अंग 1039

अंग
1039
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਤੂ ਦਾਤਾ ਹਮ ਸੇਵਕ ਤੇਰੇ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮੁ ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰਿ ਦੀਜੈ ਗੁਰਿ ਗਿਆਨ ਰਤਨੁ ਦੀਪਾਇਆ ॥੬॥
ਪੰਚ ਤਤੁ ਮਿਲਿ ਇਹੁ ਤਨੁ ਕੀਆ ॥
ਆਤਮ ਰਾਮ ਪਾਏ ਸੁਖੁ ਥੀਆ ॥
ਕਰਮ ਕਰਤੂਤਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਫਲੁ ਲਾਗਾ ਹਰਿ ਨਾਮ ਰਤਨੁ ਮਨਿ ਪਾਇਆ ॥੭॥
ਨਾ ਤਿਸੁ ਭੂਖ ਪਿਆਸ ਮਨੁ ਮਾਨਿਆ ॥
ਸਰਬ ਨਿਰੰਜਨੁ ਘਟਿ ਘਟਿ ਜਾਨਿਆ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਰਸਿ ਰਾਤਾ ਕੇਵਲ ਬੈਰਾਗੀ ਗੁਰਮਤਿ ਭਾਇ ਸੁਭਾਇਆ ॥੮॥
ਅਧਿਆਤਮ ਕਰਮ ਕਰੇ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ॥
ਨਿਰਮਲ ਜੋਤਿ ਨਿਰੰਤਰਿ ਜਾਤੀ ॥
ਸਬਦੁ ਰਸਾਲੁ ਰਸਨ ਰਸਿ ਰਸਨਾ ਬੇਣੁ ਰਸਾਲੁ ਵਜਾਇਆ ॥੯॥
ਬੇਣੁ ਰਸਾਲ ਵਜਾਵੈ ਸੋਈ ॥
ਜਾ ਕੀ ਤ੍ਰਿਭਵਣ ਸੋਝੀ ਹੋਈ ॥
ਨਾਨਕ ਬੂਝਹੁ ਇਹ ਬਿਧਿ ਗੁਰਮਤਿ ਹਰਿ ਰਾਮ ਨਾਮਿ ਲਿਵ ਲਾਇਆ ॥੧੦॥
ਐਸੇ ਜਨ ਵਿਰਲੇ ਸੰਸਾਰੇ ॥
ਗੁਰ ਸਬਦੁ ਵੀਚਾਰਹਿ ਰਹਹਿ ਨਿਰਾਰੇ ॥
ਆਪਿ ਤਰਹਿ ਸੰਗਤਿ ਕੁਲ ਤਾਰਹਿ ਤਿਨ ਸਫਲ ਜਨਮੁ ਜਗਿ ਆਇਆ ॥੧੧॥
ਘਰੁ ਦਰੁ ਮੰਦਰੁ ਜਾਣੈ ਸੋਈ ॥
ਜਿਸੁ ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਤੇ ਸੋਝੀ ਹੋਈ ॥
ਕਾਇਆ ਗੜ ਮਹਲ ਮਹਲੀ ਪ੍ਰਭੁ ਸਾਚਾ ਸਚੁ ਸਾਚਾ ਤਖਤੁ ਰਚਾਇਆ ॥੧੨॥
ਚਤੁਰ ਦਸ ਹਾਟ ਦੀਵੇ ਦੁਇ ਸਾਖੀ ॥
ਸੇਵਕ ਪੰਚ ਨਾਹੀ ਬਿਖੁ ਚਾਖੀ ॥
ਅੰਤਰਿ ਵਸਤੁ ਅਨੂਪ ਨਿਰਮੋਲਕ ਗੁਰਿ ਮਿਲਿਐ ਹਰਿ ਧਨੁ ਪਾਇਆ ॥੧੩॥
ਤਖਤਿ ਬਹੈ ਤਖਤੈ ਕੀ ਲਾਇਕ ॥
ਪੰਚ ਸਮਾਏ ਗੁਰਮਤਿ ਪਾਇਕ ॥
ਆਦਿ ਜੁਗਾਦੀ ਹੈ ਭੀ ਹੋਸੀ ਸਹਸਾ ਭਰਮੁ ਚੁਕਾਇਆ ॥੧੪॥
ਤਖਤਿ ਸਲਾਮੁ ਹੋਵੈ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ॥
ਇਹੁ ਸਾਚੁ ਵਡਾਈ ਗੁਰਮਤਿ ਲਿਵ ਜਾਤੀ ॥
ਨਾਨਕ ਰਾਮੁ ਜਪਹੁ ਤਰੁ ਤਾਰੀ ਹਰਿ ਅੰਤਿ ਸਖਾਈ ਪਾਇਆ ॥੧੫॥੧॥੧੮॥
तू दाता हम सेवक तेरे ॥
अंम्रित नामु क्रिपा करि दीजै गुरि गिआन रतनु दीपाइआ ॥६॥
पंच ततु मिलि इहु तनु कीआ ॥
आतम राम पाए सुखु थीआ ॥
करम करतूति अंम्रित फलु लागा हरि नाम रतनु मनि पाइआ ॥७॥
ना तिसु भूख पिआस मनु मानिआ ॥
सरब निरंजनु घटि घटि जानिआ ॥
अंम्रित रसि राता केवल बैरागी गुरमति भाइ सुभाइआ ॥८॥
अधिआतम करम करे दिनु राती ॥
निरमल जोति निरंतरि जाती ॥
सबदु रसालु रसन रसि रसना बेणु रसालु वजाइआ ॥९॥
बेणु रसाल वजावै सोई ॥
जा की त्रिभवण सोझी होई ॥
नानक बूझहु इह बिधि गुरमति हरि राम नामि लिव लाइआ ॥१०॥
ऐसे जन विरले संसारे ॥
गुर सबदु वीचारहि रहहि निरारे ॥
आपि तरहि संगति कुल तारहि तिन सफल जनमु जगि आइआ ॥११॥
घरु दरु मंदरु जाणै सोई ॥
जिसु पूरे गुर ते सोझी होई ॥
काइआ गड़ महल महली प्रभु साचा सचु साचा तखतु रचाइआ ॥१२॥
चतुर दस हाट दीवे दुइ साखी ॥
सेवक पंच नाही बिखु चाखी ॥
अंतरि वसतु अनूप निरमोलक गुरि मिलिऐ हरि धनु पाइआ ॥१३॥
तखति बहै तखतै की लाइक ॥
पंच समाए गुरमति पाइक ॥
आदि जुगादी है भी होसी सहसा भरमु चुकाइआ ॥१४॥
