अंग
1082
राग मारू
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਆਪੇ ਸੂਰਾ ਅਮਰੁ ਚਲਾਇਆ ॥
ਆਪੇ ਸਿਵ ਵਰਤਾਈਅਨੁ ਅੰਤਰਿ ਆਪੇ ਸੀਤਲੁ ਠਾਰੁ ਗੜਾ ॥੧੩॥
ਜਿਸਹਿ ਨਿਵਾਜੇ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਾਜੇ ॥
ਨਾਮੁ ਵਸੈ ਤਿਸੁ ਅਨਹਦ ਵਾਜੇ ॥
ਤਿਸ ਹੀ ਸੁਖੁ ਤਿਸ ਹੀ ਠਕੁਰਾਈ ਤਿਸਹਿ ਨ ਆਵੈ ਜਮੁ ਨੇੜਾ ॥੧੪॥
ਕੀਮਤਿ ਕਾਗਦ ਕਹੀ ਨ ਜਾਈ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਬੇਅੰਤ ਗੁਸਾਈ ॥
ਆਦਿ ਮਧਿ ਅੰਤਿ ਪ੍ਰਭੁ ਸੋਈ ਹਾਥਿ ਤਿਸੈ ਕੈ ਨੇਬੇੜਾ ॥੧੫॥
ਤਿਸਹਿ ਸਰੀਕੁ ਨਾਹੀ ਰੇ ਕੋਈ ॥
ਕਿਸ ਹੀ ਬੁਤੈ ਜਬਾਬੁ ਨ ਹੋਈ ॥
ਨਾਨਕ ਕਾ ਪ੍ਰਭੁ ਆਪੇ ਆਪੇ ਕਰਿ ਕਰਿ ਵੇਖੈ ਚੋਜ ਖੜਾ ॥੧੬॥੧॥੧੦॥
ਆਪੇ ਸਿਵ ਵਰਤਾਈਅਨੁ ਅੰਤਰਿ ਆਪੇ ਸੀਤਲੁ ਠਾਰੁ ਗੜਾ ॥੧੩॥
ਜਿਸਹਿ ਨਿਵਾਜੇ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਾਜੇ ॥
ਨਾਮੁ ਵਸੈ ਤਿਸੁ ਅਨਹਦ ਵਾਜੇ ॥
ਤਿਸ ਹੀ ਸੁਖੁ ਤਿਸ ਹੀ ਠਕੁਰਾਈ ਤਿਸਹਿ ਨ ਆਵੈ ਜਮੁ ਨੇੜਾ ॥੧੪॥
ਕੀਮਤਿ ਕਾਗਦ ਕਹੀ ਨ ਜਾਈ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਬੇਅੰਤ ਗੁਸਾਈ ॥
ਆਦਿ ਮਧਿ ਅੰਤਿ ਪ੍ਰਭੁ ਸੋਈ ਹਾਥਿ ਤਿਸੈ ਕੈ ਨੇਬੇੜਾ ॥੧੫॥
ਤਿਸਹਿ ਸਰੀਕੁ ਨਾਹੀ ਰੇ ਕੋਈ ॥
ਕਿਸ ਹੀ ਬੁਤੈ ਜਬਾਬੁ ਨ ਹੋਈ ॥
ਨਾਨਕ ਕਾ ਪ੍ਰਭੁ ਆਪੇ ਆਪੇ ਕਰਿ ਕਰਿ ਵੇਖੈ ਚੋਜ ਖੜਾ ॥੧੬॥੧॥੧੦॥
आपे सूरा अमरु चलाइआ ॥
आपे सिव वरताईअनु अंतरि आपे सीतलु ठारु गड़ा ॥१३॥
जिसहि निवाजे गुरमुखि साजे ॥
नामु वसै तिसु अनहद वाजे ॥
तिस ही सुखु तिस ही ठकुराई तिसहि न आवै जमु नेड़ा ॥१४॥
कीमति कागद कही न जाई ॥
कहु नानक बेअंत गुसाई ॥
आदि मधि अंति प्रभु सोई हाथि तिसै कै नेबेड़ा ॥१५॥
तिसहि सरीकु नाही रे कोई ॥
किस ही बुतै जबाबु न होई ॥
नानक का प्रभु आपे आपे करि करि वेखै चोज खड़ा ॥१६॥१॥१०॥
आपे सिव वरताईअनु अंतरि आपे सीतलु ठारु गड़ा ॥१३॥
जिसहि निवाजे गुरमुखि साजे ॥
नामु वसै तिसु अनहद वाजे ॥
तिस ही सुखु तिस ही ठकुराई तिसहि न आवै जमु नेड़ा ॥१४॥
कीमति कागद कही न जाई ॥
