अंग 1035

अंग
1035
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਹਮ ਦਾਸਨ ਕੇ ਦਾਸ ਪਿਆਰੇ ॥
ਸਾਧਿਕ ਸਾਚ ਭਲੇ ਵੀਚਾਰੇ ॥
ਮੰਨੇ ਨਾਉ ਸੋਈ ਜਿਣਿ ਜਾਸੀ ਆਪੇ ਸਾਚੁ ਦ੍ਰਿੜਾਇਦਾ ॥੧੦॥
ਪਲੈ ਸਾਚੁ ਸਚੇ ਸਚਿਆਰਾ ॥
ਸਾਚੇ ਭਾਵੈ ਸਬਦੁ ਪਿਆਰਾ ॥
ਤ੍ਰਿਭਵਣਿ ਸਾਚੁ ਕਲਾ ਧਰਿ ਥਾਪੀ ਸਾਚੇ ਹੀ ਪਤੀਆਇਦਾ ॥੧੧॥
ਵਡਾ ਵਡਾ ਆਖੈ ਸਭੁ ਕੋਈ ॥
ਗੁਰ ਬਿਨੁ ਸੋਝੀ ਕਿਨੈ ਨ ਹੋਈ ॥
ਸਾਚਿ ਮਿਲੈ ਸੋ ਸਾਚੇ ਭਾਏ ਨਾ ਵੀਛੁੜਿ ਦੁਖੁ ਪਾਇਦਾ ॥੧੨॥
ਧੁਰਹੁ ਵਿਛੁੰਨੇ ਧਾਹੀ ਰੁੰਨੇ ॥
ਮਰਿ ਮਰਿ ਜਨਮਹਿ ਮੁਹਲਤਿ ਪੁੰਨੇ ॥
ਜਿਸੁ ਬਖਸੇ ਤਿਸੁ ਦੇ ਵਡਿਆਈ ਮੇਲਿ ਨ ਪਛੋਤਾਇਦਾ ॥੧੩॥
ਆਪੇ ਕਰਤਾ ਆਪੇ ਭੁਗਤਾ ॥
ਆਪੇ ਤ੍ਰਿਪਤਾ ਆਪੇ ਮੁਕਤਾ ॥
ਆਪੇ ਮੁਕਤਿ ਦਾਨੁ ਮੁਕਤੀਸਰੁ ਮਮਤਾ ਮੋਹੁ ਚੁਕਾਇਦਾ ॥੧੪॥
ਦਾਨਾ ਕੈ ਸਿਰਿ ਦਾਨੁ ਵੀਚਾਰਾ ॥
ਕਰਣ ਕਾਰਣ ਸਮਰਥੁ ਅਪਾਰਾ ॥
ਕਰਿ ਕਰਿ ਵੇਖੈ ਕੀਤਾ ਅਪਣਾ ਕਰਣੀ ਕਾਰ ਕਰਾਇਦਾ ॥੧੫॥
ਸੇ ਗੁਣ ਗਾਵਹਿ ਸਾਚੇ ਭਾਵਹਿ ॥
ਤੁਝ ਤੇ ਉਪਜਹਿ ਤੁਝ ਮਾਹਿ ਸਮਾਵਹਿ ॥
ਨਾਨਕੁ ਸਾਚੁ ਕਹੈ ਬੇਨੰਤੀ ਮਿਲਿ ਸਾਚੇ ਸੁਖੁ ਪਾਇਦਾ ॥੧੬॥੨॥੧੪॥
हम दासन के दास पिआरे ॥
साधिक साच भले वीचारे ॥
मंने नाउ सोई जिणि जासी आपे साचु द्रिड़ाइदा ॥१०॥
पलै साचु सचे सचिआरा ॥
साचे भावै सबदु पिआरा ॥
त्रिभवणि साचु कला धरि थापी साचे ही पतीआइदा ॥११॥
वडा वडा आखै सभु कोई ॥
गुर बिनु सोझी किनै न होई ॥
साचि मिलै सो साचे भाए ना वीछुड़ि दुखु पाइदा ॥१२॥
धुरहु विछुंने धाही रुंने ॥
मरि मरि जनमहि मुहलति पुंने ॥
जिसु बखसे तिसु दे वडिआई मेलि न पछोताइदा ॥१३॥
आपे करता आपे भुगता ॥
आपे त्रिपता आपे मुकता ॥
आपे मुकति दानु मुकतीसरु ममता मोहु चुकाइदा ॥१४॥
दाना कै सिरि दानु वीचारा ॥
करण कारण समरथु अपारा ॥
करि करि वेखै कीता अपणा करणी कार कराइदा ॥१५॥
से गुण गावहि साचे भावहि ॥
तुझ ते उपजहि तुझ माहि समावहि ॥
नानकु साचु कहै बेनंती मिलि साचे सुखु पाइदा ॥१६॥२॥१४॥

हिन्दी अर्थ: मैं प्यारे प्रभू के उन दासों का दास हूँ जो उसके मिलने के प्रयत्न करते रहते हैं जो उस सदा-स्थिर परमात्मा के गुणों की विचार करते हैं। जो मनुष्य परमात्मा का नाम जपना मान लेता है (भाव। नाम-जपने को जीवन का उद्देश्य निश्चत कर लेता है) वह (जगत में से जीवन की बाज़ी) जीत के जाता है। (पर ये खेलें जीव के अपने वश की नहीं) परमात्मा स्वयं ही अपना सदा-स्थिर नाम जीवों के दिल में दृढ़ कराता है। 