अंग
1088
राग मारू
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਆਪਿ ਕਰਾਏ ਕਰੇ ਆਪਿ ਆਪੇ ਹਰਿ ਰਖਾ ॥੩॥
आपि कराए करे आपि आपे हरि रखा ॥३॥
हिन्दी अर्थ: यह (उद्यम) प्रभू स्वयं ही (जीवों से) करवाता है (जीव में बैठ के। जैसे) खुद ही करता है। खुद ही जीव का रखवाला है। 3।
ਸਲੋਕੁ ਮਃ ੩ ॥
ਜਿਨਾ ਗੁਰੁ ਨਹੀ ਭੇਟਿਆ ਭੈ ਕੀ ਨਾਹੀ ਬਿੰਦ ॥
ਆਵਣੁ ਜਾਵਣੁ ਦੁਖੁ ਘਣਾ ਕਦੇ ਨ ਚੂਕੈ ਚਿੰਦ ॥
ਕਾਪੜ ਜਿਵੈ ਪਛੋੜੀਐ ਘੜੀ ਮੁਹਤ ਘੜੀਆਲੁ ॥
ਨਾਨਕ ਸਚੇ ਨਾਮ ਬਿਨੁ ਸਿਰਹੁ ਨ ਚੁਕੈ ਜੰਜਾਲੁ ॥੧॥
ਜਿਨਾ ਗੁਰੁ ਨਹੀ ਭੇਟਿਆ ਭੈ ਕੀ ਨਾਹੀ ਬਿੰਦ ॥
ਆਵਣੁ ਜਾਵਣੁ ਦੁਖੁ ਘਣਾ ਕਦੇ ਨ ਚੂਕੈ ਚਿੰਦ ॥
ਕਾਪੜ ਜਿਵੈ ਪਛੋੜੀਐ ਘੜੀ ਮੁਹਤ ਘੜੀਆਲੁ ॥
ਨਾਨਕ ਸਚੇ ਨਾਮ ਬਿਨੁ ਸਿਰਹੁ ਨ ਚੁਕੈ ਜੰਜਾਲੁ ॥੧॥
सलोकु मः ३ ॥
जिना गुरु नही भेटिआ भै की नाही बिंद ॥
आवणु जावणु दुखु घणा कदे न चूकै चिंद ॥
कापड़ जिवै पछोड़ीऐ घड़ी मुहत घड़ीआलु ॥
नानक सचे नाम बिनु सिरहु न चुकै जंजालु ॥१॥
जिना गुरु नही भेटिआ भै की नाही बिंद ॥
आवणु जावणु दुखु घणा कदे न चूकै चिंद ॥
कापड़ जिवै पछोड़ीऐ घड़ी मुहत घड़ीआलु ॥
नानक सचे नाम बिनु सिरहु न चुकै जंजालु ॥१॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला ३॥ जिनको गुरू नहीं मिला। जिनके अंदर ईश्वर का रक्ती मात्र भी डर नहीं। उन्हें पैदा होने-मरने (का) बहुत दुख लगा रहता है। उनकी चिंता कभी समाप्त नहीं होती। हे नानक ! जैसे (धोने के वक्त) कपड़ा (पटड़े पर) पटकाते हैं। जैसे घंटा बार-बार (चोटें खाता है) वैसे ही प्रभू के नाम से वंचित रह के उनके सिर से (भी) शंका समाप्त नहीं होता। 1।
ਮਃ ੩ ॥
ਤ੍ਰਿਭਵਣ ਢੂਢੀ ਸਜਣਾ ਹਉਮੈ ਬੁਰੀ ਜਗਤਿ ॥
ਨਾ ਝੁਰੁ ਹੀਅੜੇ ਸਚੁ ਚਉ ਨਾਨਕ ਸਚੋ ਸਚੁ ॥੨॥
ਤ੍ਰਿਭਵਣ ਢੂਢੀ ਸਜਣਾ ਹਉਮੈ ਬੁਰੀ ਜਗਤਿ ॥
ਨਾ ਝੁਰੁ ਹੀਅੜੇ ਸਚੁ ਚਉ ਨਾਨਕ ਸਚੋ ਸਚੁ ॥੨॥
मः ३ ॥
त्रिभवण ढूढी सजणा हउमै बुरी जगति ॥
ना झुरु हीअड़े सचु चउ नानक सचो सचु ॥२॥
त्रिभवण ढूढी सजणा हउमै बुरी जगति ॥
ना झुरु हीअड़े सचु चउ नानक सचो सचु ॥२॥
हिन्दी अर्थ: महला ३॥ हे सज्जन (प्रभू !) मैंने तीनों ही भवनों में तलाश के देखा है कि जगत में ‘अहंकार’ चंदरी (बला चिपकी हुई) है। (पर) हे नानक के दिल ! (इस ‘अहंकार’ से घबरा के) चिंता ना कर। और प्रभू का नाम सिमर जो सदा ही स्थिर रहने वाला है। 2।
