ਲਾਗੇ ॥
ਤਿਨ ਜਮ ਡੰਡੁ ਨ ਲਗਈ ਜੋ ਹਰਿ ਲਿਵ ਜਾਗੇ ॥
ਸਭ ਤੇਰੀ ਤੁਧੁ ਛਡਾਵਣੀ ਸਭ ਤੁਧੈ ਲਾਗੇ ॥੧੨॥
ਮਨਮੁਖ ਕਾਲੁ ਵਿਆਪਦਾ ਮੋਹਿ ਮਾਇਆ ਲਾਗੇ ॥
ਖਿਨ ਮਹਿ ਮਾਰਿ ਪਛਾੜਸੀ ਭਾਇ ਦੂਜੈ ਠਾਗੇ ॥
ਫਿਰਿ ਵੇਲਾ ਹਥਿ ਨ ਆਵਈ ਜਮ ਕਾ ਡੰਡੁ ਲਾਗੇ ॥
ਤਿਨ ਜਮ ਡੰਡੁ ਨ ਲਗਈ ਜੋ ਹਰਿ ਲਿਵ ਜਾਗੇ ॥
ਸਭ ਤੇਰੀ ਤੁਧੁ ਛਡਾਵਣੀ ਸਭ ਤੁਧੈ ਲਾਗੇ ॥੧੨॥
पउड़ी ॥
मनमुख कालु विआपदा मोहि माइआ लागे ॥
खिन महि मारि पछाड़सी भाइ दूजै ठागे ॥
फिरि वेला हथि न आवई जम का डंडु लागे ॥
तिन जम डंडु न लगई जो हरि लिव जागे ॥
सभ तेरी तुधु छडावणी सभ तुधै लागे ॥१२॥
मनमुख कालु विआपदा मोहि माइआ लागे ॥
खिन महि मारि पछाड़सी भाइ दूजै ठागे ॥
फिरि वेला हथि न आवई जम का डंडु लागे ॥
तिन जम डंडु न लगई जो हरि लिव जागे ॥
सभ तेरी तुधु छडावणी सभ तुधै लागे ॥१२॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ मन के गुलाम मनुष्य माया के मोह में मस्त रहते हैं। उनको मौत (का सहम) दबाए रखता है। जो मनुष्य माया के मोह में लूटे जा रहे हैं उनको (ये सहम) पल में मार के नाश करता है। जिस वक्त मौत का डंडा आही बजता है (मौत सिर पर आ जाती है) तब (इस मोह में से निकलने के लिए) समय नहीं मिलता। जो मनुष्य परमात्मा की याद में सचेत रहते हैं उनको जम का डंडा नहीं लगता (सहम नहीं मारता)। हे प्रभू ! सारी सृष्टि तेरी ही है। तूने इसे माया के मोह से छुड़वाना है। सभी का तू ही आसरा है। 12।
ਸਲੋਕੁ ਮਃ ੧ ॥
ਸਰਬੇ ਜੋਇ ਅਗਛਮੀ ਦੂਖੁ ਘਨੇਰੋ ਆਥਿ ॥
ਕਾਲਰੁ ਲਾਦਸਿ ਸਰੁ ਲਾਘਣਉ ਲਾਭੁ ਨ ਪੂੰਜੀ ਸਾਥਿ ॥੧॥
ਸਰਬੇ ਜੋਇ ਅਗਛਮੀ ਦੂਖੁ ਘਨੇਰੋ ਆਥਿ ॥
ਕਾਲਰੁ ਲਾਦਸਿ ਸਰੁ ਲਾਘਣਉ ਲਾਭੁ ਨ ਪੂੰਜੀ ਸਾਥਿ ॥੧॥
सलोकु मः १ ॥
सरबे जोइ अगछमी दूखु घनेरो आथि ॥
कालरु लादसि सरु लाघणउ लाभु न पूंजी साथि ॥१॥
सरबे जोइ अगछमी दूखु घनेरो आथि ॥
कालरु लादसि सरु लाघणउ लाभु न पूंजी साथि ॥१॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला १॥ (जो मनुष्य) सारी सृष्टि को ना नाश होने वाली देखता है उसे बड़ा दुख (व्यापता है)। वह (मानो) कलॅर लाद रहा है (पर उसने) समुंद्र पार लांघना है। उसके पल्ले ना मूल है ना कमाई। 1।
ਮਃ ੧ ॥
ਪੂੰਜੀ ਸਾਚਉ ਨਾਮੁ ਤੂ ਅਖੁਟਉ ਦਰਬੁ ਅਪਾਰੁ ॥
ਨਾਨਕ ਵਖਰੁ ਨਿਰਮਲਉ ਧੰਨੁ ਸਾਹੁ ਵਾਪਾਰੁ ॥੨॥
ਪੂੰਜੀ ਸਾਚਉ ਨਾਮੁ ਤੂ ਅਖੁਟਉ ਦਰਬੁ ਅਪਾਰੁ ॥
ਨਾਨਕ ਵਖਰੁ ਨਿਰਮਲਉ ਧੰਨੁ ਸਾਹੁ ਵਾਪਾਰੁ ॥੨॥
मः १ ॥
पूंजी साचउ नामु तू अखुटउ दरबु अपारु ॥
नानक वखरु निरमलउ धंनु साहु वापारु ॥२॥
पूंजी साचउ नामु तू अखुटउ दरबु अपारु ॥
नानक वखरु निरमलउ धंनु साहु वापारु ॥२॥
हिन्दी अर्थ: महला १॥ (जिस मनुष्य के पास) प्रभू का नाम पूँजी है। जिस के पास (हे प्रभू !) तू ना समाप्त होने वाला और बेअंत धन है। जिसके पास ये पवित्र सौदा है। हे नानक ! वह शाह धन्य है और उसका किया हुआ व्यापार धन्य है। 2।
ਮਃ ੧ ॥
ਪੂਰਬ ਪ੍ਰੀਤਿ ਪਿਰਾਣਿ ਲੈ ਮੋਟਉ ਠਾਕੁਰੁ ਮਾਣਿ ॥
ਮਾਥੈ ਊਭੈ ਜਮੁ ਮਾਰਸੀ ਨਾਨਕ ਮੇਲਣੁ ਨਾਮਿ ॥੩॥
ਪੂਰਬ ਪ੍ਰੀਤਿ ਪਿਰਾਣਿ ਲੈ ਮੋਟਉ ਠਾਕੁਰੁ ਮਾਣਿ ॥
