अंग
1051
राग मारू
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਾਚਾ ਸਬਦਿ ਪਛਾਤਾ ॥
ਨਾ ਤਿਸੁ ਕੁਟੰਬੁ ਨਾ ਤਿਸੁ ਮਾਤਾ ॥
ਏਕੋ ਏਕੁ ਰਵਿਆ ਸਭ ਅੰਤਰਿ ਸਭਨਾ ਜੀਆ ਕਾ ਆਧਾਰੀ ਹੇ ॥੧੩॥
ਹਉਮੈ ਮੇਰਾ ਦੂਜਾ ਭਾਇਆ ॥
ਕਿਛੁ ਨ ਚਲੈ ਧੁਰਿ ਖਸਮਿ ਲਿਖਿ ਪਾਇਆ ॥
ਗੁਰ ਸਾਚੇ ਤੇ ਸਾਚੁ ਕਮਾਵਹਿ ਸਾਚੈ ਦੂਖ ਨਿਵਾਰੀ ਹੇ ॥੧੪॥
ਜਾ ਤੂ ਦੇਹਿ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਪਾਏ ॥
ਸਾਚੈ ਸਬਦੇ ਸਾਚੁ ਕਮਾਏ ॥
ਅੰਦਰੁ ਸਾਚਾ ਮਨੁ ਤਨੁ ਸਾਚਾ ਭਗਤਿ ਭਰੇ ਭੰਡਾਰੀ ਹੇ ॥੧੫॥
ਆਪੇ ਵੇਖੈ ਹੁਕਮਿ ਚਲਾਏ ॥
ਅਪਣਾ ਭਾਣਾ ਆਪਿ ਕਰਾਏ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਬੈਰਾਗੀ ਮਨੁ ਤਨੁ ਰਸਨਾ ਨਾਮਿ ਸਵਾਰੀ ਹੇ ॥੧੬॥੭॥
ਨਾ ਤਿਸੁ ਕੁਟੰਬੁ ਨਾ ਤਿਸੁ ਮਾਤਾ ॥
ਏਕੋ ਏਕੁ ਰਵਿਆ ਸਭ ਅੰਤਰਿ ਸਭਨਾ ਜੀਆ ਕਾ ਆਧਾਰੀ ਹੇ ॥੧੩॥
ਹਉਮੈ ਮੇਰਾ ਦੂਜਾ ਭਾਇਆ ॥
ਕਿਛੁ ਨ ਚਲੈ ਧੁਰਿ ਖਸਮਿ ਲਿਖਿ ਪਾਇਆ ॥
ਗੁਰ ਸਾਚੇ ਤੇ ਸਾਚੁ ਕਮਾਵਹਿ ਸਾਚੈ ਦੂਖ ਨਿਵਾਰੀ ਹੇ ॥੧੪॥
ਜਾ ਤੂ ਦੇਹਿ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਪਾਏ ॥
ਸਾਚੈ ਸਬਦੇ ਸਾਚੁ ਕਮਾਏ ॥
ਅੰਦਰੁ ਸਾਚਾ ਮਨੁ ਤਨੁ ਸਾਚਾ ਭਗਤਿ ਭਰੇ ਭੰਡਾਰੀ ਹੇ ॥੧੫॥
ਆਪੇ ਵੇਖੈ ਹੁਕਮਿ ਚਲਾਏ ॥
ਅਪਣਾ ਭਾਣਾ ਆਪਿ ਕਰਾਏ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਬੈਰਾਗੀ ਮਨੁ ਤਨੁ ਰਸਨਾ ਨਾਮਿ ਸਵਾਰੀ ਹੇ ॥੧੬॥੭॥
गुरमुखि साचा सबदि पछाता ॥
ना तिसु कुटंबु ना तिसु माता ॥
एको एकु रविआ सभ अंतरि सभना जीआ का आधारी हे ॥१३॥
हउमै मेरा दूजा भाइआ ॥
किछु न चलै धुरि खसमि लिखि पाइआ ॥
गुर साचे ते साचु कमावहि साचै दूख निवारी हे ॥१४॥
जा तू देहि सदा सुखु पाए ॥
साचै सबदे साचु कमाए ॥
अंदरु साचा मनु तनु साचा भगति भरे भंडारी हे ॥१५॥
आपे वेखै हुकमि चलाए ॥
अपणा भाणा आपि कराए ॥
नानक नामि रते बैरागी मनु तनु रसना नामि सवारी हे ॥१६॥७॥
ना तिसु कुटंबु ना तिसु माता ॥
एको एकु रविआ सभ अंतरि सभना जीआ का आधारी हे ॥१३॥
हउमै मेरा दूजा भाइआ ॥
किछु न चलै धुरि खसमि लिखि पाइआ ॥
गुर साचे ते साचु कमावहि साचै दूख निवारी हे ॥१४॥
जा तू देहि सदा सुखु पाए ॥
साचै सबदे साचु कमाए ॥
अंदरु साचा मनु तनु साचा भगति भरे भंडारी हे ॥१५॥
आपे वेखै हुकमि चलाए ॥
