अंग
1047
राग मारू
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਜੋ ਤਿਸੁ ਭਾਵੈ ਸੋਈ ਕਰਸੀ ॥
ਆਪਹੁ ਹੋਆ ਨਾ ਕਿਛੁ ਹੋਸੀ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਮਿਲੈ ਵਡਿਆਈ ਦਰਿ ਸਾਚੈ ਪਤਿ ਪਾਈ ਹੇ ॥੧੬॥੩॥
ਆਪਹੁ ਹੋਆ ਨਾ ਕਿਛੁ ਹੋਸੀ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਮਿਲੈ ਵਡਿਆਈ ਦਰਿ ਸਾਚੈ ਪਤਿ ਪਾਈ ਹੇ ॥੧੬॥੩॥
जो तिसु भावै सोई करसी ॥
आपहु होआ ना किछु होसी ॥
नानक नामु मिलै वडिआई दरि साचै पति पाई हे ॥१६॥३॥
आपहु होआ ना किछु होसी ॥
नानक नामु मिलै वडिआई दरि साचै पति पाई हे ॥१६॥३॥
हिन्दी अर्थ: हे भाई ! (ये सारी जगत-खेल प्रभू के हाथ में है) जो कुछ उसको अच्छा लगता है। वही वह करेगा। जीव के अपने प्रयासों से ना अब तक कुछ हो सका ह ैना ही आगे कुछ हो सकेगा। हे नानक ! जिस मनुष्य को परमात्मा का नाम मिल जाता है उसको (लोक-परलोक की) इज्जत मिल जाती है। वह मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू के दर पर आदर प्राप्त करता है। 16। 3।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਜੋ ਆਇਆ ਸੋ ਸਭੁ ਕੋ ਜਾਸੀ ॥
ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਬਾਧਾ ਜਮ ਫਾਸੀ ॥
ਸਤਿਗੁਰਿ ਰਾਖੇ ਸੇ ਜਨ ਉਬਰੇ ਸਾਚੇ ਸਾਚਿ ਸਮਾਈ ਹੇ ॥੧॥
ਆਪੇ ਕਰਤਾ ਕਰਿ ਕਰਿ ਵੇਖੈ ॥
ਜਿਸ ਨੋ ਨਦਰਿ ਕਰੇ ਸੋਈ ਜਨੁ ਲੇਖੈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਗਿਆਨੁ ਤਿਸੁ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਸੂਝੈ ਅਗਿਆਨੀ ਅੰਧੁ ਕਮਾਈ ਹੇ ॥੨॥
ਮਨਮੁਖ ਸਹਸਾ ਬੂਝ ਨ ਪਾਈ ॥
ਮਰਿ ਮਰਿ ਜੰਮੈ ਜਨਮੁ ਗਵਾਈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਸਹਜੇ ਸਾਚਿ ਸਮਾਈ ਹੇ ॥੩॥
ਧੰਧੈ ਧਾਵਤ ਮਨੁ ਭਇਆ ਮਨੂਰਾ ॥
ਫਿਰਿ ਹੋਵੈ ਕੰਚਨੁ ਭੇਟੈ ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ॥
ਆਪੇ ਬਖਸਿ ਲਏ ਸੁਖੁ ਪਾਏ ਪੂਰੈ ਸਬਦਿ ਮਿਲਾਈ ਹੇ ॥੪॥
ਦੁਰਮਤਿ ਝੂਠੀ ਬੁਰੀ ਬੁਰਿਆਰਿ ॥
ਅਉਗਣਿਆਰੀ ਅਉਗਣਿਆਰਿ ॥
ਕਚੀ ਮਤਿ ਫੀਕਾ ਮੁਖਿ ਬੋਲੈ ਦੁਰਮਤਿ ਨਾਮੁ ਨ ਪਾਈ ਹੇ ॥੫॥
ਅਉਗਣਿਆਰੀ ਕੰਤ ਨ ਭਾਵੈ ॥
ਮਨ ਕੀ ਜੂਠੀ ਜੂਠੁ ਕਮਾਵੈ ॥
ਪਿਰ ਕਾ ਸਾਉ ਨ ਜਾਣੈ ਮੂਰਖਿ ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਬੂਝ ਨ ਪਾਈ ਹੇ ॥੬॥
ਦੁਰਮਤਿ ਖੋਟੀ ਖੋਟੁ ਕਮਾਵੈ ॥
ਸੀਗਾਰੁ ਕਰੇ ਪਿਰ ਖਸਮ ਨ ਭਾਵੈ ॥
ਗੁਣਵੰਤੀ ਸਦਾ ਪਿਰੁ ਰਾਵੈ ਸਤਿਗੁਰਿ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਈ ਹੇ ॥੭॥
