अंग 1092

अंग
1092
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਬਿਨੁ ਕਰਮਾ ਕਿਛੂ ਨ ਪਾਈਐ ਜੇ ਬਹੁਤੁ ਲੋਚਾਹੀ ॥
ਆਵੈ ਜਾਇ ਜੰਮੈ ਮਰੈ ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਛੁਟਾਹੀ ॥
ਆਪਿ ਕਰੈ ਕਿਸੁ ਆਖੀਐ ਦੂਜਾ ਕੋ ਨਾਹੀ ॥੧੬॥
बिनु करमा किछू न पाईऐ जे बहुतु लोचाही ॥
आवै जाइ जंमै मरै गुर सबदि छुटाही ॥
आपि करै किसु आखीऐ दूजा को नाही ॥१६॥

हिन्दी अर्थ: पर चाहे कितनी ही लालसा करें प्रभू की मेहर के बिना नाम नहीं मिलता। (सो। इस मोह में ही) जगत पैदा होता है मरता है पैदा होता है मरता है। (इस चक्र में से) जीव गुरू के शबद से ही बच सकते हैं। पर ये सारी खेल प्रभू स्वयं कर रहा है। किसी और के पास पुकार नहीं की जा सकती। क्योंकि प्रभू के बिना और है ही कोई नहीं। 16।
ਸਲੋਕੁ ਮਃ ੩ ॥
ਇਸੁ ਜਗ ਮਹਿ ਸੰਤੀ ਧਨੁ ਖਟਿਆ ਜਿਨਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਮਿਲਿਆ ਪ੍ਰਭੁ ਆਇ ॥
ਸਤਿਗੁਰਿ ਸਚੁ ਦ੍ਰਿੜਾਇਆ ਇਸੁ ਧਨ ਕੀ ਕੀਮਤਿ ਕਹੀ ਨ ਜਾਇ ॥
ਇਤੁ ਧਨਿ ਪਾਇਐ ਭੁਖ ਲਥੀ ਸੁਖੁ ਵਸਿਆ ਮਨਿ ਆਇ ॥
ਜਿੰਨੑਾ ਕਉ ਧੁਰਿ ਲਿਖਿਆ ਤਿਨੀ ਪਾਇਆ ਆਇ ॥
ਮਨਮੁਖੁ ਜਗਤੁ ਨਿਰਧਨੁ ਹੈ ਮਾਇਆ ਨੋ ਬਿਲਲਾਇ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਫਿਰਦਾ ਸਦਾ ਰਹੈ ਭੁਖ ਨ ਕਦੇ ਜਾਇ ॥
ਸਾਂਤਿ ਨ ਕਦੇ ਆਵਈ ਨਹ ਸੁਖੁ ਵਸੈ ਮਨਿ ਆਇ ॥
ਸਦਾ ਚਿੰਤ ਚਿਤਵਦਾ ਰਹੈ ਸਹਸਾ ਕਦੇ ਨ ਜਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਵਿਣੁ ਸਤਿਗੁਰ ਮਤਿ ਭਵੀ ਸਤਿਗੁਰ ਨੋ ਮਿਲੈ ਤਾ ਸਬਦੁ ਕਮਾਇ ॥
ਸਦਾ ਸਦਾ ਸੁਖ ਮਹਿ ਰਹੈ ਸਚੇ ਮਾਹਿ ਸਮਾਇ ॥੧॥
सलोकु मः ३ ॥
इसु जग महि संती धनु खटिआ जिना सतिगुरु मिलिआ प्रभु आइ ॥
सतिगुरि सचु द्रिड़ाइआ इसु धन की कीमति कही न जाइ ॥
इतु धनि पाइऐ भुख लथी सुखु वसिआ मनि आइ ॥
जिंन॑ा कउ धुरि लिखिआ तिनी पाइआ आइ ॥
मनमुखु जगतु निरधनु है माइआ नो बिललाइ ॥
अनदिनु फिरदा सदा रहै भुख न कदे जाइ ॥
सांति न कदे आवई नह सुखु वसै मनि आइ ॥
सदा चिंत चितवदा रहै सहसा कदे न जाइ ॥
नानक विणु सतिगुर मति भवी सतिगुर नो मिलै ता सबदु कमाइ ॥
