अंग 1027

अंग
1027
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਚਾਰਿ ਪਦਾਰਥ ਲੈ ਜਗਿ ਆਇਆ ॥
ਸਿਵ ਸਕਤੀ ਘਰਿ ਵਾਸਾ ਪਾਇਆ ॥
ਏਕੁ ਵਿਸਾਰੇ ਤਾ ਪਿੜ ਹਾਰੇ ਅੰਧੁਲੈ ਨਾਮੁ ਵਿਸਾਰਾ ਹੇ ॥੬॥
ਬਾਲਕੁ ਮਰੈ ਬਾਲਕ ਕੀ ਲੀਲਾ ॥
ਕਹਿ ਕਹਿ ਰੋਵਹਿ ਬਾਲੁ ਰੰਗੀਲਾ ॥
ਜਿਸ ਕਾ ਸਾ ਸੋ ਤਿਨ ਹੀ ਲੀਆ ਭੂਲਾ ਰੋਵਣਹਾਰਾ ਹੇ ॥੭॥
ਭਰਿ ਜੋਬਨਿ ਮਰਿ ਜਾਹਿ ਕਿ ਕੀਜੈ ॥
ਮੇਰਾ ਮੇਰਾ ਕਰਿ ਰੋਵੀਜੈ ॥
ਮਾਇਆ ਕਾਰਣਿ ਰੋਇ ਵਿਗੂਚਹਿ ਧ੍ਰਿਗੁ ਜੀਵਣੁ ਸੰਸਾਰਾ ਹੇ ॥੮॥
ਕਾਲੀ ਹੂ ਫੁਨਿ ਧਉਲੇ ਆਏ ॥
ਵਿਣੁ ਨਾਵੈ ਗਥੁ ਗਇਆ ਗਵਾਏ ॥
ਦੁਰਮਤਿ ਅੰਧੁਲਾ ਬਿਨਸਿ ਬਿਨਾਸੈ ਮੂਠੇ ਰੋਇ ਪੂਕਾਰਾ ਹੇ ॥੯॥
ਆਪੁ ਵੀਚਾਰਿ ਨ ਰੋਵੈ ਕੋਈ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਮਿਲੈ ਤ ਸੋਝੀ ਹੋਈ ॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਬਜਰ ਕਪਾਟ ਨ ਖੂਲਹਿ ਸਬਦਿ ਮਿਲੈ ਨਿਸਤਾਰਾ ਹੇ ॥੧੦॥
ਬਿਰਧਿ ਭਇਆ ਤਨੁ ਛੀਜੈ ਦੇਹੀ ॥
ਰਾਮੁ ਨ ਜਪਈ ਅੰਤਿ ਸਨੇਹੀ ॥
ਨਾਮੁ ਵਿਸਾਰਿ ਚਲੈ ਮੁਹਿ ਕਾਲੈ ਦਰਗਹ ਝੂਠੁ ਖੁਆਰਾ ਹੇ ॥੧੧॥
ਨਾਮੁ ਵਿਸਾਰਿ ਚਲੈ ਕੂੜਿਆਰੋ ॥
ਆਵਤ ਜਾਤ ਪੜੈ ਸਿਰਿ ਛਾਰੋ ॥
ਸਾਹੁਰੜੈ ਘਰਿ ਵਾਸੁ ਨ ਪਾਏ ਪੇਈਅੜੈ ਸਿਰਿ ਮਾਰਾ ਹੇ ॥੧੨॥
ਖਾਜੈ ਪੈਝੈ ਰਲੀ ਕਰੀਜੈ ॥
ਬਿਨੁ ਅਭ ਭਗਤੀ ਬਾਦਿ ਮਰੀਜੈ ॥
ਸਰ ਅਪਸਰ ਕੀ ਸਾਰ ਨ ਜਾਣੈ ਜਮੁ ਮਾਰੇ ਕਿਆ ਚਾਰਾ ਹੇ ॥੧੩॥
ਪਰਵਿਰਤੀ ਨਰਵਿਰਤਿ ਪਛਾਣੈ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸੰਗਿ ਸਬਦਿ ਘਰੁ ਜਾਣੈ ॥
ਕਿਸ ਹੀ ਮੰਦਾ ਆਖਿ ਨ ਚਲੈ ਸਚਿ ਖਰਾ ਸਚਿਆਰਾ ਹੇ ॥੧੪॥
ਸਾਚ ਬਿਨਾ ਦਰਿ ਸਿਝੈ ਨ ਕੋਈ ॥
ਸਾਚ ਸਬਦਿ ਪੈਝੈ ਪਤਿ ਹੋਈ ॥
ਆਪੇ ਬਖਸਿ ਲਏ ਤਿਸੁ ਭਾਵੈ ਹਉਮੈ ਗਰਬੁ ਨਿਵਾਰਾ ਹੇ ॥੧੫॥
ਗੁਰ ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਹੁਕਮੁ ਪਛਾਣੈ ॥
ਜੁਗਹ ਜੁਗੰਤਰ ਕੀ ਬਿਧਿ ਜਾਣੈ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਜਪਹੁ ਤਰੁ ਤਾਰੀ ਸਚੁ ਤਾਰੇ ਤਾਰਣਹਾਰਾ ਹੇ ॥੧੬॥੧॥੭॥
चारि पदारथ लै जगि आइआ ॥
सिव सकती घरि वासा पाइआ ॥
एकु विसारे ता पिड़ हारे अंधुलै नामु विसारा हे ॥६॥
बालकु मरै बालक की लीला ॥
कहि कहि रोवहि बालु रंगीला ॥
जिस का सा सो तिन ही लीआ भूला रोवणहारा हे ॥७॥
भरि जोबनि मरि जाहि कि कीजै ॥
मेरा मेरा करि रोवीजै ॥
माइआ कारणि रोइ विगूचहि ध्रिगु जीवणु संसारा हे ॥८॥
काली हू फुनि धउले आए ॥
विणु नावै गथु गइआ गवाए ॥
दुरमति अंधुला बिनसि बिनासै मूठे रोइ पूकारा हे ॥९॥
आपु वीचारि न रोवै कोई ॥
सतिगुरु मिलै त सोझी होई ॥
बिनु गुर बजर कपाट न खूलहि सबदि मिलै निसतारा हे ॥१०॥
बिरधि भइआ तनु छीजै देही ॥
रामु न जपई अंति सनेही ॥
नामु विसारि चलै मुहि कालै दरगह झूठु खुआरा हे ॥११॥
नामु विसारि चलै कूड़िआरो ॥
आवत जात पड़ै सिरि छारो ॥
साहुरड़ै घरि वासु न पाए पेईअड़ै सिरि मारा हे ॥१२॥
खाजै पैझै रली करीजै ॥
बिनु अभ भगती बादि मरीजै ॥
सर अपसर की सार न जाणै जमु मारे किआ चारा हे ॥१३॥
परविरती नरविरति पछाणै ॥
गुर कै संगि सबदि घरु जाणै ॥