ਆਪੇ ਹੁਕਮੁ ਕਰੇ ਸਭੁ ਵੇਖੈ ॥
ਇਕਨਾ ਬਖਸਿ ਲਏ ਧੁਰਿ ਲੇਖੈ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਸਚੁ ਪਾਇਆ ਆਪੇ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਈ ਹੇ ॥੮॥
ਹਉਮੈ ਧਾਤੁ ਮੋਹ ਰਸਿ ਲਾਈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਲਿਵ ਸਾਚੀ ਸਹਜਿ ਸਮਾਈ ॥
ਆਪੇ ਮੇਲੈ ਆਪੇ ਕਰਿ ਵੇਖੈ ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਬੂਝ ਨ ਪਾਈ ਹੇ ॥੯॥
ਇਕਿ ਸਬਦੁ ਵੀਚਾਰਿ ਸਦਾ ਜਨ ਜਾਗੇ ॥
ਇਕਿ ਮਾਇਆ ਮੋਹਿ ਸੋਇ ਰਹੇ ਅਭਾਗੇ ॥
ਆਪੇ ਕਰੇ ਕਰਾਏ ਆਪੇ ਹੋਰੁ ਕਰਣਾ ਕਿਛੂ ਨ ਜਾਈ ਹੇ ॥੧੦॥
ਕਾਲੁ ਮਾਰਿ ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਨਿਵਾਰੇ ॥
ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਰਖੈ ਉਰ ਧਾਰੇ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਸੇਵਾ ਤੇ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਹਰਿ ਕੈ ਨਾਮਿ ਸਮਾਈ ਹੇ ॥੧੧॥
ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਫਿਰੈ ਦੇਵਾਨੀ ॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹਿ ਦੁਖ ਮਾਹਿ ਸਮਾਨੀ ॥
ਬਹੁਤੇ ਭੇਖ ਕਰੈ ਨਹ ਪਾਏ ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਸੁਖੁ ਨ ਪਾਈ ਹੇ ॥੧੨॥
ਕਿਸ ਨੋ ਕਹੀਐ ਜਾ ਆਪਿ ਕਰਾਏ ॥
ਜਿਤੁ ਭਾਵੈ ਤਿਤੁ ਰਾਹਿ ਚਲਾਏ ॥
ਆਪੇ ਮਿਹਰਵਾਨੁ ਸੁਖਦਾਤਾ ਜਿਉ ਭਾਵੈ ਤਿਵੈ ਚਲਾਈ ਹੇ ॥੧੩॥
ਆਪੇ ਕਰਤਾ ਆਪੇ ਭੁਗਤਾ ॥
ਆਪੇ ਸੰਜਮੁ ਆਪੇ ਜੁਗਤਾ ॥
ਆਪੇ ਨਿਰਮਲੁ ਮਿਹਰਵਾਨੁ ਮਧੁਸੂਦਨੁ ਜਿਸ ਦਾ ਹੁਕਮੁ ਨ ਮੇਟਿਆ ਜਾਈ ਹੇ ॥੧੪॥
ਸੇ ਵਡਭਾਗੀ ਜਿਨੀ ਏਕੋ ਜਾਤਾ ॥
ਜੋ ਆਇਆ ਸੋ ਸਭੁ ਕੋ ਜਾਸੀ ॥
ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਬਾਧਾ ਜਮ ਫਾਸੀ ॥
ਸਤਿਗੁਰਿ ਰਾਖੇ ਸੇ ਜਨ ਉਬਰੇ ਸਾਚੇ ਸਾਚਿ ਸਮਾਈ ਹੇ ॥੧॥
ਆਪੇ ਕਰਤਾ ਕਰਿ ਕਰਿ ਵੇਖੈ ॥
ਜਿਸ ਨੋ ਨਦਰਿ ਕਰੇ ਸੋਈ ਜਨੁ ਲੇਖੈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਗਿਆਨੁ ਤਿਸੁ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਸੂਝੈ ਅਗਿਆਨੀ ਅੰਧੁ ਕਮਾਈ ਹੇ ॥੨॥
ਮਨਮੁਖ ਸਹਸਾ ਬੂਝ ਨ ਪਾਈ ॥
ਮਰਿ ਮਰਿ ਜੰਮੈ ਜਨਮੁ ਗਵਾਈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਸਹਜੇ ਸਾਚਿ ਸਮਾਈ ਹੇ ॥੩॥
ਧੰਧੈ ਧਾਵਤ ਮਨੁ ਭਇਆ ਮਨੂਰਾ ॥
ਫਿਰਿ ਹੋਵੈ ਕੰਚਨੁ ਭੇਟੈ ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ॥
ਆਪੇ ਬਖਸਿ ਲਏ ਸੁਖੁ ਪਾਏ ਪੂਰੈ ਸਬਦਿ ਮਿਲਾਈ ਹੇ ॥੪॥
