अंग
1053
राग मारू
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਆਪੇ ਬਖਸੇ ਸਚੁ ਦ੍ਰਿੜਾਏ ਮਨੁ ਤਨੁ ਸਾਚੈ ਰਾਤਾ ਹੇ ॥੧੧॥
ਮਨੁ ਤਨੁ ਮੈਲਾ ਵਿਚਿ ਜੋਤਿ ਅਪਾਰਾ ॥
ਗੁਰਮਤਿ ਬੂਝੈ ਕਰਿ ਵੀਚਾਰਾ ॥
ਹਉਮੈ ਮਾਰਿ ਸਦਾ ਮਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਰਸਨਾ ਸੇਵਿ ਸੁਖਦਾਤਾ ਹੇ ॥੧੨॥
ਗੜ ਕਾਇਆ ਅੰਦਰਿ ਬਹੁ ਹਟ ਬਾਜਾਰਾ ॥
ਤਿਸੁ ਵਿਚਿ ਨਾਮੁ ਹੈ ਅਤਿ ਅਪਾਰਾ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਸਦਾ ਦਰਿ ਸੋਹੈ ਹਉਮੈ ਮਾਰਿ ਪਛਾਤਾ ਹੇ ॥੧੩॥
ਰਤਨੁ ਅਮੋਲਕੁ ਅਗਮ ਅਪਾਰਾ ॥
ਕੀਮਤਿ ਕਵਣੁ ਕਰੇ ਵੇਚਾਰਾ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦੇ ਤੋਲਿ ਤੋਲਾਏ ਅੰਤਰਿ ਸਬਦਿ ਪਛਾਤਾ ਹੇ ॥੧੪॥
ਸਿਮ੍ਰਿਤਿ ਸਾਸਤ੍ਰ ਬਹੁਤੁ ਬਿਸਥਾਰਾ ॥ ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਪਸਰਿਆ ਪਾਸਾਰਾ ॥
ਮੂਰਖ ਪੜਹਿ ਸਬਦੁ ਨ ਬੂਝਹਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਵਿਰਲੈ ਜਾਤਾ ਹੇ ॥੧੫॥
ਆਪੇ ਕਰਤਾ ਕਰੇ ਕਰਾਏ ॥
ਸਚੀ ਬਾਣੀ ਸਚੁ ਦ੍ਰਿੜਾਏ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਮਿਲੈ ਵਡਿਆਈ ਜੁਗਿ ਜੁਗਿ ਏਕੋ ਜਾਤਾ ਹੇ ॥੧੬॥੯॥
ਮਨੁ ਤਨੁ ਮੈਲਾ ਵਿਚਿ ਜੋਤਿ ਅਪਾਰਾ ॥
ਗੁਰਮਤਿ ਬੂਝੈ ਕਰਿ ਵੀਚਾਰਾ ॥
ਹਉਮੈ ਮਾਰਿ ਸਦਾ ਮਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਰਸਨਾ ਸੇਵਿ ਸੁਖਦਾਤਾ ਹੇ ॥੧੨॥
ਗੜ ਕਾਇਆ ਅੰਦਰਿ ਬਹੁ ਹਟ ਬਾਜਾਰਾ ॥
ਤਿਸੁ ਵਿਚਿ ਨਾਮੁ ਹੈ ਅਤਿ ਅਪਾਰਾ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਸਦਾ ਦਰਿ ਸੋਹੈ ਹਉਮੈ ਮਾਰਿ ਪਛਾਤਾ ਹੇ ॥੧੩॥
ਰਤਨੁ ਅਮੋਲਕੁ ਅਗਮ ਅਪਾਰਾ ॥
ਕੀਮਤਿ ਕਵਣੁ ਕਰੇ ਵੇਚਾਰਾ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦੇ ਤੋਲਿ ਤੋਲਾਏ ਅੰਤਰਿ ਸਬਦਿ ਪਛਾਤਾ ਹੇ ॥੧੪॥
ਸਿਮ੍ਰਿਤਿ ਸਾਸਤ੍ਰ ਬਹੁਤੁ ਬਿਸਥਾਰਾ ॥ ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਪਸਰਿਆ ਪਾਸਾਰਾ ॥
ਮੂਰਖ ਪੜਹਿ ਸਬਦੁ ਨ ਬੂਝਹਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਵਿਰਲੈ ਜਾਤਾ ਹੇ ॥੧੫॥
ਆਪੇ ਕਰਤਾ ਕਰੇ ਕਰਾਏ ॥
ਸਚੀ ਬਾਣੀ ਸਚੁ ਦ੍ਰਿੜਾਏ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਮਿਲੈ ਵਡਿਆਈ ਜੁਗਿ ਜੁਗਿ ਏਕੋ ਜਾਤਾ ਹੇ ॥੧੬॥੯॥
आपे बखसे सचु द्रिड़ाए मनु तनु साचै राता हे ॥११॥
मनु तनु मैला विचि जोति अपारा ॥
गुरमति बूझै करि वीचारा ॥
हउमै मारि सदा मनु निरमलु रसना सेवि सुखदाता हे ॥१२॥