कहु नानक बेअंत गुसाई ॥
आदि मधि अंति प्रभु सोई हाथि तिसै कै नेबेड़ा ॥१५॥
तिसहि सरीकु नाही रे कोई ॥
किस ही बुतै जबाबु न होई ॥
नानक का प्रभु आपे आपे करि करि वेखै चोज खड़ा ॥१६॥१॥१०॥
हिन्दी अर्थ: वह शूरवीर प्रभू स्वयं ही (सारे जगत में) हुकम चला रहा है। (सब जीवों के) अंदर उसने स्वयं ही सुख-शांति बरताई हुई है। (क्योंकि) वह स्वयं ओले (बर्फ के गोले) की तरह शीतल ठंढा-ठार है। 13। हे भाई ! जिस मनुष्य पर परमात्मा मेहर करता है। उसको गुरू की शरण में डाल के उसकी नई आत्मिक घाड़त घाड़ता है। उस (मनुष्य) के अंदर परमात्मा का नाम आ बसता है (मानो) उसके अंदर एक-रस बाजे (बज पड़ते हैं)। उसी मनुष्य को (सदा) आत्मिक आनंद प्राप्त रहता है। उसी को (परलोक में) आत्मिक अच्चता मिल जाती है। जमराज उसके नजदीक नहीं फटकता (मौत का डर। आत्मिक मौत उस पर असर नहीं डाल सकती)। 14। कागजों पर (लिख कर) उसका मूल्य नहीं डाला जा सकता। हे नानक ! कह- सृष्टि का मालिक-प्रभू बेअंत है। जगत के आरम्भ में। अब और अंत में भी वही कायम रहने वाला है। जीवों के कर्मों का फैसला उसी के हाथ में है। 15। हे भाई ! कोई भी जीव उस (परमात्मा) के बराबर का नहीं। उसके किसी भी काम में किसी तरफ से भी इन्कार नहीं किया जा सकता। नानक का प्रभू (हर जगह) स्वयं ही स्वयं है। वह स्वयं ही तमाशे कर-कर के खड़ा स्वयं ही देख रहा है। 16। 1। 10।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਅਚੁਤ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਪਰਮੇਸੁਰ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ॥
ਮਧੁਸੂਦਨ ਦਾਮੋਦਰ ਸੁਆਮੀ ॥
ਰਿਖੀਕੇਸ ਗੋਵਰਧਨ ਧਾਰੀ ਮੁਰਲੀ ਮਨੋਹਰ ਹਰਿ ਰੰਗਾ ॥੧॥
ਮੋਹਨ ਮਾਧਵ ਕ੍ਰਿਸ੍ਨ ਮੁਰਾਰੇ ॥
ਜਗਦੀਸੁਰ ਹਰਿ ਜੀਉ ਅਸੁਰ ਸੰਘਾਰੇ ॥
ਜਗਜੀਵਨ ਅਬਿਨਾਸੀ ਠਾਕੁਰ ਘਟ ਘਟ ਵਾਸੀ ਹੈ ਸੰਗਾ ॥੨॥
ਧਰਣੀਧਰ ਈਸ ਨਰਸਿੰਘ ਨਾਰਾਇਣ ॥