10। जिन मनुष्यों के पास चिर-स्थाई रहने वाला नाम है। वह उस सदा स्थ्रि प्रभू का रूप हो जाते हैं। वे चिर-स्थाई नाम के वनजारे हैं। जिस मनुष्य को प्रभू की सिफत-सालाह का शबद प्यारा लगता है वह सदा-स्थिर प्रभू को अच्छा लगता है। वह सदा-स्थिर प्रभू सारी सृष्टि में (व्यापक है)। उसने अपनी सक्ता दे के सृष्टि रची है। (सदा-स्थिर नाम का वाणज्य कराने वाले मनुष्य) उस सदा-स्थिर प्रभू की याद में ही खुश रहता है। 11। (वैसे तो) हरेक जीव कहता है कि परमात्मा सबसे बड़ा है पर सतिगुरू की शरण पड़े बिनाकिसी को सही समझ नहीं पड़ती। जो मनुष्य (गुरू से) सदा-स्थिर-प्रभू में जुड़ता है वह सदा-स्थिर-प्रभू को प्यारा लगता है। वह (उसके चरणों से विछुड़ता नहीं) विछुड़ के दुख नहीं पाता है। 12। पर जो लोग आदि से ही प्रभू से विछुड़े चले आ रहे हैं वे ढाहें मार-मार के रोते आ रहे हैं। जब-जब जिंदगी का समय समाप्त हो जाता है वे मरते हैं पैदा होते हैं। पैदा होते हैं मरते हैं (इस चक्कर में पड़े रहते हैं)। जिस मनुष्य पर प्रभू मेहर करता है उसको (अपना नाम बख्श के) वडिआई देता है। उसको अपने चरणों में मिला लेता है। वह मनुष्य (दोबारा कभी नहीं विछुड़ता है) ना पछताता है। 13। प्रभू स्वयं ही सारे जगत को पैदा करने वाला है। (सब जीवों में व्यापक हो के) स्वयं ही सारे पदार्थों को भोगने वाला है। फिर खुद ही इन भोगों से तृप्त हो जानें वाला है और खुद ही पदार्थों के मोह से स्वतंत्र हो जाने वाला है। प्रभू स्वयं ही मुक्ति का मालिक है। स्वयें ही विकारों से मुक्ति की दाति देता है। स्वयं ही जीवों के अंदर से माया की ममता और माया के मोह को दूर करता है। 14। वह जीवों को अपने गुणों की विचार बख्शता है और उसकी यह दाति उसकी और सब दातों से श्रेष्ठ है। परमात्मा इस जगत को रचने वाला है। सारी ताकतों का मालिक है और बेअंत है। सारी सृष्टि पैदा करके वह स्वयं ही इसकी संभाल करता है। और जीवों से वह कार करवाता है। जो कराने योग्य हो। 