गड़ काइआ अंदरि बहु हट बाजारा ॥
तिसु विचि नामु है अति अपारा ॥
गुर कै सबदि सदा दरि सोहै हउमै मारि पछाता हे ॥१३॥
रतनु अमोलकु अगम अपारा ॥
कीमति कवणु करे वेचारा ॥
गुर कै सबदे तोलि तोलाए अंतरि सबदि पछाता हे ॥१४॥
सिम्रिति सासत्र बहुतु बिसथारा ॥ माइआ मोहु पसरिआ पासारा ॥
मूरख पड़हि सबदु न बूझहि गुरमुखि विरलै जाता हे ॥१५॥
आपे करता करे कराए ॥
सची बाणी सचु द्रिड़ाए ॥
नानक नामु मिलै वडिआई जुगि जुगि एको जाता हे ॥१६॥९॥
मनु तनु मैला विचि जोति अपारा ॥
गुरमति बूझै करि वीचारा ॥
हउमै मारि सदा मनु निरमलु रसना सेवि सुखदाता हे ॥१२॥
गड़ काइआ अंदरि बहु हट बाजारा ॥
तिसु विचि नामु है अति अपारा ॥
गुर कै सबदि सदा दरि सोहै हउमै मारि पछाता हे ॥१३॥
रतनु अमोलकु अगम अपारा ॥
कीमति कवणु करे वेचारा ॥
गुर कै सबदे तोलि तोलाए अंतरि सबदि पछाता हे ॥१४॥
सिम्रिति सासत्र बहुतु बिसथारा ॥ माइआ मोहु पसरिआ पासारा ॥
मूरख पड़हि सबदु न बूझहि गुरमुखि विरलै जाता हे ॥१५॥
आपे करता करे कराए ॥
सची बाणी सचु द्रिड़ाए ॥
नानक नामु मिलै वडिआई जुगि जुगि एको जाता हे ॥१६॥९॥
हिन्दी अर्थ: जिस पर वह स्वयं ही बख्शिश करता है। उसके हृदय में अपना सदा-स्थिर नाम पक्का कर देता है; उस मनुष्य का मन उसका तन सदा-स्थिर हरी-नाम में रंगा जाता है। 11। हे भाई ! (विकारों के कारण मनुष्य का) मन और तन गंदा हुआ रहता है। (फिर भी उसके) अंदर बेअंत परमात्मा की ज्योति मौजूद है। जब गुरू की मति से वह विचार करके (आत्मिक जीवन के भेद को) समझता है। तब अहंकार को दूर करके। और जीभ से सुखों के दाते प्रभू का नाम जप के। उसका मन सदा के लिए पवित्र हो जाता है। 12। हे भाई ! इस शरीर किले में (मन। ज्ञान इन्द्रियां आदि) कई हाट हैं कई बाजार हैं (जहाँ परमात्मा के नाम-सौदे का सौदा किया जा सकता है)। इस (शरीर-किले) के बीच (ही) परमात्मा का बहुत कीमती नाम-पदार्थ है। जो मनुष्य गुरू के शबद द्वारा (इस नाम-रतन को परख के खरीदता है। वह मनुष्य) परमात्मा के दर पर सदा आदर पाता है। (अपने अंदर से) अहंकार दूर कर के (वह मनुष्य इस नाम-रतन की) कद्र समझता है। 