अंग 1024

अंग
1024
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਗੁਰਮੁਖਿ ਵਿਰਲਾ ਚੀਨੈ ਕੋਈ ॥
ਦੁਇ ਪਗ ਧਰਮੁ ਧਰੇ ਧਰਣੀਧਰ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਾਚੁ ਤਿਥਾਈ ਹੇ ॥੮॥
ਰਾਜੇ ਧਰਮੁ ਕਰਹਿ ਪਰਥਾਏ ॥
ਆਸਾ ਬੰਧੇ ਦਾਨੁ ਕਰਾਏ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮ ਬਿਨੁ ਮੁਕਤਿ ਨ ਹੋਈ ਥਾਕੇ ਕਰਮ ਕਮਾਈ ਹੇ ॥੯॥
ਕਰਮ ਧਰਮ ਕਰਿ ਮੁਕਤਿ ਮੰਗਾਹੀ ॥
ਮੁਕਤਿ ਪਦਾਰਥੁ ਸਬਦਿ ਸਲਾਹੀ ॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਸਬਦੈ ਮੁਕਤਿ ਨ ਹੋਈ ਪਰਪੰਚੁ ਕਰਿ ਭਰਮਾਈ ਹੇ ॥੧੦॥
ਮਾਇਆ ਮਮਤਾ ਛੋਡੀ ਨ ਜਾਈ ॥
ਸੇ ਛੂਟੇ ਸਚੁ ਕਾਰ ਕਮਾਈ ॥
ਅਹਿਨਿਸਿ ਭਗਤਿ ਰਤੇ ਵੀਚਾਰੀ ਠਾਕੁਰ ਸਿਉ ਬਣਿ ਆਈ ਹੇ ॥੧੧॥
ਇਕਿ ਜਪ ਤਪ ਕਰਿ ਕਰਿ ਤੀਰਥ ਨਾਵਹਿ ॥
ਜਿਉ ਤੁਧੁ ਭਾਵੈ ਤਿਵੈ ਚਲਾਵਹਿ ॥
ਹਠਿ ਨਿਗ੍ਰਹਿ ਅਪਤੀਜੁ ਨ ਭੀਜੈ ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਗੁਰ ਕਿਨਿ ਪਤਿ ਪਾਈ ਹੇ ॥੧੨॥
ਕਲੀ ਕਾਲ ਮਹਿ ਇਕ ਕਲ ਰਾਖੀ ॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਕਿਨੈ ਨ ਭਾਖੀ ॥
ਮਨਮੁਖਿ ਕੂੜੁ ਵਰਤੈ ਵਰਤਾਰਾ ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਭਰਮੁ ਨ ਜਾਈ ਹੇ ॥੧੩॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਵੇਪਰਵਾਹੁ ਸਿਰੰਦਾ ॥
ਨਾ ਜਮ ਕਾਣਿ ਨ ਛੰਦਾ ਬੰਦਾ ॥
ਜੋ ਤਿਸੁ ਸੇਵੇ ਸੋ ਅਬਿਨਾਸੀ ਨਾ ਤਿਸੁ ਕਾਲੁ ਸੰਤਾਈ ਹੇ ॥੧੪॥
ਗੁਰ ਮਹਿ ਆਪੁ ਰਖਿਆ ਕਰਤਾਰੇ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਕੋਟਿ ਅਸੰਖ ਉਧਾਰੇ ॥
ਸਰਬ ਜੀਆ ਜਗਜੀਵਨੁ ਦਾਤਾ ਨਿਰਭਉ ਮੈਲੁ ਨ ਕਾਈ ਹੇ ॥੧੫॥
ਸਗਲੇ ਜਾਚਹਿ ਗੁਰ ਭੰਡਾਰੀ ॥
ਆਪਿ ਨਿਰੰਜਨੁ ਅਲਖ ਅਪਾਰੀ ॥
ਨਾਨਕੁ ਸਾਚੁ ਕਹੈ ਪ੍ਰਭ ਜਾਚੈ ਮੈ ਦੀਜੈ ਸਾਚੁ ਰਜਾਈ ਹੇ ॥੧੬॥੪॥
गुरमुखि विरला चीनै कोई ॥
दुइ पग धरमु धरे धरणीधर गुरमुखि साचु तिथाई हे ॥८॥
राजे धरमु करहि परथाए ॥
आसा बंधे दानु कराए ॥
राम नाम बिनु मुकति न होई थाके करम कमाई हे ॥९॥
करम धरम करि मुकति मंगाही ॥
मुकति पदारथु सबदि सलाही ॥
बिनु गुर सबदै मुकति न होई परपंचु करि भरमाई हे ॥१०॥
माइआ ममता छोडी न जाई ॥
से छूटे सचु कार कमाई ॥
अहिनिसि भगति रते वीचारी ठाकुर सिउ बणि आई हे ॥११॥
इकि जप तप करि करि तीरथ नावहि ॥
जिउ तुधु भावै तिवै चलावहि ॥
हठि निग्रहि अपतीजु न भीजै बिनु हरि गुर किनि पति पाई हे ॥१२॥
कली काल महि इक कल राखी ॥
बिनु गुर पूरे किनै न भाखी ॥
मनमुखि कूड़ु वरतै वरतारा बिनु सतिगुर भरमु न जाई हे ॥१३॥