ਦਾੜਾ ਅਗ੍ਰੇ ਪ੍ਰਿਥਮਿ ਧਰਾਇਣ ॥
ਬਾਵਨ ਰੂਪੁ ਕੀਆ ਤੁਧੁ ਕਰਤੇ ਸਭ ਹੀ ਸੇਤੀ ਹੈ ਚੰਗਾ ॥੩॥
ਸ੍ਰੀ ਰਾਮਚੰਦ ਜਿਸੁ ਰੂਪੁ ਨ ਰੇਖਿਆ ॥
ਬਨਵਾਲੀ ਚਕ੍ਰਪਾਣਿ ਦਰਸਿ ਅਨੂਪਿਆ ॥
ਸਹਸ ਨੇਤ੍ਰ ਮੂਰਤਿ ਹੈ ਸਹਸਾ ਇਕੁ ਦਾਤਾ ਸਭ ਹੈ ਮੰਗਾ ॥੪॥
ਭਗਤਿ ਵਛਲੁ ਅਨਾਥਹ ਨਾਥੇ ॥
ਗੋਪੀ ਨਾਥੁ ਸਗਲ ਹੈ ਸਾਥੇ ॥
ਬਾਸੁਦੇਵ ਨਿਰੰਜਨ ਦਾਤੇ ਬਰਨਿ ਨ ਸਾਕਉ ਗੁਣ ਅੰਗਾ ॥੫॥
ਮੁਕੰਦ ਮਨੋਹਰ ਲਖਮੀ ਨਾਰਾਇਣ ॥
ਦ੍ਰੋਪਤੀ ਲਜਾ ਨਿਵਾਰਿ ਉਧਾਰਣ ॥
ਕਮਲਾਕੰਤ ਕਰਹਿ ਕੰਤੂਹਲ ਅਨਦ ਬਿਨੋਦੀ ਨਿਹਸੰਗਾ ॥੬॥
ਅਮੋਘ ਦਰਸਨ ਆਜੂਨੀ ਸੰਭਉ ॥
ਅਕਾਲ ਮੂਰਤਿ ਜਿਸੁ ਕਦੇ ਨਾਹੀ ਖਉ ॥
ਅਬਿਨਾਸੀ ਅਬਿਗਤ ਅਗੋਚਰ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਤੁਝ ਹੀ ਹੈ ਲਗਾ ॥੭॥
ਸ੍ਰੀਰੰਗ ਬੈਕੁੰਠ ਕੇ ਵਾਸੀ ॥
ਮਛੁ ਕਛੁ ਕੂਰਮੁ ਆਗਿਆ ਅਉਤਰਾਸੀ ॥
ਕੇਸਵ ਚਲਤ ਕਰਹਿ ਨਿਰਾਲੇ ਕੀਤਾ ਲੋੜਹਿ ਸੋ ਹੋਇਗਾ ॥੮॥
ਨਿਰਾਹਾਰੀ ਨਿਰਵੈਰੁ ਸਮਾਇਆ ॥
ਧਾਰਿ ਖੇਲੁ ਚਤੁਰਭੁਜੁ ਕਹਾਇਆ ॥
ਸਾਵਲ ਸੁੰਦਰ ਰੂਪ ਬਣਾਵਹਿ ਬੇਣੁ ਸੁਨਤ ਸਭ ਮੋਹੈਗਾ ॥੯॥
ਬਨਮਾਲਾ ਬਿਭੂਖਨ ਕਮਲ ਨੈਨ ॥
ਸੁੰਦਰ ਕੁੰਡਲ ਮੁਕਟ ਬੈਨ ॥
ਸੰਖ ਚਕ੍ਰ ਗਦਾ ਹੈ ਧਾਰੀ ਮਹਾ ਸਾਰਥੀ ਸਤਸੰਗਾ ॥੧੦॥
ਪੀਤ ਪੀਤੰਬਰ ਤ੍ਰਿਭਵਣ ਧਣੀ ॥
ਜਗੰਨਾਥੁ ਗੋਪਾਲੁ ਮੁਖਿ ਭਣੀ ॥
ਸਾਰਿੰਗਧਰ ਭਗਵਾਨ ਬੀਠੁਲਾ ਮੈ ਗਣਤ ਨ ਆਵੈ ਸਰਬੰਗਾ ॥੧੧॥
ਨਿਹਕੰਟਕੁ ਨਿਹਕੇਵਲੁ ਕਹੀਐ ॥
ਧਨੰਜੈ ਜਲਿ ਥਲਿ ਹੈ ਮਹੀਐ ॥
ਅਚੁਤ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਪਰਮੇਸੁਰ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ॥
ਮਧੁਸੂਦਨ ਦਾਮੋਦਰ ਸੁਆਮੀ ॥
ਰਿਖੀਕੇਸ ਗੋਵਰਧਨ ਧਾਰੀ ਮੁਰਲੀ ਮਨੋਹਰ ਹਰਿ ਰੰਗਾ ॥੧॥
ਮੋਹਨ ਮਾਧਵ ਕ੍ਰਿਸ੍ਨ ਮੁਰਾਰੇ ॥
ਜਗਦੀਸੁਰ ਹਰਿ ਜੀਉ ਅਸੁਰ ਸੰਘਾਰੇ ॥
ਜਗਜੀਵਨ ਅਬਿਨਾਸੀ ਠਾਕੁਰ ਘਟ ਘਟ ਵਾਸੀ ਹੈ ਸੰਗਾ ॥੨॥
ਧਰਣੀਧਰ ਈਸ ਨਰਸਿੰਘ ਨਾਰਾਇਣ ॥
ਦਾੜਾ ਅਗ੍ਰੇ ਪ੍ਰਿਥਮਿ ਧਰਾਇਣ ॥
ਬਾਵਨ ਰੂਪੁ ਕੀਆ ਤੁਧੁ ਕਰਤੇ ਸਭ ਹੀ ਸੇਤੀ ਹੈ ਚੰਗਾ ॥੩॥
ਸ੍ਰੀ ਰਾਮਚੰਦ ਜਿਸੁ ਰੂਪੁ ਨ ਰੇਖਿਆ ॥
ਬਨਵਾਲੀ ਚਕ੍ਰਪਾਣਿ ਦਰਸਿ ਅਨੂਪਿਆ ॥
ਸਹਸ ਨੇਤ੍ਰ ਮੂਰਤਿ ਹੈ ਸਹਸਾ ਇਕੁ ਦਾਤਾ ਸਭ ਹੈ ਮੰਗਾ ॥੪॥
ਭਗਤਿ ਵਛਲੁ ਅਨਾਥਹ ਨਾਥੇ ॥
ਗੋਪੀ ਨਾਥੁ ਸਗਲ ਹੈ ਸਾਥੇ ॥
ਬਾਸੁਦੇਵ ਨਿਰੰਜਨ ਦਾਤੇ ਬਰਨਿ ਨ ਸਾਕਉ ਗੁਣ ਅੰਗਾ ॥੫॥