15। जो जीव सदा-स्थिर प्रभू को प्यारे लगते हैं वे उसके गुण गाते हैं। हे प्रभू ! सारे जीव-जंतु तुझसे पैदा होते हैं और तेरे में ही लीन हो जाते हैं। हे नानक ! जो मनुष्य चिर-स्थाई-प्रभू को सिमरता है (उसके दर पर) विनतियाँ करता है। वह उस सदा-स्थिर परमात्मा को मिल के आत्मिक आनंद पाता है। 16। 2। 14।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਅਰਬਦ ਨਰਬਦ ਧੁੰਧੂਕਾਰਾ ॥
ਧਰਣਿ ਨ ਗਗਨਾ ਹੁਕਮੁ ਅਪਾਰਾ ॥
ਨਾ ਦਿਨੁ ਰੈਨਿ ਨ ਚੰਦੁ ਨ ਸੂਰਜੁ ਸੁੰਨ ਸਮਾਧਿ ਲਗਾਇਦਾ ॥੧॥
ਖਾਣੀ ਨ ਬਾਣੀ ਪਉਣ ਨ ਪਾਣੀ ॥
ਓਪਤਿ ਖਪਤਿ ਨ ਆਵਣ ਜਾਣੀ ॥
ਖੰਡ ਪਤਾਲ ਸਪਤ ਨਹੀ ਸਾਗਰ ਨਦੀ ਨ ਨੀਰੁ ਵਹਾਇਦਾ ॥੨॥
ਨਾ ਤਦਿ ਸੁਰਗੁ ਮਛੁ ਪਇਆਲਾ ॥
ਦੋਜਕੁ ਭਿਸਤੁ ਨਹੀ ਖੈ ਕਾਲਾ ॥
ਨਰਕੁ ਸੁਰਗੁ ਨਹੀ ਜੰਮਣੁ ਮਰਣਾ ਨਾ ਕੋ ਆਇ ਨ ਜਾਇਦਾ ॥੩॥
ਬ੍ਰਹਮਾ ਬਿਸਨੁ ਮਹੇਸੁ ਨ ਕੋਈ ॥
ਅਵਰੁ ਨ ਦੀਸੈ ਏਕੋ ਸੋਈ ॥
ਨਾਰਿ ਪੁਰਖੁ ਨਹੀ ਜਾਤਿ ਨ ਜਨਮਾ ਨਾ ਕੋ ਦੁਖੁ ਸੁਖੁ ਪਾਇਦਾ ॥੪॥
ਨਾ ਤਦਿ ਜਤੀ ਸਤੀ ਬਨਵਾਸੀ ॥
ਨਾ ਤਦਿ ਸਿਧ ਸਾਧਿਕ ਸੁਖਵਾਸੀ ॥
ਜੋਗੀ ਜੰਗਮ ਭੇਖੁ ਨ ਕੋਈ ਨਾ ਕੋ ਨਾਥੁ ਕਹਾਇਦਾ ॥੫॥
ਜਪ ਤਪ ਸੰਜਮ ਨਾ ਬ੍ਰਤ ਪੂਜਾ ॥
ਨਾ ਕੋ ਆਖਿ ਵਖਾਣੈ ਦੂਜਾ ॥
ਆਪੇ ਆਪਿ ਉਪਾਇ ਵਿਗਸੈ ਆਪੇ ਕੀਮਤਿ ਪਾਇਦਾ ॥੬॥
ਨਾ ਸੁਚਿ ਸੰਜਮੁ ਤੁਲਸੀ ਮਾਲਾ ॥
ਗੋਪੀ ਕਾਨੁ ਨ ਗਊ ਗੋੁਆਲਾ ॥
ਤੰਤੁ ਮੰਤੁ ਪਾਖੰਡੁ ਨ ਕੋਈ ਨਾ ਕੋ ਵੰਸੁ ਵਜਾਇਦਾ ॥੭॥
ਕਰਮ ਧਰਮ ਨਹੀ ਮਾਇਆ ਮਾਖੀ ॥
ਜਾਤਿ ਜਨਮੁ ਨਹੀ ਦੀਸੈ ਆਖੀ ॥
ਮਮਤਾ ਜਾਲੁ ਕਾਲੁ ਨਹੀ ਮਾਥੈ ਨਾ ਕੋ ਕਿਸੈ ਧਿਆਇਦਾ ॥੮॥
ਨਿੰਦੁ ਬਿੰਦੁ ਨਹੀ ਜੀਉ ਨ ਜਿੰਦੋ ॥
ਨਾ ਤਦਿ ਗੋਰਖੁ ਨਾ ਮਾਛਿੰਦੋ ॥
ਨਾ ਤਦਿ ਗਿਆਨੁ ਧਿਆਨੁ ਕੁਲ ਓਪਤਿ ਨਾ ਕੋ ਗਣਤ ਗਣਾਇਦਾ ॥੯॥
मारू महला १ ॥
अरबद नरबद धुंधूकारा ॥
धरणि न गगना हुकमु अपारा ॥
ना दिनु रैनि न चंदु न सूरजु सुंन समाधि लगाइदा ॥१॥
खाणी न बाणी पउण न पाणी ॥
ओपति खपति न आवण जाणी ॥
खंड पताल सपत नही सागर नदी न नीरु वहाइदा ॥२॥
ना तदि सुरगु मछु पइआला ॥
दोजकु भिसतु नही खै काला ॥
नरकु सुरगु नही जंमणु मरणा ना को आइ न जाइदा ॥३॥
ब्रहमा बिसनु महेसु न कोई ॥
अवरु न दीसै एको सोई ॥
