अंग
1036
राग मारू
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਵਰਨ ਭੇਖ ਨਹੀ ਬ੍ਰਹਮਣ ਖਤ੍ਰੀ ॥
ਦੇਉ ਨ ਦੇਹੁਰਾ ਗਊ ਗਾਇਤ੍ਰੀ ॥
ਹੋਮ ਜਗ ਨਹੀ ਤੀਰਥਿ ਨਾਵਣੁ ਨਾ ਕੋ ਪੂਜਾ ਲਾਇਦਾ ॥੧੦॥
ਨਾ ਕੋ ਮੁਲਾ ਨਾ ਕੋ ਕਾਜੀ ॥
ਨਾ ਕੋ ਸੇਖੁ ਮਸਾਇਕੁ ਹਾਜੀ ॥
ਰਈਅਤਿ ਰਾਉ ਨ ਹਉਮੈ ਦੁਨੀਆ ਨਾ ਕੋ ਕਹਣੁ ਕਹਾਇਦਾ ॥੧੧॥
ਭਾਉ ਨ ਭਗਤੀ ਨਾ ਸਿਵ ਸਕਤੀ ॥
ਸਾਜਨੁ ਮੀਤੁ ਬਿੰਦੁ ਨਹੀ ਰਕਤੀ ॥
ਆਪੇ ਸਾਹੁ ਆਪੇ ਵਣਜਾਰਾ ਸਾਚੇ ਏਹੋ ਭਾਇਦਾ ॥੧੨॥
ਬੇਦ ਕਤੇਬ ਨ ਸਿੰਮ੍ਰਿਤਿ ਸਾਸਤ ॥
ਪਾਠ ਪੁਰਾਣ ਉਦੈ ਨਹੀ ਆਸਤ ॥
ਕਹਤਾ ਬਕਤਾ ਆਪਿ ਅਗੋਚਰੁ ਆਪੇ ਅਲਖੁ ਲਖਾਇਦਾ ॥੧੩॥
ਜਾ ਤਿਸੁ ਭਾਣਾ ਤਾ ਜਗਤੁ ਉਪਾਇਆ ॥
ਬਾਝੁ ਕਲਾ ਆਡਾਣੁ ਰਹਾਇਆ ॥
ਬ੍ਰਹਮਾ ਬਿਸਨੁ ਮਹੇਸੁ ਉਪਾਏ ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਵਧਾਇਦਾ ॥੧੪॥
ਵਿਰਲੇ ਕਉ ਗੁਰਿ ਸਬਦੁ ਸੁਣਾਇਆ ॥
ਕਰਿ ਕਰਿ ਦੇਖੈ ਹੁਕਮੁ ਸਬਾਇਆ ॥
ਖੰਡ ਬ੍ਰਹਮੰਡ ਪਾਤਾਲ ਅਰੰਭੇ ਗੁਪਤਹੁ ਪਰਗਟੀ ਆਇਦਾ ॥੧੫॥
ਤਾ ਕਾ ਅੰਤੁ ਨ ਜਾਣੈ ਕੋਈ ॥
ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਤੇ ਸੋਝੀ ਹੋਈ ॥
ਨਾਨਕ ਸਾਚਿ ਰਤੇ ਬਿਸਮਾਦੀ ਬਿਸਮ ਭਏ ਗੁਣ ਗਾਇਦਾ ॥੧੬॥੩॥੧੫॥
ਦੇਉ ਨ ਦੇਹੁਰਾ ਗਊ ਗਾਇਤ੍ਰੀ ॥
ਹੋਮ ਜਗ ਨਹੀ ਤੀਰਥਿ ਨਾਵਣੁ ਨਾ ਕੋ ਪੂਜਾ ਲਾਇਦਾ ॥੧੦॥
ਨਾ ਕੋ ਮੁਲਾ ਨਾ ਕੋ ਕਾਜੀ ॥
ਨਾ ਕੋ ਸੇਖੁ ਮਸਾਇਕੁ ਹਾਜੀ ॥
ਰਈਅਤਿ ਰਾਉ ਨ ਹਉਮੈ ਦੁਨੀਆ ਨਾ ਕੋ ਕਹਣੁ ਕਹਾਇਦਾ ॥੧੧॥
ਭਾਉ ਨ ਭਗਤੀ ਨਾ ਸਿਵ ਸਕਤੀ ॥
ਸਾਜਨੁ ਮੀਤੁ ਬਿੰਦੁ ਨਹੀ ਰਕਤੀ ॥
ਆਪੇ ਸਾਹੁ ਆਪੇ ਵਣਜਾਰਾ ਸਾਚੇ ਏਹੋ ਭਾਇਦਾ ॥੧੨॥
ਬੇਦ ਕਤੇਬ ਨ ਸਿੰਮ੍ਰਿਤਿ ਸਾਸਤ ॥
ਪਾਠ ਪੁਰਾਣ ਉਦੈ ਨਹੀ ਆਸਤ ॥
ਕਹਤਾ ਬਕਤਾ ਆਪਿ ਅਗੋਚਰੁ ਆਪੇ ਅਲਖੁ ਲਖਾਇਦਾ ॥੧੩॥
ਜਾ ਤਿਸੁ ਭਾਣਾ ਤਾ ਜਗਤੁ ਉਪਾਇਆ ॥
ਬਾਝੁ ਕਲਾ ਆਡਾਣੁ ਰਹਾਇਆ ॥
ਬ੍ਰਹਮਾ ਬਿਸਨੁ ਮਹੇਸੁ ਉਪਾਏ ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਵਧਾਇਦਾ ॥੧੪॥
ਵਿਰਲੇ ਕਉ ਗੁਰਿ ਸਬਦੁ ਸੁਣਾਇਆ ॥
ਕਰਿ ਕਰਿ ਦੇਖੈ ਹੁਕਮੁ ਸਬਾਇਆ ॥
ਖੰਡ ਬ੍ਰਹਮੰਡ ਪਾਤਾਲ ਅਰੰਭੇ ਗੁਪਤਹੁ ਪਰਗਟੀ ਆਇਦਾ ॥੧੫॥
ਤਾ ਕਾ ਅੰਤੁ ਨ ਜਾਣੈ ਕੋਈ ॥
ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਤੇ ਸੋਝੀ ਹੋਈ ॥
ਨਾਨਕ ਸਾਚਿ ਰਤੇ ਬਿਸਮਾਦੀ ਬਿਸਮ ਭਏ ਗੁਣ ਗਾਇਦਾ ॥੧੬॥੩॥੧੫॥
वरन भेख नही ब्रहमण खत्री ॥
देउ न देहुरा गऊ गाइत्री ॥