ਦੁਰਮਤਿ ਝੂਠੀ ਬੁਰੀ ਬੁਰਿਆਰਿ ॥
ਅਉਗਣਿਆਰੀ ਅਉਗਣਿਆਰਿ ॥
ਕਚੀ ਮਤਿ ਫੀਕਾ ਮੁਖਿ ਬੋਲੈ ਦੁਰਮਤਿ ਨਾਮੁ ਨ ਪਾਈ ਹੇ ॥੫॥
ਅਉਗਣਿਆਰੀ ਕੰਤ ਨ ਭਾਵੈ ॥
ਮਨ ਕੀ ਜੂਠੀ ਜੂਠੁ ਕਮਾਵੈ ॥
ਪਿਰ ਕਾ ਸਾਉ ਨ ਜਾਣੈ ਮੂਰਖਿ ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਬੂਝ ਨ ਪਾਈ ਹੇ ॥੬॥
ਦੁਰਮਤਿ ਖੋਟੀ ਖੋਟੁ ਕਮਾਵੈ ॥
ਸੀਗਾਰੁ ਕਰੇ ਪਿਰ ਖਸਮ ਨ ਭਾਵੈ ॥
ਗੁਣਵੰਤੀ ਸਦਾ ਪਿਰੁ ਰਾਵੈ ਸਤਿਗੁਰਿ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਈ ਹੇ ॥੭॥
ਆਪੇ ਹੁਕਮੁ ਕਰੇ ਸਭੁ ਵੇਖੈ ॥
ਇਕਨਾ ਬਖਸਿ ਲਏ ਧੁਰਿ ਲੇਖੈ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਸਚੁ ਪਾਇਆ ਆਪੇ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਈ ਹੇ ॥੮॥
ਹਉਮੈ ਧਾਤੁ ਮੋਹ ਰਸਿ ਲਾਈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਲਿਵ ਸਾਚੀ ਸਹਜਿ ਸਮਾਈ ॥
ਆਪੇ ਮੇਲੈ ਆਪੇ ਕਰਿ ਵੇਖੈ ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਬੂਝ ਨ ਪਾਈ ਹੇ ॥੯॥
ਇਕਿ ਸਬਦੁ ਵੀਚਾਰਿ ਸਦਾ ਜਨ ਜਾਗੇ ॥
ਇਕਿ ਮਾਇਆ ਮੋਹਿ ਸੋਇ ਰਹੇ ਅਭਾਗੇ ॥
ਆਪੇ ਕਰੇ ਕਰਾਏ ਆਪੇ ਹੋਰੁ ਕਰਣਾ ਕਿਛੂ ਨ ਜਾਈ ਹੇ ॥੧੦॥
ਕਾਲੁ ਮਾਰਿ ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਨਿਵਾਰੇ ॥
ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਰਖੈ ਉਰ ਧਾਰੇ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਸੇਵਾ ਤੇ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਹਰਿ ਕੈ ਨਾਮਿ ਸਮਾਈ ਹੇ ॥੧੧॥
ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਫਿਰੈ ਦੇਵਾਨੀ ॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹਿ ਦੁਖ ਮਾਹਿ ਸਮਾਨੀ ॥
ਬਹੁਤੇ ਭੇਖ ਕਰੈ ਨਹ ਪਾਏ ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਸੁਖੁ ਨ ਪਾਈ ਹੇ ॥੧੨॥
ਕਿਸ ਨੋ ਕਹੀਐ ਜਾ ਆਪਿ ਕਰਾਏ ॥
ਜਿਤੁ ਭਾਵੈ ਤਿਤੁ ਰਾਹਿ ਚਲਾਏ ॥
ਆਪੇ ਮਿਹਰਵਾਨੁ ਸੁਖਦਾਤਾ ਜਿਉ ਭਾਵੈ ਤਿਵੈ ਚਲਾਈ ਹੇ ॥੧੩॥
ਆਪੇ ਕਰਤਾ ਆਪੇ ਭੁਗਤਾ ॥
ਆਪੇ ਸੰਜਮੁ ਆਪੇ ਜੁਗਤਾ ॥
ਆਪੇ ਨਿਰਮਲੁ ਮਿਹਰਵਾਨੁ ਮਧੁਸੂਦਨੁ ਜਿਸ ਦਾ ਹੁਕਮੁ ਨ ਮੇਟਿਆ ਜਾਈ ਹੇ ॥੧੪॥
ਸੇ ਵਡਭਾਗੀ ਜਿਨੀ ਏਕੋ ਜਾਤਾ ॥
मारू महला ३ ॥
जो आइआ सो सभु को जासी ॥
दूजै भाइ बाधा जम फासी ॥
सतिगुरि राखे से जन उबरे साचे साचि समाई हे ॥१॥
आपे करता करि करि वेखै ॥
जिस नो नदरि करे सोई जनु लेखै ॥
गुरमुखि गिआनु तिसु सभु किछु सूझै अगिआनी अंधु कमाई हे ॥२॥
मनमुख सहसा बूझ न पाई ॥
