अंग
1012
राग मारू
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਗੁਰ ਸੇਵਾ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਹੈ ਜਿਸ ਨੋ ਹੁਕਮੁ ਮਨਾਏ ॥੭॥
ਸੁਇਨਾ ਰੁਪਾ ਸਭ ਧਾਤੁ ਹੈ ਮਾਟੀ ਰਲਿ ਜਾਈ ॥
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਨਾਲਿ ਨ ਚਲਈ ਸਤਿਗੁਰਿ ਬੂਝ ਬੁਝਾਈ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਸੇ ਨਿਰਮਲੇ ਸਾਚੈ ਰਹੇ ਸਮਾਈ ॥੮॥੫॥
ਸੁਇਨਾ ਰੁਪਾ ਸਭ ਧਾਤੁ ਹੈ ਮਾਟੀ ਰਲਿ ਜਾਈ ॥
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਨਾਲਿ ਨ ਚਲਈ ਸਤਿਗੁਰਿ ਬੂਝ ਬੁਝਾਈ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਸੇ ਨਿਰਮਲੇ ਸਾਚੈ ਰਹੇ ਸਮਾਈ ॥੮॥੫॥
गुर सेवा सदा सुखु है जिस नो हुकमु मनाए ॥७॥
सुइना रुपा सभ धातु है माटी रलि जाई ॥
बिनु नावै नालि न चलई सतिगुरि बूझ बुझाई ॥
नानक नामि रते से निरमले साचै रहे समाई ॥८॥५॥
सुइना रुपा सभ धातु है माटी रलि जाई ॥
बिनु नावै नालि न चलई सतिगुरि बूझ बुझाई ॥
नानक नामि रते से निरमले साचै रहे समाई ॥८॥५॥
हिन्दी अर्थ: गुरू जिस सेवक से परमात्मा का हुकम मनाता है उस सेवक को गुरू की (इस बताई) सेवा से सदा आत्मिक आनंद मिला रहता है। 7। (हे भाई !) सोना-चाँदी आदि सब (नाशवंत) माया है (जब जीव शरीर त्यागता है तो उसके लिए तो ये सब) मिट्टी में मिल गए (क्योंकि उसके किसी काम नहीं आते)। सतिगुरू ने (प्रभू के सेवक को यह) सूझ दे दी है कि परमात्मा के नाम के बिना (सोना-चाँदी आदि कोई भी चीज़ जीव के) साथ नहीं जाती। हे नानक ! (गुरू की कृपा से) जो लोग परमात्मा के नाम-रंग में रंगे जाते हैं वे पवित्र जीवन वाले हो जाते हैं। वे सदा-स्थिर प्रभू (की याद) में लीन रहते हैं। 8। 5।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਹੁਕਮੁ ਭਇਆ ਰਹਣਾ ਨਹੀ ਧੁਰਿ ਫਾਟੇ ਚੀਰੈ ॥
ਏਹੁ ਮਨੁ ਅਵਗਣਿ ਬਾਧਿਆ ਸਹੁ ਦੇਹ ਸਰੀਰੈ ॥
ਪੂਰੈ ਗੁਰਿ ਬਖਸਾਈਅਹਿ ਸਭਿ ਗੁਨਹ ਫਕੀਰੈ ॥੧॥
ਕਿਉ ਰਹੀਐ ਉਠਿ ਚਲਣਾ ਬੁਝੁ ਸਬਦ ਬੀਚਾਰਾ ॥
ਜਿਸੁ ਤੂ ਮੇਲਹਿ ਸੋ ਮਿਲੈ ਧੁਰਿ ਹੁਕਮੁ ਅਪਾਰਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਿਉ ਤੂ ਰਾਖਹਿ ਤਿਉ ਰਹਾ ਜੋ ਦੇਹਿ ਸੁ ਖਾਉ ॥
ਜਿਉ ਤੂ ਚਲਾਵਹਿ ਤਿਉ ਚਲਾ ਮੁਖਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਉ ॥
ਮੇਰੇ ਠਾਕੁਰ ਹਥਿ ਵਡਿਆਈਆ ਮੇਲਹਿ ਮਨਿ ਚਾਉ ॥੨॥
ਕੀਤਾ ਕਿਆ ਸਾਲਾਹੀਐ ਕਰਿ ਦੇਖੈ ਸੋਈ ॥