होम जग नही तीरथि नावणु ना को पूजा लाइदा ॥१०॥
ना को मुला ना को काजी ॥
ना को सेखु मसाइकु हाजी ॥
रईअति राउ न हउमै दुनीआ ना को कहणु कहाइदा ॥११॥
भाउ न भगती ना सिव सकती ॥
साजनु मीतु बिंदु नही रकती ॥
आपे साहु आपे वणजारा साचे एहो भाइदा ॥१२॥
बेद कतेब न सिंम्रिति सासत ॥
पाठ पुराण उदै नही आसत ॥
कहता बकता आपि अगोचरु आपे अलखु लखाइदा ॥१३॥
जा तिसु भाणा ता जगतु उपाइआ ॥
बाझु कला आडाणु रहाइआ ॥
ब्रहमा बिसनु महेसु उपाए माइआ मोहु वधाइदा ॥१४॥
विरले कउ गुरि सबदु सुणाइआ ॥
करि करि देखै हुकमु सबाइआ ॥
खंड ब्रहमंड पाताल अरंभे गुपतहु परगटी आइदा ॥१५॥
ता का अंतु न जाणै कोई ॥
पूरे गुर ते सोझी होई ॥
नानक साचि रते बिसमादी बिसम भए गुण गाइदा ॥१६॥३॥१५॥
देउ न देहुरा गऊ गाइत्री ॥
होम जग नही तीरथि नावणु ना को पूजा लाइदा ॥१०॥
ना को मुला ना को काजी ॥
ना को सेखु मसाइकु हाजी ॥
रईअति राउ न हउमै दुनीआ ना को कहणु कहाइदा ॥११॥
भाउ न भगती ना सिव सकती ॥
साजनु मीतु बिंदु नही रकती ॥
आपे साहु आपे वणजारा साचे एहो भाइदा ॥१२॥
बेद कतेब न सिंम्रिति सासत ॥
पाठ पुराण उदै नही आसत ॥
कहता बकता आपि अगोचरु आपे अलखु लखाइदा ॥१३॥
जा तिसु भाणा ता जगतु उपाइआ ॥
बाझु कला आडाणु रहाइआ ॥
ब्रहमा बिसनु महेसु उपाए माइआ मोहु वधाइदा ॥१४॥
विरले कउ गुरि सबदु सुणाइआ ॥
करि करि देखै हुकमु सबाइआ ॥
खंड ब्रहमंड पाताल अरंभे गुपतहु परगटी आइदा ॥१५॥
ता का अंतु न जाणै कोई ॥
पूरे गुर ते सोझी होई ॥
नानक साचि रते बिसमादी बिसम भए गुण गाइदा ॥१६॥३॥१५॥
हिन्दी अर्थ: तब ना कोई ब्राहमण खत्री आदि वर्ण थे ना कहीं जोगी-जंगम आदि भेख थे। तब ना कोई देवता था ना ही देवताओं के मन्दिर थे। तब ना कोई गऊ थी ना कहीं गायत्री थी। ना कहीं हवन थे ना यज्ञ हो रहे थे। ना कहीं तीर्थों का स्नान था और ना कोई (देव-) पूजा कर रहा था। 