13। हे भाई ! कोई भी दुनियावी पदार्थ अपहुँच और बेअंत परमात्मा के नाम-रतन के बराबर की कीमत का नहीं। जीव बेचारा इस नाम-रत्न का मूल्य पा ही नहीं सकता। जो मनुष्य गुरू के शबद के द्वारा इस नाम-रतन को परख के खरीदता है। वह शबद की बरकति से अपने अंदर ही इसको पा लेता है। 14। हे भाई ! स्मृतियां-शास्त्र (आदि धर्म-पुस्तक हरी-नाम के बिना और) बहुत सारे विचारों का खिलारा खिलारते हैं। (पर उनमें) माया का मोह ही है (कर्म-काण्ड का ही) पसारा पसरा हुआ है। (नाम की ओर से टूटे हुए) मूर्ख (उन पुस्तकों को) पढ़ते हैं। पर सिफत-सालाह की बाणी की कद्र नहीं समझते। गुरू के सन्मुख रहने वाले विरले मनुष्य ने (शबद की कद्र) समझ ली है। 15। (पर हे भाई ! जीवों के भी क्या वश। ) करतार स्वयं ही (जीवों में व्यापक हो के सब कुछ) कर रहा है और (जीवों से) करवा रहा है। (जिस पर मेहर करता है) सिफत-सालाह की बाणी से (उसके हृदय में) सदा-स्थिर हरी-नाम पक्का कर देता है। हे नानक ! जिस मनुष्य को प्रभू का नाम मिल जाता है उसको (लोक-परलोक की) इज्जत मिल जाती है। वह मनुष्य हरेक युग में एक परमात्मा को ही व्यापक समझता है। 16। 9।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਸੋ ਸਚੁ ਸੇਵਿਹੁ ਸਿਰਜਣਹਾਰਾ ॥
ਸਬਦੇ ਦੂਖ ਨਿਵਾਰਣਹਾਰਾ ॥
ਅਗਮੁ ਅਗੋਚਰੁ ਕੀਮਤਿ ਨਹੀ ਪਾਈ ਆਪੇ ਅਗਮ ਅਥਾਹਾ ਹੇ ॥੧॥
ਆਪੇ ਸਚਾ ਸਚੁ ਵਰਤਾਏ ॥
ਇਕਿ ਜਨ ਸਾਚੈ ਆਪੇ ਲਾਏ ॥
ਸਾਚੋ ਸੇਵਹਿ ਸਾਚੁ ਕਮਾਵਹਿ ਨਾਮੇ ਸਚਿ ਸਮਾਹਾ ਹੇ ॥੨॥
ਧੁਰਿ ਭਗਤਾ ਮੇਲੇ ਆਪਿ ਮਿਲਾਏ ॥
ਸਚੀ ਭਗਤੀ ਆਪੇ ਲਾਏ ॥
ਸਾਚੀ ਬਾਣੀ ਸਦਾ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ਇਸੁ ਜਨਮੈ ਕਾ ਲਾਹਾ ਹੇ ॥੩॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਵਣਜੁ ਕਰਹਿ ਪਰੁ ਆਪੁ ਪਛਾਣਹਿ ॥
ਏਕਸ ਬਿਨੁ ਕੋ ਅਵਰੁ ਨ ਜਾਣਹਿ ॥
ਸਚਾ ਸਾਹੁ ਸਚੇ ਵਣਜਾਰੇ ਪੂੰਜੀ ਨਾਮੁ ਵਿਸਾਹਾ ਹੇ ॥੪॥
ਆਪੇ ਸਾਜੇ ਸ੍ਰਿਸਟਿ ਉਪਾਏ ॥
ਵਿਰਲੇ ਕਉ ਗੁਰ ਸਬਦੁ ਬੁਝਾਏ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਹਿ ਸੇ ਜਨ ਸਾਚੇ ਕਾਟੇ ਜਮ ਕਾ ਫਾਹਾ ਹੇ ॥੫॥
ਭੰਨੈ ਘੜੇ ਸਵਾਰੇ ਸਾਜੇ ॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹਿ ਦੂਜੈ ਜੰਤ ਪਾਜੇ ॥
ਮਨਮੁਖ ਫਿਰਹਿ ਸਦਾ ਅੰਧੁ ਕਮਾਵਹਿ ਜਮ ਕਾ ਜੇਵੜਾ ਗਲਿ ਫਾਹਾ ਹੇ ॥੬॥
ਆਪੇ ਬਖਸੇ ਗੁਰ ਸੇਵਾ ਲਾਏ ॥