ਜਿਨਿ ਕੀਆ ਸੋ ਮਨਿ ਵਸੈ ਮੈ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਈ ॥
ਸੋ ਸਾਚਾ ਸਾਲਾਹੀਐ ਸਾਚੀ ਪਤਿ ਹੋਈ ॥੩॥
ਪੰਡਿਤੁ ਪੜਿ ਨ ਪਹੁਚਈ ਬਹੁ ਆਲ ਜੰਜਾਲਾ ॥
ਪਾਪ ਪੁੰਨ ਦੁਇ ਸੰਗਮੇ ਖੁਧਿਆ ਜਮਕਾਲਾ ॥
ਵਿਛੋੜਾ ਭਉ ਵੀਸਰੈ ਪੂਰਾ ਰਖਵਾਲਾ ॥੪॥
ਜਿਨ ਕੀ ਲੇਖੈ ਪਤਿ ਪਵੈ ਸੇ ਪੂਰੇ ਭਾਈ ॥
ਪੂਰੇ ਪੂਰੀ ਮਤਿ ਹੈ ਸਚੀ ਵਡਿਆਈ ॥
ਦੇਦੇ ਤੋਟਿ ਨ ਆਵਈ ਲੈ ਲੈ ਥਕਿ ਪਾਈ ॥੫॥
ਖਾਰ ਸਮੁਦ੍ਰੁ ਢੰਢੋਲੀਐ ਇਕੁ ਮਣੀਆ ਪਾਵੈ ॥
ਦੁਇ ਦਿਨ ਚਾਰਿ ਸੁਹਾਵਣਾ ਮਾਟੀ ਤਿਸੁ ਖਾਵੈ ॥
ਗੁਰੁ ਸਾਗਰੁ ਸਤਿ ਸੇਵੀਐ ਦੇ ਤੋਟਿ ਨ ਆਵੈ ॥੬॥
ਮੇਰੇ ਪ੍ਰਭ ਭਾਵਨਿ ਸੇ ਊਜਲੇ ਸਭ ਮੈਲੁ ਭਰੀਜੈ ॥
ਮੈਲਾ ਊਜਲੁ ਤਾ ਥੀਐ ਪਾਰਸ ਸੰਗਿ ਭੀਜੈ ॥
ਵੰਨੀ ਸਾਚੇ ਲਾਲ ਕੀ ਕਿਨਿ ਕੀਮਤਿ ਕੀਜੈ ॥੭॥
ਭੇਖੀ ਹਾਥ ਨ ਲਭਈ ਤੀਰਥਿ ਨਹੀ ਦਾਨੇ ॥
ਪੂਛਉ ਬੇਦ ਪੜੰਤਿਆ ਮੂਠੀ ਵਿਣੁ ਮਾਨੇ ॥
ਨਾਨਕ ਕੀਮਤਿ ਸੋ ਕਰੇ ਪੂਰਾ ਗੁਰੁ ਗਿਆਨੇ ॥੮॥੬॥
ਹੁਕਮੁ ਭਇਆ ਰਹਣਾ ਨਹੀ ਧੁਰਿ ਫਾਟੇ ਚੀਰੈ ॥
ਏਹੁ ਮਨੁ ਅਵਗਣਿ ਬਾਧਿਆ ਸਹੁ ਦੇਹ ਸਰੀਰੈ ॥
ਪੂਰੈ ਗੁਰਿ ਬਖਸਾਈਅਹਿ ਸਭਿ ਗੁਨਹ ਫਕੀਰੈ ॥੧॥
ਕਿਉ ਰਹੀਐ ਉਠਿ ਚਲਣਾ ਬੁਝੁ ਸਬਦ ਬੀਚਾਰਾ ॥
ਜਿਸੁ ਤੂ ਮੇਲਹਿ ਸੋ ਮਿਲੈ ਧੁਰਿ ਹੁਕਮੁ ਅਪਾਰਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਿਉ ਤੂ ਰਾਖਹਿ ਤਿਉ ਰਹਾ ਜੋ ਦੇਹਿ ਸੁ ਖਾਉ ॥
ਜਿਉ ਤੂ ਚਲਾਵਹਿ ਤਿਉ ਚਲਾ ਮੁਖਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਉ ॥
ਮੇਰੇ ਠਾਕੁਰ ਹਥਿ ਵਡਿਆਈਆ ਮੇਲਹਿ ਮਨਿ ਚਾਉ ॥੨॥
ਕੀਤਾ ਕਿਆ ਸਾਲਾਹੀਐ ਕਰਿ ਦੇਖੈ ਸੋਈ ॥
ਜਿਨਿ ਕੀਆ ਸੋ ਮਨਿ ਵਸੈ ਮੈ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਈ ॥
ਸੋ ਸਾਚਾ ਸਾਲਾਹੀਐ ਸਾਚੀ ਪਤਿ ਹੋਈ ॥੩॥
ਪੰਡਿਤੁ ਪੜਿ ਨ ਪਹੁਚਈ ਬਹੁ ਆਲ ਜੰਜਾਲਾ ॥
ਪਾਪ ਪੁੰਨ ਦੁਇ ਸੰਗਮੇ ਖੁਧਿਆ ਜਮਕਾਲਾ ॥
ਵਿਛੋੜਾ ਭਉ ਵੀਸਰੈ ਪੂਰਾ ਰਖਵਾਲਾ ॥੪॥
ਜਿਨ ਕੀ ਲੇਖੈ ਪਤਿ ਪਵੈ ਸੇ ਪੂਰੇ ਭਾਈ ॥
ਪੂਰੇ ਪੂਰੀ ਮਤਿ ਹੈ ਸਚੀ ਵਡਿਆਈ ॥
ਦੇਦੇ ਤੋਟਿ ਨ ਆਵਈ ਲੈ ਲੈ ਥਕਿ ਪਾਈ ॥੫॥
ਖਾਰ ਸਮੁਦ੍ਰੁ ਢੰਢੋਲੀਐ ਇਕੁ ਮਣੀਆ ਪਾਵੈ ॥
ਦੁਇ ਦਿਨ ਚਾਰਿ ਸੁਹਾਵਣਾ ਮਾਟੀ ਤਿਸੁ ਖਾਵੈ ॥
ਗੁਰੁ ਸਾਗਰੁ ਸਤਿ ਸੇਵੀਐ ਦੇ ਤੋਟਿ ਨ ਆਵੈ ॥੬॥
ਮੇਰੇ ਪ੍ਰਭ ਭਾਵਨਿ ਸੇ ਊਜਲੇ ਸਭ ਮੈਲੁ ਭਰੀਜੈ ॥
ਮੈਲਾ ਊਜਲੁ ਤਾ ਥੀਐ ਪਾਰਸ ਸੰਗਿ ਭੀਜੈ ॥
ਵੰਨੀ ਸਾਚੇ ਲਾਲ ਕੀ ਕਿਨਿ ਕੀਮਤਿ ਕੀਜੈ ॥੭॥
ਭੇਖੀ ਹਾਥ ਨ ਲਭਈ ਤੀਰਥਿ ਨਹੀ ਦਾਨੇ ॥
ਪੂਛਉ ਬੇਦ ਪੜੰਤਿਆ ਮੂਠੀ ਵਿਣੁ ਮਾਨੇ ॥
ਨਾਨਕ ਕੀਮਤਿ ਸੋ ਕਰੇ ਪੂਰਾ ਗੁਰੁ ਗਿਆਨੇ ॥੮॥੬॥
मारू महला १ ॥
हुकमु भइआ रहणा नही धुरि फाटे चीरै ॥
एहु मनु अवगणि बाधिआ सहु देह सरीरै ॥
पूरै गुरि बखसाईअहि सभि गुनह फकीरै ॥१॥
किउ रहीऐ उठि चलणा बुझु सबद बीचारा ॥