तखति सलामु होवै दिनु राती ॥
इहु साचु वडाई गुरमति लिव जाती ॥
नानक रामु जपहु तरु तारी हरि अंति सखाई पाइआ ॥१५॥१॥१८॥

हिन्दी अर्थ: हे प्रभू ! हम जीव तेरे दर के सेवक हैं। तू हम सबको दातें देने वाला है। कृपा करके हमें आत्मिक जीवन देने वाला अपना नाम दे। (जिसके ऊपर तू कृपा करता है) गुरू ने उसके ऊपर तेरे ज्ञान का रत्न रौशन कर दिया है। 6। (सर्व-व्यापक परमात्मा की रजा में) पाँच तत्वों ने मिल के यह (मनुष्य का) शरीर बनाया। जिस मनुष्य ने उस सर्व-व्यापक प्रभू को पा लिया उसके अंदर आत्मिक आनंद बन गया। (परमात्मा के साथ संबंध बनाने वाले उसके) कामों को उसके उद्यम को वह नाम-फल लगा जिस ने उसको आत्मिक जीवन बख्शा। उसने अपने मन में ही परमात्मा का नाम-रतन पा लिया। 7। जिस मनुष्य का मन (परमात्मा की याद में) पतीज जाता है उसको माया की भूख-प्यास नहीं रहती। वह निरंजन को सब जगह हरेक घट में पहचान लेता है। वह आत्मिक जीवन देने वाले सिर्फ नाम-रस में ही मस्त रहता है। दुनिया के रसों से उपराम रहता है। गुरू की मति से परमात्मा के प्रेम में जुड़ के उसका आत्मिक जीवन सुंदर लगने लग जाता है। 8। वह मनुष्य दिन-रात वही कर्म करता है जो उसकी जिंद को परमात्मा के साथ जोड़े रखते हैं। वह परमात्मा की पवित्र ज्योति को हर जगह एक-रस पहचान लेता है। सब रसों के श्रोत गुरू-शबद को (वह अपने हृदय में बसाता है)। उसकी जीभ महान श्रेष्ठ रस नाम में (रसी) रहती है। वह (अपने अंदर आत्मिक आनंद की। मानो) एक रसीली बाँसुरी बजाता है। 9। पर यह रसीली बाँसुरी वही मनुष्य बजा सकता है जिसको तीन भवनों में व्यापक परमात्मा की सूझ पड़ जाती है। हे नानक ! तू भी गुरू की मति ले के यह सलीका सीख ले। जिस किसी ने भी गुरू की मति ली है उसकी सुरति परमात्मा के नाम में जुड़ी रहती है। 10। जगत में ऐसे लोग बहुत कम हैं जो गुरू के शबद को अपनी सुरति में टिकाते हैं और (दुनियां में विचरते हुए भी माया के मोह से) निर्लिप रहते हैं। वह संसार-समुंद्र से खुद पार लांघ जाते हैं। अपनी कुलों को और उनको भी पार लंघा लेते हैं जो उनकी संगति करते हैं। जगत में ऐसे लोगों का आना लाभदायक है। 11। वही व्यक्ति परमात्मा का घर परमात्मा का दर परमात्मा का महल पहचान लेता है जिसको पूरे गुरू से (ऊँची) समझ मिलती है। उसको समझ आ जाती है कि ये शरीर परमात्मा के किले हैं महल हैं। वह महलों का मालिक प्रभू सदा-स्थिर रहने वाला है (मनुष्य का शरीर) उसने अपने बैठने के लिए तख़्त बनाया हुआ है। 