अपणा भाणा आपि कराए ॥
नानक नामि रते बैरागी मनु तनु रसना नामि सवारी हे ॥१६॥७॥
हिन्दी अर्थ: हे भाई ! जिस मनुष्य ने गुरू की शरण पड़ कर गुरू के शबद से सदा स्थिर परमात्मा के साथ सांझ डाल ली (उसको यह समझ आ गई कि) उस (परमात्मा) का ना कोई (खास) परिवार है ना उसकी माँ है। वह स्वयं ही स्वयं सब जीवों में व्यापक है और सब जीवों का आसरा है। 13। हे भाई ! (कई ऐसे हैं जिनको) अहंकार अच्छा लगता है। ममता प्यारी लगती है। माया का मोह पसंद है; पर मालिक-प्रभू ने धुर से ही यह मर्यादा चला रखी है कि कोई भी चीज़ (किसी के साथ) नहीं जाती। अभूल गुरू से (शिक्षा ले कर) जो मनुष्य सदा-स्थिर हरी-नाम सिमरन की कमाई करते हैं। सदा-स्थिर परमात्मा ने उनके सारे दुख दूर कर दिए। 14। हे प्रभू ! जब तू (किसी मनुष्य को अपने नाम की दाति) देता है (वह मनुष्य) सदा आत्मिक आनंद पाता है। गुरू के शबद से वह तेरे सदा-स्थिर स्वरूप में टिक के तेरा सदा-स्थिर नाम सिमरता है। उस मनुष्य का हृदय अडोल हो जाता है। उसका मन अडोल हो जाता है। उसका शरीर (विकारों से) अडोल हो जाता है। (उसके अंदर) भगती के भण्डारे भर जाते हैं। 15। हे भाई ! परमात्मा स्वयं ही (सब जीवों की) संभाल कर रहा है (सबको अपने) हुकम में चला रहा है। अपनी रज़ा (जीवों से) खुद कराता है। हे नानक ! जो मनुष्य उसके नाम-रंग में रंगे रहते हैं वे माया से निर्लिप रहते हैं। उनके मन उनके तन उनकी जीभ को परमात्मा के नाम ने सुंदर बना दिया होता है। 16। 7।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਆਪੇ ਆਪੁ ਉਪਾਇ ਉਪੰਨਾ ॥
ਸਭ ਮਹਿ ਵਰਤੈ ਏਕੁ ਪਰਛੰਨਾ ॥
ਸਭਨਾ ਸਾਰ ਕਰੇ ਜਗਜੀਵਨੁ ਜਿਨਿ ਅਪਣਾ ਆਪੁ ਪਛਾਤਾ ਹੇ ॥੧॥
ਜਿਨਿ ਬ੍ਰਹਮਾ ਬਿਸਨੁ ਮਹੇਸੁ ਉਪਾਏ ॥
ਸਿਰਿ ਸਿਰਿ ਧੰਧੈ ਆਪੇ ਲਾਏ ॥
ਜਿਸੁ ਭਾਵੈ ਤਿਸੁ ਆਪੇ ਮੇਲੇ ਜਿਨਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਏਕੋ ਜਾਤਾ ਹੇ ॥੨॥
ਆਵਾ ਗਉਣੁ ਹੈ ਸੰਸਾਰਾ ॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਬਹੁ ਚਿਤੈ ਬਿਕਾਰਾ ॥
ਥਿਰੁ ਸਾਚਾ ਸਾਲਾਹੀ ਸਦ ਹੀ ਜਿਨਿ ਗੁਰ ਕਾ ਸਬਦੁ ਪਛਾਤਾ ਹੇ ॥੩॥
