अंग
1007
राग मारू
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਮੇਰੇ ਮਨ ਨਾਮੁ ਹਿਰਦੈ ਧਾਰਿ ॥
ਕਰਿ ਪ੍ਰੀਤਿ ਮਨੁ ਤਨੁ ਲਾਇ ਹਰਿ ਸਿਉ ਅਵਰ ਸਗਲ ਵਿਸਾਰਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜੀਉ ਮਨੁ ਤਨੁ ਪ੍ਰਾਣ ਪ੍ਰਭ ਕੇ ਤੂ ਆਪਨ ਆਪੁ ਨਿਵਾਰਿ ॥
ਗੋਵਿਦ ਭਜੁ ਸਭਿ ਸੁਆਰਥ ਪੂਰੇ ਨਾਨਕ ਕਬਹੁ ਨ ਹਾਰਿ ॥੨॥੪॥੨੭॥
ਕਰਿ ਪ੍ਰੀਤਿ ਮਨੁ ਤਨੁ ਲਾਇ ਹਰਿ ਸਿਉ ਅਵਰ ਸਗਲ ਵਿਸਾਰਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜੀਉ ਮਨੁ ਤਨੁ ਪ੍ਰਾਣ ਪ੍ਰਭ ਕੇ ਤੂ ਆਪਨ ਆਪੁ ਨਿਵਾਰਿ ॥
ਗੋਵਿਦ ਭਜੁ ਸਭਿ ਸੁਆਰਥ ਪੂਰੇ ਨਾਨਕ ਕਬਹੁ ਨ ਹਾਰਿ ॥੨॥੪॥੨੭॥
मेरे मन नामु हिरदै धारि ॥
करि प्रीति मनु तनु लाइ हरि सिउ अवर सगल विसारि ॥१॥ रहाउ ॥
जीउ मनु तनु प्राण प्रभ के तू आपन आपु निवारि ॥
गोविद भजु सभि सुआरथ पूरे नानक कबहु न हारि ॥२॥४॥२७॥
करि प्रीति मनु तनु लाइ हरि सिउ अवर सगल विसारि ॥१॥ रहाउ ॥
जीउ मनु तनु प्राण प्रभ के तू आपन आपु निवारि ॥
गोविद भजु सभि सुआरथ पूरे नानक कबहु न हारि ॥२॥४॥२७॥
हिन्दी अर्थ: हे मेरे मन ! परमात्मा का नाम हृदय में टिकाए रख। हे भाई ! मन लगा के तन लगा के (तन से मन से) और सारे (चिंता-फिक्र) भुला के परमात्मा के साथ प्यार बनाए रख। 1। रहाउ। हे नानक ! (कह- हे भाई !) ये जिंद। ये मन। ये शरीर। ये प्राण – (सब कुछ) परमात्मा के ही दिए हुए हैं (तू गुमान किस बात का करता है। ) स्वै भाव दूर कर। गोबिंद का भजन किया कर। तेरी सारी जरूरतें भी पूरी होंगी। और। (मनुष्य जन्म की बाजी भी) कभी नहीं हारेगा। 2। 4। 27।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਤਜਿ ਆਪੁ ਬਿਨਸੀ ਤਾਪੁ ਰੇਣ ਸਾਧੂ ਥੀਉ ॥
ਤਿਸਹਿ ਪਰਾਪਤਿ ਨਾਮੁ ਤੇਰਾ ਕਰਿ ਕ੍ਰਿਪਾ ਜਿਸੁ ਦੀਉ ॥੧॥
ਮੇਰੇ ਮਨ ਨਾਮੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀਉ ॥
ਆਨ ਸਾਦ ਬਿਸਾਰਿ ਹੋਛੇ ਅਮਰੁ ਜੁਗੁ ਜੁਗੁ ਜੀਉ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਨਾਮੁ ਇਕ ਰਸ ਰੰਗ ਨਾਮਾ ਨਾਮਿ ਲਾਗੀ ਲੀਉ ॥
ਮੀਤੁ ਸਾਜਨੁ ਸਖਾ ਬੰਧਪੁ ਹਰਿ ਏਕੁ ਨਾਨਕ ਕੀਉ ॥੨॥੫॥੨੮॥
ਤਜਿ ਆਪੁ ਬਿਨਸੀ ਤਾਪੁ ਰੇਣ ਸਾਧੂ ਥੀਉ ॥