किस ही मंदा आखि न चलै सचि खरा सचिआरा हे ॥१४॥
साच बिना दरि सिझै न कोई ॥
साच सबदि पैझै पति होई ॥
आपे बखसि लए तिसु भावै हउमै गरबु निवारा हे ॥१५॥
गुर किरपा ते हुकमु पछाणै ॥
जुगह जुगंतर की बिधि जाणै ॥
नानक नामु जपहु तरु तारी सचु तारे तारणहारा हे ॥१६॥१॥७॥

हिन्दी अर्थ: (परमात्मा से) चार पदार्थ ले कर जीव जगत में आया है। (पर यहाँ आ के) प्रभू की रची हुई माया के घर में ठिकाना बना बैठा है (भाव। माया के मोह में फस जाता है। माया के मोह में) अंधे हुए जीव ने प्रभू का नाम भुला दिया है। जो जीव नाम भुलाता है वह मानस जनम की बाजी हार जाता है। 6। (देखो माया के मोह का प्रभाव ! जब किसी के घर में कोई) बालक मरता है। तो (माता-पिता-बहिन-भाई आदि संबंधी जन) उस बालक की प्यार-भरी खेलें याद करते हैं। और यह कह-कह के रोते हैं कि बालक बहुत ही हस-मुख था। जिस प्रभू का भेजा हुआ वह बालक था उसने वह वापस ले लिया (उसको याद कर-कर के) रोने वाला (माया के मोह में फस के जीवन-राह से) टूट जाता है। 7। जब कोई भर जवानी में मर जाते हैं तो भी क्या किया जा सकता है। ये कह-कह के रोया जाता ही है कि वह मेरा (प्यारा) था। (जो रोते भी हैं वह भी अपनी कमियां याद कर कर के) माया की खातिर रो-रो के दुखी होते हैं। जगत में ऐसा जीवन धिक्कारयोग्य हो जाता है। 8। (जवानी गुजर जाती है) काले केसों से फिर धौले आ जाते हैं (इस उम्र तक भी) प्रभू के नाम से टूटा रह के मनुष्य अपने आत्मिक जीवन का सरमाया गवाए जाता है। बुरी मति के पीछे लग के माया के मोह में अंधा हुआ जीव आत्मिक मौत सहेड़ के आत्मिक मौत मरता रहता है। माया का ठॅगा हुआ माया की खातिर ही रो-रो के पुकारता है (उस उम्र तक भी माया के रोने रोता रहता है)। 9। जो कोई मनुष्य अपने आप को विचारता है (अपने आत्मिक जीवन को पड़तालता रहता है) वह पछताता नहीं। पर यह समझ किसी को तब ही होती है जब उसको गुरू मिल जाए। (माया के मोह के कारण मनुष्य की अक्ल पर पर्दा पड़ा रहता है; अक्ल मानो। करड़े किवाड़ों में बंद रहती है) गुरू के बिना (वे) करड़े किवाड़ नहीं खुलते। जो मनुष्य गुरू के शबद में जुड़ता है वह (इस कैद में से) मुक्ति हासिल कर लेता है। 10। मनुष्य बुढा हो जाता है। (उसका) शरीर भी कमजोर हो जाता है (पर माया का मोह इतना प्रबल है कि अभी भी) परमात्मा का नाम नहीं सिमरता जो (सब साक-संबंधियों के साथ छोड़ जाने पर भी) अंत को प्यारा साथी बनता है। परमात्मा का नाम भुला के मनुष्य बदनामी का टीका माथे पर लगा के यहाँ से चल पड़ता है। पल्ले झूठ ही है (पल्ले माया का मोह ही है। इस वास्ते) प्रभू की हजूरी में ख़्वार ही होता है। 