ਇਕਿ ਮੂਲਿ ਲਗੇ ਓਨੀ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ॥
ਡਾਲੀ ਲਾਗੇ ਤਿਨੀ ਜਨਮੁ ਗਵਾਇਆ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਫਲ ਤਿਨ ਜਨ ਕਉ ਲਾਗੇ ਜੋ ਬੋਲਹਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਬਾਤਾ ਹੇ ॥੪॥
ਹਮ ਗੁਣ ਨਾਹੀ ਕਿਆ ਬੋਲਹ ਬੋਲ ॥
ਤੂ ਸਭਨਾ ਦੇਖਹਿ ਤੋਲਹਿ ਤੋਲ ॥
ਜਿਉ ਭਾਵੈ ਤਿਉ ਰਾਖਹਿ ਰਹਣਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਏਕੋ ਜਾਤਾ ਹੇ ॥੫॥
ਜਾ ਤੁਧੁ ਭਾਣਾ ਤਾ ਸਚੀ ਕਾਰੈ ਲਾਏ ॥
ਅਵਗਣ ਛੋਡਿ ਗੁਣ ਮਾਹਿ ਸਮਾਏ ॥
ਗੁਣ ਮਹਿ ਏਕੋ ਨਿਰਮਲੁ ਸਾਚਾ ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਪਛਾਤਾ ਹੇ ॥੬॥
ਜਹ ਦੇਖਾ ਤਹ ਏਕੋ ਸੋਈ ॥
ਦੂਜੀ ਦੁਰਮਤਿ ਸਬਦੇ ਖੋਈ ॥
ਏਕਸੁ ਮਹਿ ਪ੍ਰਭੁ ਏਕੁ ਸਮਾਣਾ ਅਪਣੈ ਰੰਗਿ ਸਦ ਰਾਤਾ ਹੇ ॥੭॥
ਕਾਇਆ ਕਮਲੁ ਹੈ ਕੁਮਲਾਣਾ ॥
ਮਨਮੁਖੁ ਸਬਦੁ ਨ ਬੁਝੈ ਇਆਣਾ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਕਾਇਆ ਖੋਜੇ ਪਾਏ ਜਗਜੀਵਨੁ ਦਾਤਾ ਹੇ ॥੮॥
ਕੋਟ ਗਹੀ ਕੇ ਪਾਪ ਨਿਵਾਰੇ ॥
ਸਦਾ ਹਰਿ ਜੀਉ ਰਾਖੈ ਉਰ ਧਾਰੇ ॥
ਜੋ ਇਛੇ ਸੋਈ ਫਲੁ ਪਾਏ ਜਿਉ ਰੰਗੁ ਮਜੀਠੈ ਰਾਤਾ ਹੇ ॥੯॥
ਮਨਮੁਖੁ ਗਿਆਨੁ ਕਥੇ ਨ ਹੋਈ ॥
ਫਿਰਿ ਫਿਰਿ ਆਵੈ ਠਉਰ ਨ ਕੋਈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਗਿਆਨੁ ਸਦਾ ਸਾਲਾਹੇ ਜੁਗਿ ਜੁਗਿ ਏਕੋ ਜਾਤਾ ਹੇ ॥੧੦॥
ਮਨਮੁਖੁ ਕਾਰ ਕਰੇ ਸਭਿ ਦੁਖ ਸਬਾਏ ॥
ਅੰਤਰਿ ਸਬਦੁ ਨਾਹੀ ਕਿਉ ਦਰਿ ਜਾਏ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਬਦੁ ਵਸੈ ਮਨਿ ਸਾਚਾ ਸਦ ਸੇਵੇ ਸੁਖਦਾਤਾ ਹੇ ॥੧੧॥
ਆਪੇ ਆਪੁ ਉਪਾਇ ਉਪੰਨਾ ॥
ਸਭ ਮਹਿ ਵਰਤੈ ਏਕੁ ਪਰਛੰਨਾ ॥
ਸਭਨਾ ਸਾਰ ਕਰੇ ਜਗਜੀਵਨੁ ਜਿਨਿ ਅਪਣਾ ਆਪੁ ਪਛਾਤਾ ਹੇ ॥੧॥
ਜਿਨਿ ਬ੍ਰਹਮਾ ਬਿਸਨੁ ਮਹੇਸੁ ਉਪਾਏ ॥
ਸਿਰਿ ਸਿਰਿ ਧੰਧੈ ਆਪੇ ਲਾਏ ॥
ਜਿਸੁ ਭਾਵੈ ਤਿਸੁ ਆਪੇ ਮੇਲੇ ਜਿਨਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਏਕੋ ਜਾਤਾ ਹੇ ॥੨॥
ਆਵਾ ਗਉਣੁ ਹੈ ਸੰਸਾਰਾ ॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਬਹੁ ਚਿਤੈ ਬਿਕਾਰਾ ॥
ਥਿਰੁ ਸਾਚਾ ਸਾਲਾਹੀ ਸਦ ਹੀ ਜਿਨਿ ਗੁਰ ਕਾ ਸਬਦੁ ਪਛਾਤਾ ਹੇ ॥੩॥
ਇਕਿ ਮੂਲਿ ਲਗੇ ਓਨੀ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ॥