नारि पुरखु नही जाति न जनमा ना को दुखु सुखु पाइदा ॥४॥
ना तदि जती सती बनवासी ॥
ना तदि सिध साधिक सुखवासी ॥
जोगी जंगम भेखु न कोई ना को नाथु कहाइदा ॥५॥
जप तप संजम ना ब्रत पूजा ॥
ना को आखि वखाणै दूजा ॥
आपे आपि उपाइ विगसै आपे कीमति पाइदा ॥६॥
ना सुचि संजमु तुलसी माला ॥
गोपी कानु न गऊ गोुआला ॥
तंतु मंतु पाखंडु न कोई ना को वंसु वजाइदा ॥७॥
करम धरम नही माइआ माखी ॥
जाति जनमु नही दीसै आखी ॥
ममता जालु कालु नही माथै ना को किसै धिआइदा ॥८॥
निंदु बिंदु नही जीउ न जिंदो ॥
ना तदि गोरखु ना माछिंदो ॥
ना तदि गिआनु धिआनु कुल ओपति ना को गणत गणाइदा ॥९॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला १॥ (जगत की रचना से पहले बेअंत समय जिसकी गिनती के वास्ते) अरबद नरबद (शब्द भी नहीं बरते जा सकते। ऐसे) घोर अंधेरे की हालत थी (भाव। ऐसे हालात थे) जिसके बारे में कुछ भी कहा नहीं जा सकता। तब ना धरती थी। ना आकाश था। ना ही कहीं बेअंत प्रभू का हुकम चल रहा था। तब ना दिन था। ना रात थी। ना चाँद था। ना सूरज था। तब परमात्मा अपने आप में ही (माना ऐसी) समाधि लगाए बैठा था जिसमें कोई किसी किस्म का फुरना नहीं था। 1। जब ना जगत-रचना की चार-खाणियाँ थीं ना जीवों की चार बाणियाँ थीं। तब ना हवा थी। ना पानी था। ना उत्पक्ति थी ना पर्लय था। ना जन्म था ना मरना था। तब ना धरती के नौ-खण्ड थे ना पाताल था। ना सात-समुंद्र थे ना ही नदियों में पानी बह रहा था। 2। तब ना स्वर्ग-लोक था। ना मातृ-लोक था और ना ही पाताल था। तब ना कोई दोज़क था ना बहिश्त था। ना ही मौत लाने वाला काल था। तब ना स्वर्ग था ना नर्क था। ना जनम था ना मरण था। ना कोई पैदा होता था ना कोई मरता था। 3। तब ना कोई ब्रहमा था ना विष्णू था और ना ही शिव था। तब एक परमात्मा ही परमात्मा था। और कोई व्यक्ति नहीं था दिखता। तब ना कोई स्त्री था ना ही कोई मर्द था तब ना कोई जाति थी ना ही किसी जाति में कोई जन्म लेता था। ना कोई दुख भोगने वाला जीव ही था। 