सदा सदा सुख महि रहै सचे माहि समाइ ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला ३॥ इस जगत में संतों ने ही नाम-धन कमाया है जिनको गुरू मिला है (और गुरू के माध्यम से) प्रभू मिला है। (क्योंकि) गुरू ने उनके मन में सिमरन पक्का कर दिया है (भाव। सिमरन की गाँठ पक्की तरह बाँध दी है)। यह नाम-धन इतना अमूल्य है कि इसका मोल नहीं डाला जा सकता। अगर यह नाम-धन मिल जाए तो (माया की) भूख उतर जाती है। मन में सुख आ बसता है। पर मिलता उनको है जिनके भाग्यों में धुर-दरगाह से लिखा हो (भाव। जिन पर मेहर हो)। मन के पीछे चलने वाला जगत सदा कंगाल है माया के लिए बिलकता है। हर रोज सदा भटकता फिरता है। इसकी (मायावी) भूख मिटती नहीं। कभी इसके अंदर शीतलता नहीं आती। कभी इसके मन को सुख नहीं मिलता। हमेशा सोचें सोचता रहता है; हे नानक ! गुरू से वंचित रहने के कारण इसकी बुद्धि चक्करों में पड़ी रहती है। अगर मनमुख भी गुरू को मिल जाए तो शबद की कमाई करता है। (शबद की बरकति से) फिर सदा ही सुख में टिका रहता है। प्रभू में जुड़ा रहता है। 1।
ਮਃ ੩ ॥
ਜਿਨਿ ਉਪਾਈ ਮੇਦਨੀ ਸੋਈ ਸਾਰ ਕਰੇਇ ॥
ਏਕੋ ਸਿਮਰਹੁ ਭਾਇਰਹੁ ਤਿਸੁ ਬਿਨੁ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਇ ॥
ਖਾਣਾ ਸਬਦੁ ਚੰਗਿਆਈਆ ਜਿਤੁ ਖਾਧੈ ਸਦਾ ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਹੋਇ ॥
ਪੈਨਣੁ ਸਿਫਤਿ ਸਨਾਇ ਹੈ ਸਦਾ ਸਦਾ ਓਹੁ ਊਜਲਾ ਮੈਲਾ ਕਦੇ ਨ ਹੋਇ ॥
ਸਹਜੇ ਸਚੁ ਧਨੁ ਖਟਿਆ ਥੋੜਾ ਕਦੇ ਨ ਹੋਇ ॥
ਦੇਹੀ ਨੋ ਸਬਦੁ ਸੀਗਾਰੁ ਹੈ ਜਿਤੁ ਸਦਾ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਹੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਬੁਝੀਐ ਜਿਸ ਨੋ ਆਪਿ ਵਿਖਾਲੇ ਸੋਇ ॥੨॥
मः ३ ॥
जिनि उपाई मेदनी सोई सार करेइ ॥
एको सिमरहु भाइरहु तिसु बिनु अवरु न कोइ ॥
खाणा सबदु चंगिआईआ जितु खाधै सदा त्रिपति होइ ॥
पैनणु सिफति सनाइ है सदा सदा ओहु ऊजला मैला कदे न होइ ॥
सहजे सचु धनु खटिआ थोड़ा कदे न होइ ॥
देही नो सबदु सीगारु है जितु सदा सदा सुखु होइ ॥
नानक गुरमुखि बुझीऐ जिस नो आपि विखाले सोइ ॥२॥