जिसु तू मेलहि सो मिलै धुरि हुकमु अपारा ॥१॥ रहाउ ॥
जिउ तू राखहि तिउ रहा जो देहि सु खाउ ॥
जिउ तू चलावहि तिउ चला मुखि अंम्रित नाउ ॥
मेरे ठाकुर हथि वडिआईआ मेलहि मनि चाउ ॥२॥
कीता किआ सालाहीऐ करि देखै सोई ॥
जिनि कीआ सो मनि वसै मै अवरु न कोई ॥
सो साचा सालाहीऐ साची पति होई ॥३॥
पंडितु पड़ि न पहुचई बहु आल जंजाला ॥
पाप पुंन दुइ संगमे खुधिआ जमकाला ॥
विछोड़ा भउ वीसरै पूरा रखवाला ॥४॥
जिन की लेखै पति पवै से पूरे भाई ॥
पूरे पूरी मति है सची वडिआई ॥
देदे तोटि न आवई लै लै थकि पाई ॥५॥
खार समुद्रु ढंढोलीऐ इकु मणीआ पावै ॥
दुइ दिन चारि सुहावणा माटी तिसु खावै ॥
गुरु सागरु सति सेवीऐ दे तोटि न आवै ॥६॥
मेरे प्रभ भावनि से ऊजले सभ मैलु भरीजै ॥
मैला ऊजलु ता थीऐ पारस संगि भीजै ॥
वंनी साचे लाल की किनि कीमति कीजै ॥७॥
भेखी हाथ न लभई तीरथि नही दाने ॥
पूछउ बेद पड़ंतिआ मूठी विणु माने ॥
नानक कीमति सो करे पूरा गुरु गिआने ॥८॥६॥
हुकमु भइआ रहणा नही धुरि फाटे चीरै ॥
एहु मनु अवगणि बाधिआ सहु देह सरीरै ॥
पूरै गुरि बखसाईअहि सभि गुनह फकीरै ॥१॥
किउ रहीऐ उठि चलणा बुझु सबद बीचारा ॥
जिसु तू मेलहि सो मिलै धुरि हुकमु अपारा ॥१॥ रहाउ ॥
जिउ तू राखहि तिउ रहा जो देहि सु खाउ ॥
जिउ तू चलावहि तिउ चला मुखि अंम्रित नाउ ॥
मेरे ठाकुर हथि वडिआईआ मेलहि मनि चाउ ॥२॥
कीता किआ सालाहीऐ करि देखै सोई ॥
जिनि कीआ सो मनि वसै मै अवरु न कोई ॥
सो साचा सालाहीऐ साची पति होई ॥३॥
पंडितु पड़ि न पहुचई बहु आल जंजाला ॥
पाप पुंन दुइ संगमे खुधिआ जमकाला ॥
विछोड़ा भउ वीसरै पूरा रखवाला ॥४॥
जिन की लेखै पति पवै से पूरे भाई ॥
पूरे पूरी मति है सची वडिआई ॥
देदे तोटि न आवई लै लै थकि पाई ॥५॥
खार समुद्रु ढंढोलीऐ इकु मणीआ पावै ॥
दुइ दिन चारि सुहावणा माटी तिसु खावै ॥
गुरु सागरु सति सेवीऐ दे तोटि न आवै ॥६॥
मेरे प्रभ भावनि से ऊजले सभ मैलु भरीजै ॥
मैला ऊजलु ता थीऐ पारस संगि भीजै ॥
वंनी साचे लाल की किनि कीमति कीजै ॥७॥
भेखी हाथ न लभई तीरथि नही दाने ॥
पूछउ बेद पड़ंतिआ मूठी विणु माने ॥
नानक कीमति सो करे पूरा गुरु गिआने ॥८॥६॥