4। तब ना कोई जती था ना कोई सती था ना ही कोई त्यागी था। तब ना कोई सिद्ध था ना साधिक थे और ना ही कोई गृहस्ती था। तब ना कोई जोगियों का ना जंगमों का भेष था। ना ही कोई जोगियों का गुरू कहलवाने वाला था। 5। तब ना कहीं जप हो रहे थे ना तप हो रहे थे। ना कहीं संजम साधे जा रहे थे ना व्रत रखे जा रहे थे ना ही पूजा की जा रही थी। तब कोई ऐसा जीव नहीं था जो परमात्मा के बिना किसी और का जिक्र कर सकता। तब परमात्मा खुद ही अपने आप में प्रकट हो के खुश हो रहा था और अपने बड़प्पन का मूल्य खुद ही डालता था। 6। तब ना कहीं स्वच्छता रखी जा रही थी। ना कहीं कोई संजम किया जा रहा था। ना कहीं तुलसी की माला थी। तब ना कहीं कोई गोपी था ना कोई कान्हा था। ना कोई गऊ थी ना गऊऔं का (रखवाला) ग्वाला था। तब ना कोई तंत्र-मंत्र आदि पाखण्ड था ना ही कोई बाँसुरी बजा रहा था। 7। तब ना कहीं धार्मिक कर्म-काण्ड ही थे ना कहीं मीठी माया थी। तब ना कहीं कोई (ऊँची-नीची) जाति थी और ना ही किसी जाति में कोई जन्म लेता आँखों से देखा जा सकता था। तब ना कहीं माया थी ना ममता का जाल था। ना कहीं किसी के सिर पर काल (कूकता था)। ना कोई जीव किसी का सिमरन-ध्यान धरता था। 8। तब ना कहीं निंदा थी ना खुशामद थी। ना कोई जीवात्मा थी ना कोई जिंद थी। तब ना गोरख था ना माछिन्द्र नाथ था। तब ना कहीं (धार्मिक पुस्तकों की) ज्ञान-चर्चा थी ना कहीं समाधि-स्थित ध्यान था। तब ना कहीं कुलों की उत्पक्ति थी और ना ही कोई (अच्छी कुल में पैदा होने का) मान करता था। 9।

संदर्भ: यह अंग 1035 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।

गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।

Karwa Chauth की रात, चाँद का इंतज़ार, और बीच में हाथों की मेहंदी।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 49 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1035” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 1036 →, पीछे का: ← अंग 1034

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।