सतिगुरु वेपरवाहु सिरंदा ॥
ना जम काणि न छंदा बंदा ॥
जो तिसु सेवे सो अबिनासी ना तिसु कालु संताई हे ॥१४॥
गुर महि आपु रखिआ करतारे ॥
गुरमुखि कोटि असंख उधारे ॥
सरब जीआ जगजीवनु दाता निरभउ मैलु न काई हे ॥१५॥
सगले जाचहि गुर भंडारी ॥
आपि निरंजनु अलख अपारी ॥
नानकु साचु कहै प्रभ जाचै मै दीजै साचु रजाई हे ॥१६॥४॥

हिन्दी अर्थ: पर जो कोई विरला बँदा गुरू की शरण पड़ता है वह (जीवन के सही राह को) पहचानता है। वह उसी आत्मिक अवस्था में टिका रहता है जहाँ सदा-स्थिर प्रभू उसके अंदर प्रत्यक्ष बसता है। 8। राजा गण किसी मतलब के लिए धर्म कमाते हैं। दुनियावी (लोग) आशाओं में बँधे हुए दान-पुन्य करते हैं (ये सब कुछ कमर-टूटी हुई दया के कारण ही करते हैं। ये लोक और परलोक के सुख ही तलाशते हैं)। (दान-पुन्य आदि के) कर्म कर के थक जाते हैं। परमात्मा का नाम सिमरन के बिना (दुनिया के सुखों की आशाओं से) उनको खलासी नहीं मिलती (इसलिए आत्मिक आनंद नहीं मिलता)। 9। (दान-पुन्य तीर्थ आदिक) कर्म कर के मुक्ति माँगते हैं। पर। मुक्ति देने वाला नाम पदार्थ गुरू के शबद के द्वारा प्रभू की सिफत-सालाह करने से ही मिलता है। (ये पक्की बात है कि समय का नाम चाहे सतियुग रख लो चाहे त्रेता रख लो और चाहे द्वापर) गुरू के शबद के बिना मुक्ति नहीं मिल सकती, सृजनहार ने यह जगत-रचना करके जीवों को अजीब भुलेखे में डाला हुआ है । 10। (समय कोई भी हो) माया का अपनत्व त्यागा नहीं जा सकता। सिर्फ वही बंदे (इस ममता के पँजे में से) निजात पाते हैं जो सदा-स्थिर प्रभू के सिमरन की कार करते हैं। जो दिन-रात परमात्मा की भक्ति (के रंग) में रंगे रहते हैं। जो उसके गुणों की विचार करते हैं और (इस तरह) जिनकी प्रीति मालिक-प्रभू के साथ बनी रहती है। 11। हे प्रभू ! अनेकों लोग ऐसे हैं जो जप करते हैं तप तापते हैं तीर्थों पर जाते हैं (और इस तरह इस लोक में और परलोक में इज्जत हासिल करनी चाहते हैं)। (पर। हे प्रभू ! उनके भी क्या वश। ) जैसे तेरी रजा है तू उनको इस राह पर चला रहा है। (वे बिचारे नहीं समझते कि) जबरन इन्द्रियों को वश में करने का प्रयत्न करने से ये कभी ना पतीजने वाला मन तेरे नाम-रस में आनंदित नहीं हो सकता। गुरू की शरण पड़े बिना किसी ने कभी प्रभू की हजूरी में इज्जत नहीं प्राप्त की (समय और युग का नाम चाहे कुछ भी हो)। 