ਤਿਸਹਿ ਪਰਾਪਤਿ ਨਾਮੁ ਤੇਰਾ ਕਰਿ ਕ੍ਰਿਪਾ ਜਿਸੁ ਦੀਉ ॥੧॥
ਮੇਰੇ ਮਨ ਨਾਮੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀਉ ॥
ਆਨ ਸਾਦ ਬਿਸਾਰਿ ਹੋਛੇ ਅਮਰੁ ਜੁਗੁ ਜੁਗੁ ਜੀਉ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਨਾਮੁ ਇਕ ਰਸ ਰੰਗ ਨਾਮਾ ਨਾਮਿ ਲਾਗੀ ਲੀਉ ॥
ਮੀਤੁ ਸਾਜਨੁ ਸਖਾ ਬੰਧਪੁ ਹਰਿ ਏਕੁ ਨਾਨਕ ਕੀਉ ॥੨॥੫॥੨੮॥
मारू महला ५ ॥
तजि आपु बिनसी तापु रेण साधू थीउ ॥
तिसहि परापति नामु तेरा करि क्रिपा जिसु दीउ ॥१॥
मेरे मन नामु अंम्रितु पीउ ॥
आन साद बिसारि होछे अमरु जुगु जुगु जीउ ॥१॥ रहाउ ॥
नामु इक रस रंग नामा नामि लागी लीउ ॥
मीतु साजनु सखा बंधपु हरि एकु नानक कीउ ॥२॥५॥२८॥
तजि आपु बिनसी तापु रेण साधू थीउ ॥
तिसहि परापति नामु तेरा करि क्रिपा जिसु दीउ ॥१॥
मेरे मन नामु अंम्रितु पीउ ॥
आन साद बिसारि होछे अमरु जुगु जुगु जीउ ॥१॥ रहाउ ॥
नामु इक रस रंग नामा नामि लागी लीउ ॥
मीतु साजनु सखा बंधपु हरि एकु नानक कीउ ॥२॥५॥२८॥
हिन्दी अर्थ: मारू महला ५॥ हे मेरे मन ! स्वै भाव छोड़ दे। गुरू की चरण-धूड़ बन जा। तेरा सारा दुख-कलेश दूर हो जाएगा। हे प्रभू ! तेरा नाम उसी मनुष्य को मिलता है। जिसको तू स्वयं मेहर कर के देता है। 1। हे मेरे मन ! आत्मिक जीवन देने वाला हरी-नाम जल पीया कर (नाम की बरकति से) और सारे (मायावी पदार्थों के) नाशवान चस्के भुला के सदा के लिए अटल आत्मिक जीवन वाली जिंदगी गुजार। 1। रहाउ। हे नानक ! (कह- हे भाई !) जिस मनुष्य ने एक परमात्मा को ही अपना सज्जन-मित्र और संबंधी बना लिया। उसकी लिव सदा परमात्मा के नाम में लगी रहती है। परमात्मा का नाम ही उसके वास्ते (मायावी पदार्थों के स्वाद हैं)। नाम ही उसके लिए दुनियां के रंग-तमाशे हैं। 2। 5। 28।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਪ੍ਰਤਿਪਾਲਿ ਮਾਤਾ ਉਦਰਿ ਰਾਖੈ ਲਗਨਿ ਦੇਤ ਨ ਸੇਕ ॥
ਸੋਈ ਸੁਆਮੀ ਈਹਾ ਰਾਖੈ ਬੂਝੁ ਬੁਧਿ ਬਿਬੇਕ ॥੧॥
ਮੇਰੇ ਮਨ ਨਾਮ ਕੀ ਕਰਿ ਟੇਕ ॥
ਤਿਸਹਿ ਬੂਝੁ ਜਿਨਿ ਤੂ ਕੀਆ ਪ੍ਰਭੁ ਕਰਣ ਕਾਰਣ ਏਕ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਚੇਤਿ ਮਨ ਮਹਿ ਤਜਿ ਸਿਆਣਪ ਛੋਡਿ ਸਗਲੇ ਭੇਖ ॥
ਸਿਮਰਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਸਦਾ ਨਾਨਕ ਤਰੇ ਕਈ ਅਨੇਕ ॥੨॥੬॥੨੯॥
ਪ੍ਰਤਿਪਾਲਿ ਮਾਤਾ ਉਦਰਿ ਰਾਖੈ ਲਗਨਿ ਦੇਤ ਨ ਸੇਕ ॥
ਸੋਈ ਸੁਆਮੀ ਈਹਾ ਰਾਖੈ ਬੂਝੁ ਬੁਧਿ ਬਿਬੇਕ ॥੧॥
ਮੇਰੇ ਮਨ ਨਾਮ ਕੀ ਕਰਿ ਟੇਕ ॥
ਤਿਸਹਿ ਬੂਝੁ ਜਿਨਿ ਤੂ ਕੀਆ ਪ੍ਰਭੁ ਕਰਣ ਕਾਰਣ ਏਕ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਚੇਤਿ ਮਨ ਮਹਿ ਤਜਿ ਸਿਆਣਪ ਛੋਡਿ ਸਗਲੇ ਭੇਖ ॥
ਸਿਮਰਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਸਦਾ ਨਾਨਕ ਤਰੇ ਕਈ ਅਨੇਕ ॥੨॥੬॥੨੯॥
मारू महला ५ ॥
प्रतिपालि माता उदरि राखै लगनि देत न सेक ॥
सोई सुआमी ईहा राखै बूझु बुधि बिबेक ॥१॥
मेरे मन नाम की करि टेक ॥
तिसहि बूझु जिनि तू कीआ प्रभु करण कारण एक ॥१॥ रहाउ ॥
चेति मन महि तजि सिआणप छोडि सगले भेख ॥
सिमरि हरि हरि सदा नानक तरे कई अनेक ॥२॥६॥२९॥
प्रतिपालि माता उदरि राखै लगनि देत न सेक ॥
सोई सुआमी ईहा राखै बूझु बुधि बिबेक ॥१॥
मेरे मन नाम की करि टेक ॥
तिसहि बूझु जिनि तू कीआ प्रभु करण कारण एक ॥१॥ रहाउ ॥
चेति मन महि तजि सिआणप छोडि सगले भेख ॥
सिमरि हरि हरि सदा नानक तरे कई अनेक ॥२॥६॥२९॥
हिन्दी अर्थ: मारू महला ५॥ हे मन ! पालना करके प्रभू माँ के पेट में बचाता है। (पेट की आग का) सेक लगने नहीं देता। वही मालिक इस जगत में भी रक्षा करता है। हे भाई ! परख की बुद्धि से यह (सच्चाई) समझ ले। 1। हे मेरे मन ! (सदा) परमात्मा के नाम का आसरा ले। उस परमात्मा को ही (सहारा) समझ। जिसने तुझे पैदा किया है। हे मन ! एक प्रभू ही सारे जगत का मूल है। 1। रहाउ। हे भाई ! चतुराईयाँ छोड़ के (दिखावे के) सारे (धार्मिक) पहरावे छोड़ के अपने मन में परमात्मा को याद करता रह। हे नानक ! परमात्मा का सदा सिमरन करके अनेकों जीव संसार-समुंद्र से पार लांघते चले आ रहे हैं। 2। 6। 29।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਪਤਿਤ ਪਾਵਨ ਨਾਮੁ ਜਾ ਕੋ ਅਨਾਥ ਕੋ ਹੈ ਨਾਥੁ ॥
ਮਹਾ ਭਉਜਲ ਮਾਹਿ ਤੁਲਹੋ ਜਾ ਕੋ ਲਿਖਿਓ ਮਾਥ ॥੧॥
ਡੂਬੇ ਨਾਮ ਬਿਨੁ ਘਨ ਸਾਥ ॥