10। तब ना कोई मौलवी था ना काज़ी था। ना कोई शेख था ना हाज़ी था। तब ना कहीं प्रजा थी ना कोई राजा था। ना कहीं दुनियावी अहंकार था। ना ही कोई इस तरह की बातें ही करने वाला था। 11। तब ना कहीं प्रेम था ना कहीं भक्ति थी। ना कहीं जड़ था ना चेतन्न था। ना कहीं कोई सज्जन था ना मित्र था। ना कहीं पिता का वीर्य था ना माता का रक्त ही था। तब परमात्मा स्वयं ही शाह था स्वयं ही शाहूकार (वणज करने वाला)। तब उस सदा-स्थिर प्रभू को यही कुछ अच्छा लगता था। 12। तब ना कहीं शास्त्र-स्मृतियाँ और वेद थे। ना कहीं कुरान अंजील आदि पश्चिमी पुस्तकें थीं। तब कहीं पुराणों का पाठ भी नहीं थे। तब ना कहीं सूरज का चढ़ना था ना डूबना था। तब ज्ञान-इन्द्रियों की पहुँच से परे रहने वाला परमात्मा खुद ही बोलने-चालने वाला था। खुद ही अदृश्य था। और खुद ही अपने आप को प्रकट करने वाला था। 13। जब उस परमात्मा को अच्छा लगा तब उसने जगत पैदा कर दिया। इस सारे जगत-पसारे को उसने (किसी दिखाई देते) सहारे के बिना ही (अपनी-अपनी जगह) टिका दिया। तब उसने ब्रहमा विष्णू और शिव भी पैदा कर दिए। (जगत में) माया का मोह भी बढ़ा दिया। 14। जिस किसी विरले व्यक्ति को गुरू ने उपदेश सुनाया (उसे ये समझ आ गई कि) परमात्मा जगत पैदा करके खुद ही संभाल कर रहा है। हर जगह उसका ही हुकम चल रहा है। उस परमात्मा ने स्वयं ही खंड-ब्रहमंड पाताल आदिक बनाए हैं और वह स्वयं ही गुप्त अवस्था से प्रकट हुआ है। 15। कोई भी जीव परमात्मा की ताकत का अंत नहीं जान सकता। पूरे गुरू के माध्यम से ये समझ आ जाती है हे नानक ! जो लोग उस सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा (के नाम-रंग) में रंगे जाते हैं वह (उसकी बेअंत ताकत और करिश्मे देख-देख के) हैरान ही हैरान होते हैं और उसके गुण गाते रहते हैं। 16। 3। 15।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਆਪੇ ਆਪੁ ਉਪਾਇ ਨਿਰਾਲਾ ॥
ਸਾਚਾ ਥਾਨੁ ਕੀਓ ਦਇਆਲਾ ॥
ਪਉਣ ਪਾਣੀ ਅਗਨੀ ਕਾ ਬੰਧਨੁ ਕਾਇਆ ਕੋਟੁ ਰਚਾਇਦਾ ॥੧॥
ਨਉ ਘਰ ਥਾਪੇ ਥਾਪਣਹਾਰੈ ॥
ਦਸਵੈ ਵਾਸਾ ਅਲਖ ਅਪਾਰੈ ॥