ਡਾਲੀ ਲਾਗੇ ਤਿਨੀ ਜਨਮੁ ਗਵਾਇਆ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਫਲ ਤਿਨ ਜਨ ਕਉ ਲਾਗੇ ਜੋ ਬੋਲਹਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਬਾਤਾ ਹੇ ॥੪॥
ਹਮ ਗੁਣ ਨਾਹੀ ਕਿਆ ਬੋਲਹ ਬੋਲ ॥
ਤੂ ਸਭਨਾ ਦੇਖਹਿ ਤੋਲਹਿ ਤੋਲ ॥
ਜਿਉ ਭਾਵੈ ਤਿਉ ਰਾਖਹਿ ਰਹਣਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਏਕੋ ਜਾਤਾ ਹੇ ॥੫॥
ਜਾ ਤੁਧੁ ਭਾਣਾ ਤਾ ਸਚੀ ਕਾਰੈ ਲਾਏ ॥
ਅਵਗਣ ਛੋਡਿ ਗੁਣ ਮਾਹਿ ਸਮਾਏ ॥
ਗੁਣ ਮਹਿ ਏਕੋ ਨਿਰਮਲੁ ਸਾਚਾ ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਪਛਾਤਾ ਹੇ ॥੬॥
ਜਹ ਦੇਖਾ ਤਹ ਏਕੋ ਸੋਈ ॥
ਦੂਜੀ ਦੁਰਮਤਿ ਸਬਦੇ ਖੋਈ ॥
ਏਕਸੁ ਮਹਿ ਪ੍ਰਭੁ ਏਕੁ ਸਮਾਣਾ ਅਪਣੈ ਰੰਗਿ ਸਦ ਰਾਤਾ ਹੇ ॥੭॥
ਕਾਇਆ ਕਮਲੁ ਹੈ ਕੁਮਲਾਣਾ ॥
ਮਨਮੁਖੁ ਸਬਦੁ ਨ ਬੁਝੈ ਇਆਣਾ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਕਾਇਆ ਖੋਜੇ ਪਾਏ ਜਗਜੀਵਨੁ ਦਾਤਾ ਹੇ ॥੮॥
ਕੋਟ ਗਹੀ ਕੇ ਪਾਪ ਨਿਵਾਰੇ ॥
ਸਦਾ ਹਰਿ ਜੀਉ ਰਾਖੈ ਉਰ ਧਾਰੇ ॥
ਜੋ ਇਛੇ ਸੋਈ ਫਲੁ ਪਾਏ ਜਿਉ ਰੰਗੁ ਮਜੀਠੈ ਰਾਤਾ ਹੇ ॥੯॥
ਮਨਮੁਖੁ ਗਿਆਨੁ ਕਥੇ ਨ ਹੋਈ ॥
ਫਿਰਿ ਫਿਰਿ ਆਵੈ ਠਉਰ ਨ ਕੋਈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਗਿਆਨੁ ਸਦਾ ਸਾਲਾਹੇ ਜੁਗਿ ਜੁਗਿ ਏਕੋ ਜਾਤਾ ਹੇ ॥੧੦॥
ਮਨਮੁਖੁ ਕਾਰ ਕਰੇ ਸਭਿ ਦੁਖ ਸਬਾਏ ॥
ਅੰਤਰਿ ਸਬਦੁ ਨਾਹੀ ਕਿਉ ਦਰਿ ਜਾਏ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਬਦੁ ਵਸੈ ਮਨਿ ਸਾਚਾ ਸਦ ਸੇਵੇ ਸੁਖਦਾਤਾ ਹੇ ॥੧੧॥
मारू महला ३ ॥
आपे आपु उपाइ उपंना ॥
सभ महि वरतै एकु परछंना ॥
सभना सार करे जगजीवनु जिनि अपणा आपु पछाता हे ॥१॥
जिनि ब्रहमा बिसनु महेसु उपाए ॥
सिरि सिरि धंधै आपे लाए ॥
जिसु भावै तिसु आपे मेले जिनि गुरमुखि एको जाता हे ॥२॥
आवा गउणु है संसारा ॥
माइआ मोहु बहु चितै बिकारा ॥
थिरु साचा सालाही सद ही जिनि गुर का सबदु पछाता हे ॥३॥
इकि मूलि लगे ओनी सुखु पाइआ ॥
डाली लागे तिनी जनमु गवाइआ ॥
अंम्रित फल तिन जन कउ लागे जो बोलहि अंम्रित बाता हे ॥४॥
हम गुण नाही किआ बोलह बोल ॥
तू सभना देखहि तोलहि तोल ॥
जिउ भावै तिउ राखहि रहणा गुरमुखि एको जाता हे ॥५॥
जा तुधु भाणा ता सची कारै लाए ॥
अवगण छोडि गुण माहि समाए ॥
गुण महि एको निरमलु साचा गुर कै सबदि पछाता हे ॥६॥
जह देखा तह एको सोई ॥
दूजी दुरमति सबदे खोई ॥