ਕਰਣ ਕਾਰਣੁ ਚਿਤਿ ਨ ਆਵੈ ਦੇ ਕਰਿ ਰਾਖੈ ਹਾਥ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਗੁਣ ਉਚਾਰਣ ਹਰਿ ਨਾਮ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਪਾਥ ॥
ਕਰਹੁ ਕ੍ਰਿਪਾ ਮੁਰਾਰਿ ਮਾਧਉ ਸੁਣਿ ਨਾਨਕ ਜੀਵੈ ਗਾਥ ॥੨॥੭॥੩੦॥
ਪਤਿਤ ਪਾਵਨ ਨਾਮੁ ਜਾ ਕੋ ਅਨਾਥ ਕੋ ਹੈ ਨਾਥੁ ॥
ਮਹਾ ਭਉਜਲ ਮਾਹਿ ਤੁਲਹੋ ਜਾ ਕੋ ਲਿਖਿਓ ਮਾਥ ॥੧॥
ਡੂਬੇ ਨਾਮ ਬਿਨੁ ਘਨ ਸਾਥ ॥
ਕਰਣ ਕਾਰਣੁ ਚਿਤਿ ਨ ਆਵੈ ਦੇ ਕਰਿ ਰਾਖੈ ਹਾਥ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਗੁਣ ਉਚਾਰਣ ਹਰਿ ਨਾਮ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਪਾਥ ॥
ਕਰਹੁ ਕ੍ਰਿਪਾ ਮੁਰਾਰਿ ਮਾਧਉ ਸੁਣਿ ਨਾਨਕ ਜੀਵੈ ਗਾਥ ॥੨॥੭॥੩੦॥
मारू महला ५ ॥
पतित पावन नामु जा को अनाथ को है नाथु ॥
महा भउजल माहि तुलहो जा को लिखिओ माथ ॥१॥
डूबे नाम बिनु घन साथ ॥
करण कारणु चिति न आवै दे करि राखै हाथ ॥१॥ रहाउ ॥
साधसंगति गुण उचारण हरि नाम अंम्रित पाथ ॥
करहु क्रिपा मुरारि माधउ सुणि नानक जीवै गाथ ॥२॥७॥३०॥
पतित पावन नामु जा को अनाथ को है नाथु ॥
महा भउजल माहि तुलहो जा को लिखिओ माथ ॥१॥
डूबे नाम बिनु घन साथ ॥
करण कारणु चिति न आवै दे करि राखै हाथ ॥१॥ रहाउ ॥
साधसंगति गुण उचारण हरि नाम अंम्रित पाथ ॥
करहु क्रिपा मुरारि माधउ सुणि नानक जीवै गाथ ॥२॥७॥३०॥
हिन्दी अर्थ: मारू महला ५॥ हे भाई ! जिस परमात्मा का नाम पापियों को पवित्र करने योग्य है। जो बेआसरों का आसरा है। वह परमात्मा इस भयानक संसार समुंद्र में (जीव के लिए) जहाज है। (पर ये उसी को मिलता है) जिसके माथे पर (मिलाप के लेख) लिखे होते हैं। 1। हे भाई ! उसके नाम के बिना (ना जाने कितने ही) काफिले (इस संसार समुंद्र में) डूब रहे हैं। (क्योंकि) जगत का मूल परमात्मा (उनके) चिक्त में नहीं बसता जो परमात्मा (जीवों को) हाथ दे के बचाता है। 1। रहाउ। हे भाई ! साध-संगति में (टिक के) परमात्मा का नाम परमात्मा के गुण उचारते रहना- यही है आत्मिक जीवन देने वाला रास्ता। हे नानक ! (कह-) हे मुरारी ! मेहर कर (ता कि तेरा दास तेरी) सिफत सालाह सुन के आत्मिक जीवन हासिल करता रहे। 2। 7। 30।
ਮਾਰੂ ਅੰਜੁਲੀ ਮਹਲਾ ੫ ਘਰੁ ੭