12। यह बेमिसाल और अमूल्य नाम-धन हरेक शरीर महल के अंदर मौजूद है। अगर गुरू मिल जाए तो अंदर से ही यह धन प्राप्त हो जाता है। (जिनको यह नाम-धन मिल जाता है वह प्रभू के जाने-माने सेवक कहलवाते हैं) वह जाने-पहचाने सेवक (फिर) उस माया-जहर को नहीं चखते जो आत्मिक मौत लाती है (वे अटल आत्मिक जीवन के मालिक बन जाते हैं) चौदह लोक और चाँद व सूरज इस बात के गवाह हैं। 13। वह हृदय-तख़्त पर बैठने-योग्य हो जाता है और हृदय-तख़्त पर बैठा रहता है (भाव। ना उसकी ज्ञानेन्द्रियां माया की तरफ डोलती हैं ना ही उसका मन विकारों की ओर जाता है)। जो मनुष्य गुरू की मति पर चलता है उसकी पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ उसकी सेवक बन के उसके वश में रहती हैं। जो परमात्मा सृष्टि के आदि से भी पहले का है जुगों से भी आदि से है। अब भी मौजूद है और सदा के लिए कायम रहेगा वह परमात्मा गुरू की मति पर चलने वाले मनुष्य के अंदर प्रकट होकर उसका सहम और उसकी भटकना दूर कर देता है। 14। हृदय-तख़्त पर बैठे मनुष्य को दिन-रात आदर मिलता है। जिस मनुष्य ने गुरू की मति पर चल कर परमात्मा के चरणों के साथ लिव की सांझ डाल ली उसको ये आदर सदा के लिए मिला रहता है ये इज्जत सयदा के लिए मिली रहती है। हे नानक ! (कह- हे भाई !) परमात्मा का नाम जपो। (संसार समुंद्र से पार लांघने के लिए सिमरन की) तैराकी तैरो। जो मनुष्य सिमरन करता है वह उस हरी को मिल जाता है जो आखिर तक साथी बना रहता है। 15। 1। 18।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਹਰਿ ਧਨੁ ਸੰਚਹੁ ਰੇ ਜਨ ਭਾਈ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਸੇਵਿ ਰਹਹੁ ਸਰਣਾਈ ॥
ਤਸਕਰੁ ਚੋਰੁ ਨ ਲਾਗੈ ਤਾ ਕਉ ਧੁਨਿ ਉਪਜੈ ਸਬਦਿ ਜਗਾਇਆ ॥੧॥
ਤੂ ਏਕੰਕਾਰੁ ਨਿਰਾਲਮੁ ਰਾਜਾ ॥
ਤੂ ਆਪਿ ਸਵਾਰਹਿ ਜਨ ਕੇ ਕਾਜਾ ॥
ਅਮਰੁ ਅਡੋਲੁ ਅਪਾਰੁ ਅਮੋਲਕੁ ਹਰਿ ਅਸਥਿਰ ਥਾਨਿ ਸੁਹਾਇਆ ॥੨॥
ਦੇਹੀ ਨਗਰੀ ਊਤਮ ਥਾਨਾ ॥
ਪੰਚ ਲੋਕ ਵਸਹਿ ਪਰਧਾਨਾ ॥
ਊਪਰਿ ਏਕੰਕਾਰੁ ਨਿਰਾਲਮੁ ਸੁੰਨ ਸਮਾਧਿ ਲਗਾਇਆ ॥੩॥
ਦੇਹੀ ਨਗਰੀ ਨਉ ਦਰਵਾਜੇ ॥
ਸਿਰਿ ਸਿਰਿ ਕਰਣੈਹਾਰੈ ਸਾਜੇ ॥
ਦਸਵੈ ਪੁਰਖੁ ਅਤੀਤੁ ਨਿਰਾਲਾ ਆਪੇ ਅਲਖੁ ਲਖਾਇਆ ॥੪॥
ਪੁਰਖੁ ਅਲੇਖੁ ਸਚੇ ਦੀਵਾਨਾ ॥
ਹੁਕਮਿ ਚਲਾਏ ਸਚੁ ਨੀਸਾਨਾ ॥
ਨਾਨਕ ਖੋਜਿ ਲਹਹੁ ਘਰੁ ਅਪਨਾ ਹਰਿ ਆਤਮ ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਪਾਇਆ ॥੫॥
मारू महला १ ॥
हरि धनु संचहु रे जन भाई ॥
सतिगुर सेवि रहहु सरणाई ॥
तसकरु चोरु न लागै ता कउ धुनि उपजै सबदि जगाइआ ॥१॥
तू एकंकारु निरालमु राजा ॥
तू आपि सवारहि जन के काजा ॥
अमरु अडोलु अपारु अमोलकु हरि असथिर थानि सुहाइआ ॥२॥
देही नगरी ऊतम थाना ॥
पंच लोक वसहि परधाना ॥
ऊपरि एकंकारु निरालमु सुंन समाधि लगाइआ ॥३॥
देही नगरी नउ दरवाजे ॥
सिरि सिरि करणैहारै साजे ॥
दसवै पुरखु अतीतु निराला आपे अलखु लखाइआ ॥४॥
पुरखु अलेखु सचे दीवाना ॥
हुकमि चलाए सचु नीसाना ॥