हिन्दी अर्थ: महला ३॥ जिस परमात्मा ने सृष्टि पैदा की है वही इसकी संभाल करता है। हे भाईयो ! उस एक को सिमरो। उसके बिना और कोई (संभाल करने वाला) नहीं। (हे भाईयो !) प्रभू के गुणों को गुरू के शबद को भोजन बनाओ (भाव। जीवन का आसरा बनाओ)। ये भोजन खाते हुए सदा तृप्त रहना है (मन में सदा संतोख रहता है); प्रभू की सिफतसालाह को वडिआईयों को (अपना) पोशाका बनाओ। वह पोशाक सदा साफ़ रहती है और कभी मैली नहीं होती। आत्मिक अडोलता में (रह के) कमाया हुआ नाम-धन कभी कम नहीं होता। मनुष्य के शरीर के लिए गुरू का शबद (मानो) गहना है। इस (गहने की बरकति) से सदा ही सुख मिलता है। हे नानक ! जिस मनुष्य को प्रभू स्वयं समझ बख्शे वह गुरू के माध्यम से यह (जीवन का भेद) समझ लेता है। 2।
ਪਉੜੀ ॥
ਅੰਤਰਿ ਜਪੁ ਤਪੁ ਸੰਜਮੋ ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਜਾਪੈ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਈਐ ਹਉਮੈ ਅਗਿਆਨੁ ਗਵਾਪੈ ॥
ਅੰਦਰੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤਿ ਭਰਪੂਰੁ ਹੈ ਚਾਖਿਆ ਸਾਦੁ ਜਾਪੈ ॥
ਜਿਨ ਚਾਖਿਆ ਸੇ ਨਿਰਭਉ ਭਏ ਸੇ ਹਰਿ ਰਸਿ ਧ੍ਰਾਪੈ ॥
ਹਰਿ ਕਿਰਪਾ ਧਾਰਿ ਪੀਆਇਆ ਫਿਰਿ ਕਾਲੁ ਨ ਵਿਆਪੈ ॥੧੭॥
पउड़ी ॥
अंतरि जपु तपु संजमो गुर सबदी जापै ॥
हरि हरि नामु धिआईऐ हउमै अगिआनु गवापै ॥
अंदरु अंम्रिति भरपूरु है चाखिआ सादु जापै ॥
जिन चाखिआ से निरभउ भए से हरि रसि ध्रापै ॥
हरि किरपा धारि पीआइआ फिरि कालु न विआपै ॥१७॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (‘दूजे भरम’ से हट के) मन के अंदर ही टिकना – यही है जप यही है तप यही है इन्द्रियों को विकारों से रोकने का साधन; पर यह समझ सतिगुरू के शबद द्वारा ही आती है; अगर (‘दूसरे भ्रम’ को छोड़ के) प्रभू का नाम सिमरें तो अहंकार और आत्मिक जीवन की तरफ से बनी हुई बेसमझी दूर हो जाती है। (वैसे तो सदा ही) हृदय नाम-अमृत से नाको-नाक भरा हुआ है (भाव। परमात्मा अंदर ही रोम-रोम में बसता है)। (गुरू के शबद द्वारा नाम-रस) चखने से स्वाद आता है। जिन्होंनें ये नाम-रस चखा है वह निर्भय (प्रभू का रूप) हो जाते हैं। वे नाम के रस से तृप्त हो जाते हैं। जिनको प्रभू ने मेहर करके यह रस पिलाया है उनको दोबारा मौत का डर सता नहीं सकता (आत्मिक मौत उनके नजदीक नहीं आती)। 17।
ਸਲੋਕੁ ਮਃ ੩ ॥
ਲੋਕੁ ਅਵਗਣਾ ਕੀ ਬੰਨੑੈ ਗੰਠੜੀ ਗੁਣ ਨ ਵਿਹਾਝੈ ਕੋਇ ॥
ਗੁਣ ਕਾ ਗਾਹਕੁ ਨਾਨਕਾ ਵਿਰਲਾ ਕੋਈ ਹੋਇ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਗੁਣ ਪਾਈਅਨਿੑ ਜਿਸ ਨੋ ਨਦਰਿ ਕਰੇਇ ॥੧॥
सलोकु मः ३ ॥
लोकु अवगणा की बंन॑ै गंठड़ी गुण न विहाझै कोइ ॥
गुण का गाहकु नानका विरला कोई होइ ॥
गुर परसादी गुण पाईअनि॑ जिस नो नदरि करेइ ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला ३॥ जगत अवगुणों की पोटली बाँधता जा रहा है। कोई व्यक्ति गुणों का सौदा नहीं करता। हे नानक ! गुण खरीदने वाला कोई विरला ही होता है। गुरू की कृपा से ही गुण मिलते हैं। (पर मिलते उसको हैं) जिस पर प्रभू मेहर की नज़र करता है। 1।
ਮਃ ੩ ॥
ਗੁਣ ਅਵਗੁਣ ਸਮਾਨਿ ਹਹਿ ਜਿ ਆਪਿ ਕੀਤੇ ਕਰਤਾਰਿ ॥
ਨਾਨਕ ਹੁਕਮਿ ਮੰਨਿਐ ਸੁਖੁ ਪਾਈਐ ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਵੀਚਾਰਿ ॥੨॥
मः ३ ॥
गुण अवगुण समानि हहि जि आपि कीते करतारि ॥
नानक हुकमि मंनिऐ सुखु पाईऐ गुर सबदी वीचारि ॥२॥

