अंग 1076

अंग
1076
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਆਪਿ ਤਰੈ ਸਗਲੇ ਕੁਲ ਤਾਰੇ ਹਰਿ ਦਰਗਹ ਪਤਿ ਸਿਉ ਜਾਇਦਾ ॥੬॥
ਖੰਡ ਪਤਾਲ ਦੀਪ ਸਭਿ ਲੋਆ ॥
ਸਭਿ ਕਾਲੈ ਵਸਿ ਆਪਿ ਪ੍ਰਭਿ ਕੀਆ ॥
ਨਿਹਚਲੁ ਏਕੁ ਆਪਿ ਅਬਿਨਾਸੀ ਸੋ ਨਿਹਚਲੁ ਜੋ ਤਿਸਹਿ ਧਿਆਇਦਾ ॥੭॥
ਹਰਿ ਕਾ ਸੇਵਕੁ ਸੋ ਹਰਿ ਜੇਹਾ ॥
ਭੇਦੁ ਨ ਜਾਣਹੁ ਮਾਣਸ ਦੇਹਾ ॥
ਜਿਉ ਜਲ ਤਰੰਗ ਉਠਹਿ ਬਹੁ ਭਾਤੀ ਫਿਰਿ ਸਲਲੈ ਸਲਲ ਸਮਾਇਦਾ ॥੮॥
ਇਕੁ ਜਾਚਿਕੁ ਮੰਗੈ ਦਾਨੁ ਦੁਆਰੈ ॥
ਜਾ ਪ੍ਰਭ ਭਾਵੈ ਤਾ ਕਿਰਪਾ ਧਾਰੈ ॥
ਦੇਹੁ ਦਰਸੁ ਜਿਤੁ ਮਨੁ ਤ੍ਰਿਪਤਾਸੈ ਹਰਿ ਕੀਰਤਨਿ ਮਨੁ ਠਹਰਾਇਦਾ ॥੯॥
ਰੂੜੋ ਠਾਕੁਰੁ ਕਿਤੈ ਵਸਿ ਨ ਆਵੈ ॥
ਹਰਿ ਸੋ ਕਿਛੁ ਕਰੇ ਜਿ ਹਰਿ ਕਿਆ ਸੰਤਾ ਭਾਵੈ ॥
ਕੀਤਾ ਲੋੜਨਿ ਸੋਈ ਕਰਾਇਨਿ ਦਰਿ ਫੇਰੁ ਨ ਕੋਈ ਪਾਇਦਾ ॥੧੦॥
ਜਿਥੈ ਅਉਘਟੁ ਆਇ ਬਨਤੁ ਹੈ ਪ੍ਰਾਣੀ ॥
ਤਿਥੈ ਹਰਿ ਧਿਆਈਐ ਸਾਰਿੰਗਪਾਣੀ ॥
ਜਿਥੈ ਪੁਤ੍ਰੁ ਕਲਤ੍ਰੁ ਨ ਬੇਲੀ ਕੋਈ ਤਿਥੈ ਹਰਿ ਆਪਿ ਛਡਾਇਦਾ ॥੧੧॥
ਵਡਾ ਸਾਹਿਬੁ ਅਗਮ ਅਥਾਹਾ ॥
ਕਿਉ ਮਿਲੀਐ ਪ੍ਰਭ ਵੇਪਰਵਾਹਾ ॥
ਕਾਟਿ ਸਿਲਕ ਜਿਸੁ ਮਾਰਗਿ ਪਾਏ ਸੋ ਵਿਚਿ ਸੰਗਤਿ ਵਾਸਾ ਪਾਇਦਾ ॥੧੨॥
ਹੁਕਮੁ ਬੂਝੈ ਸੋ ਸੇਵਕੁ ਕਹੀਐ ॥
ਬੁਰਾ ਭਲਾ ਦੁਇ ਸਮਸਰਿ ਸਹੀਐ ॥
ਹਉਮੈ ਜਾਇ ਤ ਏਕੋ ਬੂਝੈ ਸੋ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਹਜਿ ਸਮਾਇਦਾ ॥੧੩॥
ਹਰਿ ਕੇ ਭਗਤ ਸਦਾ ਸੁਖਵਾਸੀ ॥
ਬਾਲ ਸੁਭਾਇ ਅਤੀਤ ਉਦਾਸੀ ॥
ਅਨਿਕ ਰੰਗ ਕਰਹਿ ਬਹੁ ਭਾਤੀ ਜਿਉ ਪਿਤਾ ਪੂਤੁ ਲਾਡਾਇਦਾ ॥੧੪॥
ਅਗਮ ਅਗੋਚਰੁ ਕੀਮਤਿ ਨਹੀ ਪਾਈ ॥
ਤਾ ਮਿਲੀਐ ਜਾ ਲਏ ਮਿਲਾਈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਪ੍ਰਗਟੁ ਭਇਆ ਤਿਨ ਜਨ ਕਉ ਜਿਨ ਧੁਰਿ ਮਸਤਕਿ ਲੇਖੁ ਲਿਖਾਇਦਾ ॥੧੫॥
ਤੂ ਆਪੇ ਕਰਤਾ ਕਾਰਣ ਕਰਣਾ ॥
ਸ੍ਰਿਸਟਿ ਉਪਾਇ ਧਰੀ ਸਭ ਧਰਣਾ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕੁ ਸਰਣਿ ਪਇਆ ਹਰਿ ਦੁਆਰੈ ਹਰਿ ਭਾਵੈ ਲਾਜ ਰਖਾਇਦਾ ॥੧੬॥੧॥੫॥
आपि तरै सगले कुल तारे हरि दरगह पति सिउ जाइदा ॥६॥
खंड पताल दीप सभि लोआ ॥
सभि कालै वसि आपि प्रभि कीआ ॥
निहचलु एकु आपि अबिनासी सो निहचलु जो तिसहि धिआइदा ॥७॥
हरि का सेवकु सो हरि जेहा ॥
भेदु न जाणहु माणस देहा ॥
जिउ जल तरंग उठहि बहु भाती फिरि सललै सलल समाइदा ॥८॥
इकु जाचिकु मंगै दानु दुआरै ॥
जा प्रभ भावै ता किरपा धारै ॥
देहु दरसु जितु मनु त्रिपतासै हरि कीरतनि मनु ठहराइदा ॥९॥