ਸਾਇਰ ਸਪਤ ਭਰੇ ਜਲਿ ਨਿਰਮਲਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਮੈਲੁ ਨ ਲਾਇਦਾ ॥੨॥
ਰਵਿ ਸਸਿ ਦੀਪਕ ਜੋਤਿ ਸਬਾਈ ॥
ਆਪੇ ਕਰਿ ਵੇਖੈ ਵਡਿਆਈ ॥
ਜੋਤਿ ਸਰੂਪ ਸਦਾ ਸੁਖਦਾਤਾ ਸਚੇ ਸੋਭਾ ਪਾਇਦਾ ॥੩॥
ਗੜ ਮਹਿ ਹਾਟ ਪਟਣ ਵਾਪਾਰਾ ॥
ਪੂਰੈ ਤੋਲਿ ਤੋਲੈ ਵਣਜਾਰਾ ॥
ਆਪੇ ਰਤਨੁ ਵਿਸਾਹੇ ਲੇਵੈ ਆਪੇ ਕੀਮਤਿ ਪਾਇਦਾ ॥੪॥
ਕੀਮਤਿ ਪਾਈ ਪਾਵਣਹਾਰੈ ॥
ਵੇਪਰਵਾਹ ਪੂਰੇ ਭੰਡਾਰੈ ॥
ਸਰਬ ਕਲਾ ਲੇ ਆਪੇ ਰਹਿਆ ਗੁਰਮੁਖਿ ਕਿਸੈ ਬੁਝਾਇਦਾ ॥੫॥
ਨਦਰਿ ਕਰੇ ਪੂਰਾ ਗੁਰੁ ਭੇਟੈ ॥
ਜਮ ਜੰਦਾਰੁ ਨ ਮਾਰੈ ਫੇਟੈ ॥
ਜਿਉ ਜਲ ਅੰਤਰਿ ਕਮਲੁ ਬਿਗਾਸੀ ਆਪੇ ਬਿਗਸਿ ਧਿਆਇਦਾ ॥੬॥
ਆਪੇ ਵਰਖੈ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਧਾਰਾ ॥ ਰਤਨ ਜਵੇਹਰ ਲਾਲ ਅਪਾਰਾ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਮਿਲੈ ਤ ਪੂਰਾ ਪਾਈਐ ਪ੍ਰੇਮ ਪਦਾਰਥੁ ਪਾਇਦਾ ॥੭॥
ਪ੍ਰੇਮ ਪਦਾਰਥੁ ਲਹੈ ਅਮੋਲੋ ॥
ਕਬ ਹੀ ਨ ਘਾਟਸਿ ਪੂਰਾ ਤੋਲੋ ॥
ਸਚੇ ਕਾ ਵਾਪਾਰੀ ਹੋਵੈ ਸਚੋ ਸਉਦਾ ਪਾਇਦਾ ॥੮॥
ਸਚਾ ਸਉਦਾ ਵਿਰਲਾ ਕੋ ਪਾਏ ॥
ਪੂਰਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਮਿਲੈ ਮਿਲਾਏ ॥
ਆਪੇ ਆਪੁ ਉਪਾਇ ਨਿਰਾਲਾ ॥
ਸਾਚਾ ਥਾਨੁ ਕੀਓ ਦਇਆਲਾ ॥
ਪਉਣ ਪਾਣੀ ਅਗਨੀ ਕਾ ਬੰਧਨੁ ਕਾਇਆ ਕੋਟੁ ਰਚਾਇਦਾ ॥੧॥
ਨਉ ਘਰ ਥਾਪੇ ਥਾਪਣਹਾਰੈ ॥
ਦਸਵੈ ਵਾਸਾ ਅਲਖ ਅਪਾਰੈ ॥
ਸਾਇਰ ਸਪਤ ਭਰੇ ਜਲਿ ਨਿਰਮਲਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਮੈਲੁ ਨ ਲਾਇਦਾ ॥੨॥
ਰਵਿ ਸਸਿ ਦੀਪਕ ਜੋਤਿ ਸਬਾਈ ॥
ਆਪੇ ਕਰਿ ਵੇਖੈ ਵਡਿਆਈ ॥
ਜੋਤਿ ਸਰੂਪ ਸਦਾ ਸੁਖਦਾਤਾ ਸਚੇ ਸੋਭਾ ਪਾਇਦਾ ॥੩॥
ਗੜ ਮਹਿ ਹਾਟ ਪਟਣ ਵਾਪਾਰਾ ॥
ਪੂਰੈ ਤੋਲਿ ਤੋਲੈ ਵਣਜਾਰਾ ॥
ਆਪੇ ਰਤਨੁ ਵਿਸਾਹੇ ਲੇਵੈ ਆਪੇ ਕੀਮਤਿ ਪਾਇਦਾ ॥੪॥
ਕੀਮਤਿ ਪਾਈ ਪਾਵਣਹਾਰੈ ॥
ਵੇਪਰਵਾਹ ਪੂਰੇ ਭੰਡਾਰੈ ॥
ਸਰਬ ਕਲਾ ਲੇ ਆਪੇ ਰਹਿਆ ਗੁਰਮੁਖਿ ਕਿਸੈ ਬੁਝਾਇਦਾ ॥੫॥
ਨਦਰਿ ਕਰੇ ਪੂਰਾ ਗੁਰੁ ਭੇਟੈ ॥
ਜਮ ਜੰਦਾਰੁ ਨ ਮਾਰੈ ਫੇਟੈ ॥
ਜਿਉ ਜਲ ਅੰਤਰਿ ਕਮਲੁ ਬਿਗਾਸੀ ਆਪੇ ਬਿਗਸਿ ਧਿਆਇਦਾ ॥੬॥
ਆਪੇ ਵਰਖੈ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਧਾਰਾ ॥ ਰਤਨ ਜਵੇਹਰ ਲਾਲ ਅਪਾਰਾ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਮਿਲੈ ਤ ਪੂਰਾ ਪਾਈਐ ਪ੍ਰੇਮ ਪਦਾਰਥੁ ਪਾਇਦਾ ॥੭॥
ਪ੍ਰੇਮ ਪਦਾਰਥੁ ਲਹੈ ਅਮੋਲੋ ॥