ਮਾਥੈ ਊਭੈ ਜਮੁ ਮਾਰਸੀ ਨਾਨਕ ਮੇਲਣੁ ਨਾਮਿ ॥੩॥
मः १ ॥
पूरब प्रीति पिराणि लै मोटउ ठाकुरु माणि ॥
माथै ऊभै जमु मारसी नानक मेलणु नामि ॥३॥
पूरब प्रीति पिराणि लै मोटउ ठाकुरु माणि ॥
माथै ऊभै जमु मारसी नानक मेलणु नामि ॥३॥
हिन्दी अर्थ: महला १॥ ( हे जीव !) प्रभू के साथ प्राथमिक मूल प्रीति को पहचान। उस बड़े मालिक को याद कर। हे नानक ! प्रभू के नाम में जुड़ना जम को (भाव। मौत के सहम को) मुँह-भार मारता है। 3।
ਪਉੜੀ ॥
ਆਪੇ ਪਿੰਡੁ ਸਵਾਰਿਓਨੁ ਵਿਚਿ ਨਵ ਨਿਧਿ ਨਾਮੁ ॥
ਇਕਿ ਆਪੇ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਇਅਨੁ ਤਿਨ ਨਿਹਫਲ ਕਾਮੁ ॥
ਇਕਨੀ ਗੁਰਮੁਖਿ ਬੁਝਿਆ ਹਰਿ ਆਤਮ ਰਾਮੁ ॥
ਇਕਨੀ ਸੁਣਿ ਕੈ ਮੰਨਿਆ ਹਰਿ ਊਤਮ ਕਾਮੁ ॥
ਅੰਤਰਿ ਹਰਿ ਰੰਗੁ ਉਪਜਿਆ ਗਾਇਆ ਹਰਿ ਗੁਣ ਨਾਮੁ ॥੧੩॥
ਆਪੇ ਪਿੰਡੁ ਸਵਾਰਿਓਨੁ ਵਿਚਿ ਨਵ ਨਿਧਿ ਨਾਮੁ ॥
ਇਕਿ ਆਪੇ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਇਅਨੁ ਤਿਨ ਨਿਹਫਲ ਕਾਮੁ ॥
ਇਕਨੀ ਗੁਰਮੁਖਿ ਬੁਝਿਆ ਹਰਿ ਆਤਮ ਰਾਮੁ ॥
ਇਕਨੀ ਸੁਣਿ ਕੈ ਮੰਨਿਆ ਹਰਿ ਊਤਮ ਕਾਮੁ ॥
ਅੰਤਰਿ ਹਰਿ ਰੰਗੁ ਉਪਜਿਆ ਗਾਇਆ ਹਰਿ ਗੁਣ ਨਾਮੁ ॥੧੩॥
पउड़ी ॥
आपे पिंडु सवारिओनु विचि नव निधि नामु ॥
इकि आपे भरमि भुलाइअनु तिन निहफल कामु ॥
इकनी गुरमुखि बुझिआ हरि आतम रामु ॥
इकनी सुणि कै मंनिआ हरि ऊतम कामु ॥
अंतरि हरि रंगु उपजिआ गाइआ हरि गुण नामु ॥१३॥
आपे पिंडु सवारिओनु विचि नव निधि नामु ॥
इकि आपे भरमि भुलाइअनु तिन निहफल कामु ॥
इकनी गुरमुखि बुझिआ हरि आतम रामु ॥
इकनी सुणि कै मंनिआ हरि ऊतम कामु ॥
अंतरि हरि रंगु उपजिआ गाइआ हरि गुण नामु ॥१३॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ परमात्मा ने स्वयं ही इस मनुष्य शरीर को सँवारा है और स्वयं ही इसमें अपना नाम (मानो) नौ-खजानों के रूप में डाल दिए हैं (नौ-निधि-नाम डाल रखा है)। पर। कई जीव उसने स्वयं ही भटकना में डाल के गलत रास्ते पर डाले हुए हैं। उनका (सारा) उद्यम असफल जाता है। कई जीवों ने गुरू के सन्मुख हो के (सब जगह) परमात्मा की ज्योति (व्यापक) समझी है। कई जीवों ने ‘नाम’ सुन के मान लिया है (भाव। ‘नाम’ में मन लगा लिया है) उनका ये उद्यम बढ़िया है। जो मनुष्य प्रभू के गुण गाते हैं। ‘नाम’ सिमरते हैं उनके मन में प्रभू का प्यार पैदा होता है। 13।
ਸਲੋਕੁ ਮਃ ੧ ॥
सलोकु मः १ ॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला १॥
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 1090 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।
गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।
IIT-JEE result का दिन, परिवार phones के पास बैठा।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 50 पंक्तियों का है, 12 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1090” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 1091 →, पीछे का: ← अंग 1089।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।