ਮੁਕੰਦ ਮਨੋਹਰ ਲਖਮੀ ਨਾਰਾਇਣ ॥
ਦ੍ਰੋਪਤੀ ਲਜਾ ਨਿਵਾਰਿ ਉਧਾਰਣ ॥
ਕਮਲਾਕੰਤ ਕਰਹਿ ਕੰਤੂਹਲ ਅਨਦ ਬਿਨੋਦੀ ਨਿਹਸੰਗਾ ॥੬॥
ਅਮੋਘ ਦਰਸਨ ਆਜੂਨੀ ਸੰਭਉ ॥
ਅਕਾਲ ਮੂਰਤਿ ਜਿਸੁ ਕਦੇ ਨਾਹੀ ਖਉ ॥
ਅਬਿਨਾਸੀ ਅਬਿਗਤ ਅਗੋਚਰ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਤੁਝ ਹੀ ਹੈ ਲਗਾ ॥੭॥
ਸ੍ਰੀਰੰਗ ਬੈਕੁੰਠ ਕੇ ਵਾਸੀ ॥
ਮਛੁ ਕਛੁ ਕੂਰਮੁ ਆਗਿਆ ਅਉਤਰਾਸੀ ॥
ਕੇਸਵ ਚਲਤ ਕਰਹਿ ਨਿਰਾਲੇ ਕੀਤਾ ਲੋੜਹਿ ਸੋ ਹੋਇਗਾ ॥੮॥
ਨਿਰਾਹਾਰੀ ਨਿਰਵੈਰੁ ਸਮਾਇਆ ॥
ਧਾਰਿ ਖੇਲੁ ਚਤੁਰਭੁਜੁ ਕਹਾਇਆ ॥
ਸਾਵਲ ਸੁੰਦਰ ਰੂਪ ਬਣਾਵਹਿ ਬੇਣੁ ਸੁਨਤ ਸਭ ਮੋਹੈਗਾ ॥੯॥
ਬਨਮਾਲਾ ਬਿਭੂਖਨ ਕਮਲ ਨੈਨ ॥
ਸੁੰਦਰ ਕੁੰਡਲ ਮੁਕਟ ਬੈਨ ॥
ਸੰਖ ਚਕ੍ਰ ਗਦਾ ਹੈ ਧਾਰੀ ਮਹਾ ਸਾਰਥੀ ਸਤਸੰਗਾ ॥੧੦॥
ਪੀਤ ਪੀਤੰਬਰ ਤ੍ਰਿਭਵਣ ਧਣੀ ॥
ਜਗੰਨਾਥੁ ਗੋਪਾਲੁ ਮੁਖਿ ਭਣੀ ॥
ਸਾਰਿੰਗਧਰ ਭਗਵਾਨ ਬੀਠੁਲਾ ਮੈ ਗਣਤ ਨ ਆਵੈ ਸਰਬੰਗਾ ॥੧੧॥
ਨਿਹਕੰਟਕੁ ਨਿਹਕੇਵਲੁ ਕਹੀਐ ॥
ਧਨੰਜੈ ਜਲਿ ਥਲਿ ਹੈ ਮਹੀਐ ॥
मारू महला ५ ॥
अचुत पारब्रहम परमेसुर अंतरजामी ॥
मधुसूदन दामोदर सुआमी ॥
रिखीकेस गोवरधन धारी मुरली मनोहर हरि रंगा ॥१॥
मोहन माधव क्रिस्न मुरारे ॥
जगदीसुर हरि जीउ असुर संघारे ॥
जगजीवन अबिनासी ठाकुर घट घट वासी है संगा ॥२॥
धरणीधर ईस नरसिंघ नाराइण ॥
दाड़ा अग्रे प्रिथमि धराइण ॥
बावन रूपु कीआ तुधु करते सभ ही सेती है चंगा ॥३॥
स्री रामचंद जिसु रूपु न रेखिआ ॥
बनवाली चक्रपाणि दरसि अनूपिआ ॥
सहस नेत्र मूरति है सहसा इकु दाता सभ है मंगा ॥४॥
भगति वछलु अनाथह नाथे ॥
गोपी नाथु सगल है साथे ॥
बासुदेव निरंजन दाते बरनि न साकउ गुण अंगा ॥५॥
मुकंद मनोहर लखमी नाराइण ॥
द्रोपती लजा निवारि उधारण ॥
कमलाकंत करहि कंतूहल अनद बिनोदी निहसंगा ॥६॥
अमोघ दरसन आजूनी संभउ ॥
अकाल मूरति जिसु कदे नाही खउ ॥
अबिनासी अबिगत अगोचर सभु किछु तुझ ही है लगा ॥७॥
स्रीरंग बैकुंठ के वासी ॥
मछु कछु कूरमु आगिआ अउतरासी ॥
केसव चलत करहि निराले कीता लोड़हि सो होइगा ॥८॥
निराहारी निरवैरु समाइआ ॥