हिन्दी अर्थ: मारू महला १॥ जब (परमात्मा का) हुकम हो जाता है जब (किसी की) चिट्ठी धुर (दरगाह) से फाड़ दी जाती है। तो वह (इस संसार में) नहीं रह सकता। (हे भाई ! जब तक तेरा) ये मन अवगुणों (की फाही) में बँधा हुआ है (तब तक अपने इस) शरीर में (दुख) सह। जो मनुष्य पूरे गुरू के द्वारा परमात्मा के दर का मँगता बनता है उसके सारे गुनाह बख्शे जाते हैं। 1। (हे भाई ! अभी-अभी वक्त है) गुरू के शबद की विचार समझ। (यहाँ सदा) टिके नहीं रहा जा सकता। (जब प्रभू का हुकम आया तब) यहाँ से चलना ही पड़ेगा। (पर। हे प्रभू ! जीवों के क्या वश। ) हे बेअंत प्रभू ! तुझे वही मनुष्य मिल सकता है जिसको तू स्वयं मिलाए। धुर से तेरा (ऐसा ही) हुकम है (ऐसी ही रज़ा है)। 1। रहाउ। (पर। हम जीवों के वश की बात नहीं) हे प्रभू ! जिस हालत में तू मुझे रखता है। मैं उसी हालत में रह सकता हूँ। जो (आत्मिक खुराक) तू मुझे देता है मैं वही खाता हूँ। (आत्मिक जीवन के रास्ते पर) जिस तरह तू मुझे चलाता है मैं उसी तरह चलता हूँ। और अपने मुँह में आत्मिक जीवन देने वाला तेरा नाम डालता हूँ। हे मेरे ठाकुर ! तेरे अपने हाथ में वडिआईआँ (आदर-मान) हैं (जिसको तू वडिआई बख्शता है जिसको तू अपने चरणों में) जोड़ता है उसके मन में (तेरी भक्ति का) चाव पैदा हो जाता है। 2। (परमात्मा की सिफत-सालाह छोड़ के परमात्मा के) पैदा किए हुए की वडिआई करने से कोई (आत्मिक) लाभ नहीं होगा (वडिआई उस करतार की करो) जो (जगत-रचना) कर के स्वयं ही (उसकी) संभाल करता है। जिस करतार ने जगत रचा है वही (मेरे) मन में बसता है। मुझे उस जैसा और कोई नहीं दिखाई देता। उस सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा की ही सिफत-सालाह करनी चाहिए (जो करता है उसको) सदा के लिए आदर मिल जाता है। 3। पंडित (शास्त्र। पुराण आदि धर्म-पुस्तकें सिर्फ) पढ़ के (उस अवस्था पर) नहीं पहुँचता (जहाँ परमात्मा से विछोड़ा समाप्त हो जाए। क्योंकि पढ़-पढ़ के भी) वह माया के जंजालों में बहुत फसा रहता है। (धर्म-शास्त्रों के अनुसार) पाप क्या है औरा पुन्य क्या है ये विचार करता हुआ भी वह द्वैत के फंदे में ही रहता है। माया की भूख और आत्मिक मौत (मौत का डर) उसके सिर पर कायम रहते हैं। परमात्मा के चरणों से विछोड़ा और सहम उस मनुष्य का ही खत्म होता है जिसके मन में हर तरह से रक्षा करने वाला परमात्मा बसा रहता है। 