मरि मरि जंमै जनमु गवाई ॥
गुरमुखि नामि रते सुखु पाइआ सहजे साचि समाई हे ॥३॥
धंधै धावत मनु भइआ मनूरा ॥
फिरि होवै कंचनु भेटै गुरु पूरा ॥
आपे बखसि लए सुखु पाए पूरै सबदि मिलाई हे ॥४॥
दुरमति झूठी बुरी बुरिआरि ॥
अउगणिआरी अउगणिआरि ॥
कची मति फीका मुखि बोलै दुरमति नामु न पाई हे ॥५॥
अउगणिआरी कंत न भावै ॥
मन की जूठी जूठु कमावै ॥
पिर का साउ न जाणै मूरखि बिनु गुर बूझ न पाई हे ॥६॥
दुरमति खोटी खोटु कमावै ॥
सीगारु करे पिर खसम न भावै ॥
गुणवंती सदा पिरु रावै सतिगुरि मेलि मिलाई हे ॥७॥
आपे हुकमु करे सभु वेखै ॥
इकना बखसि लए धुरि लेखै ॥
अनदिनु नामि रते सचु पाइआ आपे मेलि मिलाई हे ॥८॥
हउमै धातु मोह रसि लाई ॥
गुरमुखि लिव साची सहजि समाई ॥
आपे मेलै आपे करि वेखै बिनु सतिगुर बूझ न पाई हे ॥९॥
इकि सबदु वीचारि सदा जन जागे ॥
इकि माइआ मोहि सोइ रहे अभागे ॥
आपे करे कराए आपे होरु करणा किछू न जाई हे ॥१०॥
कालु मारि गुर सबदि निवारे ॥
हरि का नामु रखै उर धारे ॥
सतिगुर सेवा ते सुखु पाइआ हरि कै नामि समाई हे ॥११॥
दूजै भाइ फिरै देवानी ॥
माइआ मोहि दुख माहि समानी ॥
बहुते भेख करै नह पाए बिनु सतिगुर सुखु न पाई हे ॥१२॥
किस नो कहीऐ जा आपि कराए ॥
जितु भावै तितु राहि चलाए ॥
आपे मिहरवानु सुखदाता जिउ भावै तिवै चलाई हे ॥१३॥
आपे करता आपे भुगता ॥
आपे संजमु आपे जुगता ॥
आपे निरमलु मिहरवानु मधुसूदनु जिस दा हुकमु न मेटिआ जाई हे ॥१४॥
से वडभागी जिनी एको जाता ॥
जो आइआ सो सभु को जासी ॥
दूजै भाइ बाधा जम फासी ॥
सतिगुरि राखे से जन उबरे साचे साचि समाई हे ॥१॥
आपे करता करि करि वेखै ॥
जिस नो नदरि करे सोई जनु लेखै ॥
गुरमुखि गिआनु तिसु सभु किछु सूझै अगिआनी अंधु कमाई हे ॥२॥
मनमुख सहसा बूझ न पाई ॥
मरि मरि जंमै जनमु गवाई ॥
गुरमुखि नामि रते सुखु पाइआ सहजे साचि समाई हे ॥३॥
धंधै धावत मनु भइआ मनूरा ॥
फिरि होवै कंचनु भेटै गुरु पूरा ॥
आपे बखसि लए सुखु पाए पूरै सबदि मिलाई हे ॥४॥
दुरमति झूठी बुरी बुरिआरि ॥
अउगणिआरी अउगणिआरि ॥
कची मति फीका मुखि बोलै दुरमति नामु न पाई हे ॥५॥
अउगणिआरी कंत न भावै ॥
मन की जूठी जूठु कमावै ॥
पिर का साउ न जाणै मूरखि बिनु गुर बूझ न पाई हे ॥६॥
दुरमति खोटी खोटु कमावै ॥