रूड़ो ठाकुरु कितै वसि न आवै ॥
हरि सो किछु करे जि हरि किआ संता भावै ॥
कीता लोड़नि सोई कराइनि दरि फेरु न कोई पाइदा ॥१०॥
जिथै अउघटु आइ बनतु है प्राणी ॥
तिथै हरि धिआईऐ सारिंगपाणी ॥
जिथै पुत्रु कलत्रु न बेली कोई तिथै हरि आपि छडाइदा ॥११॥
वडा साहिबु अगम अथाहा ॥
किउ मिलीऐ प्रभ वेपरवाहा ॥
काटि सिलक जिसु मारगि पाए सो विचि संगति वासा पाइदा ॥१२॥
हुकमु बूझै सो सेवकु कहीऐ ॥
बुरा भला दुइ समसरि सहीऐ ॥
हउमै जाइ त एको बूझै सो गुरमुखि सहजि समाइदा ॥१३॥
हरि के भगत सदा सुखवासी ॥
बाल सुभाइ अतीत उदासी ॥
अनिक रंग करहि बहु भाती जिउ पिता पूतु लाडाइदा ॥१४॥
अगम अगोचरु कीमति नही पाई ॥
ता मिलीऐ जा लए मिलाई ॥
गुरमुखि प्रगटु भइआ तिन जन कउ जिन धुरि मसतकि लेखु लिखाइदा ॥१५॥
तू आपे करता कारण करणा ॥
स्रिसटि उपाइ धरी सभ धरणा ॥
जन नानकु सरणि पइआ हरि दुआरै हरि भावै लाज रखाइदा ॥१६॥१॥५॥

हिन्दी अर्थ: (जो मनुष्य जपता है) वह खुद (संसार-समुंद्र से) पार लांघ जाता है। अपनी सारी कुलों को पार लंघा लेता है। और परमात्मा की हजूरी में इज्जत से जाता है। 6। हे भाई ! ये जितने भी खंड-मण्डल-पाताल-द्वीप हैं। ये सारे परमात्मा ने खुद ही काल के अधीन रखे हुए हैं। नाश-रहित प्रभू खुद ही सदा कायम रहने वाला है। जो मनुष्य परमात्मा का सिमरन करता है वह भी अटल जीवन वाला हो जाता है। (जनम-मरण के चक्कर से बच जाता है)। 7। हे भाई ! परमात्मा की भक्ति करने वाला मनुष्य परमात्मा जैसा ही हो जाता है। उस का मनुष्य का शरीर (देख के परमात्मा से उसका) फर्क ना समझो। (सिमरन करने वाला मनुष्य इस तरह ही है) जैसे कई किस्मों की पानी की लहरें उठती हैं। दोबारा पानी में ही पानी मिल जाता है। 8। (प्रभू का दास) एक मँगता (बन के उसके) दर पर (खड़ा उसके दर्शनों की) ख़ैर माँगता है। जब प्रभू की रजा होती है तब वह किरपा करता है। (मँगता यूँ माँगता जाता है- हे प्रभू !) अपने दर्शन दे। जिसकी बरकति से मन (माया की ओर से) तृप्त हो जाता है और सिफतसालाह में टिक जाता है। 