ਪਉੜੀ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਆਪੇ ਬਖਸਿਓਨੁ ਹਰਿ ਨਾਮਿ ਸਮਾਣੇ ॥
ਆਪੇ ਭਗਤੀ ਲਾਇਓਨੁ ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਨੀਸਾਣੇ ॥
ਸਨਮੁਖ ਸਦਾ ਸੋਹਣੇ ਸਚੈ ਦਰਿ ਜਾਣੇ ॥
ਐਥੈ ਓਥੈ ਮੁਕਤਿ ਹੈ ਜਿਨ ਰਾਮ ਪਛਾਣੇ ॥
ਧੰਨੁ ਧੰਨੁ ਸੇ ਜਨ ਜਿਨ ਹਰਿ ਸੇਵਿਆ ਤਿਨ ਹਉ ਕੁਰਬਾਣੇ ॥੪॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਆਪੇ ਬਖਸਿਓਨੁ ਹਰਿ ਨਾਮਿ ਸਮਾਣੇ ॥
ਆਪੇ ਭਗਤੀ ਲਾਇਓਨੁ ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਨੀਸਾਣੇ ॥
ਸਨਮੁਖ ਸਦਾ ਸੋਹਣੇ ਸਚੈ ਦਰਿ ਜਾਣੇ ॥
ਐਥੈ ਓਥੈ ਮੁਕਤਿ ਹੈ ਜਿਨ ਰਾਮ ਪਛਾਣੇ ॥
ਧੰਨੁ ਧੰਨੁ ਸੇ ਜਨ ਜਿਨ ਹਰਿ ਸੇਵਿਆ ਤਿਨ ਹਉ ਕੁਰਬਾਣੇ ॥੪॥
पउड़ी ॥
गुरमुखि आपे बखसिओनु हरि नामि समाणे ॥
आपे भगती लाइओनु गुर सबदि नीसाणे ॥
सनमुख सदा सोहणे सचै दरि जाणे ॥
ऐथै ओथै मुकति है जिन राम पछाणे ॥
धंनु धंनु से जन जिन हरि सेविआ तिन हउ कुरबाणे ॥४॥
गुरमुखि आपे बखसिओनु हरि नामि समाणे ॥
आपे भगती लाइओनु गुर सबदि नीसाणे ॥
सनमुख सदा सोहणे सचै दरि जाणे ॥
ऐथै ओथै मुकति है जिन राम पछाणे ॥
धंनु धंनु से जन जिन हरि सेविआ तिन हउ कुरबाणे ॥४॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ जो जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है उसको प्रभू खुद ही बख्शता है (भाव। माया के असर से बचाता है; )। वह मनुष्य प्रभू के नाम में जुड़ते हैं। सतिगुरू के शबद से (माया के असर से निखेड़ने वाला) निशान लगा के स्वयं ही उसने (गुरमुख को) भगती में लगाया है। जो मनुष्य भगती करते हैं उन्हें प्रभू के दर पर आँखें झुकानी नहीं पड़तीं। (क्योंकि भक्ति करने के कारण) उनके मुँह सुंदर लगते हैं। प्रभू के दर से आदर मिलता है। जिन्होंने परमात्मा के साथ गहरी सांझ डाली है वे लोक-परलोक में (माया के प्रभाव से) आजाद रहते हैं। भाग्यशाली हैं वह लोग जिन्होंने प्रभू की बंदगी की है। मैं उनसे सदके हूँ। 4।
ਸਲੋਕੁ ਮਃ ੧ ॥
ਮਹਲ ਕੁਚਜੀ ਮੜਵੜੀ ਕਾਲੀ ਮਨਹੁ ਕਸੁਧ ॥
ਜੇ ਗੁਣ ਹੋਵਨਿ ਤਾ ਪਿਰੁ ਰਵੈ ਨਾਨਕ ਅਵਗੁਣ ਮੁੰਧ ॥੧॥
ਮਹਲ ਕੁਚਜੀ ਮੜਵੜੀ ਕਾਲੀ ਮਨਹੁ ਕਸੁਧ ॥
ਜੇ ਗੁਣ ਹੋਵਨਿ ਤਾ ਪਿਰੁ ਰਵੈ ਨਾਨਕ ਅਵਗੁਣ ਮੁੰਧ ॥੧॥
सलोकु मः १ ॥
महल कुचजी मड़वड़ी काली मनहु कसुध ॥
जे गुण होवनि ता पिरु रवै नानक अवगुण मुंध ॥१॥
महल कुचजी मड़वड़ी काली मनहु कसुध ॥