ਗੁਰਮਤੀ ਨਾਮੁ ਮੰਨਿ ਵਸਾਏ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਨਾਮੁ ਧਿਆਏ ਸਾਚਾ ਇਸੁ ਜਗ ਮਹਿ ਨਾਮੋ ਲਾਹਾ ਹੇ ॥੭॥
ਆਪੇ ਸਚਾ ਸਚੀ ਨਾਈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਦੇਵੈ ਮੰਨਿ ਵਸਾਈ ॥
ਜਿਨ ਮਨਿ ਵਸਿਆ ਸੇ ਜਨ ਸੋਹਹਿ ਤਿਨ ਸਿਰਿ ਚੂਕਾ ਕਾਹਾ ਹੇ ॥੮॥
ਅਗਮ ਅਗੋਚਰੁ ਕੀਮਤਿ ਨਹੀ ਪਾਈ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਮੰਨਿ ਵਸਾਈ ॥
ਸਦਾ ਸਬਦਿ ਸਾਲਾਹੀ ਗੁਣਦਾਤਾ ਲੇਖਾ ਕੋਇ ਨ ਮੰਗੈ ਤਾਹਾ ਹੇ ॥੯॥
ਬ੍ਰਹਮਾ ਬਿਸਨੁ ਰੁਦ੍ਰੁ ਤਿਸ ਕੀ ਸੇਵਾ ॥
ਅੰਤੁ ਨ ਪਾਵਹਿ ਅਲਖ ਅਭੇਵਾ ॥
ਜਿਨ ਕਉ ਨਦਰਿ ਕਰਹਿ ਤੂ ਅਪਣੀ ਗੁਰਮੁਖਿ ਅਲਖੁ ਲਖਾਹਾ ਹੇ ॥੧੦॥
ਸੋ ਸਚੁ ਸੇਵਿਹੁ ਸਿਰਜਣਹਾਰਾ ॥
ਸਬਦੇ ਦੂਖ ਨਿਵਾਰਣਹਾਰਾ ॥
ਅਗਮੁ ਅਗੋਚਰੁ ਕੀਮਤਿ ਨਹੀ ਪਾਈ ਆਪੇ ਅਗਮ ਅਥਾਹਾ ਹੇ ॥੧॥
ਆਪੇ ਸਚਾ ਸਚੁ ਵਰਤਾਏ ॥
ਇਕਿ ਜਨ ਸਾਚੈ ਆਪੇ ਲਾਏ ॥
ਸਾਚੋ ਸੇਵਹਿ ਸਾਚੁ ਕਮਾਵਹਿ ਨਾਮੇ ਸਚਿ ਸਮਾਹਾ ਹੇ ॥੨॥
ਧੁਰਿ ਭਗਤਾ ਮੇਲੇ ਆਪਿ ਮਿਲਾਏ ॥
ਸਚੀ ਭਗਤੀ ਆਪੇ ਲਾਏ ॥
ਸਾਚੀ ਬਾਣੀ ਸਦਾ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ਇਸੁ ਜਨਮੈ ਕਾ ਲਾਹਾ ਹੇ ॥੩॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਵਣਜੁ ਕਰਹਿ ਪਰੁ ਆਪੁ ਪਛਾਣਹਿ ॥
ਏਕਸ ਬਿਨੁ ਕੋ ਅਵਰੁ ਨ ਜਾਣਹਿ ॥
ਸਚਾ ਸਾਹੁ ਸਚੇ ਵਣਜਾਰੇ ਪੂੰਜੀ ਨਾਮੁ ਵਿਸਾਹਾ ਹੇ ॥੪॥
ਆਪੇ ਸਾਜੇ ਸ੍ਰਿਸਟਿ ਉਪਾਏ ॥
ਵਿਰਲੇ ਕਉ ਗੁਰ ਸਬਦੁ ਬੁਝਾਏ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਹਿ ਸੇ ਜਨ ਸਾਚੇ ਕਾਟੇ ਜਮ ਕਾ ਫਾਹਾ ਹੇ ॥੫॥
ਭੰਨੈ ਘੜੇ ਸਵਾਰੇ ਸਾਜੇ ॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹਿ ਦੂਜੈ ਜੰਤ ਪਾਜੇ ॥
ਮਨਮੁਖ ਫਿਰਹਿ ਸਦਾ ਅੰਧੁ ਕਮਾਵਹਿ ਜਮ ਕਾ ਜੇਵੜਾ ਗਲਿ ਫਾਹਾ ਹੇ ॥੬॥
ਆਪੇ ਬਖਸੇ ਗੁਰ ਸੇਵਾ ਲਾਏ ॥
ਗੁਰਮਤੀ ਨਾਮੁ ਮੰਨਿ ਵਸਾਏ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਨਾਮੁ ਧਿਆਏ ਸਾਚਾ ਇਸੁ ਜਗ ਮਹਿ ਨਾਮੋ ਲਾਹਾ ਹੇ ॥੭॥
ਆਪੇ ਸਚਾ ਸਚੀ ਨਾਈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਦੇਵੈ ਮੰਨਿ ਵਸਾਈ ॥
ਜਿਨ ਮਨਿ ਵਸਿਆ ਸੇ ਜਨ ਸੋਹਹਿ ਤਿਨ ਸਿਰਿ ਚੂਕਾ ਕਾਹਾ ਹੇ ॥੮॥
ਅਗਮ ਅਗੋਚਰੁ ਕੀਮਤਿ ਨਹੀ ਪਾਈ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਮੰਨਿ ਵਸਾਈ ॥
ਸਦਾ ਸਬਦਿ ਸਾਲਾਹੀ ਗੁਣਦਾਤਾ ਲੇਖਾ ਕੋਇ ਨ ਮੰਗੈ ਤਾਹਾ ਹੇ ॥੯॥
ਬ੍ਰਹਮਾ ਬਿਸਨੁ ਰੁਦ੍ਰੁ ਤਿਸ ਕੀ ਸੇਵਾ ॥
ਅੰਤੁ ਨ ਪਾਵਹਿ ਅਲਖ ਅਭੇਵਾ ॥
ਜਿਨ ਕਉ ਨਦਰਿ ਕਰਹਿ ਤੂ ਅਪਣੀ ਗੁਰਮੁਖਿ ਅਲਖੁ ਲਖਾਹਾ ਹੇ ॥੧੦॥
मारू महला ३ ॥
सो सचु सेविहु सिरजणहारा ॥