धारि खेलु चतुरभुजु कहाइआ ॥
सावल सुंदर रूप बणावहि बेणु सुनत सभ मोहैगा ॥९॥
बनमाला बिभूखन कमल नैन ॥
सुंदर कुंडल मुकट बैन ॥
संख चक्र गदा है धारी महा सारथी सतसंगा ॥१०॥
पीत पीतंबर त्रिभवण धणी ॥
जगंनाथु गोपालु मुखि भणी ॥
सारिंगधर भगवान बीठुला मै गणत न आवै सरबंगा ॥११॥
निहकंटकु निहकेवलु कहीऐ ॥
धनंजै जलि थलि है महीऐ ॥
अचुत पारब्रहम परमेसुर अंतरजामी ॥
मधुसूदन दामोदर सुआमी ॥
रिखीकेस गोवरधन धारी मुरली मनोहर हरि रंगा ॥१॥
मोहन माधव क्रिस्न मुरारे ॥
जगदीसुर हरि जीउ असुर संघारे ॥
जगजीवन अबिनासी ठाकुर घट घट वासी है संगा ॥२॥
धरणीधर ईस नरसिंघ नाराइण ॥
दाड़ा अग्रे प्रिथमि धराइण ॥
बावन रूपु कीआ तुधु करते सभ ही सेती है चंगा ॥३॥
स्री रामचंद जिसु रूपु न रेखिआ ॥
बनवाली चक्रपाणि दरसि अनूपिआ ॥
सहस नेत्र मूरति है सहसा इकु दाता सभ है मंगा ॥४॥
भगति वछलु अनाथह नाथे ॥
गोपी नाथु सगल है साथे ॥
बासुदेव निरंजन दाते बरनि न साकउ गुण अंगा ॥५॥
मुकंद मनोहर लखमी नाराइण ॥
द्रोपती लजा निवारि उधारण ॥
कमलाकंत करहि कंतूहल अनद बिनोदी निहसंगा ॥६॥
अमोघ दरसन आजूनी संभउ ॥
अकाल मूरति जिसु कदे नाही खउ ॥
अबिनासी अबिगत अगोचर सभु किछु तुझ ही है लगा ॥७॥
स्रीरंग बैकुंठ के वासी ॥
मछु कछु कूरमु आगिआ अउतरासी ॥
केसव चलत करहि निराले कीता लोड़हि सो होइगा ॥८॥
निराहारी निरवैरु समाइआ ॥
धारि खेलु चतुरभुजु कहाइआ ॥
सावल सुंदर रूप बणावहि बेणु सुनत सभ मोहैगा ॥९॥
बनमाला बिभूखन कमल नैन ॥
सुंदर कुंडल मुकट बैन ॥
संख चक्र गदा है धारी महा सारथी सतसंगा ॥१०॥
पीत पीतंबर त्रिभवण धणी ॥
जगंनाथु गोपालु मुखि भणी ॥
सारिंगधर भगवान बीठुला मै गणत न आवै सरबंगा ॥११॥
निहकंटकु निहकेवलु कहीऐ ॥
धनंजै जलि थलि है महीऐ ॥