सीगारु करे पिर खसम न भावै ॥
गुणवंती सदा पिरु रावै सतिगुरि मेलि मिलाई हे ॥७॥
आपे हुकमु करे सभु वेखै ॥
इकना बखसि लए धुरि लेखै ॥
अनदिनु नामि रते सचु पाइआ आपे मेलि मिलाई हे ॥८॥
हउमै धातु मोह रसि लाई ॥
गुरमुखि लिव साची सहजि समाई ॥
आपे मेलै आपे करि वेखै बिनु सतिगुर बूझ न पाई हे ॥९॥
इकि सबदु वीचारि सदा जन जागे ॥
इकि माइआ मोहि सोइ रहे अभागे ॥
आपे करे कराए आपे होरु करणा किछू न जाई हे ॥१०॥
कालु मारि गुर सबदि निवारे ॥
हरि का नामु रखै उर धारे ॥
सतिगुर सेवा ते सुखु पाइआ हरि कै नामि समाई हे ॥११॥
दूजै भाइ फिरै देवानी ॥
माइआ मोहि दुख माहि समानी ॥
बहुते भेख करै नह पाए बिनु सतिगुर सुखु न पाई हे ॥१२॥
किस नो कहीऐ जा आपि कराए ॥
जितु भावै तितु राहि चलाए ॥
आपे मिहरवानु सुखदाता जिउ भावै तिवै चलाई हे ॥१३॥
आपे करता आपे भुगता ॥
आपे संजमु आपे जुगता ॥
आपे निरमलु मिहरवानु मधुसूदनु जिस दा हुकमु न मेटिआ जाई हे ॥१४॥
से वडभागी जिनी एको जाता ॥
हिन्दी अर्थ: मारू महला ३॥ हे भाई ! जो भी जीव (जगत में) पैदा होता है वह हरेक ही (अवश्य इस जगत से) कूच (भी) कर जाता है। (पर) माया के मोह के कारण (जीव) आत्मिक मौत के बँधनों में बँध जाता है। गुरू ने जिनकी रक्षा की। वह मनुष्य (माया के मोह से) बच निकलते हैं; वे सदा ही सदा-स्थिर परमात्मा में लीन रहते हैं। 1। हे भाई ! (ये सारा खेल) करतार स्वयं ही कर कर के देख रहा है; जिस मनुष्य पर वह मेहर की निगाह करता है वही मनुष्य उसकी परवानगी में है। जिस मनुष्य को गुरू के द्वारा आत्मिक जीवन की सूझ पड़ जाती है उसको (आत्मिक जीवन के बारे में) हरेक बात की समझ आ जाती है। ज्ञान से वंचित मनुष्य अंधों वाले काम ही करता रहता है। 2। हे भाई ! मन के मुरीद मनुष्य को (हर वक्त कोई ना कोई) सहम (खाए जाता है। क्योंकि) उसको आत्मिक जीवन की समझ नहीं होती वह जनम-मरण के चक्कर में पड़ा रहता है। वह अपना मानस जन्म व्यर्थ गवा जाता है। गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य परमात्मा के नाम में रंगे रहते हैं। वे आत्मिक आनंद पाते हैं। वे आत्मिक अडोलता में सदा-स्थिर प्रभू में हर वक्त टिके रहते हैं। 