जे गुण होवनि ता पिरु रवै नानक अवगुण मुंध ॥१॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला १॥ उस (जीव) स्त्री को कोई सलीका (चज) नहीं जो निरा अपने शरीर के साथ प्यार करती है। वह अंदर से काली है। मैली है। हे नानक ! (जीव-स्त्री) पति-प्रभू से तभी मिल सकती है अगर (उसके) अंदर गुण हों। (पर कुचॅजी) बेसलीके वाली स्त्री के पास हुए तो केवल अवगुण ही। 1।
ਮਃ ੧ ॥
ਸਾਚੁ ਸੀਲ ਸਚੁ ਸੰਜਮੀ ਸਾ ਪੂਰੀ ਪਰਵਾਰਿ ॥
ਨਾਨਕ ਅਹਿਨਿਸਿ ਸਦਾ ਭਲੀ ਪਿਰ ਕੈ ਹੇਤਿ ਪਿਆਰਿ ॥੨॥
ਸਾਚੁ ਸੀਲ ਸਚੁ ਸੰਜਮੀ ਸਾ ਪੂਰੀ ਪਰਵਾਰਿ ॥
ਨਾਨਕ ਅਹਿਨਿਸਿ ਸਦਾ ਭਲੀ ਪਿਰ ਕੈ ਹੇਤਿ ਪਿਆਰਿ ॥੨॥
मः १ ॥
साचु सील सचु संजमी सा पूरी परवारि ॥
नानक अहिनिसि सदा भली पिर कै हेति पिआरि ॥२॥
साचु सील सचु संजमी सा पूरी परवारि ॥
नानक अहिनिसि सदा भली पिर कै हेति पिआरि ॥२॥
हिन्दी अर्थ: महला १॥ हे नानक ! जो स्त्री पति के हित में रहती है वह दिन-रात हर वक्त अच्छी है। वही अच्छे आचरण वाली और जुगति वाली है। वह परिवार में जानी-मानी है। 2।
ਪਉੜੀ ॥
ਆਪਣਾ ਆਪੁ ਪਛਾਣਿਆ ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ਪਾਇਆ ॥
ਕਿਰਪਾ ਕਰਿ ਕੈ ਆਪਣੀ ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਮਿਲਾਇਆ ॥
ਗੁਰ ਕੀ ਬਾਣੀ ਨਿਰਮਲੀ ਹਰਿ ਰਸੁ ਪੀਆਇਆ ॥
ਹਰਿ ਰਸੁ ਜਿਨੀ ਚਾਖਿਆ ਅਨ ਰਸ ਠਾਕਿ ਰਹਾਇਆ ॥
ਹਰਿ ਰਸੁ ਪੀ ਸਦਾ ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਭਏ ਫਿਰਿ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਭੁਖ ਗਵਾਇਆ ॥੫॥
ਆਪਣਾ ਆਪੁ ਪਛਾਣਿਆ ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ਪਾਇਆ ॥
ਕਿਰਪਾ ਕਰਿ ਕੈ ਆਪਣੀ ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਮਿਲਾਇਆ ॥
ਗੁਰ ਕੀ ਬਾਣੀ ਨਿਰਮਲੀ ਹਰਿ ਰਸੁ ਪੀਆਇਆ ॥
ਹਰਿ ਰਸੁ ਜਿਨੀ ਚਾਖਿਆ ਅਨ ਰਸ ਠਾਕਿ ਰਹਾਇਆ ॥
ਹਰਿ ਰਸੁ ਪੀ ਸਦਾ ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਭਏ ਫਿਰਿ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਭੁਖ ਗਵਾਇਆ ॥੫॥
पउड़ी ॥
आपणा आपु पछाणिआ नामु निधानु पाइआ ॥
किरपा करि कै आपणी गुर सबदि मिलाइआ ॥
गुर की बाणी निरमली हरि रसु पीआइआ ॥
हरि रसु जिनी चाखिआ अन रस ठाकि रहाइआ ॥
हरि रसु पी सदा त्रिपति भए फिरि त्रिसना भुख गवाइआ ॥५॥
आपणा आपु पछाणिआ नामु निधानु पाइआ ॥