सबदे दूख निवारणहारा ॥
अगमु अगोचरु कीमति नही पाई आपे अगम अथाहा हे ॥१॥
आपे सचा सचु वरताए ॥
इकि जन साचै आपे लाए ॥
साचो सेवहि साचु कमावहि नामे सचि समाहा हे ॥२॥
धुरि भगता मेले आपि मिलाए ॥
सची भगती आपे लाए ॥
साची बाणी सदा गुण गावै इसु जनमै का लाहा हे ॥३॥
गुरमुखि वणजु करहि परु आपु पछाणहि ॥
एकस बिनु को अवरु न जाणहि ॥
सचा साहु सचे वणजारे पूंजी नामु विसाहा हे ॥४॥
आपे साजे स्रिसटि उपाए ॥
विरले कउ गुर सबदु बुझाए ॥
सतिगुरु सेवहि से जन साचे काटे जम का फाहा हे ॥५॥
भंनै घड़े सवारे साजे ॥
माइआ मोहि दूजै जंत पाजे ॥
मनमुख फिरहि सदा अंधु कमावहि जम का जेवड़ा गलि फाहा हे ॥६॥
आपे बखसे गुर सेवा लाए ॥
गुरमती नामु मंनि वसाए ॥
अनदिनु नामु धिआए साचा इसु जग महि नामो लाहा हे ॥७॥
आपे सचा सची नाई ॥
गुरमुखि देवै मंनि वसाई ॥
जिन मनि वसिआ से जन सोहहि तिन सिरि चूका काहा हे ॥८॥
अगम अगोचरु कीमति नही पाई ॥
गुर परसादी मंनि वसाई ॥
सदा सबदि सालाही गुणदाता लेखा कोइ न मंगै ताहा हे ॥९॥
ब्रहमा बिसनु रुद्रु तिस की सेवा ॥
अंतु न पावहि अलख अभेवा ॥
जिन कउ नदरि करहि तू अपणी गुरमुखि अलखु लखाहा हे ॥१०॥
सो सचु सेविहु सिरजणहारा ॥
सबदे दूख निवारणहारा ॥
अगमु अगोचरु कीमति नही पाई आपे अगम अथाहा हे ॥१॥
आपे सचा सचु वरताए ॥
इकि जन साचै आपे लाए ॥
साचो सेवहि साचु कमावहि नामे सचि समाहा हे ॥२॥
धुरि भगता मेले आपि मिलाए ॥
सची भगती आपे लाए ॥
साची बाणी सदा गुण गावै इसु जनमै का लाहा हे ॥३॥
गुरमुखि वणजु करहि परु आपु पछाणहि ॥
एकस बिनु को अवरु न जाणहि ॥
सचा साहु सचे वणजारे पूंजी नामु विसाहा हे ॥४॥
आपे साजे स्रिसटि उपाए ॥
विरले कउ गुर सबदु बुझाए ॥
सतिगुरु सेवहि से जन साचे काटे जम का फाहा हे ॥५॥
भंनै घड़े सवारे साजे ॥
माइआ मोहि दूजै जंत पाजे ॥
मनमुख फिरहि सदा अंधु कमावहि जम का जेवड़ा गलि फाहा हे ॥६॥
आपे बखसे गुर सेवा लाए ॥
गुरमती नामु मंनि वसाए ॥
अनदिनु नामु धिआए साचा इसु जग महि नामो लाहा हे ॥७॥
आपे सचा सची नाई ॥
गुरमुखि देवै मंनि वसाई ॥
जिन मनि वसिआ से जन सोहहि तिन सिरि चूका काहा हे ॥८॥
अगम अगोचरु कीमति नही पाई ॥
गुर परसादी मंनि वसाई ॥