3। हे भाई ! दुनियां के धंधों में दौड़-भाग करते हुए मनुष्य जला हुआ लोहा बन जाता है (ऐसे जला रहता है जैसे जला हुआ लोहा)। पर जब उसे पूरा गुरू मिलता है। तब वह दोबारा (शुद्ध) सोना बन जाता है। हे भाई ! जिस मनुष्य पर परमात्मा स्वयं बख्शिश करता है वह मनुष्य आत्मिक आनंद पाता है। वह पूरन प्रभू की सिफत-सालाह में लीन रहता है। 4। हे भाई ! खोटी मति वाली जीव स्त्री झूठ में बुराई में मस्त रहती है। वह बुराई का अड्डा बनी रहती है। वह सदा ही अवगुणों से भरी रहती है। उसकी मति सदा (विकारों में) बहकती है। वह मुँह से कठोर वचन बोलती है। खोटी मति के कारण उसको परमात्मा का नाम नसीब नहीं होता। 5। हे भाई ! अवगुण-भरी जीव-स्त्री पति-प्रभू को अच्छी नहीं लगती। मन की गंदी वह जीव-स्त्री सदा गंदा काम ही करती है। वह मूर्ख जीव-स्त्री पति-रूप के मिलाप का आनंद नहीं जानती। गुरू के बिना उसको आत्मिक जीवन की सूझ नहीं पड़ती। 6। हे भाई ! खोटी मति वाली जीव-स्त्री सदा खोट से भरी रहती है सदा खोट ही कमाती है (खोटा काम करती है)। (दुराचारिन स्त्री की तरह वह बाहर से धार्मिक) सजावट करती है। पर पति-प्रभू को पसंद नहीं आती। गुणवान जीव-स्त्री को पति-प्रभू सदा मिला रहता है। उसको गुरू (-चरणों) में मिला के (अपने साथ) मिलाए रखता है। 7। (पर। हे भाई ! जीवों के भी क्या वश। ) परमात्मा हर जगह स्वयं ही हुकम कर के (अपने प्रेरित किए हुए जीवों का हरेक काम) देख रहा है। धुर से अपने हुकम में ही कई जीवों को लेखे में बख्श लेता है; वह जीव हर वक्त उसके नाम में रंगे रहते हैं। उन्हें वह सदा-स्थिर प्रभू मिला रहता है। प्रभू स्वयं ही उनको (गुरू से) मिला के अपने चरणों में जोड़े रखता है। 8। हे भाई ! माया (जीव को) अहंकार में मोह के रस में लगाए रखती है। गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य को प्रभू-चरणों की सदा-स्थिर लगन आत्मिक अडोलता में टिकाए रखती है। पर। हे भाई ! प्रभू स्वयं ही (जीव को अपने चरणों में) जोड़ता है। स्वयं ही यह खेल करके देख रहा है- ये समझ गुरू के बिना नहीं पड़ती। 