हिन्दी अर्थ: मारू महला ५॥ हे करतार ! तू अविनाशी है। तू पारब्रहम है। तू परमेश्वर है। तू अंतरजामी है। हे स्वामी ! मधुसूदन और दामोदर भी तू ही है। हे हरी ! तू ही ऋषिकेश गोवर्धन और मनोहर मुरलीवाला है। तू अनेकों रंग-तमाशे कर रहा है। 1। हे हरी जीउ ! मेहन। माधव। कृष्ण मुरारी तू ही है। तू ही है जगत का मालिक। तू ही दैत्यों का नाश करने वाला। हे जगजीवन ! हे अविनाशी ठाकुर ! तू सब शरीरों में मौजूद है। तू सबके साथ बसता है। 2। हे धरती के आसरे ! हे ईश्वर ! तू ही है नरसिंह अवतार। तू है विष्णू जिसका निवास समुंद्र में है। (वराह अवतार धार के) धरती को अपनी दाड़ों पर उठाने वाला भी तू ही है। हे करतार ! (राजा बलि को छलने के लिए) तूने ही वामन-रूप धारण किया था। तू सब जीवों के साथ बसता है। (फिर भी तू सबसे) उक्तम है। 3। हे प्रभू ! तू वह श्री रामचंद्र है जिसका ना कोई रूप है ना रेख। तू ही है बनवाली और सुदर्शन चक्रधारी। तू बेमिसाल अलोकिक स्वरूप वाला है। तेरे हजारों नेत्र हैं। तेरी हजारों मूर्तियाँ हैं। तू ही अकेला दाता है। सारी दुनिया तुझसे माँगने वाली है। 4। हे अनाथों के नाथ ! तू भक्ति को प्यार करने वाला है ! तू ही गोपियों का नाथ है। तू सब जीवों के साथ रहने वाला है। हे वासुदेव ! हे निर्लिप दातार ! मैं तेरे अनेकों गुण बयान नहीं कर सकता। 5। हे मुक्ति के दाते ! हे सुंदर प्रभू ! हे लक्ष्मी के पति नारायण ! हे द्रोपदी को बेइज्जती से बचा के उसकी लाज रखने वाले ! हे लक्ष्मी के पति ! तू अनेकों करिश्मे करता है। तू सारे आनंद लेने वाला है। और निर्लिप भी है। 6। हे फल देने से कभी ना उकताने वाले दर्शनों वाले प्रभू ! हे जूनि-रहित प्रभू ! हे अपने आप से प्रकाश करने वाले प्रभू ! हे मौत-रहित स्वरूप वाले ! हे (ऐसे) प्रभू जिसका कभी नाश नहीं हो सकता ! हे अविनाशी ! हे अदृष्ट ! हे अगोचर ! (जगत की) हरेक चीज़ तेरे ही आसरे है। 