9। हे भाई ! सुंदर प्रभू किसी तरीके से वश में नहीं आता पर जो कुछ उसके संत चाहते हैं वह वही कुछ कर देता है। (प्रभू के संत जन जो कुछ) करना चाहते हैं वही कुछ प्रभू से करवा लेते हैं। प्रभू के दर पे उनके रास्ते में कोई रुकावट नहीं डाल सकता। 10। हे प्राणी ! (जीवन-सफर में) जहाँ भी कोई मुश्किल आ बनती है। वहीं धर्नुधारी प्रभू का नाम सिमरना चाहिए। जहाँ ना पुत्र ना स्त्री कोई भी साथी नहीं बन सकता। वहाँ प्रभ स्वयं (मुश्किलों से) छुड़ा लेता है। 11। हे भाई ! परमात्मा अपहुँच है। अथाह है। बड़ा मालिक है। उस बेमुहताज को जीव अपने उद्यम से नहीं मिल सकता। वह प्रभू स्वयं ही जिस मनुष्य को (माया के मोह की) फाही काट के सही जीवन-राह पर डालता है। वह मनुष्य साध-संगति में आ टिकता है। 12। हे भाई ! वह मनुष्य परमात्मा का भगत कहा जाता है। जो (हरेक हो रही कार को परमात्मा की) समझता है (और। यह निश्चय रखता है कि) दुख (आए चाहे) सुख। दोनों को एक समान सहना चाहिए। पर मनुष्य तब ही सिर्फ परमात्मा को सब कुछ करने-कराने में समर्थ समझता है जब उसके अंदर से अहंकार दूर होता है। वह मनुष्य गुरू के सन्मुख रह के आत्मिक अडोलता में टिका रहता है। 13। हे भाई ! परमात्मा के भगत सदा आत्मिक आनंद लेते हैं। वे सदा वैर-विरोध से परे रहते हैं। विरक्त और माया के मोह से ऊपर रहते हैं। जैसे पिता अपने पुत्र को कई लाड लडाता है। (वैसे ही भगत प्रभू-पिता की गोद में रह के) कई तरह के अनेकों आत्मिक रंग (का आनंद) लेते हैं। 14। हे भाई ! परमात्मा अपहुँच है। ज्ञानेन्द्रियों की पहुँच से परे है। वह किसी भी दुनियावी पदार्थ के बदले में नहीं मिल सकता। उसे तभी मिला जा सकता है। जब वह स्वयं ही मिलाता है। गुरू के माध्यम से उन मनुष्यों के हृदय में प्रकट होता है जिनके माथे पर (पूर्बले संस्कारों के अनुसार) धुर से ही मिलाप का लेख लिखा होता है। 15। हे प्रभू ! तू स्वयं ही पैदा करने वाला है। तू खुद ही जगत का मूल है। तूने स्वयं ही सृष्टि पैदा करके सारी धरती को सहारा दिया हुआ है। हे भाई ! दास नानक उसी प्रभू के दर पर (गिरा हुआ है। उसी की) शरण पड़ा हुआ है। उसकी अपनी रज़ा होती है तो (लोक-परलोक में जीव की) इज्जत रख लेता है। 16। 1। 5।