सदा सबदि सालाही गुणदाता लेखा कोइ न मंगै ताहा हे ॥९॥
ब्रहमा बिसनु रुद्रु तिस की सेवा ॥
अंतु न पावहि अलख अभेवा ॥
जिन कउ नदरि करहि तू अपणी गुरमुखि अलखु लखाहा हे ॥१०॥
हिन्दी अर्थ: मारू महला ३॥ हे भाई ! उस सदा कायम रहने वाले करतार का सिमरन किया करो। वह गुरू के शबद में जोड़ के (जीवों के सारे) दुख दूर करने की समर्था वाला है। हे भाई ! वह अपहुँच अगोचर और अथाह प्रभू (अपने जैसा) स्वयं ही है। उसका मूल्य नहीं पाया जा सकता। 1। हे भाई ! वह सदा कायम रहने वाला परमात्मा स्वयं ही अपना अटल हुकम चला रहा है। कई भक्तजन ऐसे हैं जिनको उस सदा-स्थिर करतार ने स्वयं ही अपने चरणों से जोड़ रखा है। वह भक्त जन सदा-स्थिर का ही सिमरन करते रहते हैं। सदा-स्थिर नाम (सिमरन) की कमाई करते हैं। नाम (सिमरन की बरकति) से वह उस सदा-स्थिर परमात्मा में लीन रहते हैं। 2। हे भाई ! धुर दरगाह से भक्तों को प्रभू स्वयं ही अपने साथ मिलाता है। स्वयं ही उनको अपनी सच्ची भक्ति में जोड़ता है। (उसकी अपनी मेहर से ही मनुष्य) सिफत-सालाह की बाणी से सदा उसके गुण गाता है- हे भाई ! ये सिफत-सालाह ही इस मानस जन्म की कमाई है। 3। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ते हैं वह (नाम जपने का) व्यापार करते हैं। (इस तरह किसी) पराए को और किसी अपने को (ऐसे) पहचानते हैं (कि इनमें) एक परमात्मा के बिना कोई और दूसरा बसता वे नहीं जानते। (वे समझते हैं कि सबको आत्मिक जीवन की पूँजी देने वाला) शाह-परमात्मा सदा कायम रहने वाला है। जीव उसके सदा-स्थिर नाम का व्यापार करने वाले हैं। (परमात्मा से) पूँजी (ले के उसका) नाम-सौदा खरीदते हैं। 4। (हे भाई !) परमात्मा स्वयं ही (जीवों को) पैदा करता है। स्वयं ही सृष्टि रचता है। (किसी) विरले (भाग्यशाली) को गुरू के शबद की सूझ भी स्वयं ही बख्शता है। (उसकी मेहर से जो मनुष्य) गुरू की शरण पड़ते हैं। वे अडोल जीवन वाले हो जाते हैं। परमात्मा स्वयं ही उनकी जम (आत्मिक मौत) के बँधन काटता है। 