12। (अगर धरम-सक्ता के चार हिस्से कर दिए जाएं और अगर किसी मनुष्य के अंदर) धर्म की सिर्फ एक ही सक्ता रह जाए तो वह मनुष्य। मानो। कलियुग में बसता है। सतिगुरू की शरण पड़े बिना उसकी यह भटकना दूर नहीं होती, पूरे गुरू के बिना कभी किसी ने यह बात नहीं समझाई । 13। अपने मन के पीछे चलने वाले उस मनुष्य के अंदर माया का मोह ही अपना प्रभाव डाल के रखता है (उसके अंदर सदा माया की भटकना बनी रहती है) सतिगुरू सृजनहार का रूप है। गुरू दुनियाँ की नजरों में बहुत ऊँचा है। गुरू को जमका डर नहीं। गुरू को दुनिया के बँदों की मुथाजी नहीं। जो मनुष्य गुरू की बताई हुई सेवा करता है वह नाश-रहित हो जाता है (उसको कभी आत्मिक मौत नहीं आती) मौत का डर उसको कभी नहीं सताता। 14। करतार ने अपना आप गुरू में छुपा रखा है। वह जगत की जिंदगी का आसरा है वह सब जीवों को दातें देता है। उसको किसी का डर नहीं। उसको (माया-मोह आदि की) कोई मैल नहीं लग सकती। वह करतार गुरू के द्वारा करोड़ों और असंख जीवों को (संसार-समुंद्र में डूबने से) बचा लेता है। 15। सारे जीव गुरू के खजाने में से (उस प्रभू का नाम) माँगते हैं जो स्वयं माया के प्रभाव से ऊपर है जो अलख है और बेअंत है। हे रजा के मालिक प्रभू ! नानक (भी गुरू के दर पर पड़ कर) तेरा सदा-स्थिर नाम सिमरता है और माँगता है कि मुझे अपने सदा-स्थिर रहने वाले नाम की दाति दे। 16। 4।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਸਾਚੈ ਮੇਲੇ ਸਬਦਿ ਮਿਲਾਏ ॥
ਜਾ ਤਿਸੁ ਭਾਣਾ ਸਹਜਿ ਸਮਾਏ ॥
ਤ੍ਰਿਭਵਣ ਜੋਤਿ ਧਰੀ ਪਰਮੇਸਰਿ ਅਵਰੁ ਨ ਦੂਜਾ ਭਾਈ ਹੇ ॥੧॥
ਜਿਸ ਕੇ ਚਾਕਰ ਤਿਸ ਕੀ ਸੇਵਾ ॥
ਸਬਦਿ ਪਤੀਜੈ ਅਲਖ ਅਭੇਵਾ ॥
ਭਗਤਾ ਕਾ ਗੁਣਕਾਰੀ ਕਰਤਾ ਬਖਸਿ ਲਏ ਵਡਿਆਈ ਹੇ ॥੨॥
ਦੇਦੇ ਤੋਟਿ ਨ ਆਵੈ ਸਾਚੇ ॥
ਲੈ ਲੈ ਮੁਕਰਿ ਪਉਦੇ ਕਾਚੇ ॥
ਮੂਲੁ ਨ ਬੂਝਹਿ ਸਾਚਿ ਨ ਰੀਝਹਿ ਦੂਜੈ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਈ ਹੇ ॥੩॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਾਗਿ ਰਹੇ ਦਿਨ ਰਾਤੀ ॥
ਸਾਚੇ ਕੀ ਲਿਵ ਗੁਰਮਤਿ ਜਾਤੀ ॥
ਮਨਮੁਖ ਸੋਇ ਰਹੇ ਸੇ ਲੂਟੇ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਾਬਤੁ ਭਾਈ ਹੇ ॥੪॥
ਕੂੜੇ ਆਵੈ ਕੂੜੇ ਜਾਵੈ ॥
ਕੂੜੇ ਰਾਤੀ ਕੂੜੁ ਕਮਾਵੈ ॥