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਸੰਜੋਗੁ ਵਿਜੋਗੁ ਧੁਰਹੁ ਹੀ ਹੂਆ ॥
ਪੰਚ ਧਾਤੁ ਕਰਿ ਪੁਤਲਾ ਕੀਆ ॥
ਸਾਹੈ ਕੈ ਫੁਰਮਾਇਅੜੈ ਜੀ ਦੇਹੀ ਵਿਚਿ ਜੀਉ ਆਇ ਪਇਆ ॥੧॥
ਜਿਥੈ ਅਗਨਿ ਭਖੈ ਭੜਹਾਰੇ ॥
ਊਰਧ ਮੁਖ ਮਹਾ ਗੁਬਾਰੇ ॥
ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ਸਮਾਲੇ ਸੋਈ ਓਥੈ ਖਸਮਿ ਛਡਾਇ ਲਇਆ ॥੨॥
ਵਿਚਹੁ ਗਰਭੈ ਨਿਕਲਿ ਆਇਆ ॥
ਖਸਮੁ ਵਿਸਾਰਿ ਦੁਨੀ ਚਿਤੁ ਲਾਇਆ ॥
ਆਵੈ ਜਾਇ ਭਵਾਈਐ ਜੋਨੀ ਰਹਣੁ ਨ ਕਿਤਹੀ ਥਾਇ ਭਇਆ ॥੩॥
ਮਿਹਰਵਾਨਿ ਰਖਿ ਲਇਅਨੁ ਆਪੇ ॥
ਜੀਅ ਜੰਤ ਸਭਿ ਤਿਸ ਕੇ ਥਾਪੇ ॥
ਜਨਮੁ ਪਦਾਰਥੁ ਜਿਣਿ ਚਲਿਆ ਨਾਨਕ ਆਇਆ ਸੋ ਪਰਵਾਣੁ ਥਿਆ ॥੪॥੧॥੩੧॥
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਸੰਜੋਗੁ ਵਿਜੋਗੁ ਧੁਰਹੁ ਹੀ ਹੂਆ ॥
ਪੰਚ ਧਾਤੁ ਕਰਿ ਪੁਤਲਾ ਕੀਆ ॥
ਸਾਹੈ ਕੈ ਫੁਰਮਾਇਅੜੈ ਜੀ ਦੇਹੀ ਵਿਚਿ ਜੀਉ ਆਇ ਪਇਆ ॥੧॥
ਜਿਥੈ ਅਗਨਿ ਭਖੈ ਭੜਹਾਰੇ ॥
ਊਰਧ ਮੁਖ ਮਹਾ ਗੁਬਾਰੇ ॥
ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ਸਮਾਲੇ ਸੋਈ ਓਥੈ ਖਸਮਿ ਛਡਾਇ ਲਇਆ ॥੨॥
ਵਿਚਹੁ ਗਰਭੈ ਨਿਕਲਿ ਆਇਆ ॥
ਖਸਮੁ ਵਿਸਾਰਿ ਦੁਨੀ ਚਿਤੁ ਲਾਇਆ ॥
ਆਵੈ ਜਾਇ ਭਵਾਈਐ ਜੋਨੀ ਰਹਣੁ ਨ ਕਿਤਹੀ ਥਾਇ ਭਇਆ ॥੩॥
ਮਿਹਰਵਾਨਿ ਰਖਿ ਲਇਅਨੁ ਆਪੇ ॥
ਜੀਅ ਜੰਤ ਸਭਿ ਤਿਸ ਕੇ ਥਾਪੇ ॥
ਜਨਮੁ ਪਦਾਰਥੁ ਜਿਣਿ ਚਲਿਆ ਨਾਨਕ ਆਇਆ ਸੋ ਪਰਵਾਣੁ ਥਿਆ ॥੪॥੧॥੩੧॥
मारू अंजुली महला ५ घरु ७
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
संजोगु विजोगु धुरहु ही हूआ ॥
पंच धातु करि पुतला कीआ ॥
साहै कै फुरमाइअड़ै जी देही विचि जीउ आइ पइआ ॥१॥
जिथै अगनि भखै भड़हारे ॥
ऊरध मुख महा गुबारे ॥
सासि सासि समाले सोई ओथै खसमि छडाइ लइआ ॥२॥
विचहु गरभै निकलि आइआ ॥
खसमु विसारि दुनी चितु लाइआ ॥
आवै जाइ भवाईऐ जोनी रहणु न कितही थाइ भइआ ॥३॥
मिहरवानि रखि लइअनु आपे ॥
जीअ जंत सभि तिस के थापे ॥
जनमु पदारथु जिणि चलिआ नानक आइआ सो परवाणु थिआ ॥४॥१॥३१॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
संजोगु विजोगु धुरहु ही हूआ ॥
पंच धातु करि पुतला कीआ ॥
साहै कै फुरमाइअड़ै जी देही विचि जीउ आइ पइआ ॥१॥
जिथै अगनि भखै भड़हारे ॥
ऊरध मुख महा गुबारे ॥
सासि सासि समाले सोई ओथै खसमि छडाइ लइआ ॥२॥