किरपा करि कै आपणी गुर सबदि मिलाइआ ॥
गुर की बाणी निरमली हरि रसु पीआइआ ॥
हरि रसु जिनी चाखिआ अन रस ठाकि रहाइआ ॥
हरि रसु पी सदा त्रिपति भए फिरि त्रिसना भुख गवाइआ ॥५॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ जिस मनुष्य ने अपने आत्मिक जीवन को (सदा) पड़ताला है उसको नाम-खजाना मिल जाता है। प्रभू अपनी मेहर करके उसको सतिगुरू के शबद में जोड़ता है। और। गुरू की पवित्र बाणी के माध्यम से उसको अपने नाम का रस पिलाता है। जिन्होंने नाम-रस चखा है वे और रसों से बचे रहते हैं (भाव। दुनिया के चस्कों को अपने नजदीक नहीं फटकने देते); नाम-रस पी के वे सदा तृप्त रहते हैं और माया की तृष्णा और भूख का नाश कर लेते हैं। 5।
ਸਲੋਕੁ ਮਃ ੩ ॥
ਪਿਰ ਖੁਸੀਏ ਧਨ ਰਾਵੀਏ ਧਨ ਉਰਿ ਨਾਮੁ ਸੀਗਾਰੁ ॥
ਨਾਨਕ ਧਨ ਆਗੈ ਖੜੀ ਸੋਭਾਵੰਤੀ ਨਾਰਿ ॥੧॥
ਪਿਰ ਖੁਸੀਏ ਧਨ ਰਾਵੀਏ ਧਨ ਉਰਿ ਨਾਮੁ ਸੀਗਾਰੁ ॥
ਨਾਨਕ ਧਨ ਆਗੈ ਖੜੀ ਸੋਭਾਵੰਤੀ ਨਾਰਿ ॥੧॥
सलोकु मः ३ ॥
पिर खुसीए धन रावीए धन उरि नामु सीगारु ॥
नानक धन आगै खड़ी सोभावंती नारि ॥१॥
पिर खुसीए धन रावीए धन उरि नामु सीगारु ॥
नानक धन आगै खड़ी सोभावंती नारि ॥१॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला ३॥ जिस जीव-स्त्री के हृदय में ‘नाम’-श्रृंगार है उसको प्रभू-पति खुशी के साथ अपने साथ मिलाता है। हे नानक ! जो जीव-स्त्री प्रभू-पति की हजूरी में खड़ी रहती है उसको शोभा मिलती है। 1।
ਮਃ ੧ ॥
ਸਸੁਰੈ ਪੇਈਐ ਕੰਤ ਕੀ ਕੰਤੁ ਅਗੰਮੁ ਅਥਾਹੁ ॥
ਨਾਨਕ ਧੰਨੁ ਸੋੁਹਾਗਣੀ ਜੋ ਭਾਵਹਿ ਵੇਪਰਵਾਹ ॥੨॥
ਸਸੁਰੈ ਪੇਈਐ ਕੰਤ ਕੀ ਕੰਤੁ ਅਗੰਮੁ ਅਥਾਹੁ ॥
ਨਾਨਕ ਧੰਨੁ ਸੋੁਹਾਗਣੀ ਜੋ ਭਾਵਹਿ ਵੇਪਰਵਾਹ ॥੨॥
मः १ ॥
ससुरै पेईऐ कंत की कंतु अगंमु अथाहु ॥
नानक धंनु सोुहागणी जो भावहि वेपरवाह ॥२॥
ससुरै पेईऐ कंत की कंतु अगंमु अथाहु ॥
नानक धंनु सोुहागणी जो भावहि वेपरवाह ॥२॥
हिन्दी अर्थ: महला १॥ प्रभू-पति अपहुँच है और बहुत गहरा है; जो जीव-सि्त्रयाँ ससुराल और पेके घर (दोनों जगहों पर। भाव लोक परलोक में उस) पति की हो के रहती हैं और (इस तरह) उस बेपरवाह को प्यारी लगती हैं वे भाग्यशाली हैं। 2।
ਪਉੜੀ ॥
ਤਖਤਿ ਰਾਜਾ ਸੋ ਬਹੈ ਜਿ ਤਖਤੈ ਲਾਇਕ ਹੋਈ ॥
ਜਿਨੀ ਸਚੁ ਪਛਾਣਿਆ ਸਚੁ ਰਾਜੇ ਸੇਈ ॥
ਏਹਿ ਭੂਪਤਿ ਰਾਜੇ ਨ ਆਖੀਅਹਿ ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਦੁਖੁ ਹੋਈ ॥