4। हे भाई ! किए कर्मों का हिसाब होने पर जिन्हें इज्जत मिलती है वह सम्पूर्ण बर्तन समझे जाते हैं। ऐसे संपूर्ण गुणवान मनुष्य को परमात्मा के दर से मति भी पूरी ही मिलती है (जिसके कारण वह भूलने वाले जीवन के राह पर नहीं पड़ता) और सदा-स्थिर रहने वाली इज्जत प्राप्त होती है। (वह परमात्मा बेअंत दातों का मालिक है। जीव को) सदा देता है (उसके खजाने में) घाटा नहीं पड़ता। जीव दातें ले ले के थक जाता है। 5। (इस बात की बहुत उपमा की जाती है कि देवताओं ने समुंद्र मथा और उसमें से चौदह रत्न निकले। भला) अगर खारा समुंद्र मथने से। उसमें से कोई मनुष्य रत्न ढूँढ ले (तो भी आखिर कौन सी बड़ी बात कर ली। वह रतन) दो-चार दिन ही सुंदर लगता है (अंत में) उस रत्न को कभी ना कभी मिट्टी ही खा जाती है। (सतिगुरू असल समुंद्र है) अगर सतिगुरू” समुंद्र को सेवा जाए (अगर गुरू-समुंद्र की शरण पड़ें। तो गुरू-समुंद्र ऐसा नाम-रत्न) देता है जिसमें कभी भी कमी नहीं आ सकती। 6। सारी दुनिया (माया के मोह की) मैल से भरी हुई है। सिर्फ वह लोग साफ-सुथरे हैं जो परमात्मा को प्यारे लगते हैं। (माया के मोह से) मलीन-मन हुआ आदमी तब ही पवित्र हो सकता है जब वह गुरू पारस की संगति में रह के (परमात्मा के नाम-अमृत से) भीगता है। सदा-स्थिर प्रभू-लाल का नाम-रंग उसको ऐसा चढ़ता है कि किसी भी तरफ से उसका मूल्य नहीं पड़ सकता। 7। पर उस नाम-रंग की गहराई बाहरी धार्मिक पहिरावों से नहीं पाई जा सकती। तीर्थ पर स्नान करने से दान-पून्य करने से नहीं मिलती। मैं बेद पढ़ने वालों से ये भेद पूछता हूँ (धार्मिक पुस्तकें पढ़ने से नाम-रंग की गहराई की समझ नहीं पड़ती)। जब तक नाम-रंग में मन नहीं डूबता (मन नहीं भीगता तब तक सारी दुनिया ही माया-मोह में) ठॅगी जा रही है। हे नानक ! नाम-रंग की कद्र वही मनुष्य करता है जिसको पूरा गुरू मिलता है और (गुरू के माध्यम से परमात्मा के साथ) गहरी सांझ मिलती है। 8। 6।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਮਨਮੁਖੁ ਲਹਰਿ ਘਰੁ ਤਜਿ ਵਿਗੂਚੈ ਅਵਰਾ ਕੇ ਘਰ ਹੇਰੈ ॥
ਗ੍ਰਿਹ ਧਰਮੁ ਗਵਾਏ ਸਤਿਗੁਰੁ ਨ ਭੇਟੈ ਦੁਰਮਤਿ ਘੂਮਨ ਘੇਰੈ ॥
ਦਿਸੰਤਰੁ ਭਵੈ ਪਾਠ ਪੜਿ ਥਾਕਾ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਹੋਇ ਵਧੇਰੈ ॥
ਕਾਚੀ ਪਿੰਡੀ ਸਬਦੁ ਨ ਚੀਨੈ ਉਦਰੁ ਭਰੈ ਜੈਸੇ ਢੋਰੈ ॥੧॥