11। (सारी उम्र) झूठ का व्यापार करने वाला व्यक्ति परमात्मा का नाम भुला के (यहाँ से आत्मिक गुणों से खाली हाथ) चल पड़ता है। जनम-मरण के चक्कर में पड़े हुए के सिर पर राख ही पड़ती है (धिक्कारें पड़ती हैं)। (यहाँ से गए को) परमात्मा के दर पर कोई जगह नहीं मिलती। (जब तक) जगत में (रहा। यहाँ) भी सिर पर चोटें ही खाता रहा। 12। (अच्छा) खाते हैं। (अच्छा) पहनते हैं। (दुनिया की) मौज मनाते हैं (इन ही व्यस्तताओं में) हृदय परमात्मा की भक्ति से सूना रहने के कारण व्यर्थ ही आत्मिक मौत सहेड़ लेता है। जो व्यक्ति (इस तरह अंधा हो के) अच्छे-बुरे समय की सूझ नहीं जानता। उसको जम दुखी करता है। और उसकी कोई पेश नहीं चलती। 13। जो मनुष्य दुनिया की किरत-कार करता हुआ दुनिया से उपराम रहना जानता है। जो गुरू की संगति में रह के गुरू के शबद में जुड़ के परमात्मा के साथ मिलाप-अवस्था वाली सांझ डाले रखता है। जीवन-यात्रा में किसी को बुरा नहीं कहता। सदा-स्थिर-प्रभू में टिका रहता है वह सच का व्यापारी व्यक्ति (प्रभू की हजूरी में) खरा (सिक्का माना जाता) है। 14। सदा-स्थिर-प्रभू के नाम के बिना कोई मनुष्य (प्रभू के) दर पे (जिंदगी की पड़ताल में) कामयाब नहीं होता। सदा-स्थिर प्रभू की सिफत-सालाह की बाणी में जुड़ने से सिरोपा मिलता है सम्मान मिलता है। (पर जीवों के भी क्या वश। ) जिस पर प्रभू स्वयं बख्शिश करता है। वह उसको प्यारा लगने लग जाता है और वह अहम्-अहंकार (अपने अंदर से) दूर करता है। 15। गुरू की मेहर से ही मनुष्य परमात्मा के हुकम को पहचानता है और युगों-युगांतरों से चली आ रही उस विधि से सांझ डालता है (जिससे संसार-समुंद्र से सही सलामत पार लांघा जा सकता है। वह विधि है परमात्मा का नाम सिमरना)। हे नानक ! (कह- हे भाई ! परमात्मा का) नाम जपो (नाम सिमरन की) तैराकी तैरो। (इस तरह) सदा-स्थिर-प्रभू और पार लंघाने में समर्थ प्रभू (संसार-समुंद्र में से) पार लंघा लेता है। 16। 1। 7।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਹਰਿ ਸਾ ਮੀਤੁ ਨਾਹੀ ਮੈ ਕੋਈ ॥
ਜਿਨਿ ਤਨੁ ਮਨੁ ਦੀਆ ਸੁਰਤਿ ਸਮੋਈ ॥
ਸਰਬ ਜੀਆ ਪ੍ਰਤਿਪਾਲਿ ਸਮਾਲੇ ਸੋ ਅੰਤਰਿ ਦਾਨਾ ਬੀਨਾ ਹੇ ॥੧॥
ਗੁਰੁ ਸਰਵਰੁ ਹਮ ਹੰਸ ਪਿਆਰੇ ॥
ਸਾਗਰ ਮਹਿ ਰਤਨ ਲਾਲ ਬਹੁ ਸਾਰੇ ॥
ਮੋਤੀ ਮਾਣਕ ਹੀਰਾ ਹਰਿ ਜਸੁ ਗਾਵਤ ਮਨੁ ਤਨੁ ਭੀਨਾ ਹੇ ॥੨॥
ਹਰਿ ਅਗਮ ਅਗਾਹੁ ਅਗਾਧਿ ਨਿਰਾਲਾ ॥
ਹਰਿ ਅੰਤੁ ਨ ਪਾਈਐ ਗੁਰ ਗੋਪਾਲਾ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਮਤਿ ਤਾਰੇ ਤਾਰਣਹਾਰਾ ਮੇਲਿ ਲਏ ਰੰਗਿ ਲੀਨਾ ਹੇ ॥੩॥
ਸਤਿਗੁਰ ਬਾਝਹੁ ਮੁਕਤਿ ਕਿਨੇਹੀ ॥
ਓਹੁ ਆਦਿ ਜੁਗਾਦੀ ਰਾਮ ਸਨੇਹੀ ॥
ਦਰਗਹ ਮੁਕਤਿ ਕਰੇ ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਬਖਸੇ ਅਵਗੁਣ ਕੀਨਾ ਹੇ ॥੪॥
मारू महला १ ॥
हरि सा मीतु नाही मै कोई ॥
जिनि तनु मनु दीआ सुरति समोई ॥