ਸਬਦਿ ਮਿਲੇ ਸੇ ਦਰਗਹ ਪੈਧੇ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸੁਰਤਿ ਸਮਾਈ ਹੇ ॥੫॥
ਕੂੜਿ ਮੁਠੀ ਠਗੀ ਠਗਵਾੜੀ ॥
ਜਿਉ ਵਾੜੀ ਓਜਾੜਿ ਉਜਾੜੀ ॥
ਨਾਮ ਬਿਨਾ ਕਿਛੁ ਸਾਦਿ ਨ ਲਾਗੈ ਹਰਿ ਬਿਸਰਿਐ ਦੁਖੁ ਪਾਈ ਹੇ ॥੬॥
ਭੋਜਨੁ ਸਾਚੁ ਮਿਲੈ ਆਘਾਈ ॥
ਨਾਮ ਰਤਨੁ ਸਾਚੀ ਵਡਿਆਈ ॥
ਚੀਨੈ ਆਪੁ ਪਛਾਣੈ ਸੋਈ ਜੋਤੀ ਜੋਤਿ ਮਿਲਾਈ ਹੇ ॥੭॥
मारू महला १ ॥
साचै मेले सबदि मिलाए ॥
जा तिसु भाणा सहजि समाए ॥
त्रिभवण जोति धरी परमेसरि अवरु न दूजा भाई हे ॥१॥
जिस के चाकर तिस की सेवा ॥
सबदि पतीजै अलख अभेवा ॥
भगता का गुणकारी करता बखसि लए वडिआई हे ॥२॥
देदे तोटि न आवै साचे ॥
लै लै मुकरि पउदे काचे ॥
मूलु न बूझहि साचि न रीझहि दूजै भरमि भुलाई हे ॥३॥
गुरमुखि जागि रहे दिन राती ॥
साचे की लिव गुरमति जाती ॥
मनमुख सोइ रहे से लूटे गुरमुखि साबतु भाई हे ॥४॥
कूड़े आवै कूड़े जावै ॥
कूड़े राती कूड़ु कमावै ॥
सबदि मिले से दरगह पैधे गुरमुखि सुरति समाई हे ॥५॥
कूड़ि मुठी ठगी ठगवाड़ी ॥
जिउ वाड़ी ओजाड़ि उजाड़ी ॥
नाम बिना किछु सादि न लागै हरि बिसरिऐ दुखु पाई हे ॥६॥
भोजनु साचु मिलै आघाई ॥
नाम रतनु साची वडिआई ॥
चीनै आपु पछाणै सोई जोती जोति मिलाई हे ॥७॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला १॥ उस सदा-स्थिर प्रभू ने जिन लोगों को (अपने चरणों में) मिलाया जिन्हें गुरू के शबद में जोड़ा तब जब उसे अच्छा लगा। वह लोग अडोल आत्मिक अवस्था में लीन हो गए। परमेश्वर ने अपनी ज्योति तीनों भवनों में टिका के रखी है; हे भाई ! कोई और उस प्रभू जैसा नहीं। 1। जब (भक्तजन) गुरू के शबद में जुड़ते हैं। जब उस प्रभू के सेवक बन के उसकी सेवा-भक्ति करते हैं। तब वह अलख और अभेव प्रभू (उनकी इस मेहनत पर) प्रसन्न होता है। करतार अपने भक्तों में आत्मिक गुण पैदा करता है। स्वयं उन पर बख्शिश करता है उनको महातम देता है। 2। (जीवों को दातें) दे दे के सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा के (भण्डारों में) कमी नहीं आती (घाटा नहीं पड़ता)। पर तुच्छ जीव दातें ले ले के (भी) मुकर जाते हैं। (अपने जीवन के) मूल-प्रभू (के खुल-दिले-स्वाभाव) को नहीं समझते। सदा-स्थिर प्रभू के नाम में जुड़ने की जीवों में रीझ पैदा नहीं होती। प्रभू के बिना और आसरों की झाक में भटक के गलत राह पर पड़े रहते हैं। 