ਕਬ ਹੀ ਨ ਘਾਟਸਿ ਪੂਰਾ ਤੋਲੋ ॥
ਸਚੇ ਕਾ ਵਾਪਾਰੀ ਹੋਵੈ ਸਚੋ ਸਉਦਾ ਪਾਇਦਾ ॥੮॥
ਸਚਾ ਸਉਦਾ ਵਿਰਲਾ ਕੋ ਪਾਏ ॥
ਪੂਰਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਮਿਲੈ ਮਿਲਾਏ ॥
मारू महला १ ॥
आपे आपु उपाइ निराला ॥
साचा थानु कीओ दइआला ॥
पउण पाणी अगनी का बंधनु काइआ कोटु रचाइदा ॥१॥
नउ घर थापे थापणहारै ॥
दसवै वासा अलख अपारै ॥
साइर सपत भरे जलि निरमलि गुरमुखि मैलु न लाइदा ॥२॥
रवि ससि दीपक जोति सबाई ॥
आपे करि वेखै वडिआई ॥
जोति सरूप सदा सुखदाता सचे सोभा पाइदा ॥३॥
गड़ महि हाट पटण वापारा ॥
पूरै तोलि तोलै वणजारा ॥
आपे रतनु विसाहे लेवै आपे कीमति पाइदा ॥४॥
कीमति पाई पावणहारै ॥
वेपरवाह पूरे भंडारै ॥
सरब कला ले आपे रहिआ गुरमुखि किसै बुझाइदा ॥५॥
नदरि करे पूरा गुरु भेटै ॥
जम जंदारु न मारै फेटै ॥
जिउ जल अंतरि कमलु बिगासी आपे बिगसि धिआइदा ॥६॥
आपे वरखै अंम्रित धारा ॥ रतन जवेहर लाल अपारा ॥
सतिगुरु मिलै त पूरा पाईऐ प्रेम पदारथु पाइदा ॥७॥
प्रेम पदारथु लहै अमोलो ॥
कब ही न घाटसि पूरा तोलो ॥
सचे का वापारी होवै सचो सउदा पाइदा ॥८॥
सचा सउदा विरला को पाए ॥
पूरा सतिगुरु मिलै मिलाए ॥
आपे आपु उपाइ निराला ॥
साचा थानु कीओ दइआला ॥
पउण पाणी अगनी का बंधनु काइआ कोटु रचाइदा ॥१॥
नउ घर थापे थापणहारै ॥
दसवै वासा अलख अपारै ॥
साइर सपत भरे जलि निरमलि गुरमुखि मैलु न लाइदा ॥२॥
रवि ससि दीपक जोति सबाई ॥
आपे करि वेखै वडिआई ॥
जोति सरूप सदा सुखदाता सचे सोभा पाइदा ॥३॥
गड़ महि हाट पटण वापारा ॥
पूरै तोलि तोलै वणजारा ॥
आपे रतनु विसाहे लेवै आपे कीमति पाइदा ॥४॥
कीमति पाई पावणहारै ॥
वेपरवाह पूरे भंडारै ॥
सरब कला ले आपे रहिआ गुरमुखि किसै बुझाइदा ॥५॥
नदरि करे पूरा गुरु भेटै ॥
जम जंदारु न मारै फेटै ॥
जिउ जल अंतरि कमलु बिगासी आपे बिगसि धिआइदा ॥६॥
आपे वरखै अंम्रित धारा ॥ रतन जवेहर लाल अपारा ॥
सतिगुरु मिलै त पूरा पाईऐ प्रेम पदारथु पाइदा ॥७॥
प्रेम पदारथु लहै अमोलो ॥
कब ही न घाटसि पूरा तोलो ॥