ਕੀਤਾ ਕਿਆ ਸਾਲਾਹੀਐ ਜਿਸੁ ਜਾਦੇ ਬਿਲਮ ਨ ਹੋਈ ॥
ਨਿਹਚਲੁ ਸਚਾ ਏਕੁ ਹੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਬੂਝੈ ਸੁ ਨਿਹਚਲੁ ਹੋਈ ॥੬॥
ਤਖਤਿ ਰਾਜਾ ਸੋ ਬਹੈ ਜਿ ਤਖਤੈ ਲਾਇਕ ਹੋਈ ॥
ਜਿਨੀ ਸਚੁ ਪਛਾਣਿਆ ਸਚੁ ਰਾਜੇ ਸੇਈ ॥
ਏਹਿ ਭੂਪਤਿ ਰਾਜੇ ਨ ਆਖੀਅਹਿ ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਦੁਖੁ ਹੋਈ ॥
ਕੀਤਾ ਕਿਆ ਸਾਲਾਹੀਐ ਜਿਸੁ ਜਾਦੇ ਬਿਲਮ ਨ ਹੋਈ ॥
ਨਿਹਚਲੁ ਸਚਾ ਏਕੁ ਹੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਬੂਝੈ ਸੁ ਨਿਹਚਲੁ ਹੋਈ ॥੬॥
पउड़ी ॥
तखति राजा सो बहै जि तखतै लाइक होई ॥
जिनी सचु पछाणिआ सचु राजे सेई ॥
एहि भूपति राजे न आखीअहि दूजै भाइ दुखु होई ॥
कीता किआ सालाहीऐ जिसु जादे बिलम न होई ॥
निहचलु सचा एकु है गुरमुखि बूझै सु निहचलु होई ॥६॥
तखति राजा सो बहै जि तखतै लाइक होई ॥
जिनी सचु पछाणिआ सचु राजे सेई ॥
एहि भूपति राजे न आखीअहि दूजै भाइ दुखु होई ॥
कीता किआ सालाहीऐ जिसु जादे बिलम न होई ॥
निहचलु सचा एकु है गुरमुखि बूझै सु निहचलु होई ॥६॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ जो मनुष्य तख्त के लायक होता है वही राजा बन के तख्त पर बैठता है (भाव। जो माया की ‘तृष्णा भूख’ गवा के बेपरवाह हो जाता है वही आदर पाता है); सो। जिन्होंने प्रभू के साथ गहरी सांझ डाल ली है वही असल राजे हैं। धरती के मालिक बने हुए ये लोग राजे नहीं कहे जा सकते। इनको (एक तो) माया के मोह के कारण सदा दुख मिलता है। (दूसरे) उसे क्या सलाहना जो पैदा किया हुआ है और जिसके नाश होते देर नहीं लगती। अॅटल राज वाला एक प्रभू ही है। जो गुरू के सन्मुख हो के ये बात समझ लेता है। वह भी (‘तृष्णा भूख से) अडोल हो जाता है। 6।
ਸਲੋਕੁ ਮਃ ੩ ॥
ਸਭਨਾ ਕਾ ਪਿਰੁ ਏਕੁ ਹੈ ਪਿਰ ਬਿਨੁ ਖਾਲੀ ਨਾਹਿ ॥
ਨਾਨਕ ਸੇ ਸੋਹਾਗਣੀ ਜਿ ਸਤਿਗੁਰ ਮਾਹਿ ਸਮਾਹਿ ॥੧॥
ਸਭਨਾ ਕਾ ਪਿਰੁ ਏਕੁ ਹੈ ਪਿਰ ਬਿਨੁ ਖਾਲੀ ਨਾਹਿ ॥
ਨਾਨਕ ਸੇ ਸੋਹਾਗਣੀ ਜਿ ਸਤਿਗੁਰ ਮਾਹਿ ਸਮਾਹਿ ॥੧॥
सलोकु मः ३ ॥
सभना का पिरु एकु है पिर बिनु खाली नाहि ॥
नानक से सोहागणी जि सतिगुर माहि समाहि ॥१॥
सभना का पिरु एकु है पिर बिनु खाली नाहि ॥
नानक से सोहागणी जि सतिगुर माहि समाहि ॥१॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला ३॥ सब जीव-सि्त्रयों का पति एक प्रभू है। कोई ऐसी नहीं जिस पर पति ना हो। पर। हे नानक ! सोहाग-भाग्य वाली वे हैं जो सतिगुरू में लीन हैं। 1।