7। हे लक्ष्मी के पति ! हे बैकुंठ के रहने वाले ! मॅछ और कछुए (आदि) का तेरी ही आज्ञा में अवतार हुआ। हे सुंदर लंबे केशों वाले ! तू (सदा) अनोखे करिश्मे करता है। जो कुछ तू करना चाहता है वही अवश्य होता है। 8। हे प्रभू ! तू अन्न खाए बिना जीवित रहने वाला है। तेरा किसी के साथ वैर नहीं। तू सबमें व्यापक है। ये जगत-खेल रच के (तूने ही अपने आप को) ब्रहमा कहलवाया है। हे प्रभू ! (कृष्ण जैसे) अनेकों साँवले-सुंदर रूप तू बनाता रहता है। तेरी बाँसुरी सुनते ही सारी सृष्टि मोहित हो जाती है। 9। हे प्रभू ! सारी सृष्टि की वनस्पति तेरे आभूषण हैं। हे कमल-पुष्प जैसी आँखों वाले ! हे सुंदर कुण्डलों वाले ! हे मुकट धारी ! हे बाँसुरी वाले ! हे शँखधारी ! हे चक्रधारी ! हे गदाधारी ! तू सत्संगियों का सबसे बड़ा सारथी (रथवाह। आगू) है। 10। हे पीले वस्त्रों वाले ! हे तीनों भवनों के मालिक ! तू ही सारे जगत का नाथ है। सृष्टि का पालनहार है। मैं (अपने) मुँह से (तेरा नाम) उचारता हूँ। हे धर्नुधारी ! हे भगवान ! हे माया के प्रभाव से परे रहने वाले ! मुझसे तेरे सारे गुण बयान नहीं हो सकते। 11। हे भाई ! परमात्मा का कोई वैरी नहीं। उसको वासना-रहित कहा जाता है वही (सारे जगत के धन को जीतने वाला) धनंजय है। वह जल में है थल में है धरती पर (हर जगह) है।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 1082 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
दिल्ली के winter-fog में सुबह 5 बजे driver को waiting करवाना।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 47 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1082” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 1083 →, पीछे का: ← अंग 1081।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।