सचे का वापारी होवै सचो सउदा पाइदा ॥८॥
सचा सउदा विरला को पाए ॥
पूरा सतिगुरु मिलै मिलाए ॥
हिन्दी अर्थ: मारू महला १॥ (परमात्मा) आप ही अपने आप को (जगत के रूप में) पैदा करके (माया के मोह से) निर्लिप (भी) रहता है। सदा स्थिर दयालु प्रभू इस शरीर को (अपने रहने के लिए) जगह बनाता है। हवा पानी आग (आदि तत्वों) का मेल करके वह परमात्मा शरीर-किला रचता है 1। बनाने की ताकत रखने वाले प्रभू ने इस शरीर के नौ घर (कर्म-इन्द्रिए) बनाए हैं। दसवें घर (दसम द्वार) में उस अदृश्य और बेअंत प्रभू की रिहायश है। (जीव माया के मोह में फस के अपने आप को मलीन कर लेते हैं। पर) जो मनुष्य गुरू के सन्मुख होता है उसकी पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ उसका मन और उसकी बुद्धि – यह सातों ही सरोवर प्रभू के नाम के पवित्र जल से भरे रहते हैं। इसलिए उसको माया की मैल नहीं लगती। 2। इन सूरज। चँद्रमा (आदि) दीयों में सारी सृष्टि में उसकी अपनी ही ज्योति (रौशनी कर रही) है। परमात्मा स्वयं ही सूरज चँद्रमा (जगत के) दीए बना के अपनी वडिआई (महानता) देखता है। वह प्रभू सदा प्रकाश ही प्रकाश है। वह सदा (जीवों को) सुख देने वाला है। जो जीव उसका रूप हो जाता है उसको प्रभू स्वयं शोभा देता है। 3। (प्रभू के रचे हुए इस शरीर-) किले में (ज्ञान-इन्द्रियाँ जैसे) शहर की हाट हैं जहाँ (प्रभू स्वयं ही) व्यापार कर रहा है। (प्रभू का नाम ही एक ऐसा तोल है जिसके द्वारा किए हुए वणज में कोई घाटा नहीं पड़ता। इस) पूरे तोल द्वारा प्रभू-वणजारा (शरीर-किले में बैठ के) स्वयं ही नाम-सौदा (वॅखर) तौलता है। आप ही नाम-रत्न का व्यापार करता है। आप ही नाम रतन का (ठीक) मूल्य डालता है। 