9। हे भाई ! कई ऐसे मनुष्य हैं जो गुरू के शबद को विचार के (माया के हमलों से) सचेत रहते हैं। कई ऐसे बद्किस्मत हैं जो सदा माया के मोह में गाफिल हुए रहते हैं। (पर। जीवों के भी क्या वश।) प्रभू खुद ही (सबमें व्यापक हो के सब कुछ) करता है। खुद ही (जीवों से) करवाता है (उसकी रजा के विरुद्ध) और कुछ भी किया नहीं जा सकता। 10। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के शबद से आत्मिक मौत को मार के (अपने अंदर से स्वै भाव) दूर करता है। और परमात्मा का नाम अपने दिल में बसाए रखता है। वह मनुष्य गुरू की शरण की बरकति से आत्मिक आनंद पाता है। परमात्मा के नाम में सदा टिका रहता है। 11। हे भाई ! जो जीव-स्त्री माया के मोह में झल्ली हुई भटकती फिरती है वह माया के मोह में और दुखों में ग्रसी रहती है; अगर वह बहुत सारे धार्मिक पहिरावे भी धारण कर ले। वह सुख प्राप्त नहीं कर सकती। गुरू की शरण पड़े बिना वह सुख नहीं मिल सकता। 12। हे भाई ! जब (परमात्मा) स्वयं (ही जीवों से सब कुछ) करवा रहा है। तो उसके बिना किसी और के पास पुकार नहीं की जा सकती। जिस राह पर चलाना उसको अच्छा लगता है उस राह पर ही (जीवों को) चलाता है। 13। वह स्वयं ही मेहरबान एवं सुख देने वाला है, जैसा उसे मंजूर है, वैसे ही वह जीवों को चलाता है॥ १३॥ हे भाई ! परमात्म स्वयं ही (जीवों को) पैदा करने वाला है। खुद ही (जीवों में बैठ के पदार्थों को) भोगने वाला है। प्रभू खुद ही (पदार्थों के भोगने से) परहेज (करने वाला) है। स्वयं ही सब जीवों में और पदार्थों में व्यापक है। वह स्वयं ही पवित्र है। स्वयं ही दया करने वाला है। स्वयं ही विकारियों का नाश करने वाला है। (वह ऐसा है) जिसके हुकम की अवहेलना नहीं की जा सकती। 14। हे भाई ! वे मनुष्य भाग्यशाली हैं जिन्होंने उस एक परमात्मा को (हर जगह) जाना है
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 1047 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।
सर्दी के पहले हफ़्ते का पहला rajai का आना, और मन का बदलना।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 47 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1047” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 1048 →, पीछे का: ← अंग 1046।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।