एकसु महि प्रभु एकु समाणा अपणै रंगि सद राता हे ॥७॥
काइआ कमलु है कुमलाणा ॥
मनमुखु सबदु न बुझै इआणा ॥
गुर परसादी काइआ खोजे पाए जगजीवनु दाता हे ॥८॥
कोट गही के पाप निवारे ॥
सदा हरि जीउ राखै उर धारे ॥
जो इछे सोई फलु पाए जिउ रंगु मजीठै राता हे ॥९॥
मनमुखु गिआनु कथे न होई ॥
फिरि फिरि आवै ठउर न कोई ॥
गुरमुखि गिआनु सदा सालाहे जुगि जुगि एको जाता हे ॥१०॥
मनमुखु कार करे सभि दुख सबाए ॥
अंतरि सबदु नाही किउ दरि जाए ॥
गुरमुखि सबदु वसै मनि साचा सद सेवे सुखदाता हे ॥११॥
आपे आपु उपाइ उपंना ॥
सभ महि वरतै एकु परछंना ॥
सभना सार करे जगजीवनु जिनि अपणा आपु पछाता हे ॥१॥
जिनि ब्रहमा बिसनु महेसु उपाए ॥
सिरि सिरि धंधै आपे लाए ॥
जिसु भावै तिसु आपे मेले जिनि गुरमुखि एको जाता हे ॥२॥
आवा गउणु है संसारा ॥
माइआ मोहु बहु चितै बिकारा ॥
थिरु साचा सालाही सद ही जिनि गुर का सबदु पछाता हे ॥३॥
इकि मूलि लगे ओनी सुखु पाइआ ॥
डाली लागे तिनी जनमु गवाइआ ॥
अंम्रित फल तिन जन कउ लागे जो बोलहि अंम्रित बाता हे ॥४॥
हम गुण नाही किआ बोलह बोल ॥
तू सभना देखहि तोलहि तोल ॥
जिउ भावै तिउ राखहि रहणा गुरमुखि एको जाता हे ॥५॥
जा तुधु भाणा ता सची कारै लाए ॥
अवगण छोडि गुण माहि समाए ॥
गुण महि एको निरमलु साचा गुर कै सबदि पछाता हे ॥६॥
जह देखा तह एको सोई ॥
दूजी दुरमति सबदे खोई ॥
एकसु महि प्रभु एकु समाणा अपणै रंगि सद राता हे ॥७॥
काइआ कमलु है कुमलाणा ॥
मनमुखु सबदु न बुझै इआणा ॥
गुर परसादी काइआ खोजे पाए जगजीवनु दाता हे ॥८॥
कोट गही के पाप निवारे ॥
सदा हरि जीउ राखै उर धारे ॥
जो इछे सोई फलु पाए जिउ रंगु मजीठै राता हे ॥९॥
मनमुखु गिआनु कथे न होई ॥
फिरि फिरि आवै ठउर न कोई ॥
गुरमुखि गिआनु सदा सालाहे जुगि जुगि एको जाता हे ॥१०॥
मनमुखु कार करे सभि दुख सबाए ॥
अंतरि सबदु नाही किउ दरि जाए ॥
गुरमुखि सबदु वसै मनि साचा सद सेवे सुखदाता हे ॥११॥