विचहु गरभै निकलि आइआ ॥
खसमु विसारि दुनी चितु लाइआ ॥
आवै जाइ भवाईऐ जोनी रहणु न कितही थाइ भइआ ॥३॥
मिहरवानि रखि लइअनु आपे ॥
जीअ जंत सभि तिस के थापे ॥
जनमु पदारथु जिणि चलिआ नानक आइआ सो परवाणु थिआ ॥४॥१॥३१॥
हिन्दी अर्थ: मारू अंजुली महला ५ घरु ७ ੴ सतिगुर प्रसादि॥ हे भाई ! (प्राण और शरीर का) मिलाप और विछोड़ा परमात्मा की रजा अनुसार ही होता है। (परमात्मा के हुकम में ही) पाँच तत्व (इकट्ठे) करके शरीर बनाया जाता है। प्रभू-पातशाह के हुकम अनुसार ही जीवात्मा शरीर में आ टिकता है। 1। हे भाई ! जहाँ (माँ के पेट में पेट की) आग बहुत जलती है। उस भयानक अंधेरे में जीव उल्टे मुँह पड़ा रहता है। जीव (वहाँ अपने) हरेक साँस के साथ परमात्मा को याद करता रहता है। उस जगह मालिक-प्रभू ने ही जीव को बचाया होता है। 2। हे भाई ! जब जीव माँ के पेट में से बाहर आ जाता है। मालिक प्रभू को भुला के दुनियां के पदार्थों में चिक्त जोड़ लेता है। (प्रभू को बिसारने के कारण) पैदा होने-मरने के चक्कर में (जीव) पड़ जाता है। जूनियों में पाया जाता है। किसी एक जगह इसको ठिकाना नहीं मिलता। 3। उस मेहरवान (प्रभू) ने स्वयं ही (कई जीव जनम-मरण के चक्कर से) बचाए हैं। हे भाई ! सारे जीव उस (परमात्मा) के ही पैदा किए हुए हैं। हे नानक ! जो मनुष्य (परमात्मा के नाम से) इस कीमती जनम (की बाज़ी) को जीत के यहाँ से चलता है। वह इस जगत में आया हुआ मनुष्य परमात्मा की हजूरी में कबूल होता है। 4। 1। 31।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 1007 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
Old Delhi के Karim’s में दोपहर का खाना, और बीच में मौन-सा एक pause।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 39 पंक्तियों का है, 5 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1007” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 1008 →, पीछे का: ← अंग 1006।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।