नानक खोजि लहहु घरु अपना हरि आतम राम नामु पाइआ ॥५॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला १॥ हे भाई जनो ! परमात्मा का नाम-धन इकट्ठा करो (पर ये धन गुरू के बताए राह पर चलने से मिलता है। इस वास्ते) गुरू की बताई हुई सेवा करके गुरू की शरण में टिके रहो। (जो मनुष्य ये आत्मिक रास्ता पकड़ता है) उसको कोई (कामादिक) चोर नहीं लगता (कोई चोर उस पर अपना दाव नहीं लगा सकता क्योंकि) गुरू ने अपने शबद के द्वारा उसको जगा दिया है और उसके अंदर (नाम-सिमरन की) ध्वनि पैदा हुई रहती है। 1। हे प्रभू ! तू एक स्वयं ही स्वयं है। तुझे किसी सहारे की आवश्यक्ता नहीं। तू सारी सृष्टि का राजा है। अपने सेवकों के काम तू खुद सवारता है। हे हरी ! तुझे मौत नहीं छू सकती। तुझे माया डुला नहीं सकती। तू बेअंत है। तेरा मूल्य नहीं डाला जा सकता। तू ऐसी जगह शोभायमान है जो हमेशा कायम रहने वाला है। 2। मनुष्य का शरीर। मानो। एक शहर है। जिस-जिस शरीर-शहर में जाने-माने संत-जन रहते हैं। वह-वह शरीर-शहर (परमात्मा के बसने के लिए) श्रेष्ठ जगह है। जो परमात्मा सब जीवों के सिर पर रखवाला है। जो एक स्वयं ही स्वयं (अपने जैसा) है। जिसको और किसी आसरे-सहारे की आवश्यक्ता नहीं। वह परमात्मा (उस शरीर-शहर में। मानो) ऐसी समाधि लगाए बैठा है जिसमें कोई मायावी फुरने नहीं उठते। 3। सृजनहार प्रभू ने हरेक शरीर-शहर को नौ-नौ दरवाजे लगा दिए हैं (इन दरवाजों के द्वारा शरीर-शहर में बसने वाली जीवात्मा बाहरी दुनियां से अपना संबंध बनाए रखती है। एक दसवाँ दरवाजा भी है जिसके द्वारा परमात्मा और जीवात्मा का मेल होता है। उस) में वह परमात्मा खुद टिकता है जो सर्व-व्यापक है जो माया के प्रभाव से परे है। जो निर्लिप है जो अदृष्ट है। (पर जीव को अपना आप) वह स्वयं ही दिखाता है। 4। हरेक शरीर-शहर में रहने वाला परमात्मा ऐसा है कि उसका कोई चित्र नहीं बना सकता (वह सदा-स्थिररहने वाला है और) उस सदा-स्थिर प्रभू का दरबार भी सदा-स्थिर है। (जगत की सारी कार वह) अपने हुकम में चला रहा है (उसके हुकम का) परवाना अटल है। हे नानक ! (सर्व-व्यापक प्रभू हरेक शरीर-घर में मौजूद है) अपना हृदय-घर खोज के उसको ढूँढ लो। (जिस-जिस मनुष्य ने ये खोज-बीन की है) उसने उस सर्व-व्यापक प्रभू का नाम-धन हासिल कर लिया है। 5।

संदर्भ: यह अंग 1039 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।

गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।

CBSE board-exam का दिन सुबह, बच्चा pencil-box check कर रहा, माँ चुप।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 45 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1039” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 1040 →, पीछे का: ← अंग 1038

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।