ਮਃ ੩ ॥
ਮਨ ਕੇ ਅਧਿਕ ਤਰੰਗ ਕਿਉ ਦਰਿ ਸਾਹਿਬ ਛੁਟੀਐ ॥
ਜੇ ਰਾਚੈ ਸਚ ਰੰਗਿ ਗੂੜੈ ਰੰਗਿ ਅਪਾਰ ਕੈ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਛੁਟੀਐ ਜੇ ਚਿਤੁ ਲਗੈ ਸਚਿ ॥੨॥
ਮਨ ਕੇ ਅਧਿਕ ਤਰੰਗ ਕਿਉ ਦਰਿ ਸਾਹਿਬ ਛੁਟੀਐ ॥
ਜੇ ਰਾਚੈ ਸਚ ਰੰਗਿ ਗੂੜੈ ਰੰਗਿ ਅਪਾਰ ਕੈ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਛੁਟੀਐ ਜੇ ਚਿਤੁ ਲਗੈ ਸਚਿ ॥੨॥
मः ३ ॥
मन के अधिक तरंग किउ दरि साहिब छुटीऐ ॥
जे राचै सच रंगि गूड़ै रंगि अपार कै ॥
नानक गुर परसादी छुटीऐ जे चितु लगै सचि ॥२॥
मन के अधिक तरंग किउ दरि साहिब छुटीऐ ॥
जे राचै सच रंगि गूड़ै रंगि अपार कै ॥
नानक गुर परसादी छुटीऐ जे चितु लगै सचि ॥२॥
हिन्दी अर्थ: महला ३॥ (जब तक) मन की कई लहरें हैं (भाव। तृष्णा की कई लहरें मन में उठ रही हैं। तब तक) मालिक की हजूरी में सुर्खरू नहीं हो सकते। अगर बेअंत प्रभू के गूढ़े प्यार में। सदा स्थिर रहने वाले रंग में मन मस्त रहे। अगर चिक्त सदा-स्थिर प्रभू में जुड़ा रहे। तो। हे नानक ! गुरू की मेहर से सुर्ख-रू हुआ जा सकता है। 2।
ਪਉੜੀ ॥
ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਅਮੋਲੁ ਹੈ ਕਿਉ ਕੀਮਤਿ ਕੀਜੈ ॥
ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਅਮੋਲੁ ਹੈ ਕਿਉ ਕੀਮਤਿ ਕੀਜੈ ॥
पउड़ी ॥
हरि का नामु अमोलु है किउ कीमति कीजै ॥
हरि का नामु अमोलु है किउ कीमति कीजै ॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (धरती के मालिक राजाओं के मुकाबले में) प्रभू का नाम एक ऐसी वस्तु है जिसका मूल्य नहीं पड़ सकता। जिसके बराबर के मूल्य की कोई वस्तु नहीं बताई जा सकती।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 1088 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।
दिल्ली का summer-shaadi, मंडप के बीच bride-groom, और परिवार की उम्मीदें।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 48 पंक्तियों का है, 13 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1088” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 1089 →, पीछे का: ← अंग 1087।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।