सरब जीआ प्रतिपालि समाले सो अंतरि दाना बीना हे ॥१॥
गुरु सरवरु हम हंस पिआरे ॥
सागर महि रतन लाल बहु सारे ॥
मोती माणक हीरा हरि जसु गावत मनु तनु भीना हे ॥२॥
हरि अगम अगाहु अगाधि निराला ॥
हरि अंतु न पाईऐ गुर गोपाला ॥
सतिगुर मति तारे तारणहारा मेलि लए रंगि लीना हे ॥३॥
सतिगुर बाझहु मुकति किनेही ॥
ओहु आदि जुगादी राम सनेही ॥
दरगह मुकति करे करि किरपा बखसे अवगुण कीना हे ॥४॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला १॥ मुझे परमात्मा जैसा और कोई मित्र नहीं दिखता। (परमात्मा ही है) जिसने मुझे यह शरीर दिया यह (मन) जीवात्मा दी और मेरे अंदर सुरति टिका दी। (वह सिर्फ प्रभू ही है जो) सारे जीवों की पालना करके सबकी संभाल करता है। वह सब जीवों के अंदर मौजूद है। सबके दिलों की जानता है। सबके किए कर्मों को देखता है। 1। (पर वह मित्र-प्रभू गुरू की शरण पड़ने से मिलता है) गुरू सरोवर है। हम जीव उस प्यारे (सरोवर) के हंस हैं (गुरू के हो के रहने वाले हंसों को गुरू मान-सरोवर में मोती मिलते हैं)। (गुरू समुंद्र है) उस समुंद्र में (परमात्मा की सिफत-सालाह के) रतन हैं। लाल हैं। मोती-माणक हैं। हीरे हैं। (गुरू-समुंद्र में टिक के) परमात्मा के गुण गाने से मन (हरी के प्रेम-रंग में) भीग जाता है। शरीर (भी) भीग जाता है। 2। (सब जीवों में व्यापक होते हुए भी) परमात्मा जीवों की पहुँच से परे है। अथाह है। उसके गुणों (के समुंद्र) की थाह नहीं मिलती। वह निर्लिप है। सृष्टि के रखवाले। सबसे बड़े हरी के गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता। सब जीवों को संसार-समुंद्र से पार लंघाने में समर्थ प्रभू सतिगुरू की मति दे कर पार लंघा लेता है। जिस जीव को वह अपने चरणों में जोड़ता है वह उसके प्रेम-रंग में लीन हो जाता है। 3। गुरू को मिले बिना (माया के मोह-समुंद्र से) मुकित नहीं मिलती। वह परमात्मा सारे जगत का मूल है। जुगों के आरम्भ से है। सबमें व्यापक और सबसे प्यार करने वाला है (वह स्वयं ही गुरू से मिलाता है)। वह परमात्मा मेहर करके हमारे किए अवगुणों को बख्शता है। हमें अवगुणों से मुक्ति देता है और अपनी हजूरी में रखता है। 4।

संदर्भ: यह अंग 1027 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।

गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।

Punjabi Bagh के gurdwara में अरदास के बाद का calm।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 46 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1027” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 1028 →, पीछे का: ← अंग 1026

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।