ਬਾਬਾ ਐਸੀ ਰਵਤ ਰਵੈ ਸੰਨਿਆਸੀ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਏਕ ਲਿਵ ਲਾਗੀ ਤੇਰੈ ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਤ੍ਰਿਪਤਾਸੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਘੋਲੀ ਗੇਰੂ ਰੰਗੁ ਚੜਾਇਆ ਵਸਤ੍ਰ ਭੇਖ ਭੇਖਾਰੀ ॥
ਕਾਪੜ ਫਾਰਿ ਬਨਾਈ ਖਿੰਥਾ ਝੋਲੀ ਮਾਇਆਧਾਰੀ ॥
ਘਰਿ ਘਰਿ ਮਾਗੈ ਜਗੁ ਪਰਬੋਧੈ ਮਨਿ ਅੰਧੈ ਪਤਿ ਹਾਰੀ ॥
ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਣਾ ਸਬਦੁ ਨ ਚੀਨੈ ਜੂਐ ਬਾਜੀ ਹਾਰੀ ॥੨॥
ਮਨਮੁਖੁ ਲਹਰਿ ਘਰੁ ਤਜਿ ਵਿਗੂਚੈ ਅਵਰਾ ਕੇ ਘਰ ਹੇਰੈ ॥
ਗ੍ਰਿਹ ਧਰਮੁ ਗਵਾਏ ਸਤਿਗੁਰੁ ਨ ਭੇਟੈ ਦੁਰਮਤਿ ਘੂਮਨ ਘੇਰੈ ॥
ਦਿਸੰਤਰੁ ਭਵੈ ਪਾਠ ਪੜਿ ਥਾਕਾ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਹੋਇ ਵਧੇਰੈ ॥
ਕਾਚੀ ਪਿੰਡੀ ਸਬਦੁ ਨ ਚੀਨੈ ਉਦਰੁ ਭਰੈ ਜੈਸੇ ਢੋਰੈ ॥੧॥
ਬਾਬਾ ਐਸੀ ਰਵਤ ਰਵੈ ਸੰਨਿਆਸੀ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਏਕ ਲਿਵ ਲਾਗੀ ਤੇਰੈ ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਤ੍ਰਿਪਤਾਸੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਘੋਲੀ ਗੇਰੂ ਰੰਗੁ ਚੜਾਇਆ ਵਸਤ੍ਰ ਭੇਖ ਭੇਖਾਰੀ ॥
ਕਾਪੜ ਫਾਰਿ ਬਨਾਈ ਖਿੰਥਾ ਝੋਲੀ ਮਾਇਆਧਾਰੀ ॥
ਘਰਿ ਘਰਿ ਮਾਗੈ ਜਗੁ ਪਰਬੋਧੈ ਮਨਿ ਅੰਧੈ ਪਤਿ ਹਾਰੀ ॥
ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਣਾ ਸਬਦੁ ਨ ਚੀਨੈ ਜੂਐ ਬਾਜੀ ਹਾਰੀ ॥੨॥
मारू महला १ ॥
मनमुखु लहरि घरु तजि विगूचै अवरा के घर हेरै ॥
ग्रिह धरमु गवाए सतिगुरु न भेटै दुरमति घूमन घेरै ॥
दिसंतरु भवै पाठ पड़ि थाका त्रिसना होइ वधेरै ॥
काची पिंडी सबदु न चीनै उदरु भरै जैसे ढोरै ॥१॥
बाबा ऐसी रवत रवै संनिआसी ॥
गुर कै सबदि एक लिव लागी तेरै नामि रते त्रिपतासी ॥१॥ रहाउ ॥
घोली गेरू रंगु चड़ाइआ वसत्र भेख भेखारी ॥
कापड़ फारि बनाई खिंथा झोली माइआधारी ॥
घरि घरि मागै जगु परबोधै मनि अंधै पति हारी ॥
भरमि भुलाणा सबदु न चीनै जूऐ बाजी हारी ॥२॥
मनमुखु लहरि घरु तजि विगूचै अवरा के घर हेरै ॥
ग्रिह धरमु गवाए सतिगुरु न भेटै दुरमति घूमन घेरै ॥
दिसंतरु भवै पाठ पड़ि थाका त्रिसना होइ वधेरै ॥
काची पिंडी सबदु न चीनै उदरु भरै जैसे ढोरै ॥१॥
बाबा ऐसी रवत रवै संनिआसी ॥
गुर कै सबदि एक लिव लागी तेरै नामि रते त्रिपतासी ॥१॥ रहाउ ॥
घोली गेरू रंगु चड़ाइआ वसत्र भेख भेखारी ॥
कापड़ फारि बनाई खिंथा झोली माइआधारी ॥