हिन्दी अर्थ: महला ३॥ (जिसने हुकम माना है उसको लोगों की ओर से किए गए) गुण और अवगुण (भाव। नेकी और बदी के सलूक) एक समान ही प्रतीत होते हैं (क्योंकि। ‘हुकम’ में चलने के कारण समझ लेता है कि) ये (गुण और अवगुण) करतार ने खुद ही पैदा किए हैं। हे नानक ! गुरू के शबद द्वारा विचारवान हो के प्रभू का हुकम मानने से सुख मिलता है। 2।
ਪਉੜੀ ॥
ਅੰਦਰਿ ਰਾਜਾ ਤਖਤੁ ਹੈ ਆਪੇ ਕਰੇ ਨਿਆਉ ॥
ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਦਰੁ ਜਾਣੀਐ ਅੰਦਰਿ ਮਹਲੁ ਅਸਰਾਉ ॥
ਖਰੇ ਪਰਖਿ ਖਜਾਨੈ ਪਾਈਅਨਿ ਖੋਟਿਆ ਨਾਹੀ ਥਾਉ ॥
ਸਭੁ ਸਚੋ ਸਚੁ ਵਰਤਦਾ ਸਦਾ ਸਚੁ ਨਿਆਉ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਕਾ ਰਸੁ ਆਇਆ ਮਨਿ ਵਸਿਆ ਨਾਉ ॥੧੮॥
पउड़ी ॥
अंदरि राजा तखतु है आपे करे निआउ ॥
गुर सबदी दरु जाणीऐ अंदरि महलु असराउ ॥
खरे परखि खजानै पाईअनि खोटिआ नाही थाउ ॥
सभु सचो सचु वरतदा सदा सचु निआउ ॥
अंम्रित का रसु आइआ मनि वसिआ नाउ ॥१८॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (जीव के) अंदर ही (जीवों का) मालिक (बैठा) है। (जीव के) अंदर ही (उसका) तख़्त है। वह स्वयं ही (अंदर बैठा हुआ। जीव के किए कर्मों का) न्याय किए जाता है; (जीव के) अंदर ही (उसका) महल है। (जीव के) अंदर ही (बैठा जीव को) आसरा (दिए जा रहा) है। पर उसके महल का दरवाजा गुरू के शबद द्वारा ही मिलता है। (जीव के अंदर ही बैठे हुए की हजूरी में) खरे जीव परख के खजाने में रखे जाते हैं (भाव। अंदर बैठा हुआ ही खरे जीवों की आप संभाल किए जाता है)। खोटों को जगह नहीं मिलती। वह सदा-स्थिर रहने वाला प्रभू हर जगह मौजूद है। उसका न्याय सदा अटल है; उनको उसके नाम-अमृत का स्वाद आता है जिनके मन में नाम बसता है। 18।
ਸਲੋਕ ਮਃ ੧ ॥
ਹਉ ਮੈ ਕਰੀ ਤਾਂ ਤੂ ਨਾਹੀ ਤੂ ਹੋਵਹਿ ਹਉ ਨਾਹਿ ॥
सलोक मः १ ॥
हउ मै करी तां तू नाही तू होवहि हउ नाहि ॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला १॥ हे प्रभू ! जब मैं ‘मैं मैं’ करता हूँ तब तू (मेरे अंदर प्रकट) नहीं होता। पर जब तू आ बसता है मेरी ‘मैं’ समाप्त हो जाती है।

संदर्भ: यह अंग 1092 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।

startup की 14-घंटे की रात, founder अकेले laptop पर।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 43 पंक्तियों का है, 8 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1092” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 1093 →, पीछे का: ← अंग 1091

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।