हिन्दी अर्थ: मारू महला ३॥ हे भाई ! परमात्मा स्वयं ही अपने आप को पैदा करके प्रकट हुआ। (यह) जिस मनुष्य ने सदा अपने जीवन को पड़ताला है (आत्मावलोकन किया है वह जानता है ) परमात्मा स्वयं ही सबके अंदर गुप्त रूप में व्यापक है और वह जगत का सहारा प्रभू सब जीवों की संभाल करता है। 1। हे भाई ! जिस मनुष्य ने गुरू की शरण पड़ कर एक परमात्मा को हर जगह बसता पहचान लिया (वह समझता है कि) जिस परमात्मा ने ब्रहमा-विष्णू व शिव पैदा किए। वह स्वयं ही हरेक जीव को धंधे में लगाता है और जो उसको अच्छा लगता है उसको स्वयं ही (अपने चरणों में) जोड़ता है। 2। हे भाई ! जिस मनुष्य ने गुरू के शबद के साथ सांझ डाल ली (वह जानता है कि) यह जगत जनम-मरण का चक्कर ही है। यहाँ माया का मोह प्रबल है (जिसके कारण जीव) विकार चितवता रहता है। (यहाँ) सदा कायम रहने वाला परमात्मा ही सदा सराहनीय है। 3। हे भाई ! कई ऐसे हैं जो जगत के रचनहार प्रभू की याद में जुड़े रहते हैं। वह आत्मिक आनंद पाते हैं। पर जो मनुष्य मायावी पदार्थों में लगे रहते हैं। उन्होंने अपना जीवन गवा लिया है। आत्मिक जीवन देने वाले फल उनको ही लगते हैं जो आत्मिक जीवन देने वाले (सिफत-सालाह के) बोल बोलते हैं। 4। हे प्रभू ! हम जीव गुण-हीन हैं। (अपने बुरे कर्मों के कारण) हम बोलने के भी लायक नहीं हैं। तू सब जीवों (के कर्मों) को देखता है परखता है। जैसे तेरी रजा होती है तू हमें रखता है। हम उसी तरह रह सकते हैं। गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य तेरे साथ ही सांझ डालता है। 5। हे प्रभू ! जब तुझे अच्छा लगे। तब तू (सब जीवों को) सच्ची कार में लगाता है। (जिनको लगाता है। वे) अवगुण छोड़ के तेरे गुणों में लीन हुए रहते हैं। हे भाई ! प्रभू के गुणों में चिक्त जोड़ने से गुरू के शबद से वह पवित्र अविनाशी प्रभू ही (हर जगह) दिखता है। 6। हे भाई ! मैं जिधर देखता हूँ। उधर सिर्फ वह परमात्मा ही दिख रहा है। प्रभू के बिना किसी और को देखने के लिए खोटी मति गुरू के शबद से नाश हो जाती है। (शबद की बरकति से इस तरह दिख जाता है कि) अपने आप में परमात्मा आप ही समाया हुआ है। वह सदा अपनी मौज में रहता है। 