4। कद्र समझने वाला प्रभू अपने नाम-रतन की कद्र पा रहा है। (जिसको ये समझ देता है वह) उस बेपरवाह परमात्मा के भरे खजाने में से नाम-रतन प्राप्त करता है। प्रभू किसी (विरले भाग्यशाली) को गुरू के माध्यम से ये समझ बख्शता है कि वह स्वयं ही अपनी सारी सक्ता (अपने अंदर) रख के सब जीवों में व्याप रहा है 5। जिस मनुष्य पर प्रभू मेहर की निगाह करता है उसको पूरा सतिगुरू मिल जाता है। ज़ालिम जम उस को कोई चोट नहीं पहुँचाता। जैसे पानी में कमल का फूल खिलता है (निर्लिप रहता है) वैसे प्रभू स्वयं ही उस मनुष्य के अंदर खिल के (अपने आप को) सिमरता है। 6। (जिस मनुष्य को गुरू मिलाता है उसके अंदर प्रभू) स्वयं ही नाम-अमृत की धाराओं की बरखा करता है। जिसमें प्रभू के बेअंत गुण-रूप रतन जवाहर और लाल होते हैं। गुरू मिल जाए तो पूरा प्रभू मिल जाता है। (जिस मनुष्य को गुरू के द्वारा पूरा परमात्मा मिलता है वह) प्रभू-प्रेम का अमूल्य सौदा प्राप्त कर लेता है। 7। (गुरू की शरण पड़ कर) जो मनुष्य प्रभू-प्रेम का कीमती सौदा हासिल कर लेता है। उसका ये सौदा कम नहीं होता। (जब कभी भी तौला जाए उसका) तोल पूरा ही निकलेगा (भाव। माया के भले ही कई कमले हों। उसके अंदर बसा हुआ प्रभू-चरणों के प्रति प्रेम डोलता नहीं)। जो मनुष्य सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा के नाम का व्यापार करने लग जाता है। वह इस सदा-स्थिर नाम का सौदा ही लादता है। 8। (पर जगत में) कोई विरला व्यक्ति सदा-स्थिर रहने वाला यह सौदा प्राप्त करता है। जिसको पूरा सतिगुरू मिल जाता है गुरू उसको यह सौदा दिला देता है।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 1036 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।
गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।
Lohri की रात अगियारी के पास, गाने और तिल-गुड़।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 47 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1036” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 1037 →, पीछे का: ← अंग 1035।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।