5। हे भाई ! (जीवों के शरीर-बर्तन) घड़ के (खुद ही) सँवारता है। माया के मोह में। मेर तेर में भी जीव (उसने स्वयं ही) डाले हुए हैं। अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य (मोह में) भटकते फिरते हैं। सदा अंधों वाले काम करते रहते हैं। उनके गले में आत्मिक मौत की रस्सी का बँधन बँधा रहता है। 6। हे भाई ! प्रभू स्वयं (जिन पर) बख्शिश करता है (उनको) गुरू की सेवा में जोड़ता है। गुरू की मति दे के (अपना) नाम (उनके) मन में बसाता है। जो मनुष्य हर वक्त हरी-नाम सिमरता है। वह अडोल जीवन वाला हो जाता है। हे भाई ! परमात्मा का नाम ही इस जगत में (असल) कमाई है। 7। हे भाई ! प्रभू स्वयं ही सदा कायम रहने वाला है। उसकी वडिआई भी सदा कायम रहने वाली है। गुरू के सन्मुख रख के (जीव को अपनी वडिआई) देता है (जीव के) मन में बसाता है। हे भाई ! जिनके मन में (परमात्मा का नाम) आ बसता है। वह मनुष्य (लोक-परलोक में) शोभते हैं। उनके सिर (पड़ा हुआ) भार समाप्त हो जाता है। 8। हे भाई ! परमात्मा अपहुँच है। ज्ञानेन्द्रियों की पहुँच से परे है। उसका मूल्य नहीं पाया जा सकता (किसी दुनियावी पदार्थ के बदले नहीं मिल सकता)। मैं तो उसको गुरू की कृपा से (अपने) मन में बसाता हूँ। गुरू के शबद से मैं सदा उस गुणों के दाते की सिफत-सालाह करता हूँ। (जो उस गुण-दाते की सिफत-सालाह करता है) उस (के कर्मों का) लेखा कोई नहीं माँगता। 9। हे भाई ! ब्रहमा। विष्णु। शिव (ये सारे) उस (परमात्मा) की ही शरण में रहते हैं। (ये बड़े-बड़े देवते भी उस) अलख और अभेव परमात्मा (के गुणों) का अंत नहीं पा सकते। हे प्रभू ! जिन पर तू अपनी मेहर की निगाह करता है उनको गुरू की शरण में ला के तू अपना अलख स्वरूप समझा देता है। 10।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 1053 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।
दिल्ली मेट्रो की सुबह 7 बजे की rush hour, हर चेहरा अपनी जल्दी में, और मन के अंदर यह विचार।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 46 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1053” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 1054 →, पीछे का: ← अंग 1052।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।