3। जो लोग गुरू की शरण पड़ते हैं वे हर वक्त माया के मोह से सचेत रहते हैं। गुरू की शिक्षा ले के वे सदा-स्थिर प्रभू की लगन (का आनंद) पहचान लेते हैं। गुरू के सन्मुख रहने वाले बंदे अपने आत्मिक जीवन की पूँजी को (माया के हमलों से) बचा के रखते हैं। अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य माया के मोह में गाफिल टिके रहते हैं। और आत्मिक गुणों का सरमाया लुटा बैठते हैं। 4। जो जीव-स्त्री माया के मोह के रंग में रंगी रहती है। वह माया के मोह में ग्रसी ही पैदा होती है। यहाँ (संसार में) हमेशा माया के मोह का ही व्यापार करती है। माया के मोह में फसी हुई ही दुनिया से चली जाती है। जो लोग गुरू के शबद में जुड़े रहते हैं उन्हें परमात्मा की हजूरी में आदर मिलता है। गुरू की शरण पड़ने वाले लोगों की सुरति (प्रभू की याद में) टिकी रहती है। 5। जो जीव-स्त्री माया की तृष्णा में मोही रहती है उसके आत्मिक जीवन की बगीची को कामादिक ठॅग। ठॅग लेते हैं। जैसे कोई फुलवाड़ी कहीं उजाड़ में (बिना किसी वाली वारिस रखवाले की होने के कारण) उजड़ जाती है। (भले वह माया के मोह में फसी रहती है फिर भी) परमात्मा के नाम के बिना कोई भी चीज स्वादिष्ट नहीं लग सकती (कोई भी आकर्षण अच्छा नहीं लग सकता)। प्रभू का नाम भूलने के कारण वह सदा दुख ही पाती है। 6। जिस मनुष्य को सदा-स्थिर प्रभू का नाम (आत्मिक जिंदगी के लिए) भोजन मिलता है। वह (तृष्णा की ओर से) तृप्त हो जाता है। जिसको परमात्मा का नाम-रत्न मिल जाता है। उसको (लोक-परलोक में) सदा-स्थिर रहने वाली इज्जत मिलती है। जो मनुष्य अपने आत्मिक जीवन को पड़तालता रहता है। वही (अपने जीवन-मनोरथ को) पहचानता है। उसकी सुरति प्रभू की ज्योति में मिली रहती है। 7।

संदर्भ: यह अंग 1024 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।

गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।

दिल्ली-यूनिवर्सिटी के North Campus में exam-season की tension।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 48 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1024” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 1025 →, पीछे का: ← अंग 1023

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।