7। (इस वास्ते उसके) शरीर में उसका हृदय-कमल-फूल कुम्हलाया रहता है। हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाला बेसमझ मनुष्य गुरू के शबद से सांझ नहीं डालता। जो मनुष्य गुरू की कृपा से अपने शरीर को खोजता है (अपने आत्मिक जीवन को पड़तालता रहता है) वह जगत के सहारे परमात्मा को पा लेता है। 8। वह (अपने अंदर से) शरीर को ग्रसने वाले पाप दूर कर लेता है। हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा को सदा अपने दिल में बसाए रखता है। वह मनुष्य जिस (फल) की इच्छा करता है वह फल हासिल कर लेता है। उसका मन नाम-रंग में इस तरह रंगा रहता है जैसे मजीठ का (पक्का) रंग है। 9। हे भाई ! मन का मुरीद मनुष्य ज्ञान की बातें तो करता है। (पर उसके अंदर आत्मिक जीवन की सूझ) नहीं। वह बार-बार जन्मों के चक्कर में पड़ा रहता है। उसे कहीं ठिकाना नहीं मिलता। गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य (गुरू से) आत्मिक जीवन की सूझ (प्राप्त करके) सदा परमात्मा की सिफत-सालाह करता है। उसको हरेक जुग में एक ही परमात्मा बसता समझ आता है। 10। हे भाई ! मन का मुरीद मनुष्य वही काम करता है जिससे सारे दुख ही दुख घटित हों। उसके अंदर गुरू का शबद नहीं बसता। वह परमात्मा के दर पर नहीं पहुँच सकता। गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य के मन में गुरू का शबद बसता है सदा स्थिर प्रभू बसता है। वह सदा सुखों के दाते प्रभू की सेवा-भक्ति करता है। 11।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 1051 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।
Connaught Place के Bangla Sahib में दोपहर 12 बजे का langar-समय, और बीच में यह पंक्ति।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 46 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1051” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 1052 →, पीछे का: ← अंग 1050।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।