घरि घरि मागै जगु परबोधै मनि अंधै पति हारी ॥
भरमि भुलाणा सबदु न चीनै जूऐ बाजी हारी ॥२॥
हिन्दी अर्थ: मारू महला १॥ पर अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य (त्याग के) जोश में अपना घर त्याग के (फिर रोटी आदि की खातिर) औरों के घर ताकता फिरता है। गृहस्त निभाने का फर्ज (किरत करनी) छोड़ देता है (इस गलत त्याग से उसको) सतिगुरू (भी) नहीं मिलता। और अपनी दुर्मति के चक्रवात में (गोते खाता है)। (अपना घर छोड़ के) और और देशों (का) रटन करता फिरता है। (धर्म-पुस्तकों के) पाठ पढ़-पढ़ के भी थक जाता है। (पर माया की) तृष्णा (खत्म होने की जगह बल्कि) बढ़ती जाती है। होछी मति वाला (मनमुख) गुरू के शबद को नहीं विचारता। (और लोगों के घरों से बग़ैर काम काज वाले) पशुओं की तरह अपना पेट भरता है। 1। हे प्रभू ! असल सन्यासी वह है जो ऐसा जीवन जीए कि गुरू के शबद में जुड़ के उसकी लगन एक (तेरे चरणों) में लगी रहे। तेरे नाम-रंग में रंग के (माया की ओर से) उसे सदा तृप्ति रहेगी। 1। रहाउ। मनमुख बंदा गेरूआ घोलता है। उसका रंग (अपने कपड़ों पर) चढ़ाता है। धार्मिक पहरावे वाले कपड़े पहन के भिखारी बन जाता है। कपड़े फाड़ के (पहनने के लिए) गुदड़ी बनाता है। और (अन्न आटा आदि) माया डालने के लिए झोली (तैयार कर लेता है)। (खुद तो) हरेक घर में (जा के भिक्षा) माँगता है पर जगत को (सत-धर्म का। गृहस्त मार्ग वाला) उपदेश करता है। अपना मन अंधा होने के कारण मनमुख अपनी इज्जत गवा लेता है। भटकना में (पड़ कर जीवन-राह से) विछुड़ा हुआ गुरू के शबद को पहचानता नहीं (जैसे कोई जुआरी) जूए में बाज़ी हारता है (वैसे ही यह मनमुख अपनी मानस जनम की बाज़ी हार जाता है)। 2।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 1012 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।
गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।
Sarojini Nagar की hagling के बीच कोई unexpected calm।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 42 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1012” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 1013 →, पीछे का: ← अंग 1011।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।