ਮਾਰੂ ਸੋਲਹੇ ਮਹਲਾ ੫
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਜੋ ਦੀਸੈ ਸੋ ਏਕੋ ਤੂਹੈ ॥
ਬਾਣੀ ਤੇਰੀ ਸ੍ਰਵਣਿ ਸੁਣੀਐ ॥
ਦੂਜੀ ਅਵਰ ਨ ਜਾਪਸਿ ਕਾਈ ਸਗਲ ਤੁਮਾਰੀ ਧਾਰਣਾ ॥੧॥
ਆਪਿ ਚਿਤਾਰੇ ਅਪਣਾ ਕੀਆ ॥
ਆਪੇ ਆਪਿ ਆਪਿ ਪ੍ਰਭੁ ਥੀਆ ॥
ਆਪਿ ਉਪਾਇ ਰਚਿਓਨੁ ਪਸਾਰਾ ਆਪੇ ਘਟਿ ਘਟਿ ਸਾਰਣਾ ॥੨॥
ਇਕਿ ਉਪਾਏ ਵਡ ਦਰਵਾਰੀ ॥
ਇਕਿ ਉਦਾਸੀ ਇਕਿ ਘਰ ਬਾਰੀ ॥
मारू सोलहे महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जो दीसै सो एको तूहै ॥
बाणी तेरी स्रवणि सुणीऐ ॥
दूजी अवर न जापसि काई सगल तुमारी धारणा ॥१॥
आपि चितारे अपणा कीआ ॥
आपे आपि आपि प्रभु थीआ ॥
आपि उपाइ रचिओनु पसारा आपे घटि घटि सारणा ॥२॥
इकि उपाए वड दरवारी ॥
इकि उदासी इकि घर बारी ॥

हिन्दी अर्थ: मारू सोलहे महला ५ ੴ सतिगुर प्रसादि॥ हे प्रभू ! (जगत में) जो कुछ दिखाई दे रहा है। ये सब कुछ सिर्फ तू ही तू है। (सब जीवों में सिर्फ तू ही बोल रहा है) तेरे ही बोल कानों से सुने जा रहे हैं। सारी सृष्टि तेरी ही रची हुई है। कोई भी चीज तुझसे अलग नहीं दिख रही। 1। हे भाई ! अपने पैदा किए जगत की प्रभू स्वयं ही संभाल कर रहा है। हर जगह प्रभू स्वयं ही स्वयं है। प्रभू ने स्वयं ही अपने आप से पैदा करके ये जगत-पसारा रचा है। हरेक शरीर में स्वयं ही (व्यापक होके सबकी) सार लेता है। 2। हे प्रभू ! तूने कई बड़े दरबारों वाले पैदा किए हैं। कई त्यागी और कई गृहस्ती बना दिए हैं।

संदर्भ: यह अंग 1076 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

Chittaranjan Park के Bengali-दुर्गा-puja के बीच पंडाल में किसी quiet pause में।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 41 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1076” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 1077 →, पीछे का: ← अंग 1075

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।